Friday, November 30, 2018

----- || काव्यमंडन २ || -----

जिन हाथों के लोहमयी हल पर..,
चमकते प्रस्वेद कणों के बल पर..,
दसों दिशाएं ज्योतिर होती थीं..,
वो किसान कहो कौन थे..,


जिनके श्रम-बिंदु संच कर धरती.., 
कणिका-कणिका कनकमय करती.., 
माणिक मुक्ता माल पिरोती थी..,
वो किसान कहो कौन थे .....

Monday, November 19, 2018

----- || राग-रंग १५ | -----,

----- || राग-दरबार || -----
लो फिर हर शै हुई ज़ाहिरॉ.., 
ए चाँद तेरे नूर से..,
अपनी शम्मे-रु को अब..,
मैं किस तरह अर्जे-हाल करूँ..,

शाम ज़रा स्याहे-गूँ तो हो..,
लम्हे भर को तू हिज़ाब कर..,
सिल्के-गौहरे-गुल के दस्त..,
 मैँ ख्वाबे-शब विसाल करूँ.....

Sunday, November 18, 2018

----- || राग-रंग १४ | -----,

----- || राग-बिहाग || -----

 जर जर मनोहर दीपक अवली  
जगुरावत घन तम निसि चहुँ दिसि कुञ्ज कुञ्ज सब गेह गली || १ || 

बेनु के बेढ़ब माहि प्रजरत,जिमि लाल मनि मुक्ता बली || 
सकल कला गह बिकसहि चंदा बिकसाइ सब कुमोद कली || २ || 

बरन दिगंतर गौरज बेला  साँझि गहे बरमाल चली || 
सीस धरे पिय के पग धुरी अभरत सुभग सेंदुर ढली || ३ || 

पाँव पधारत पँवरी पँवरी लागहि साँवरि रैन भली || 
दीप्ति मत मुख अंचल ढाँकी समीप सहुँ सकुचात चली || ४ || 



Saturday, November 17, 2018

----- || राग-रंग १३ | -----,

----- || राजस्थानी-धुन || -----

कर्यो तिलक लिलारा केसर्यो..,

चौक पुराया आँगणियो प्यारो पावणा पधर्यो ..,
मेल्यो जोड़ो रो लस्करिआ पिचरंगी पागड़ो पहर्यो..,

पगां लखीना मोचड़ा जी हाथ हीराजड़ मूंदड़ा..,
सो व सोरठड़ी कटियार करधन उप्पर फेंटा फिर्यो..,

सोवनी ऊछली घोड़ी बरणी सै जी राजकुमारी..,
कान्हो बजावै बंसरी नगरी तावड़िया पग धर्यो..,

ओजी रंगाद्यो बाला चुनड़ी घढ़ द्यो बैंयारो चुडलो..,
न्यारो नौलड़ी रा हार जी ढोला बांकड़ा मनहर्यो..,

मांग्यो मेलियो सोहाग बर परमेश्वर धण भाग रो ..,
जीवणजोति हरि को रूप महान्यो ब्यावण चढ़्यो ..,

हाल्दि उबटणों अन्हायो रांच्यो मेहन्दड़ि हथेलवो..,
घाल्यो कोयाँ रो काजलों जी ढोला सांवड़ा सँवर्यो..,

म्हारो बिंदणों म्हारो कानड़ो सो तो म्हारो राज..,
पल्लो जिरंजीव को डुपटो घुल घुल गाँठा पड़्यो.....

भावार्थ : - चौंक पूर्णित आँगन ( आटे की आयातकार रचना जिसके ऊपर चौंकी रखकर वर का स्वागत किया जाता है ) में हृदय प्रिय अतिथि पधार रहे हैं अरे तिलक ! तुम उनके मस्तक की आभा को केसरी रंग से युक्त करना | उन्होंने ने दैदिप्यवान आभूषा धारण की है उसपर मेल करती पञ्चवर्णवाली पगड़ी है | उनके चरण में.......... उनके हाथ में हीराजटित मुद्रिका है करधन पर सोरठ की कटार  सुशोभित है जिसके ऊपर कटिबंध आबद्ध है | सुन्दर घोड़ी उछल कर निवेदन कर रही हमें राजकुमारी का वरण करना है |  सम्मुख भगवान कृष्ण का बांसुरी वादन संकेत कर रहा है कि नगर के तालाब के निकट उनका पदार्पण हो चुका है | अब इस कन्या की भी  चुनरी रंगवा दो कलाई के कंगन  नौलड़ियों से युक्त अद्वितीय हार गढ़वा दो हमारा ढोला (प्रियतम ) अत्यंत मनोहर और आकर्षक है | धन्य भाग! जैसा माँगा वैसा जीवनसाथी  मिला ये वर परमेश्वर के सदृश्य व् जीवनज्योति विष्णुस्वरूप हैं जो मुझसे विवाह करने हेतु आए हैं | हल्दी उबटन से स्नान कर  हथेली पर मेहंदी रची नेत्र पोरों को अंजन से युक्त कर  इस प्रकार प्रियतम अत्यंत मनोयोग से सुसज्जित हुवे है अरे आँचल ! तुम हमारे उस प्राणाधार चिरंजीवी के दुपट्टे में अतिशय सुदृढ़ ग्रंथि करना |

Friday, November 16, 2018

----- || राग-रंग १२ ||-----,

----- || राग -भैरवी || -----
जागौ रे हे सिंधु सयन
जागौ हे जगन्नाथ हरे
जगरावत जग जागति ज्योति घरि भर के ही सार बरे..,
गगन सदन रबि पियबर जागे प्रभा पद धूरि सीस धरे..,
नभपथ अरुन सारथी संगत रस्मि गहे रथ सथ उतरे..,
पधरत नदि नदि परबत परबत करत भोर अंजोर भरे..,
जागौ तुमहु हे सिंधु सयन..

रैन बसेरा छाँड़ के पाँखि सैन बिहुरे नभ उड़ि चरे..,
कुसुमित भयउ सब कुञ्ज निकुंज सकल सुमन बन माल परे..,
सकल सरोजल भयउ सरोजी ओस बूँदि के मुकुत घरे..,  
निर्झरीं सों झरी निरझरनी झरझर जर रमझोर झरे..,  
जागौ रे हे सिंधु सयन..

रैन सलोनी पग बहुराई फूटहि पौ पँवरे पँवरे..,
सुबरन मई भई अँगनाई द्वार पुर गोपुर सँवरे 
अरुन चूड़ कर जोरि निहोरत बिनत सीस बोलत भँवरे.., 
हे कमल नयन तोहि पुकारत तुहरे भगत जुहार करे.., 
जागौ रे हे सिंधु सयन.....
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जागौ रे मम लाल मनोहर
सैन बसाए नैन भवन हरि रहो नहि  ललना सोइ परे
गगन सदन रबि पियबर जागे प्रभा पद धूरि सीस धरे..,
जगरावत जग जागति ज्योति घरि भर के ही सार बरे..,
नभपथ अरुन सारथी संगत रस्मि गहे रथ सथ उतरे..,
पधरत नदि नदि परबत परबत करत भोर अंजोर भरे..,
जागौ तुमहु हे सिंधु सयन..



----- || राग-रंग ११ | -----

मैं बागे-रु वो चश्में-गुल शबनम के क़तरों की तरह..,
वो ख़्वाब है तो क्यूँ न रख्खूँ उसको मैं पलकों की तरह..,
सफ़हे-आइना-ए-हेरते वो झुकती है कदमों पर मेरे..,
उठता हूँ फिर पेशानी पे उसके मैं सुर्ख़ ज़र्रों की तरह.....

बहारे गुल तरन्नुम छेड़ती और गुनगुनाती है हवा..,
जब पड़ता हूँ उसको क़ाग़ज़े पुरनम के नग्मों की तरह..,

शब् को शम्मे करके रौशन देखूँ जब चिलमन से उसे..,
रख्खे हथेली को निग़ाहों पे वो परदों की तरह


Thursday, November 15, 2018

----- || राग-रंग १० | -----,

   ----- || राग-भैरवी || -----

सोहत सिंदूरि चंदा जूँ रैन गगन काल पे..,
लाल लाल चमके रे बिंदिआ तुहरे भाल पे..,

कंगन कलाई कर पियतम संग डोलते..,
पाँव परे नूपुर सों छनन छनन बोलते..,
छत छत फिरत काहे  दीप गहे थाल पे..,
जब लाल लाल चमके रे बिंदिया तुहरे भाल पे..,

चरत डगरी रोकि रोकि बूझत ए बैन कहे.., 
बिरुझे मोरे नैन सहुँ काहे तुहरे नैन कहे ..,
देइ के पट पाटली भुज सेखर बिसाल पे..,
लाल लाल चमके रे बिंदिया तुहरे भाल पे..,

गुम्फित छदम मुक्ता हीर मनि बल के रे..,
करत छल छंद बहु छन छब सी झलके रे.., 
रिझियो ना भीति केरी मनियारि जाल पे.., 
लाल लाल चमके रे बिंदिया तुहरे भाल पे.....