Wednesday, June 27, 2018

----- || प्रभात-चरित्र १ || -----

बुधवार, २८ जून, २०१८                                                                           

सरिदबरा की धार ते, पयदबान जौ देस | 
तीन देउ रच्छा करें ब्रम्हा बिष्नु महेस || १ || 

पद पद सदोपदेस इहँ ग्रंथ ग्रंथ सद ग्रंथ | 

भगवन पाहि पहुँचावैं दरसावत सत पंथ || २ || 

कहत भूमि निज मात जहँ रतनन की आगार | 

धनधान ताहि संपन्न भरे भूरि भंडार || ३ || 

धौल गिरि के मौलि मुकुट जाके सीस सिँगार | 

तीन सिंधु कर जोरि के करिते चरन पखार || ४ || 

सील चरित के भूषना भाव भगति के भेस | 

बास बास हरि बास जहँ परम पवित परिबेस || ५ || 

यह देस सो देस जहां रहँ सब जीअ सुखारि । 
राम रमे बन बन तहाँ कुञ्ज कुञ्ज गिरधारि ॥६ ॥ 


जेहि देस कर मानसा रहे सहित परिबार | 
ताहि सीस नवाई के बन्दै चरन जुहार || ७ || 

भावार्थ : - गंगा जी की पवित्र धाराओं से जो देश सदैव पयस्वान ( जल से परिपूर्ण ) रहता है | ब्रह्मा, विष्णु महेश  जिसकी रक्षा करते हैं || १ || जहाँ पद पद पर सदोपदेश मिलते हैं, जहाँ के प्रत्येक धर्म ग्रन्थ धर्म के चार चरणों पर स्थित होकर सत्ग्रन्थ है जो  सन्मार्ग को दर्शाते हुवे ईश्वर के पास पहुंचाते हैं || २ || जिस देश में धरती को माता कहकर पुकारते हैं वह रत्नों की खान है वह धन धान्य से सम्पन्न है भंडारों को परिपूर्ण रखती है || ३ || जिस देश का शीश हिमालय पर्वत के शिखर मुकुट से श्रृंगारित  है, तीन सिंधु करबद्ध होकर जिसके चरण का प्रक्षालन करते हैं || ४ || शील व् चरित्र ही जिसके आभूषण हैं भाव -भक्ति जिसकी वेशभूषा है जहाँ का प्रत्येक निवास ईश्वर के निवास के समतुल्य है जहाँ का परिवेश परम पवित्र है || ५ || यह देश वह देश है एक समय जहाँ संसार के सभी जीवंतकों को जीवन का अधिकार था यहां वन वन में भगवान श्री राम का व कुञ्ज कुञ्ज में गिरधारी का वास हुवा ॥६ ||विद्यमान काल में भी जिस देश का जनमानस कुटुंब सहित निवास करता है  नतमस्तक होकर हम उस देश की चरण वंदना करते हैं || ७ || 

बृहस्पतिवार, २९ जून , २०१८                                                            

सत सत बंदन सो बिद्बाना | साधक गुरु जग सिद्ध सुजाना || 
आखरि ग्यान देयब मोही | कीन्हि धनि बिद्या मनि सोंही || 
उन विद्वानों का सत् सत् अभिवंदन है जो साधक है ज्ञानी है व् जगत सिद्ध गुरु है | जिन्होंने मुझे अक्षर ज्ञान देकर विद्या रूपी धन से धनवान किया | 

जाके बल मसि धरिअ उजासे  | धर्म बिकासत पाप बिनासा || 
तासु कृपा सुर बिंजन माला | रररत होइँ मूक बाचाला || 
इस विद्या की शक्ति से ही मलिन मलिनांबु ने उज्वलता धारण कर अधर्म का विनाश और  धर्म का विकास किया | उनकी कृपा से ही  स्वर व् व्यंजन मालाओं का अध्ययनोभ्यास कर यह मूक मुख भी वाचाल हो गया | 

सो गुरु दीप सीख भै जोती | पोथी सीप बरन कर मोती || 
चुनि चुनि पुनि मोरे कर धरयो | तामस अंतर गेह उजरियो || 
वह गुरु दीप स्वरूप व् उनकी  शिक्षा ज्योति स्वरूप है सीप स्वरूप पुस्तकों व ग्रन्थों से जिन्होंने शब्दों के मुक्ता को चुन चुन कर मेरे करतल पर धरा और मेरे अंधकारमय अन्तर गृह को ज्योतिर्मय  कर दिया || 

आन आन रतनन सन लस्यो  | रचत भनित मय भूषन बस्यो || 
बचन देसु रह निपट कुबेसा | भाष भेस दए कियउ सुदेसा || 
यह मुक्ता अन्यान्य रत्नों के संग सुशोभित होकर काव्यमय रचना के आभूषणों में निवासित हुवे | मेरा वाक्य देश का वेश नितांत ही निकृष्ट था किन्तु गुरुजनों ने भाषा के उत्कृष्ट वेश देकर इस देश को सुन्दर व् रमणीक देश में परिणित कर दिया |  

जानब सो सब सुबुधजन मम हरिदय तम घोरि | 
चरन चरन सचेत कियो चेतत जड़ मति मोरि || 
मेरे ह्रदय के घोर अन्धकार को भानते हुवे वह सभी सुबुद्ध जन मेरी जड़तम बुद्धि को चैतन्य कर चरण-चरण पर मुझे संज्ञावान करते रहे | 

शनिवार, ३० जून, २०१८                                                                                             

यहु अनंत अम्बर इब अंका | गुरूगह ताल जगति जस पंका || 
सकल गुरुजन अरबिंदु बृंदा | सिस अलि गन ग्यान मकरंदा || 
यह अनंत अम्बर एक स्थली के व् मानवीय संसार कीचड़ के समरूप है जहाँ गुरुशाला सरोवर के समान है | सभी गुरुजन कमल स्वरूप हैं,  शिष्य भ्रमर के तथा ज्ञान मकरंद के सरिस है | 

जौ सिस मिरदा गुरु घटकारा  | सार देइ घट लेइ अकारा || 
तीर तलावा जल भरि लावा | तृषा हरत सो जगत सुहावा || 
शिष्य यदि कच्ची मृदा है तो गुरु कुम्भकार है उसकी शिक्षा रूपी सार के द्वारा शिष्य कुम्भाकृति को प्राप्त होता है | इस आकृति के पश्चात वह पात्र स्वरूप हो जल स्त्रोतों से जल भरने में समर्थ होकर जिज्ञाषा रूपी पिपाशा को शांत करते हुवे संसार में सुशोभित होता है | 

अंक तंत्र गुरु मोहि जनावा | काल गतिहि पुनि गनि मैं पावा || 
भौनत भूमि भानु के मंडल | भूतमय भौति जगत चलाचल || 
गणित शास्त्र के गुरु के ज्ञान मकरंद ने  मुझे काल की गणना करने में समर्थ किया | भूमि सौर्य मंडल में घूर्णन करती है यह भौतिक जगत पदार्थमय है जो चल व् अचल दो प्रकार की गतियों से युक्त है यह भी मुझे गुरु के ज्ञान मकरंद से ही ज्ञात हुवा | 

नगर नगर बन नग नद नावा | देस दिसा कर पुनि सुमिरावा || 
जान रसायन जगि जिग्यासा | जानेउ सबहि जग इतिहासा || 
नगरों तथा नगरों में स्थित पर्वतों नदियों के देशों के तथा विभिन्न दिशाओं के नामों का स्मरण करवाया | रसायन विज्ञान का ज्ञान ग्रहण जब जिज्ञासा जागृत हुई तब मैने समूचे विश्व के इतिहास का परिचय प्राप्त किया | 

पाहन कर एहि जग निरजीवा | जीउ जंत ते होइँ सजीवा || 
अर्थ बिदूषक सीख दिए मोहि | अजहूँ त जगत अरथ गत होंहि || 
 जीव है जंतु है तभी यह संसार सजीव है अन्यथा यह पाषाणमय संसार निर्जीव है | अर्थ विदूषक ने मुझे शिक्षा दी कि अधुनातन यह जगत अर्थ पर आश्रित है (धर्म पर नहीं है ने यह ज्ञान गुरुओं की वाणी ने दिया )| 

बहिर जगत तेउ परचत दिए सीख ब्यौहारि | 
सकल बिद्याकर के कर अनगढ़ घट कृत कारि || 
बाह्यजगत का परिचय देकर मुझे इस गुरुशाला में व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हुवा  | इसप्रकार सभी विद्याकरों के ज्ञान  ने मुझ अनगढ़ को गढ़ कर  कुम्भ की आकृति प्रदान की | 

वीरवार, ०१ जुलाई, २०१८                                                                                                

दिसि बिनु नयन श्रवन बिनु काना | तन बिनु प्रान अर्थ बिनु दाना | 
धन ते पीन धरम ते दीना | होत कुम्भ तस कंज बिहीना || 
जल से विहीन कुम्भ की प्रकृति दृष्टि रहित नयन, श्रवण रहित कर्ण, प्राण रहित देह,  दान रहित अर्थ के तथा  धन से पुष्ट किन्तु धर्म से दीन धनवान के जैसे ही होती है | 

गुरु बिन गुन ग्यान नहि होई | कहिअ ए सुधि बुधिजन सब कोई || 
ग्यान बिनु जौ करिए बखाना | होइब फर बिनु बान समाना || 
 गुरु बिना ज्ञान उपलब्ध नहीं होता ऐसा सुबुद्ध जनों का कहना है | ज्ञान रहित व्याख्यान फल रहित बाण के समान होता है जो वांछित परिणाम नहीं देता | 

बिदयाकर दए घट आकारी | दूषन धारि कि गुन रस वारी || 
एक घट माया मद के गाही  | दूजे बरखत नभोद्बाही || 
विद्याकर अपने शिष्य को कुम्भ की आकृति प्रदान करते  है वह कुम्भ गुण व् दोष दोनों से युक्त  हो सकता है | एक कुम्भ माया रूपी मदिरा का धारक  तो दुसरा श्रावण मास के बरसने वाले बादलों जैसा हो सकता  है | 

भरोस बिनु न प्रीति के पोषा | ज्ञान दिसि बिनु दिसै न दोषा || 
पेम भक्ति सो अमरित धारा | तासों रहित सकल जल खारा || 
विश्वास से रहित होकर प्रेम पुष्ट नहीं होता और ज्ञानदृष्टि के बिना दोष दर्शित नहीं होते | प्रेम भक्ति से युक्त ज्ञान जल अमृत धारा के समान है उससे विहीन समस्त ज्ञान खारापन लिए होता है | 

निर्मल जल बरखाए ते बिकसै भनित निकुंज  | 
कबित कुसुम रस पाए के मधुप निकर करि गुंज || 
 प्रेम व भक्तिमय ज्ञान रूपी निर्मल जल के वर्षा से ही (युगकालीन )रचनाओं के निकुंज प्रस्फुटित होते हैं | कवित के कुसुम रस का पानकर उसपर कविता रसिक मधुकर के समूह सदैव गुंजन करते हैं, अर्थात प्रीति व् भक्ति मई ज्ञान रचनाए युग युग तक पठनीय होती हैं | 

सोमवार, ०२ जुलाई, २०१८                                                                                

धर्म ग्रन्थ श्रुति बेद पुराना |  अहँ पनियन केरे तट नाना || 
परम पुरुख सुभ कीन्हि चरिता | मोरे कलस हुँत भयउ सरिता || 
श्रुति वेद पुराणों सहित समस्त धर्मग्रंथ ज्ञान जल के विभिन्न स्त्रोत हैं इनके सहित महापुरुषों द्वारा कृत चरित्रावलियाँ मेरे कलश हेतु ज्ञान सरिता हुवे | 

साधु सुजन संतन करि बानी | होत गुनद अति निर्मल पानी || 
अस तौ बहत बहुंत परनाला | ताहि बरत जग करिअ कुचाला || 
साधू, सज्जन तथा संतों की वाणी भी अतिशय गुणदायक व् निर्मल जल स्वरूप है जहाँ से मुझे ज्ञानजल प्राप्त हुवा | ऐसे तो बहुंत से परनाले भी बहते दर्शित होते हैं जिसका उपयोग कर ही लोग कुत्सित आचरण करते हैं | 

अजहुँ त साधू संत भए थोड़े  | अधिक जोइ कहँ दिए जग छोड़े || 
कामिनि काँचन बासहि मन में | जति बलकल बसबासिहि तन में || 
विद्यमान समय में  साधू संत भी अत्यल्प हो गए | वह साधू संत अत्यधिक हो गए जो विरक्ति व् वैराग्य का दम्भ भरते हैं जिनके तन में तपस्वी का वेश विराजित रहता है किन्तु मन में स्त्री व् धन सम्पदा के प्रति कामासक्ति निवासित रहती है | 

बिनु सत्संग न होत बिबेका | बिबेक बिनु गुन दोषु रहँ एका || 
कलिमल सब अनभल संगोठी | काल कलुष कलंक करि कोठी || 
सत्संग के बिना हंस विवेक नहीं होता, विवेक से गुण- दोष को विभक्त करने का ज्ञान नहीं होता, इसके बिना यह एक से प्रतीत होते हैं | कलयुग की सभी संगोष्ठियां असाधुओं  की हो चली है ये सभी पापमयी व् दोषों से परिपूर्ण हैं अत: इस काल में सत्संग कठिन है | 

जाकी बानी बान समाना | जाकर पानि कटै पाषाना || 
सो सब जगगुरु सतगुरु मोरे | ता सहुँ रहौं सदा कर जोरे || 
जिसकी वाणी बाण के समान हो जिनके ज्ञान रूपी पाणी  (पानी इतना पैना होता है जो पाषाण को भी काटने में समर्थ  होता है युग के पाषाण काटने में वह भी असमर्थ होता है, पानी से पैना ज्ञान होता है ) युगों के पाषाण को  भी काटने में सक्षम है, वह सब जगत- गुरु मेरे सतगुरु हैं उनके सम्मुख ये हस्त सदैव जुड़े रहते हैं | 

बायन केहु दाहिन रहँ साँचा जिनका नाम | 

लोह परस भए पारसा तिनको सदा प्रनाम || 
जो अपने प्रतिकूल के भी अनुकूल रहते हैं सत्य जिनका नाम है जिनके स्पर्श से कुधातु स्वर्ण न होकर पारस हो जाता है उनको सदैव प्रणाम है |  

मंगलवार, ०३ जुलाई २०१८                                                                                   

अधुनै सब गुरु न कोइ चेला | करिअ मान मद संगत मेला || 
माया काया के भए  दासा | हिलग नित कीन्हसि सो हेला || 
अधुनातन तो शिष्य कोई नहीं है, सभी गुरु हैं जो नित्य मान मद के साथ इनका मेल-मिलाप है , ये माया व् काया के दास होकर इसके साथ नित्य ही राग-रंग में मग्न रहते हैं | 

अहहि जगत सत गुरु जो कोई | ता चरनन सब तीरथ होईँ || 
पग पग सन मारग दरसावै | अनुहारिहि  भगवद पद पावैं || 
इनमें में भी यदि कोई सतगुरु हैं तब निश्चित ही उनके चरणों में सब तीर्थ होंगे | वह चरण-चरण पर सन्मार्ग दर्शाते होंगे उनके अनुशरणकर्ता को अवश्य ही भगवद पद प्राप्त होगा | 

अजहुँ त जग जगदीस दुरायो | खेलन खावन माहि रमायो || 
जनजन धन सम्पद कै भूखे | गुन लच्छन नहि रस तै रूखे || 
विद्यमान समय में संसार से ईश्वर विलुप्त होते जा रहे हैं | समूचा संसार ही विषय भोग में ही संलिप्त हैं, जन-जन धन सम्पति की क्षुधा से ग्रस्त हैं अनीश्वरवादी होने के कारण उनमें गुण लक्षण का अभाव लक्षित होता है उनका जीवन नीरस प्रतीत होता है | 

कीरति कबित सुसम्पद सोई | जौ अग जग हुँत हितकर होई || 
भगतिमई कि ग्यान बिरागा | जासु बोध सोवत जग जागा || 
कीर्ति, कविता व् सम्पदा वही उत्तम है जो संसार भर के लिए कल्याणकारी हो | वह भक्तिमय हो अथवा ज्ञान मई हो या वैराग्य जनित हो जिसके बोधन से शयनरत जगत जागृत हो जाए | 

कीरत कबित सम्पत अस जे भगवद जन पाहि | 

सो अपार भव सिंधु सहुँ तरन हेतु जलबाहि || 
ऐसी कीर्ति, कबिता व् सम्पदा जिस भगवद जन के पास है | वह इस अपार भव सिंधु के पारग हेतु जलयान के समान है || 

बुधवार, ०४ जुलाई, २०१८                                                                                       

सबते मह बागीस बिधाता | सतगुरु साधु संत सुखदाता || 
जासु कीरत करत सब कोई | ता सहुँ जग कोबिद नहि होई || 
सबसे महतिमह कवि जगद्विधाता हैं वह सतगुरु व् साधु-संत स्वरूप सुख के प्रदाता हैं | जिसकी कीर्ति सभी सुबुद्धजन किया करते हैं उनके जैसे कविकुशल इस जगत में नहीं है | 

लिखे प्रथमतम अवनि अगासा | अनल अनिल पुनि दिए चहुँ पासा || 
चरन चरन जौं अरन न्यासा | ता संगत  एहि जगत बिकासा || 
सर्वप्रथम उन्होंने धरती व् आकाश लिखा ततपश्चात उसे वाय व् अग्नि से व्याप्त किया | चरण चरण पर जल न्यासित किया जिसके सनगत इस संसार का विकास हुवा | 

रचत नखत पथ रबि रजनीसा | बिरचिहि अहिर्निस दिसा बिदिसा | 
सिंधु सरित सर बन नग नाना | पुरयो भुइँ भव भूति निधाना || 
नक्षत्र का परिभ्रमण मार्ग रचकर सूर्य व् चन्द्रमा को रचा दिवस व् रजनी को रचकर ततपश्चात दिशा व् दिशाओं के कोण को रचा | समुद्र, नदी, सरोवर, वन व् अनेकानेक पर्वतों को रचकर इस भूमि को प्राकृति संपदाओं के भंडार से परिपूरित किया | 

रचत बहुरि भव सागर सरिबर | कीन्हेसि पुनि तिहु लोक उजागर | 
रचे जीवन मरनि के मंचा | दोषु गुन सन रचै परपंचा || 
इस संसार को सागर की भांति रचकर तत्पश्चात तीन लोकों को प्रकट किया | जीवन-मरण के  मंच की रचना कर दोष व गुण से युक्त सृष्टि को सृजित किया  | 

कीरत देह कबित सम प्राना | बिधस सम्पद हेतु कल्याना || 
गह अवगुन परिहर गुन कोषा | आपुनि भीत भरै सो दोषा || 
कीर्ति जीव देह हो गई प्राण कविता हो गए इस प्रकार विधाता की सम्पति देहधारियों के कल्याण हेतु नियोजित हो गई | फिर जिसने इस संसार में गुण कोष को त्यागकर अवगुण ग्रहण किए उसने अपने भीतर दोषों को संकलित कर लिया | 

कबहुँ भाग बिपरीत बिधि लेखिहि ससि सो राहु | 
अंत परै त  होइ भलो सो सब बिधि सब काहु || 
भाग्य के विपरीत विधाता ने कभी शशि के साथ उसे ग्रसने वाला राहु भी लिख दिया किन्तु अंत में यह भी सभी के लिए सभी प्रकार से कल्याणकारी ही सिद्ध हुवा | 

बृहस्पति/शुक्र, ०५/०६  जुलाई, २०१८                                                                                

जौ जगजीवन जग करतारा | बागिसरेसर जगदाधारा  || 
नमउँ अजहुँ सो अनंत अनादि | बंदत जिन मुनि देउ सनकादि || 
जो जगत के जीवन रूप परमेश्वर हैं जो जगत के कर्ता हैं जो जगत के आधार स्वरूप (जिनके आधार पर ही ब्रह्मा ने जगत की रचना की थी ) होकर ब्रह्मा के भी ईश्वर हैं जिसका नकोई अंत है न आदि है उन परमात्का को मेरा सादर नमस्कार है |  सनकादि (सनक= ब्रह्मा के पुत्र ) देव व् मुनिजन भी जिनके चरणों की वंदना करते हैं | 

सातु भुवन तिहु लोक उदारा | अबिनसवर अबिदित अबिकारा || 
बंदउँ कारज कारन रूपा | अनंद मय हरि बेद सरूपा || 
जिनके उदार में सप्त भुवन व् त्रिलोक अवस्थित हैं जो अविनाशी, अविदित व्  विकार से रहित हैं उन कार्य व् कारण स्वरूप आनंदमय वेदस्वरूप ईश्वर की में वंदना करती हूँ | 

भए पुरुषोतम हरि गुन सीला | औतर जग किन्ही बहु लीला || 
जबु जबु बरधिहि भू अघ भारा | तबु तबु प्रभु  लीन्हि औतारा || 
जगत में अवतरित होकर जिन्हें अपार लीलाएं की और गुण व् शील के निधाता होकर पुरुषोत्तम कहलाए | जब जब पृथ्वी पर पापों का भार बर्द्धित हुवा तब तब उन प्रभु ने अवतार ग्रहण किया | 

जासु कथा अगजग अनुहारिनि | पबित अतुल कलि कुल उद्धारिनि || 
अकुलीन को हो कि कुल हीना | कलुष हरत सो करत कुलीना || 
और अवतार स्वरूप उनकी कथाएं संसार भर के लिए अनुकरणीय हैं यह अत्यधिक पवित्र व् कलि तथा कुलों का उद्धार करने वाली हैं | 

भए स्वजन संकुल ए देस सब कुल कथा चरित नुहार के | 
राम रीति नीति निहछल प्रीति जोग लोक ब्यौहार के || 
ए चरित सोंहि भरेपूरे सबसुख साधन साम भयो | 
गेहनी सुहा गेहि स्वामिन गेह गेह सुरधाम भयो | 
इन कथाओं में विहित भगवान के अवतार चरित्रों का अनुशरण कर इस  देश के कुल स्वजनों से परिपूरित हुवे | दशम अवतार श्रीराम की रीति-नीति और निश्छल प्रीति तो सम्पूर्ण विश्व के व्यवहार योग्य है | इस चरित्र से से इस देश के गृह गृह सुख के साधन सामग्रियों से युक्त हुवे | गृहणी घर की शोभा कहलाई गृही को गृहस्वामी का पद प्राप्त हुवा और इस देश के घर घर देवधाम में परिणित हो गए | 

जहाँ नारी श्री सरूप पुरुख रूप श्रीमान | 
सुघड़ता गह होत तहाँ सीलवान संतान || 
जहाँ नारी शोभा व् विभूति व् सौंदर्य का स्वरूप होती है और पुरुष उसका धारक होता है|  सुसभ्यता ग्रहण कर वहां संततियां शील व् चरित्रवान होती है | 

शनिवार, ०६ जुलाई, २०१८                                                                                             

सत सत नमन सो शशि शेखरं | शिव शम्भु प्रभु गंगाधरं || 
जटालू धारी बाघाम्बरं | कंबु कर्पुर वपुर्धर धवलं || 
शीश शिखर पर चन्द्रमा एवं गंगा को धारण करने वाले प्रभु शिव-शम्भू को सत सत नमन है जटा धारण करने वाले, बाघ वस्त्र ग्रहण करने वाले, शंख व् कर्पूर से श्वेत श्री विग्रह वाले, 

भुजगेन्द्र हारं आत्मकं | कंबोज कंठ्य नील लक्षणं || 
भस्मभूति श्री अंग भूषणं | गरलपान कृतं त्रिलोचनं || 
गरल पान के कारण नील लक्षणी  शंख आकृति कंठ्य है जो  सर्प माल्य से युक्त है, उन त्रिलोचन धारी के अंग में भस्मविभूति भूषण स्वरूप है |  
जौ गौरी गिरि राज कुमारी | उमा पते बिरति तपोचारी || 
सर्वदेवमय सर्व कामदं | सर्व धनविन मर्दनं सर्वप्रदं || 
जो गौरी, गिरिराज कुमारी उमा के प्रियतम हैं तथा विरक्त तपस्वी हैं | सर्वदेव  निवास स्वरूप , समस्त कामनाओं को पूर्ति करने वाले, कामदेव का मर्दन करने वाले, सर्वस्व देने वाले वह प्रभु-  

बिधिस परपंचु कर संहारी | भव अपार कर प्रलयं कारी || 
कासी पति कैलास निवासी | रुद्रा पति शव भूमिहि वासी || 
विधाता द्वारा रचित जगत प्रपंच के संहारक है | जो इस अपार संसार को प्रलय द्वारा लय करने वाले हैं,| काशी व् कैलाश में निवास करने वाले रुद्रा के स्वामी व्  शव भूमि वासी हैं 

मो पर कृत कृपा नयन शंकर तपो निधान | 
जासु सकल रूप सरूप सर्व हेतु कल्यान || 
जिनका समस्त रूप स्वरूप सभी के लिए कल्याणकारी है वह तपोनिधान भगवान शंकर मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि करें | 

सोमवार, ०८ जुलाई, २०१८                                                                                  

वन्दे वरदायिनी शारदे | सर्व श्रुति: सर्व काम: प्रदे || 
प्रनमउ मातु जोए कर साथा | जा सहुँ नितहि रहउँ नत माथा || 

बरन छंद रस वीना पानी |  सरसति बिद्या बधु सुर बानी || 
मैं अध घट मम मतिहि बिमूढ़ा |  तुम हंसाधिरुढ़ा || 

बुद्धि कर देई परम पबिता | मोर गुरु गिरा ग्यान सरिता || 
होइ जासु बल मोहि भरोसा | कबित्त कर्तन रूचि परिपोषा || 

कुसल कला कृत चहिअब आनी | उदार रूप मोहि बरदानी || 
आखर अरथ छन्द लंकारू | भाव करष रास भेद अपारू || 

बिचार बिनहि त परहि न पारा | अरु मो पहि नहि  एकउ बिचारा || 

निज मुखनि निज होनी जूँ  कहन चहइ रूचि मोरि | 
छमिब देब मम भोरि सो बिनति करौं कर जोरि || 

बृहस्पतिवार, १२ जुलाई, २०१८                                                                            

ए जग ए जिउ जग जीउन ज्याए  |  जननि जनक सहुँ जनमु बस पाए || 
एहि जग जातक जेतक होईं | जननि जनक बिहीन नहि कोई || 
यह जगत यह जीवन जगत जीवन स्वरूप ईश्वर द्वारा ही व्युत्पन्न हुवा है जननी जनक से केवल उसने जन्म प्राप्त किया है | इस संसार में जितने भी जातक हैं वह जननी जनक से विहीन नहीं है | 

जनम दात जाके प्रतिपालक | अति सोभाग सील सो बालक || 
मातुपिता बिरधा बट छावाँ | ताहि न आतप ताप सतावा || 
जन्म दाता ही जिनके पालक हैं वह बालक अत्यंत ही सौभाग्यशाली हैं ||  माता,पिता, बड़े वृद्ध वैट वृक्ष की छाया स्वरूप होते हैं इस छाया से जीवन पंथ में दुःख रूपी आतप का ताप कष्टकारी नहीं होता | 

प्रनमउ जनम दात पितु माता | जासों जीउ प्रान मम गाता || 
प्रथमहि गुरु मम मातु स्नेही | बदन ज्ञान सबद मुख देही || 
मैं अपने जन्मदाता माता पिता को प्रणाम करती हूँ जिनसे मेरा जीवन है प्राण हैं यह देह है | मेरी प्रथम गुरु मेरी स्नेहिल माता है जिन्होंने मेरे मुख को अभिभाषण का ज्ञान देकर मेरी वाणी को शब्दमय किया || 

ताकर गुनद पयद करि पाना | भयउ मतिहि मम सुमति सुजाना || 
ताके धरे धरनि पगुधारी | बिरद रहत होयउँ पदचारी || 
उनके गुणकारी पयस रस के पान से मेरी बुद्धि ज्ञान से युक्त होकर प्रवीण हुई | उनके द्वारा ही  मेरे चरण धरा आधारित हुवे और दंतहीन अवस्था में ही मैने परिचालन सीखा || 

नगरी नागर नदी नेह से | दीप दीप्ति दुगध स्नेह से || 
अधम अधर्मिन माहि धरम से | अकरमि माहि करतब करम से || 
जो नगरी में नागरिक के जैसे नदी में नीर के जैसे  दीपक में दीप्ती के जैसे दुग्ध में नवनीत के जैसे  अधमी व् अधर्मियों में धर्म  के जैसे अकर्मण्य में कर्त्तव्य कर्म के जैसे होते हैं | 

ते जनक जननि के चरन प्रनमन बारहिबार | 
जाकी कृपा सों डीठि ए दरस रहे संसार || 
उन मातापिता के चरणों में वारंवार प्रणाम है जिनकी कृपा से आज यह दृष्टि संसार के दर्शन कर रही है || 

शुक्रवार, १३ जुलाई, २०१८                                                                                             

अजहुँ नमत गज बदन बिनायक | सिद्धि प्रद गौरीज गन नायक || 
रचना जगत कहुँ प्रनत बिसेसु |  आत्म चरित करत श्री गनेसु | 
सिद्धियों के प्रदाता गौरी पुत्र गजमुखी गण  के स्वामी श्री गणेशजी को नमन कर रचना जगत को विशेष प्रणाम करते हुवे अपनी आत्मकथा का श्री गणेश करते हुवे 

कृति कृत भुवन भनिति कर देसा | कबित भेस भर करउँ प्रबेसा || 
बसैं बासि जहँ देसि बिदेसी | सुरुचित सुचरित सुचित सुदेसी || 
 कविता का वेश धारण किए रचनाओं के लोक में स्थित कथाओं के देश में प्रवेश करती हूँ जो सुव्यवस्थित, चरित्रवान, पवित्र-पावन होकर वास करने योग्य स्थान है जहाँ देशज के सह विदेशी भी निवासरत हैं | 

नागर संकुल नगर निकेता | गाउँ पुरा यहँ केतनिकेता || 
मन मन महुँ मनि मंदिर रेखे | अराध्य देउ मूरति लेखे || 
इसके नगर निकेत नागरिकों से भरे पुरे हैं यहाँ कितने ही ग्राम व् पुर हैं ( यह रचना धर्मियों से परिपूर्ण कृति बाहुल्य देश है ) | यहाँ प्रत्येक मन में मणिमय मंदिर आरेखित हैं जहाँ  वह अपने आराध्य देव की मूर्ति प्रतिष्ठित किए हुवे हैं | 

देउ गिरा के अभरत बानी | रचइहि कतहुँ रामरज धानी || 
कबि हिय छबि धरि मुख हरि नावा | ग्रामगिरा कृत सरु बर गाँवा || 
देवगिरा संस्कृत से वाणी आभूषित किए यहाँ कहीं पर रामचंद्र की राजधानी रचित है | ह्रदय में जगत कारण भूत भगवान  की छवि व मुख पर उनका का नाम आधारित किए कवि का ग्रामीण भाषा के सरोवर से युक्त ग्राम है | 

कीरति करत सेबत हरि चरन | रचेउ भिति भिति ब्रज बृंदाबन || 
निगमागम कथ सत पथ चीन्हि | अमरितमय अमरावति कीन्हि || 
जगत ईश्वर  की कीर्ति कर उनके चरणों की सेवा में अर्पित उस देश के अन्तस्थ में ब्रज व् वृन्दावन भी रचित हैं | सन्मार्ग को संसूचित करते धर्म व दर्शन ग्रन्थ की  आख्यायिकाओं का अमृतमय स्वर्ग भी रचित है | 


चारि बेद रचत रचइता रचेउ चातुर धाम | 
धाम धाम धनीमानी गह सुख सम्पद साम  || 
रचयिता ने चार वेदों को रच कर यहाँ चार धामों की रचना की | प्रत्येक धाम साहित्यिक सुख सम्पति की साधन भूत सामग्री से युक्त हो समृद्ध व् प्रतिष्ठित हैं | 

शनिवार, १४ जुलाई २०१८                                                                       

जेहि देस मम चरन प्रबेसिहि | जनम भुइँ सो मोर स्वदेसिहि ||
जगत बिदित जाकर इतिहासा | रचिता तहँ बोलिहि बहु भासा ||
(इसप्रकार) जिस देश में मेरी प्रविष्टि हुई, मेरी जन्मभूमि के सह वह मेरा मूलगत देश है | जिसका  जगत विख्यात इतिहास है यहाँ के रचना धर्मी बहुभाषी हैं | 

बरनिका ताल तूलि तमाला  |  सबदाकर कर सैल बिसाला  || 
बिंजन माल मनोहर श्रेनी   | सुर सरिता की सुन्दर बेनी  ||
वर्णिका के सरोवर तमाल वृक्ष सी लेखनियाँ के सह यहाँ शब्दों  के भंडार स्वरूप  विशाल पर्वत  हैं जो व्यंजनमाला की मनोहर श्रेणियों से आबद्ध व् स्वरों की सरिता रूपी सुन्दर शिखा से युक्त हैं  | 

भवन कृतिहि बहु खन गचि ढारी | गगन परसि अति तुंग अटारी || 
द्योतिर्मई दुरग दुवारा | ग्यान मनिमत दीप अधारा || 
जो परिपक्व आच्छादन से युक्त कृतियों के बहुखंडीय भवन व् गगनस्पर्शी ऊँची अट्टालिकाएं हैं | ज्ञान माणिक्य रूपी दीपक  को आधारित किए यहाँ प्रकाशमय दुर्ग व् गोपुर है || 

अधुनै नगरु पुरा पुर सोभा | बिलोकत मोर मन अति लोभा || 
कबित नदि तट भनित बट छाँवा | बसाए चहइ सोइ तहँ गाँवा || 
आधुनिक नगरों व् पुरातन पुरों की शोभा देखकर मेरा मन भी लालायित हो गया | कविता की नदी के तट पर कथनों के वट की छाया में वह भी एक गाँव बसाने हेतु अभिलाषित हो उठा | 

जोइ काल प्रबिसिहि मम पाऊ | कबिन्दु मुख अधुनात कहाऊ || 
जद्यपि रहँ सो काल अधूना | कलि कलुषावत जौ दिन दूना || 
रचनाओं के देश में जिस काल में मेरा प्रवेश हुवा उस काल को श्रेष्ठ कवियों द्वारा आधुनिक काल कहा गया | वह काल  यद्यपि आधुनिक ही था जो कलियुग को शीघ्रता से कलुषित कर रहा था | 

नरनारी भूषन भरे परधन भेस बिसेसि | 
भूति बर्धि बिभूति बरे भाषै भाष बिदेसि || 
नरनारी,भूषणों से आभरित विशिष्ट वेश धारण किए हुवे थे ऐश्वर्य का वर्द्धनकारने वाली विभूतियों को वरण किए वह विदेशी भाषा के भाषिक थे | 
  वीरवार/सोम, १५/१६ जुलाई, २०१८                                                                                         

ग्राम गिरा अटपटि मम बानी | समुझ परै न भरम महुँ सानी || 
मोरी भनिति रीतिगत होई | अनगढ़ गाउँ गँवरु जस कोई || 
ग्रामीण भाषा होने के कारण मेरी वाणी विचित्र थी यह बोधमयी न होकर भ्रम से संलिप्त थी | मेरी कथा भी रीतिकालीन होते हुवे ऐसे प्रतीत होती थी जैसे वह कोई असभ्य ग्रामीण ही हो | 

अह अति गरुबर मम अभिलासा | हरुबर भासु जोग उपहासा || 
सोन बरन न त भूषन भारू | रूप कुरूप बिनहि लंकारू || 
मेरी अभिलाषा अत्यंत गुरुत्वमयी थी मेरी भाषा अतिशय लघु थी | न मेरा वर्ण स्वर्ण था न मैने  कोई भूषण आभरित किए हुवे थे मेरा कविता का रूप अलंकार विहीन होकर कुरूपता को प्राप्य थी || 

धीगुन हीन मलिन मन भावा | कबित कला मोहि एकु न आवा || 
गिरा ग्यान कर गोट न गारा | दीन दारिद न गाँठि बिचारा || 
मेरे काव्यगत मनोभाव मलीन व् श्रुश्रुषा श्रवण आदि बुद्धि के आठ धर्मों से वियुक्त थे | मुझे कविता की एक भी कला नहीं सिद्धि प्राप्त नहीं थी | ज्ञान रूपी गोटियों व गारों से विपन्न मेरी वाणी की  ग्रंथि उत्तम विचारों से भी रिक्त थी इस हेतु वह दीन व् दरिद्र थी | 

बसइ चलेउ गाह के गाँवा | चढ़न चहै गिरि जिमि बिनु पाँवा || 
भए धरनि बहु धुरीन धुरंदरु | कबित गिरि चर कलित कृति सेखरु || 
पंगु के द्वारा पर्वत लंघन की अभिलाषा के जैसे मैं ऐसी दरिद्र वाणी से गाथा का ग्राम अधिवासित करने हेतु अभिलाषित हूँ | इस धरती में अतिशय  प्रवीण व् कोविद कवि हैं जो कविता के पर्वत पर निरंतर आरोहण करते हैं उनकी कृतियां इस कवितामय पर्वत शिखर के आभूषण स्वरूप हैं | 

रूचि उपजात चितहि जौ चाहा | ताके बस सो करिए न काहा || 
पेम पयधि मन चहि औगाहन | सुख सुभागु मुकुता के लाहन || 

गुरुजन चित चिंतन करत सुरत जगत करतार | 
जोरि पानि नत सिस करौं बिनती बारहिबार || 

कबित खन खेह खेट घरु जौ करि चहैं बिहार | 
सद्गुन मोरे गहि लियो दुरगुन दियो परिहार || 

बुए बिआ कहनिहि लीक खीचें | देइब फर करनिहि जर सीँचे || 
रचेउँ परनकुटी दुइ चारी |  कथा केरि गढ़ि करनक ढारी || 

भगतिमय सुठि प्रीति की रीति | नीति मृण्मलि दियउँ भलि भीती || 
कुंज गली कृत कुसुम वाटिका | बरनाबलि सों लसे अंतिका || 

धरे दोइ पट दोहु द्वारा | परे छंद कर बंदनबारा || 
चौंक पुरावत चातुरि पाई | अंतर गेह पियहि पौढ़ाई || 

अर्थागन अर्थापन जेतू  | कछु निज कछु परमारथ हेतू || 
जा संगत जौ उपजै भावा | जीवन जोवन जोग जुगावा || 

तुलसी कृत मानस नहि दूरे | कलि महुँ निर्मल जल भर भूरे || 
बिरदाबली कहत सिय पी के | संग लगे बन बाल्मीकि के || 

बधिअ गौ सो पुण्य करम पापकरम सरि साँप | 
या संगत सुखसार है या संगत संताप || 

मंगलवार, १७ जुलाई, २०१८                                                                                        

रीति नीति सुठि प्रीति राम की | धरा धुरज धर धर्म धाम की || 
अवतार रूप पुनीत पबिता | कीन्हेसि नाना बिषद चरिता || 

रचिहि सुपंथ चरत  दे चीन्हि   | पुरबजहु तहाँ पायन्हि दीन्हि || 
पुर्बज पथ बिरधा अनुहारिहि | बिरध पथ पितु मात अनुसारिहि || 

हमहि तासु चरनहि अनुगामी | भए सुखि सुखसाधन सामी || 
सुकृता केर चरित चरितारथ | होत जीउ हित हेतु परारथ || 

होत जोग जग देसु समाजा | तरत पारग करत कृत काजा || 
सुचितात्मन पुरइनी जाके  | होइँ चरितबअ जीवन ताके || 

सुचिता पुर्बज पुरइनी भा हमरे बढ़ भाग | 
अजहुँ के अस चलन दियो तिनके पंथ त्याग || 

बुधवार, १८ जुलाई, २०१८                                                                                            

सुपंथी तेउ भयउ कुपंथा | गुपुत गिरि भए लुपुत सद ग्रंथा || 
अब न कहंत नहि श्रुतिबंता | साधु साध बिनु भए सतसंता || 

 रहत बिदेसि कहत जबु देसी | देसज होतब गयउ भदेसी || 
दुर्गुन करिअ जहाँ उपनिबेसा | बिगरै तहाँ सकल परिबेसा || 

रहँ मलीन सो होएं कुलीना | कुलीन होइब दीन मलीना || 
भाषन भाष न भेस न भूषन | दरसि दहुँ दिसि दूषनहि दूषन || 

कवन कहा हम कहँ सोंहि आए | सनै सनै एहि सुरति बिसराए || 
साखि कहाँ कहँ हमरे मूला | जासु बिआ हम जिनके फूला || 








 



































Monday, June 25, 2018

----- || राग-रंग ४ | -----


----- || राग-मालकौंस || -----


श्री रामायन कलिमल हरनी.., पुनीत पबित जगत अनुसरनी.....


सिय के पिय की प्रीति सुठि रीति कल कंठ कलित कर बरनी.., 
थकै पंथि हुँत तरुबर छाईं तिसनित हुँत यहु निरझरनी.., 
एहि भव सागर सरिस अपारा तासु तरन हेतु यह तरनी.., 
जगति राति की जरति जोत सी अगजग जोतिर्मय करनी.., 
अधबर पंथ अँधियारे पाँखि महुँ यह उजियारा भरनी.., 
श्रवन मृदु मधुरिम श्रुति रंजन गायन मंजुल मनहरनी.., 
 भगवन्मय यहु भगति भगवती सरूप भगवद पद परनी.., 
भव बंधन मुकुति कर मुकुता गहै याके मारग चरनी.., 
साधू सज्जन संत जन सहित दीन दुखियन केरि सरनी..,

Thursday, June 21, 2018

----- || राग-रंग ३ | -----,


----- || राग -मियाँ की तोड़ी || -----

हे जग बंदन अब अवतरौ तुम्ह..,
कलि काल कर कलुष हरौ तुम्ह..,

हिय संताप नैन भर बारी | धेनु रूप धर धरति पुकारी ||
तरस प्रभु दृग दरस परौ तुम्ह..,

तलफत भू कलपत बहु रोई | तुम्ह सोंहि प्रभु अबर न कोई ||
मोर हरिदय चरन धरौ तुम्ह..,

बोहि बोह सिरु पाप अगाधा | गहबर पंथ चरन गहि बाधा ||
पातक भारु हरन करौ तुम्ह..,

गिरि सरि सागर हरुबर मोही | भा गरुबर एक धर्म बिद्रोही ||
प्रगस सगुन सरूप धरौ तुम्ह..,

दुःख दारुन कर रैन मँझारे  | धरै दीप सम नैन दुआरे || 
दिनकर के रूप अभरौ तुम्ह.., 

चारिहुँ ओर घोर अँधियारा | निद्रालस बस भयो संसारा || 
करत भोर अँजोर भरौ तुम्ह.., 

लोग भयऊ मोर बिपरीता | अपकरनि ते भयहु भयभीता ||
भवहि केरि बिभूति बरौ तुम्ह.....

भावार्थ : - हे जगत वंदनीय ईश्वर अब आप अवतार लो | और अवतार लेकर कलियुग की कलुषता से मुक्त करो || ह्रदय में संताप और नेत्रों में जल भरकर  गाय रूप धारण की हुई  धरती ने आर्त होकर भगवान को पुकार कर कहा -- हे भगवन ! अब दया कर इन अश्रुपूरित नेत्रों को अपना दर्शन दो || तड़पती हुवे रूदन के द्वारा  अपनी अंतर वेदना को व्यक्त करती हुई भूमि ने फिर कहा हे प्रभु! आपके अतिरिक्त इस संसार में मरा कोई नहीं है मेरे ह्रदय में अपने चरण धरो | मेरे शीश पर अगाध पाप के गठरी का बोझ है मेरा भ्रमण पंथ दुर्गम है उसपर मेरे चरण आपदा स्वरूप बाधाओं से बंधे हैं, प्रभु! अब आप इन पापों का हरण करो | पर्वत, सरिताएं और सागर भी मेरे लिए भारहीन हैं किन्तु एक धर्म विद्रोही का भार मुझे अतिशय भारी प्रतीत होने लगा है | हे अन्तर्यामी ! अब प्रकट होओ और सगुण स्वरूप धारण करो | दुःख व् दरिद्रता की अर्ध रात्रि में द्वार पर धरे दीपक के समान ये नयन प्रतीक्षारत है  | हे प्रभु ! अब आप दिनकांत के रूप का आभरण करो | चारों और घोर अन्धकार व्याप्त है संसार निद्रा व् आलस्य के वशीभूत हो गया है हे भगवन ! अब भोर कर अपनी दीप्ती से जगत में उजाला भर दो | ये सांसारिक लोग मेरे विपरीत हो चले  है इनके कुकर्मों सेस्वयं भय भी भयभीत है अब इस लोक की वैभव विभूति को आप ही वरण करो हे राम अवतरण करो.....

Tuesday, May 29, 2018

----- || नई स्वतंत्रता || -----

----- || नई स्वतंत्रता || -----

हव्य वाहावाहवि नई स्वतंत्रता लिए..,
ज्वाल दो बाल दो सौभाग्य के नए दीये..,

हवन बना ह्रदय भवन धूम लोहिता गगन..,
क्रोध है विरोध है तो क्यूँ हो होठों को सीए..,

 रोम रोम व्याकुलित हो प्राण प्राण प्रज्वलित
 दाह हो प्रदाह हो आह्वान की हो लौ लिये..,

आहार हो विहार हो आहा ! आहार्य वेश हो..,
क्रांति है विक्रांति है तो क्यूँ हलाहल पियें.....

         हव्य = आहुति , बलिदान
वाहावाहवि = हाथो-हाथ

'एक पुरानी रचना'



Thursday, May 24, 2018

----- || राग-रंग 2 || -----


----- || रागललित || -----

ख़ुदा की ये दुन्या खुदा की ये राहें,
हरेक उफ़ तलक हों रहम की निगाहें..,

वो सतहे पे हो याके बह्रे-तबक़ पे,
जो क़दमों तले हो सुनो उसकी आहें..,

ख़ुदा-बंद का ही है ये काऱखाना,
हो मासूमो-महरूब के हक़ में पनाहें..,

दयानत से उठे हाथ दुआ के लिए,
के हम दरियादिल हों गाहे-बेगाहे.....

बह्रे-तबक़ = समुद्र की तलहटी
मासूम = निर्दोष 
महरूब = मारा गया, घायल 
ख़ुदा का कारख़ान = जगत का प्रपंच 

Wednesday, May 23, 2018

----- || राग-रंग 1 || -----

----- || रागललित || -----

भरी भोर में बड़े मुँह अँधेरे, 
हुए फिर से रीते रैनी-बसेरे.., 

चिड़ियों को पानी, कनका न तिनका, 
उड़े भूखे प्यासे पंखि-पखेरे..,

हुवे दाता ग्यानी बड़ा नाम जिनका, 
न देवें कसोरे न मूठि बखेरे.., 

भरी दुइ पहरी फिरें ये नगरी-नगरी, 
ढली साँझ को भी फिरे ये न फेरे.., 

न ये पिंजड़े के न पिंजड़ा ही इनका,
ये भगवान के न तेरे न मेरे.....


Wednesday, August 13, 2014

-----॥ सोपान-पथ १८ ॥ -----

शुक्रवार, ०७ अगस्त, २०१४                                                                                               

तिलछित नैन बैन सर छोरे । बोलि होरि कू ठौर न थोरे॥ 

अजहु देहिहु हेल तुअँ केतहु । फिरौं न मैं कहहु चहे जेतहु ॥ 
तिरछे नयन किए जब वांणी रूपी प्रचंड वाण छोड़े और कहा : -- वासियों को वास की अल्पता नहीं । अब से चाहे तुम कितना ही आह्वान करना चाहे जितना कहना फिर मेरा फेर न होगा ॥ 

फुलाउब गालु पचारत पाउँ । करत रोख  जा बसी दुज ठाउँ ॥ 

लिख लिपि पिछु जो कछु सुरताई । लेख तहाँ  नउ पीठ रचाई ॥ 
वधु वहां से गाल फुलाती, पाँव पटकती हुई, रोष व्यक्त करती किसी दूसरे ठौर में जा बसी ॥ ठौरन की अल्पता थोड़े ही थी ॥ वहां एक नविन पृष्ठ की रचना की । पिछ्ला लिखा जो कुछ भी स्मरण रहा उसे उस पृष्ठ पर लिपि बद्ध करती चली गई । 

नवल ठौर नउ भनित नउ गीति । रस जुगत 
सिंगारी सब रीति ॥ 
कहत बचन कृत कथन प्रबोधा । दमन  कारिनी नीति बिरोधा ॥ 
नवल निवास में नई कवितायेँ नई नई गीतिकाएं थीं  जिनका सभी रीतियों से सुंदरता पूर्वक श्रृंगार किया ॥ रचित वचन यथार्थ ज्ञान का कथन कहते हुवे दमन कारी नीतियों का विरोध करते । । 

कहुँ भाष बध सुभाषित भासी । कहूँ जमन उद्भास संभासी ॥ 
लिखनि लीक  भै गुन कोदंडा । बियंगित बचन बान प्रचंडा ।। 
कहीं हिंदी भाषा  तो कहीं यमन भाषा में लिखित कवित्तमय उक्ति आलोकित होकर परस्पर वार्त्तालाप करती ॥ कहीं लेखनी  धनुष एवं लीक प्रत्यंचा हो गई थी,  व्यंग वचन प्रचंड वाण हो चले थे ॥ 

धरिअ हस्त साध लस्तक, धर मुख सान सुधार ।  
 ताकि तमक अनुमान लछ , छाँडत करे प्रहार ॥ 
अब वधु शाण ( एक कृत्रिम पाषाण जिसपर लोहा तेज किया जाता है ) में सुधारती फिर मूठ हस्तगत किए धनुष  साधते हुवे लक्ष्य का अनुमान कर उद्वेग पूर्वक वाण रूपी उन व्यंग वचनों का प्रहार करने लगी ॥ 

सोमवार, ११ अगस्त २०१४                                                                                               

भए  सान सर बरन के कोषा । दुराचरन भए कारन रोषा । 
बरनै जब रीत प्रीत्यरथा ।  अर्थि गरुअ हनि करै अनरथा ॥ 
शब्द कोष शायक सुधारक शाण हो गए  । जगत में व्याप्त दुराचरण रोष का कारण  हो गए ॥ वधु जब रीति-काव्य में कुछ वर्णन करती ।  अर्थ कारी उसकी  गंभीरता को नष्ट करते हुवे अर्थ का  अनर्थ कर देते ॥ 

सत्य संध  तब छाँड़े लच्छा । काल सरप जिमि चले सुपच्छा ॥ 
सँधाने जब  दान नाराचे । मुखर होत मंजुल गति नाचे ॥ 
तब वधु ने सत्य-संध बाण नामक वाणों की वर्षा की , तब वे ऐसे चल मानो पंख वाले काल सर्प चल रहे हों ॥ जब दान के नाराच का संधान किया तब वे मुखरित हो उठे एवं मंजुल गति से नृत्य करने लगे ॥ 

धरि गुन त्याग बान त्यागे । धाए जहँ  तहँ सबइँ ते आगे ॥ 
प्रचरे प्रजर दयासर पुंजा । निकसे होत कुमुद कल कुंजा ॥ 
 त्यागनामक बाण को  प्रत्यंचा पर संधान किया तब वे सभी बाणों से अग्रसर  होका यत्र-तत्र  दौड़े ॥  दया -वाण समूह जब प्रचारित हुवे तब वह प्रज्वलित होकर कौमुद के सुहावने निकुञ्ज से होते हुवे निकले ॥ 

तरे तपस तर तीरत चापा ॥ अहंकारी भूरे निज आपा ॥ 
जैसे अहिँसा बान  चलाई । हिंसा हय हहरत  हिन्साई  ॥
 धनुष खैचकर जब तपस्या -वाण अवतरित हुवे तब अहंकारी अपना अहंकार भूल गए ॥ जैसे ही अहिंसा का वाण छूटा हिंसा के अश्व काँप उठे और भयवश हिनहिनाने लगे ॥ 

काल बाण बन गहन घन, किए गगन महा नाद । 
नदी परबत बन उपबन, करे मधुर संवाद ॥  

काल  बाण गहरे बादल बनकर गगन में महानाद करने लगे । इस नाद से निह्नादित होकर नदी -पर्वत, वन-उपवन परस्पर मधुर संवाद करने लगे ॥ 

बुधवार, १३ अगस्त,२०१४                                                                                                      

 बधु लेखोन्मद माहि खोई ।पिया पठन उत पूरन होई ॥ 
सेबक एकै दुइ सेवकाई ।  गेह भार पुनि गहन पढ़ाई ॥ 
इधर वधु लेखानुराग से अनुरागित हो चली थी  उधर  उसके प्रियतम का अध्ययन कार्य पूर्णता को प्राप्त हो गया ॥ सेवक एक और सेवकाई दो, फिर गृहस्थि का भार उसपर गहन अध्ययन ॥ 

लगे सो तेहि अवसर ऐसे । कोलहु जुते मेष के जैसे ॥ 
अंक सूचि लह अजहुँ समाजू । रहे सेष परिजोजन काजू ॥ 
उस समय प्रियतम  ऐसे दर्शित  हो रहे थे जैसे कोई कोल्हू में बैल जुता हुवा हो ॥ अंक सूची प्राप्त हो चुकी थी अब परियोजन कार्य तैयार करना शेष रह गया था  ॥  

साँझ रयन किए दिन कर कांति । कछुक काल बीते एहि भांति ॥ 
बाल बिरध घिरि गह जो कोई । सोइ सकल सुख सम्पद जोई ॥ 
संध्या काल को रयन में  परिवर्तित कर रयन काल से दिवस को कांतमान करते हुवे फिर समय कुछ इसी प्रकार व्यतीत हुवा ॥ बालक एवं वृद्धजनों से भरपूर गृह  में सुख की समस्त संपत्तियां संकलित रहती हैं ॥ 

गेहिनी जहां लखि संकासा । हरि निबास निभ गेहि निबासा ॥ 
प्रबंध के सब साधन साजे । भगवदीअ मन भाउ बिराजे ॥ 
जहां गृहणी श्री  का रूप  हो वह गृह श्रीधर का निवास हैं क्योंकि वहां गृहपति श्रीधर स्वरूप में निवास करते हैं । जहां चित्त में भगवद भक्ति का भाव विराजमान होता है वहाँ गृह प्रबंध के सभी साधन श्री को प्राप्त करते हैं ॥ 

असनासन हो कि वासन  लोचन सब सुख लाखि । 
आए सोइ दिन काल जब, देखे सम्मुख साखि ॥ 
उत्तम भोजन हो कि वसन हो की उत्तम निवास हो  वधु के लोचन ने सभी ऐहिक सुखों का दर्शन किया । और वह दिन भी आया जब उसने साक्षात काल के दर्शन किए ॥ 

बृहस्पतिवार, १४ अगस्त, २०१४                                                                                                    

ते अवसर बधु  लेवनु थाही । सबद सिंधु रहि गह अवगाही  ॥ 
तबहि द्वारि पिया दिए हेरी । हेर मुक्ति तुर बधु मुख फेरी ॥ 
उस समय  वधु  शब्दों के सिंधु में गहरे गोते लगाते हुवे उसकी थाह ले रही थी  कि तभी प्रियतम ने द्वार पर हाँक  लगाई । शब्द मुक्तियों का अन्वेषण करती वधु ने  तत्काल ही मुख फेरा ॥ 

चले पिय साँस धुकनि सकासे । मंद प्रभा मुख सीकर बासे ॥ 
कहे हहर उर होत  अधीरा । पिंड हरिअ हरि  होइहि पीरा ॥ 
और क्या देखा कि प्रियतम की सांस धूकनी के सदृश्य तीव्र थी । मुख की प्रभा धूमिल हो गई थी और उसपर श्रम सीकर का वास हो चला था ॥ काँपते स्वर में वे अधीर होते हुवे बोले : -- मेरे ह्रदय पिंड में हलकी पीड़ा हो रही है ॥ 

अस सुनत प्रिया भई अबाके । अचरज दीठ कंत मुख ताके ॥ 
प्रभहत चितबत चितब अचेती ।परिहरि सुधि पुनि हरि अरि चेती ॥ 
ऐसे वचन श्रवण कर  वधु अवाक रह गई । वह विस्मय भरी दृष्टी से  कांत के मुख को एकटक निहारने लगी ॥ हतप्रभता  एवं स्तब्धता के कारण  उसकी चेतना- शुन्य सी हो गई । तत्पश्चात निश्चेष्ट चित्त  शनै-शनै चैतन्य हुवा  ॥ 

हहरत  पहिले जीउ सँभारी । पठइ निअरई बैदु दुआरी ॥ 
रहे सकास एक सख नुरागीं । सुनी अघात पिय संग लागीं ॥ 
चकित होकर उसने प्रियतम की सांस को किसी भाँति संयत किया ॥  फिर निकट के चिकित्सक के पास प्रथमोपचार हेतु भेजा ॥ प्रियतम का एक अनुरागी सखा निकट में निवासित थे । जब उन्होंने आघात के विषय में जाना तब वह सखा प्रियतम के  संग हो लिए ॥ 

गहे घन गहन भइ रयन, घरि घरि किए घन नाद । 
छाए वधु मुख मंडल इत, रयनै सम अवसाद ॥ 
रात बहुंत ही गहरी हो चली थी बादल घड़ी घड़ी निह्नादित हो रहे थे । इधर  वधु के मुखमंडल पर भी रयनी के समृश्य ही अवसाद के बादलों का निवास हो गया था  ॥ 

शुक्रवार, १५ अगस्त, २०१४                                                                                                   

बहुत सिथिर मन चरन बहुराए । निगद जीवद सोइ आन बताए ॥ 
प्रथमहिं लै हिय कम्पन रेखे । लेख यन्त्र लिखि लिपि का देखें ॥ 
पृयतम् अत्यंत ही शिथिल चित्त एवं चरणों से घर लौटे । जैसा चिकित्सक ने कहा प्रियतम ने वैसे ही श्रुत निगदिन किया ॥ सर्वप्रथम ह्रदय कम्प आलेख लेवें । फिर देखते हैं की लेख यन्त्र  कैसी लिपि उद्भाषित  करता है ॥ 

ते अवसर तमरघन काल अधारी । बोलि बधू  कर चिंतन  भारी ॥ 
करो बिश्राम रहौ कर जोरे । गमनोचित होइहि जब भोरे ॥ 
उस समय अन्धेरे पर घनश्याम आधारित हो गया था । तब वधु ने भारी चंता करते हुवे कहा : -- युगीत हस्त स्वरूप में अभी आप विश्राम कीजिए । प्रभात काल में कहीं जाना उचित होगा ॥ 

भए अध निसि मर्म उर दाहू । फरकेउ बाम नयन अरु बाहू ॥ 
डरपत जस तस रैन बिताई । नयन पलक पट देइ लगाईं ॥ 
अर्द्ध-रात्रि हो चुकी थी वधु के ह्रदय को मर्म जैसे दहन करने को ही तुला था । किन्तु उसके बाएं अंग फड़क रहे थे ॥ उसने भयविह्वल होकर नयनों में पलकों का पट दिए जैसे-तैसे वह रात काटी ॥  

मत मीर माहि डूबि तिराई  । मुख पट प्रथम किरन परसाई  ॥ 
बहुरि  पिया अरु बिलम न कारे । गत हरिदै बिग्यानि दुआरे  ॥ 
 वधु विचारो के सिंधू में डूबते उतरती रही, मुख पटल पर भोर की प्रथम किरण का स्पर्श प्राप्त हुवा  ॥ प्रियतम  ने फिर और अधिक विलम्ब नहीं किया । वे ह्रदय विशेषज्ञ के द्वार पर गए : --- 

लेइ अचिरम बिद्युति गति, हृदय स्पंदन लेख । 
पढेँ पिय बेदु  मुख रंग , बेदु लिपि रहे देख ॥ 
फिर विद्युत की गति सी शीघ्रता बरतते हुवे ह्रदय स्पंदन आलेख की लिपि लिए । इधर  चिकित्सक लिपि का निरक्षण कर रहा था  वह उसके मुख की रंगत पढने का प्रयास कर रहे थे ॥ 

शनिवार, १६ अगस्त, २०१४                                                                                                  

बाधित गति सँग हिय हिचकोले  ।  बैदु हहरत बानि मह बोले ॥ 
अनभल कँह हिय कंप लिखाई । तुर हिय ब्याधि भवन पठाईं ॥ 
 कुछ समय पश्चात चिकित्सक ने कंपकंपाती वाणी से कहा : -- किसी प्रतिरोध के कारण ह्रदय हिचकोले ले रहा है ॥  स्पंदन आलेख किसी हानि का संकेत कर रहे  है । और जीवाद ने तत्काल ही प्रियतम को ह्रदय चिकित्सालय भेज दिया ॥ 

पैठत भवन साँझ पग फेरी । रयनी काल बरन लिए घेरी ॥ 
अंतर भीड़ रह अति भारी । परिजन पीड़ित हिय कर धारी ॥ 
चिकित्सा भवन पहुंचते पहुंचते संध्या की पग फेरी हो चुकी थी  । काल वर्ण लिए रयनी घेरे हुवे थी ।   अंतर भवन में  जन संकुलता अति गहन थी । परिजन एवं पीड़ित हाथों में ह्रदय लिए निरिक्षण हेतु प्रतीक्षा रत थे ॥ 

अचिरम उर छत भवन पधारे । हराहरि ह्रदय कर मह धारे ॥ 
निरखए  बैदु हरिदयागासा । पडत कम्पन लेख के भासा ॥ 
शिथिल हो चुके ह्रदय को हाथ में लिए प्रियतम ने शीघ्रता करते हुवे ह्रदय चिकित्सालय में प्रवेश किया ॥ चिकित्सकों ने कम्पन आलेख की भाषा का अध्ययन करते हुवे संपूर्ण ह्रदय का निरीक्षण किया ॥ 

संगनक अंतरायन चाके । हहर बैदु बहुटी दिए हाँके ।। 
पूछि अरु को होइ तुअ संगा । भयऊ अतिसय गहन प्रसंगा ॥ 
संगणक ने अपने पटल  पर ह्रदय के अंतर जगत का दृश्य उकेर दिया । तब चिकित्सक गण ने घबरा कर वधु को पुकारा । उन्होंने प्रश्न किया  अति गम्भीर विषय हैं तुम्हारे साथ कौन कौन हैं॥ 

कहि पिय सख सह कौटुम होई । अबर हमहि अरु संग न कोई ॥ 
भाव भए प्रबन् सिथिरै अंगा । प्रतिभाषत मुख भयउ बिरंगा ॥ 
वधु ने उत्तर दिया : -- प्रियतम के मित्र सपरिवार हैं । हमारे संग अन्य कोई नहीं है ॥ ऐसा उत्तर देते हुवे वधु भावुक  हो गई उसके अंग शिथिल हो गए प्रतिभास करते हुवे मुख विवर्ण हो गया ॥ 

पडत जीवद बदन रेख, बहियर भई अधीर । 
डरपत पूछी का अहैं, सोए बिषय गम्भीर ॥ 
उस समय चिकित्सक के मुखाकृत की रेखाओं का अध्ययन कर वधु अत्यंत अधीर हो गई । भयभीत होकर उसने प्रतिप्रश्न किया वह गम्भीर विषय है क्या ॥ 

रविवार, १७ अगस्त, २०१४                                                                                                     


तीनि बाहिनिहि भयउ बिभंगा । जुगित जोइ मुख हरिदै संगा ॥ 
रुधिराभिसरन जौ रुध होही । साँसत हरिदै साँस न जोही ॥
तीन रक्त वाहिनियां अवरुद्ध हो गई हैं यह अवरोधन ह्रदय के मुख्य द्वार से सलंग्न हैं ॥ यदि रुधरिाभिशरण अवरुद्ध हो गया तब सांस रुकने की पीड़ा के सह ह्रदय स्वांस ग्रहण नहीं करेगा ॥ 

 स्वेद  दै  हिय तुर कम्पन किन्हे  । पहिले कभु अस लच्छन चिन्हे ॥ 
बधूटी सिरु कहे  नहि नाही । जीवद गहन सोच अवगाही ॥ 
तुमने पहले कभी रोगी में ऐसा लक्षण  है श्रम सीकर के सह ह्रदय तीव्र गति से स्पंदित हुवा हो ॥ उत्तर में वधु के सिर ने नहीं कहा । तब चकित्सक गहरी सोच में पड़ गए ॥ 

 प्रसन  निरंतरप्रस्नी पूछी । बधु प्रतिभासन भासत छूछी ॥ 
अरु बहु भाँति पूछ बुझाईं । थकित नयन बधु कह समुझाई ॥ 
प्रश्न पूछने वाले निरंतर प्रश्न कर रहे थे । वधु भासते भासते उत्तरों स रिक्त हो रही थी । और बहुंत प्रकार की पूछ को बुझाते वधु थकित नयन होकर कहती समझाती गई ॥ 

कहे जीवद तब हतप्रद बदन । जे अपने पो  अभिन्न प्रकरन ॥ 
स्थूल तन न ब्यसन न कोई । मधु मेह संग ग्रसित न होई ॥ 
तब हतप्रभ मुख से चिकित्सकों  ने कहा यह अपने आप में एक एकेला प्रकरण है ॥ कारण कि रोगी का शरीर न तो स्थूल है न उसे कोई व्यसन है न वह मधुमेह के रोग से ग्रस्त है ॥ 

चले सुधित बहु संजमित रुधिरू चरन के चाप । 
का कतहुँ कबहु परिखेहु,  पित सांद्रव संतापा ॥ 
उसके रुधिर के पद चाप भी व्यवस्थित एवं संयमित हैं । क्या कभी कहीं रक्त के पित्त गाढ़ेपन का अर्थात रक्तवसा  का परिक्षण किया है ॥ 

सोमवार, १८ अगस्त, २०१४                                                                                                         

अस कह बेदु  पद कतहुँ  बाढ़े । बहुरत बोलि पित्त अति गाढ़े ॥ 
रुधिरभिसरनु चाप अनियंता । लघु घात कृत बर किए अंता ॥ 
ऐसा कहकर चिकित्सक के चरण कहीं बढ़े और लौटकर कहा रक्तवसा स्निग्ध है ।  रक्त के  दाब की अधिकता उसके परिभ्रमण को अनियंत्रित कर देती है जो लघु आघात को भी वृहद कर रोगी का अंत करने में सक्षम होती है ॥ 

एहि भल पिय मधुमेह न जोई । नियंत चाप अरु भली होई ॥ 
न तरु मीच हरिदै दिए काँचे । जो किए अंत  पलक पै पाँचे ॥ 
यह भी एक भली बात हुई कि रोगी को मधुमेही नहीं है उसपर रक्त चाप भी  नियंत्रित है ॥ अन्यथा  मृत्यु ह्रदय को खंडित कर पालक भर में ही रोगी का अंत कर देती है ॥ 

अजहुँ एहि बचन  हमहि समझाएँ । गत रयन कतहुँ काहू न धाए ।। 
उरस पीर जब अल्पक देखे । अहइँ घात एहि हम नहि लेखे ॥ 
अब हमें यह समझाओ  बीती रात उपचार हेतु तुम कहीं गए क्यों नहीं ॥ ह्रदय की पीड़ा को जब अल्प स्वरूप में देखा तब हमें समझ नहीं अाया कि यह ह्रदय आघात है ॥ 

अस कह बधु धीरज गइ हारे । नयन पटल  जर  झर झर झारे ॥ 
कहत एहि बरन फूटी धारा । मूसक हेरि निकसे पहारा ॥ 
ऐसा कहकर वधु धीरज हार गई  नयन पटल से झर झर कर जल झरने लगा ॥ और ये शब्द कहते हुवे जल  की जैसे धारा ही फूट पड़ी ।मूसक ढूंडने चले थे, पहाड़ निकल आया ॥ 

अरु प्रतिभेदन क्रिया के, जीवद किए संभारि  । 
कहत अचिरम बोलि पठउ, रुधिरु हेतु परिबारि ॥   
तदनन्तर  चिकित्सक शल्यक्रिया की तैयारी करने लगे  । यह कहते हुवे कि रक्त दान हेतु  अपने कुटुंब को शीघ्रातिशीघ्र बुला भेजो ॥ 

मंगलवार, १९ अगस्त, २०१४                                                                                                           

देइ संग दिनुभर  के होरी । सखा कौटुम्ब सहित बहोरी ॥ 
बँधे धीर तिन पलक बिभंगे । बहे नीर बन नयन प्रसंगे ॥ 
 जो दिनभर चिकित्सालय में रुके रहे और वरवधु का साथ दिया  वह सखा अब कुटुंब सहित लौट चुके थे ॥  कुछ धीरज पलकों ने बांधे रखा था वह भी विभंगित होते हुवे  पलकों के संग नीर बनकर बह चला ॥ 

जासु सपन महु रहि न अँदेसा । सोइ केहि कस कहउँ सँदेसा ॥ 
भए घनबर तरंग के नाई । एक रंग अवाई एक जाईं ॥ 
जिस घटना का स्वप्न में भी कहीं अंदेशा नहीं था उसका  सन्देश किसे व् कैसे कहूँ ॥ ( यह विचार कर ) वधु का मुख तरंग की भाँती हो गया । उसपर एक रंग आता दुसरा लौट जाता ॥ 

ताप सिंधु उर कंठ भरे । उदहार बन लोचन कन झरे ॥ 
इत हिय बल्लभ ब्याधि भोगे । उत गह बालक पालक जोगे ॥ 
सन्तापित ह्रदय रूपी सिंधु,  कंठ में भर आया । वह बादल बनकर नयनों से बरसने लगा ॥ इधर ह्रदय वल्लभ  ह्रदय व्याधि से ग्रसित हैं उधर गृह में बालक अपने पालकों की प्रतीक्षा में हैं ॥ 

कवलन पिय  पथ काल जुहारी । होत बिलंबु उतारिहि पारा ॥ 
बैदु आन कहि बारहि बारे । बेगि करो तनि रुधिरू जुगारैं ॥ 
 कवलित करने हेतु काल प्रियतम की प्रतीक्षा कर रहा है विलम्ब होते ही वह जीवन नैया को संसार सिंधु से पार लगा देगा ॥ चिकित्सक वधु के पास आकर वारंवार कहते । थोड़ी शीघ्रता करते हुबे रुधिर की व्यवस्था करें ॥ 

पलक दसा सुभ रीत रही, अजहुँ  भई बिपरीत । 
जीवन मरन रनांगन  , होइहि बिधि के जीत ॥  
क्षण भर पहले जो दशा मंगलकारी थी वही अब विपरीत हो गई । जीवन -मरण के रणांगण  में अंतत: विधाता की ही विजय होती है ॥ 

बुधवार, २० अगस्त, २०१४                                                                                                       

दुर्दसा दर्प एहि सोच करे । सहुँ जनम मरन  के प्रसन खरे ॥ 
अस बिपति सँदेसु केहि दाईं । कौन सुहरिदै कौन सहाई ॥ 
 दुर्दशा दर्प से युक्त हो कर यही विचार करने लगी ।  सम्मुख जीवन-मरण का प्रश्न मुंह बाए खड़ा है ॥ ऐसी  विपत्ति का सन्देश किसे भेजूँ । कौन सरल हृदयी है कौन सहायता करेगा  ।

स्व अर्थ सहारथ आन पड़े ॥ पुरजन परिजन कि बिरधा बड़े बिरध बड़े 
परे बिपति पुनि कहन सँकोची । दोनउ तईं कहहि का सोची ॥ 
प्रियजन हो कि परिजन हो कि  घर के बड़े-बूढ़े हों स्वार्थ को उनके सहयोग की आवश्यकता आन पड़ी है । उन्हें सूचना देते हुवे वधु संकोच करने लगी कि वे दोनों के प्रति क्या सोचेंगे ॥ 

आरत के जस गेह बसाही । लिए बुलाए परिगह जब चाही ॥ 
छाँड़ साँस पुनि ऊपर खींची । कथन सँभार  दीठ किए नीची ॥ 
रोगों की तो जैसे इन्होने गृहस्थी ही बसा रखी है ।  एक साँस छोड़ कर उसे ऊपर खींचते,  दृष्टि नीची किए वधु ने शब्दों को संभाला ॥ 

मात पिता बिरधा बय  भोगहि । सेव सहारथ आपहि जोगिहि ॥ 
बहुरि बिनु अरु समउ चूकाही । बड़े भगिनि सब  कही बुझाई ॥ 
मात-पिता बृद्धावस्था को भोग रहे हैं सेवा सहायता की वह  स्वयं ही प्रतीक्षारत हैं ।ऐसा सोचते हुवे अधिक समय नष्ट न कर बड़ी भगिनी को सारा समाचार कह सुनाया  ॥ 

दिए सँदेसु सकल परिजन, पुनि उर धर बहु धीर । 
कहत नयन निर्झर भयो, झर झर झलके नीर ॥  
तत्पश्चात  धैर्यवान  ह्रदय से बारी बारी सभी परिजनों को सुचना देते हुवे वधु के नयन निर्झर हो गए उनसे झर झर करते हुवे जल की धारा फूट पड़ी ॥ 

बृहस्पतिवार, २१ अगस्त, २०१४                                                                                             

बालकिन्ह लिए सख बहुराई  ।  क्रमबध बधु सब दसा बुझाई ॥ 
प्रिय हो पुर हो दूर कि धूरे । हरियर भवन सबइ जन जूरे ॥ 
इधर प्रियतम के मित्र बालकों को लेते आए ।  वधु ने  उन्हें क्रमवार सारी घटना कह सुनाई ॥ प्रिय हो कि पर हो दूर के हो की निकट सम्बन्धी हों शनै: शनै: सभी निवारण भवन में एकत्रित हो गए  ॥ 
 
भगिनी भाबुक भौजि कि भ्राता । आनि संग लिए जात जमाता ॥ 
सुमिरि जननि अस आइहि धाई । बत्स रूप जिमि धेनु लवाई ।। 
भगिनी हो की भावुक हों भावज हो कि भ्राता हों सभी अपनी पुत्रों एवं जमाता सहित आए । प्रियतम का स्मरण कर जननी ऐसे दौड़े आईं जैसे वत्स-रूप ( छोटा बछड़ा )  को स्मरण कर गौवें दौड़ी आती हैं ॥ 

बरसन जस रस घन निकचाहिहि । पूछ प्रसन सब झरी लगाहिहि ॥ 
भई दसा जब अस गंभीरे । पूरब काहे नाहि कही रे ॥ 
 जैसे झड़ी बांधने हेतु नभ में मेघ संकलित होते हैं वैसे ही निवारण भवन रूपी गगन में परिगृह संकलित हुवे एवं पूछ-प्रश्न की सभी ने झड़ी सी लगा दी ॥ जब ऐसी गम्भीर दशा थी । तब तुमने हमें पहले क्यों नहीं कहा ( उन्होंने पूछा ) ॥ 

  सोक बिबस बधु कही न पारा । डूबे भयउ तृन के सहारा ॥ 
आगत संग चिंतत महतारी । कटोक्ति किए बत कही चारी ॥ 
वधु शोक से संतप्त थी विवशता के कारण वह कुछ उत्तर न दे पाईं । किंतु डूबे  को तृण का सहारा अवश्य प्राप्त हो गया था ॥  पदार्पण करते ही माता वधु के संग प्रियतम हेतु चिंतत हो उठी । और कटोक्ति कर चार बाते भी कह सुनाई ॥ 

दोनउ कुल भयउ दोउ कूला । धीरबान मन धीरज भूला ॥ 
दुःखकर लोचन जल भर लाई । बहियर भइ निर्झरनि के नाईं ॥ 
उस समय वर-वधु दोनों के कुल दो तट हो चले  । चित्त अत्यंत धैर्यवान था किन्तु ऐसे कटुक वचन श्रवण कर वह अपना धीरज भूल गया ॥ दुख करते हुवे वधु लोचन में जल भर लाई । पलक में ही वह निर्झरणी स्वरूप हो गई ॥ 

 लेखे हरुबारी निकसे भारी उरस छत आरत महा । 
पुनि सकल कहानी बधू बखानी बदन जस लच्छन कहा ॥ 
प्रतिभेद क्रियाहि सब संसय लाहि अबर नगर गवन कहे । 
जीबद बहु कुसल जुग साधन सकल जदपि अरुज भवन रहे ॥ 
जिसे  छोटा समझा ह्रदय को ग्रस्त करता हुवा वह रोग महा भारी निकला ।  देह ने जैसे लक्षण प्रदर्शित किए वधु ने वह सारी घटना कह सुनाई ॥ यद्यपि निवासित  नगर का निवारण भवन चिकित्सकीय संसाधनों एवं कुशल चिकित्सकों से  परिपूर्ण था तथापि  परिगृही शल्य क्रिया के प्रति संशय व्यक्त करते हुवे किसी अन्य नगर में निर्गमन हेतु कहने लगे ॥ 

पर पुर गमन निरखत नहि, मम नैन को निहोर ।  
कहत बधुरि नीर नीरज, करत करज के कोर । 
मेरी दृष्टि को पराई नगरी जाने का कोई उचित कारण गॉचर नहीं होता ।  अश्रु -मुक्ता को हस्त्यमाल  में संकलित करते हुवे वधु ने ऐसे वचन कहे ॥ 
शुक्र/शनि , २२/२३  अगस्त, २०१४                                                                                                  

जदपि कहि बचन सकल  परिबारि । पिय छत हिय कृत हेतु हितकारि ॥ 
स्यान नयन जिउ मरनि पेखे । अग जग लग के चरितर देखे ॥ 
कौटुम्बिक के कहे वचन यद्यपि प्रियतम के छतवत हृदय के हेतु हितकारी थे, उनकी अनुभवी दृष्टि ने जीवन-मरण को निकट से देखा था वह गृह क्या संसार तक के चरित्र से परिचित थे | 

यह  जी जोनि बहुत अनमोले । परिजन कह समुझावत बोले ॥ 
जो तुहरे मन धन के चिंता । तिन संजुत गत भयउ अचिंता ॥ 
परिजनों ने अबोध वधु का प्रबोधन करते हुवे कहा कि यह जीवन व् यह देह अतिशय अनमोल है, यदि तुम्हारे मनो-मस्तिष्क में धन-व्यय की चिंता है तब उक्त सम्बन्ध में  निश्चिन्त हो जाओ | 

भाव सरिबर  कंठ भर लाई । भगिनी पुनि पुनि कह समुझाई ॥ 
जे भाबुक तव पिता समाने । लगिहिं लाग  सो सन लए आने ॥ 
भगिनी भावों के सरोवर से कंठ भर लाई वह वधु को वारंवार कह कर समझाती कि ये भगिनोई तुम्हारे पिता तुल्य हैं जो कुछ धन व्यय होगा सो वो अपने साथ लाएं हैं | 

महा नगरि के  सुजस बखाने । सकल भवन जीवन बरदाने ॥ 
अहैं तहाँ बर बर बिग्यानी । पूछो त एकहु नाउ न जानी ॥ 
और महानगरों की कीर्ति का व्याख्यान करते बोली कि वहां सभी चिकित्सा भवन जीवन के हेतु वरदान तुल्य हैं वहां महातिमह विशेषज्ञ हैं  उनक पूछा तब वह एक का नाम भी न कह पाईं || 

को रोग को पीर धरत , रूप धरे उन्माद । 
अधुनातन घर घर चले  चलन पलायन वाद ॥ 
कोई किसी भी रोग से ग्रसित हो अथवा किसी भी पीड़ा से पीड़ित क्यों हो उसने उन्माद का स्वरूप धारण कर लिया है स्थानीय चिकित्सा संतषजनक होने के पश्चात भी अब तो घर घर उपचार हेतु पलायन वाद का चलन चल पड़ा है | 

पिहरारु पख हो कि ससुराई  । सब मह नगरि गवनु समुझाई  ॥ 
बहियर के चित भए दृढ़ चेता । निबारन निबास ह्रदय केता ॥ 
नैहर पक्ष हो कि ससुराल का पक्ष सभी उपचार हेतु महानगर में गमन हेतु ही प्रबोधन कर रहे थे | वधु के चित्त ने भी निवास स्थान में ही प्रियतम के ह्रदय केतन के रोग के निवारण का दृढ निश्चय कर लिया था | 

करत कीरत महा नगरी के । कहत इहाँ भरोस का जी के ।। 
को किछु कहई को किछु कहई । बधु मत संग असंगत रहई ॥ 

मात भ्रात पुनि पिय पहि गयऊ । पूछे तुहरे मति का कहऊ ॥ 
कराउ सोइ अरु सोच बिनाही । जो प्रान समा के चित चाही ॥ 

जोइ जिउ दे जिआवहि सोई । अगुसर किछु कर सके न कोई ॥ 
आकुल परिजन हिट अभिलाखी । कबहुँक पिय कबहु प्रिया लाखी ।। 

भयउ बिहान दुनहु कुल कूला । बर बधु के अनुमत अनुकूला ॥ 
आने एक  संसय उर माही।  कहीं सरबस  सुधित तौ नाही ॥ 

हृदय लेख  चित्र लेइ गत , आन जीवद दुआरि । 
मंद मलिन प्रभा मुख सों,  बहुरे सब किछु हारि ॥ 

रवि/सोम, २४/२५  अगस्त, २०१४                                                                                                    

इहाँ बिग्यानी जोई कहे । उहाँ  केहु  ग्यानि सोई कहे ॥ 

जस अंतर चित्र दरसनाई । सल्य चिकित्सा एकै उपाई ॥ 

बसित भवन हुँत संसितात्मन । आईटी बधु निज सम्मत संपोषन ॥ 

बड़ भाबुक कहि  अनुमत घारे । किजौ  सोइ जो मनस उचारे ॥ 

चिंता चित संसय उर लाहत । बिसाद सिंधु माहि अवगाहत ॥ 

भगिनि जोई धरोहरु  दाईं  । त्रयोदस लखा  सेष सँचाई ॥ 

एक अरु अरध लखा तिन माही । माँग अधि कोष करतल गाही  ॥ 

सरल सधारन  जीवन जीवा । जासु चरन निज छादन  सीवा ॥ 

तासु कठिन अनुमान धराना । सो दारिद अहैं कि धनवाना ॥ 

भगिनहि भाबुक दीन सोच किए । आनए सन लगे सो लाग लिए ॥ 

उर छत निबारन भवन, जब गुनि गिनि धन धारि । 
सल्य चिकित्सा के तबहि , जीवाद साज सँभारि 

मंगलवार, २६ अगस्त, २०१४                                                                                                    

साँस चढ़ाए रहे कर जूरे । जबलग भेदन होइ न पूरे ॥ 
अति संसय बसे मन माही । मरन जिअन परिजन डेराहीं ॥ 

काल के क्रम चारि खन धारीं । प्रिया पलक पल पल अनुहारीं ॥ 
उर दधि ताप नयन घन घोरे । नीरज माल करज किए कोरे ॥ 

रलिरए रै संसय बहुतेरे । जपत राम किए धाम घनेरे ॥ 
हस्त पटल मुख पटीक धराए । सल्य हृत गेह बाहिर आए ॥ 

मुरुझित  हास अलप हरषाईं । भेदन कृतफल कहत  बताईं ॥ 
हास हर्ष बय अजहूं आधा । अहन रयन लग रहि किछु बाधा ॥

जीवद के लेइ अनुमति,  बधु गए भेदन केत । 
टाँक लगे उर चरन कर, प्रीतम परे अचेत ॥ 


दोइ दिवस छय दोइ प्रभाता । भयउ समउ हिय पर अघाता ॥ 
चरण जुगत पिय पलन पौढ़ाए । दरसे बधू मुख कातरताए ॥ 

जस मेला एहि मेल बिहाना । जीवन के का हो अवसाना ॥ 
पलकन पंथ  नयन गह छाई । सुराग नरक के छबि दरसाई ॥ 

उर उमगेउ अम्बुधि नुरागे  । लोचन जल लिए जनि पद लागे ॥ 
चीरंजीउ कहि मात ब्याकुल । भयउ भयाकुल दोनउ के कुल ॥ 

मिलि बालकिन्ह कछ जाइ पुरब । बैन नैन रे मुख किछु न कहब ॥ 
तपित उर बधु पलक जल बोही । पौड़ पलन पिय बाढ़त जोही ॥ 

अरम्भे पतिभेद क्रिया समऊ बिते प्रभात । 
दिए रक्त दान सह भगिनि भ्रात जात जमात ॥ 

लौह एक कटनी दोई, दोनहु मुरुछित कारि । 
एक अघात अंत किए, एक अघात उपचारि ॥

बृहस्पतिवार, २८ अगस्त, २०१४                                                                                               

धरकत हृदय भयउ अधीरा । आनए चेतस धीरहि धीरा ॥ 
हस्त चरण उर लागिहि चीरा । मंद प्रभा मुख पीरहि पीरा ॥ 

ए गहन रोग अरु इ जुबताई । दसा पीया के देखि न जाई ॥ 
लिखे बिधान समउ बलबाना । काल करम गति अघटित माना ॥ 

स्वजन  सहित भेंटि पटि लागे । पिया बिलोकत अति अनुरागे ॥ 
मांगे बरदान जिए पिय मोरे । सुमिरत प्रभु दोनउ कर जोरे ॥ 

उपकृत होत बधु चरन बहुरे ।  नयन जलज  अचरा पट कूरे ॥ 
चेत भए चिंता  भई आधी ।  पूर्ण सन भै आध  ब्याधी ॥ 

जीवन निरीक्षत कहि अजहुँ , जी संकट बिरताइ  ॥ 
भले बचन अजहुँ आगिन  होहिहि परभु सहाइ ॥ 

शुक्रवार, २९ अगस्त, २०१४                                                                                                         

अस निगदत गह गहन उदासी । दूर सुदूर के कि संकासी । 
प्रियजन परिजन का पुर बासी । फिरि एक एक मुख ले उछबासी ॥ 

देउ पितर सम्मुख कर जोरी । भइ कृपा कह बहोरि बहोरी ॥ 
सुभ आकाछी मंगल कारी । मृदु हिय ममता मै महतारी ॥ 

रही संग लगि  पालउ साथा । बड़े भाग जग जोइ सनाथा ॥ 
बे परिनति माह एही ब्याधी । जब लगि जीवन तब लग बाधी । । 

महतारि तनुज लेख अभागे । साली क्रिया सों संका लागे ॥ 
गावं बिनु मह नगरी पराई । सलया क्रिया के दसा अनाई ॥ 

रह अरुजित रे मोरे ललना । इहँ काटि हिय पौढ़ाए पलना ॥ 
बानि बान किए मुख किए कोसा  । कोसे जीवद सह संक्रोसा ॥ 

मात सकल संक संदेहु  बुद्धि कोष संजोइ ।  
इत प्रीतमहु सिथिर देह, मात कहे सन होइ ॥ 

शनिवार, ३० अगस्त, २०१४                                                                                                  

पीरा होइ न जाहिं बखानी । माना मैं तुहरे मनमानी ॥ 
देखु देही सूत कस साँटे । परिच्छेद दए दुइ दुइ आँटे ।। 

जाब निबारन महा अगारा । होतब तहँ अरु भल उपचारा ॥ 
भए  उर छत इहँ फूरी बोले । लाह लबध हुँत उर पट खोले ॥ 

सुनी पिया के बधु भइ खिन्ना । तुहरे प्रकरन जगत अभिन्ना ॥ 
सो सब मोर करे परिनामू । भय कुठाहर जेहि बिधि बामू ॥ 

इहँ जीवद कहि सो सब काँचे । आए बात तब जब जी बाँचे ॥ 
प्रथमहिं अस कहु कहे न काहे । चुगि न खेह चिरि अरु पछिताहे ।। 

बोली  बधु अजहुँ तुहरे , मन आहि जहाँ जाउ । 
ताँस होत  घर आइ फिरि भरे कोप अरु ताउ ॥  

रविवार, ३१ अगस्त, २०१४                                                                                                        

निबारन भवन दिए अवकासा । श्रमित चरन पिय आनि निबासा ॥ 
धरि भुज सिखर लगि संग माई । जासु संगती परम सुखदाई ॥ 

संधिकाल हो रयन बिहाना । रखे राख बहु देइ ध्याना ।। 
बान सम बचन एहि दुखदाई । अबर गवन के ररन न जाई ॥ 

चरन कर उर काटि के डारे । ए जोग रहे न ललन हमारे ॥ 
हरिअ हहरन पीर गह थोरे । दुरोपचार करे धन जोरे ॥

मनुजाद मरन गति पैठाइहि  ।  मर्म घात अन्बेष बिनाइहि ॥
सुनत अस पिया आह पुकारे । जनि कहि पुनि पुनि हाँ रे हाँ रे ॥ 

को फूरि कही को सही, को आन समुझाए । 
बधूटि चित जनिजात के, भरम बचन भरमाए ॥