Monday, June 16, 2025

----- || राग-रंग 41 || -----,

 तोरी कुंज गली बिनसाए रे, सम्हारो रे साँवरिआ..... 

सम्हारो रे साँवरिआ रखधारो रे साँवरिआ.....


गोरखपुर ते आया जोगी गोरख वैकें धँधे,

रँग भवन करे रँगरलिआ, पड़ माया के फँदे....


पीले पँजे से डर दिखलाए रे सम्हारो रे साँवरिआ... ..

राग रंग मे डुबकी लगाए,तन बैरागी चैला । 
मल मल साबुन तन उजियारा मन मटियारा मैला....

हढ धर्मि का जोग लगाए वो सम्हारो रे साँवरिआ .....


कपट भेष भर रे नगर फिरे वह ढोंगी पाखंडी,
लाज वाज सिर धरे टोकरी,बैठा बेचे मंडी.....

मानत ना वो कोई उपाए रे मनवारो रे साँवरिआ.....

गली गली जोगी फिरे चाहे जो रख लेय | 
ये सेवक ताहि के जो मोल कहे सो देय || 

Sunday, June 15, 2025

----- || राग-रंग 40 || -----,

 l| राग दरबार ll

कहो प्रेम से राम राम जी,
जा रहा है ये समय बितता l काल आए नहि किसी को बता ll पलक हो कि छन पहर हो कि दिन l  सब घड़ी लो प्रभु का नाम जी ll हो उपकृत सत्य के साथ से l हो सुकृत्य नित्य ही हाथ से ll राम का नाम रहे अधर पर l नहि और कोइ रहे नाम जी ll प्रभु वंदना नित करते चलो l दुखि जग की वेदना हरते चलो ll करके पुण्य का काम एक फिर l करो दूसरा कोइ काम जी ll नाम राम का जपे मरण में lरहे सदैव मन हरि मगन में करो शरण उन प्रभु की जिनके  l चरण में हैँ चारों धाम जी |
| दुख हो कि सुख हो धन संपदा  lकष्ट व्यथा विपदा में सदा ll
रहो मगन में करो हरि भजन l एक पल भी हो ना  विश्राम जी ll

----- || राग-रंग 39 | -----,

|| राग भैरवी ||

प्रभु जी छूटि ना ए माया,
किन्हा निसि दिन सुमिरन जग का हरि सुमिरन बिसराया l सोई कर्मन करतब माना, जब जस जौ मन भाया l पद पद भरमते कुपथ चरिया सद्पथ तै भरमाया l कहि फिरा मैं परम परबोधा पत कइ ना पतियाया l बुध कइ बतियाँ सुधि सुधि बाहुर बहुर बहुर बिहुराया l भूरि भूरि भव भोगन भोगा पहिरा सोया खाया l धरणि परबत लए उत्खंदिया काँकरि चुग चुग लाया l हरियारी थल मरूथल किन्हा भू भू भवन रचाया l जोड़ि जोड़ि कै भया करोड़ी एकै न धरम लगाया l जिअ निकसावत न गयउ पयादहि चातुर कंध बुलाया l मन भर लाकर दाहन माँगा धरिअ चिता जबु काया |

----- || राग-रंग 38 | -----,

 || राग भीम पलासी ||


आयो फागुन मास जू पीटै नगर ढिंढोर l
पूछ रहा री राधिका छुपे कहाँ चित चोर ll देखे द्वारि द्वारका पेखे पौरी पौर l निकुंज पंथ कुंज गली ढूँढ फिरा चहुँ ओर l ज्योतिमंडल जुहारै छानै छिति का छोर l बैकुंठ लोक बिलोकया सोधै सुर के ठोर ll जमुना तट कि बंसी बट घट घट लिया टटोर l पनघट पनघट टोह लिए मिले न नंद किसोर ll हार फिर फिर पूछ फिरा ले गोपिन कै नाम l कहु कह मिलेंगे स्याम कह मिले घन स्याम ll कहु कह मिलेंगे स्याम कह मिलेंगे स्याम, पग पग फागुन पूछ फिरे करे न क्षण विश्राम   पनघट पनघट ढूंढ लिया ढूँढा जमुना कारी लिया जुहारा द्वारी द्वारी पर मिले नहीं बनवारी हे री मोहे दरसे नहीं दरसिया चारो धाम फिर दो छन को जा बैठा बंसी बट की छैया पूछा रे बल दाउ भैया कहाँ छुपे कन्हैया अग जग में मैं देख निहारा मिले न नैनाभिराम तीन लोक का भ्रमण किया क्या मथुरा क्या कासी   देखा सारा तारा मंडल देखी लख चौरासी देखी असुर की नगर सारी देखा सुर का ग्राम कहु कह मिलेंगे स्याम कहु कह मिलें स्याम, कहो कह मिले घन कहो तो मिले कहाँ घन स्याम
नैन कुंज राधिका के बैसे पलक हिंडोर l लेय हिलोरा साँवरे गह नेहन की डोर ||

----- || राग-रंग 37 | -----,

 || राग मालकोंस ||


मंदिर मंदिर मूरति तोरी,
सुरपथ रबिरथ किरन संभारे l परबत परबत चरन उतारे ll
भिद अँधियारा भै भिनसारा l जागि जगति हे जग पति तोरी ll निसरत ताल कमल कर जोरे l देय पलक पट नयन निहोरे ll
जागो हे जग बंदन जागो l करत बिनयाबत बिनति तोरी ll लाग निसि लग देहरि द्वारी l जागती जोति जग थकि हारी ll
दिसि उजियारति जगमग जगमग lजरति प्रकीरति कीरति तोरी ll अवध पुरी बृंदाबन कासी l सागर संगम सुख कर रासी ll धीगुनि धुरीनि धर्म कइ धुरी l तीरथ तीरथ संपति तोरी ll तट तट निद्रालस बट छावा l लए करवट जमुहारहिँ नावा ll
पाख पसारत कूजहि पाखी l समपूरन है प्रकृति तोरी ll कुंज कुंज तुम रास बिहारी l बन बन तुम रघुबर बन चारी ll आँगन आँगन तुलसी सोहे l मन माहि मोहिनि सुरति तोरी ll
नगर नगर सब गेह झरोके l जगत बिहासत तुअहि बिलोके ll पंच सबद संगत सुर गावाँ l गावहि श्रुति सुख आरति तोरी ll

----- || राग-रंग 36 | -----,

 II राग दरबारी II

जगमग दीप जले मंदिर में, कासै कंचन कलस कंगुरे l चौंक पुरावत सजै गोपुरे ll रतिकर सुन्दर साँझ सैंदुरी lप्रबसत चरन ढले मंदिर में ll करत नाद मुख संखअपूरे l खनकत खंखन झांझ नूपुरे ll पनब पखावज ढोल मजीरे l बाजत संग मिले मंदिर में ll पहिर पीत पट पुरट पटोरे l भर भूषन बर दुहु कर जोरे ll पुरपुर पथपथ गलीगली ते l प्रमुदित भगत चलेमंदिर में ll गंध पुष्प जल मंगल मौली I अछत कर्पूर चंदन रौली II जोए मंजुल आरती बंदन l करत थाल कर ले मंदिर में ll

Friday, June 13, 2025

----- || राग-रंग 35 | -----,

सब रूप में सब रंग में तू | रोम रोम अंग अंग में तू || 

क्या कहूं प्रभु/के तू कहाँ नहीं | व्योम व्योम विहङ्ग में तू || 


जो अगजग के पाप को हरे | जो संताप आताप को वरे || 

तरी धरा पे जो स्वर्ग से  | उस गिरिवरम् की गंग है तू || 


मेरे प्रेम मेरी प्रीत में | मेरे साँसों के संगीत में || 

तू सात स्वरों के तार में | रागों की जल तरंग में तू || 


तू बाँसुरी की रवकार में | तू झांझती झंकार में || 

तू कंठ की श्री माल में | कर ताली में मृदंग में तू || 


कहीं उड़े गगन तो क्षण लगे | वही राग कण आ चरण लगे || 

जो चढ़े सौभाग्य शीश पर | उस श्रृंगार के सुरंग में तू || 


भाव सिंधु को विस्तार दे | करतार बनके तू तार दे || 

इस संसार के उस सार का | है प्रशान्तमनम् प्रसंग तू || 


मिल दीप्त दिया की रेह में | और डूब उसके स्नेह में ||

बिरहा अगन में जल उठे | ऐसे प्रियतम पतंग में तू || 


कभी डरे डरे डेग भर चलूँ | कहीं दूर कोई डगर चलूँ || 

तब हो फिर क्यूँ किसी का डर | जब हो प्रभो/पिया मेरे संग में तू|| 


ये जगत की भूरि सम्पदा | रही पास में ना कहीं सदा | 

 कर वचन जो ये सुविचार दे | उस वाचनीय व्यंग में तू ||