Friday, July 18, 2025

----- || राग-रंग 60|| -----,

दीप सिखा प्रजरत बरी, द्युति करत घन रात | 

जौँ अँधिआरि सयन करी जागे प्रात प्रभात || 

:-- सघन निशीथ को प्रदीप्त करते प्रज्वलित दीप की शिखा को समाप्त होते देख जैसे ही अन्धकार शयनित हुवा वैसे ही प्रात संग प्रभात काल जागृत हो उठे...... 

सरन सरन बखेर चली दिपित किरन चहुँ ओर | 

सोम सुनेरि सूर प्रभा छाइ छितिज के छोर || 

: -- शरणियों के चातुर्य कोणों में दीप्त किरण विकिरित करते सौम्य स्वर्णिम सूर्य प्रभा क्षितिज के छोर छोर पर व्याप्त हो गई | 

ले अरुन की अरुनाई  सौंधि सौगंधी धूर | 

नत नयन नव यौवन के सीस धरे सिंदूर || 

:-- सूर्य के तेजस्व की लालिमा लिए सुरभित सौगंध्यित धूलिका अवनत नयन नव यौवन के सैंदूर्य स्वरूप सिरोधार्य हुई.....  

मनमोहन के मंदिरे मँजीरु शंख अपूर | 

मंद मधुर सुर ताल दे रँग नूपुर सौं रूर  || 

रँग = वादन, सौं रुर = संग सुशोभित 


जल तरंग की संगती बाज रहे सौ तूर | 

सुर थाप सौं राग रहे मद्धम ढोल सुदूर || 


पुष्कर पुष्कर भए पुष्करी बिकसे प्रेम पराग | 

भौंरत भरमत भाँवरी भर अंतर अनुराग  || 

:--पुष्कर = सरोवर, पुष्करी = कमलों से युक्त, भौरत भरमत भौंरी = भ्रमण करती भ्रमित भ्र्मरी, अंतर=अंतस्य 


 भाव विभोर ह्रदय करे यह पावस की भोर | 

परन पंथ पर पँख पसारे निरत मगन बन मोर || 

पावस = वर्षा,, परन पंथ = पर्ण आच्छादित पंथ  


झनक झनक जस झँकारें झाँझरि के रमझोर | 

झर झर करती निरझरी लेवे तस चित चोर ||   

निर्झरी = झरना,रमझोर =घुंघरू 


कुसुम कलित कल कुस थली, करषत कुञ्ज कुटीर |  

सुरभि सैल के सिस झरे  झर झर नीरज नीर || 

:--  कौसुम से सुसज्जित सुन्दर ग्रास की स्थली पर लताओं से आच्छादित आकर्षक कुञ्ज कुटीर 

सुरभि शैल =मनोरम पहाड़ी नीरज नीर = जल मुक्ता 


डाल डाल पर डारि के झूलनिआ की डोर | 

बरखा रानी झूरती सावन को झकझोर || 


प्रेम करन को फूल दे बाँध प्रीत के केस | 

गोद बैठाए लए गया रे बाबुल निज देस || 

करन फूल =कर्णफूल 

बूंद बून्द घन बरस के गाए बिरह का राग | 

सात सुर में प्रियतम को, छेड़ रहा अनुराग || 


पहला सावन दे रहा पहला ये संदेस | 

प्रीति बिनु इन नैनन में नींद नहीं लवलेस || 


प्रेयसी के तन मन में लेवे प्रीत हिलोर | 

डोरी धरे पलकन की झौंरे प्रेम हिंडोर || 


दीप सिखा जर बरत सिराई, उजरावत सघन घन रात | 

ज्यों अँधियारि सयन करि जाई, उठे जागे प्रात प्रभात || 

सरन सरन पै किरन बखेरे  चलत चहुँ ओर 

सोम सुनेरी सूरुज परभा छत छाई छितिज के छोर 

Monday, July 14, 2025

----- || राग-रंग 59 | -----,

धौल गिरि से गिरे गंगा की पावन अर्द्धांगी  धारा ।

यहाँ त्रिजट त्रिलोकि त्रिपुण्ड्र धरे वासे नाथ केदारा ।।१|| 


शिव शशिभूषण शिव त्रिशूल धर शिव शङ्कर ओंकारा | 

शिव के शेखर कर जल अर्पण शिव शिव कह जग सारा ||२||  


शिव शैल राज गौरी गिरिवर शिव सब देव दुआरा | 

शिव काशी कैलास निवासी शिव सब चौंक चौबारा ||३||  


नवल नीलोत्पल गरल कंठ शिव भुज भुजङ्गि हारा | 

शिव महाकाल  उज्जैन नगर हर हर कह उच्चारा ||४||  


शिव प्रियङ्कर शिव सिरोधर कर पारग सिंधु अपारा | 

 राम रमेश्वर रमा नरेश ने लंका को उपकारा  ||५||  


बैद्य नाथ के धाम धरे जन कंधे काँवड़ भारा |

यहाँ शिवंकर धरनी पर धर रावण गया सँहारा ||६|| 


त्रयंबकेश स्वरूप महेश का जप जग उद्धारा | 

ब्रह्म गिरि से गोदावरी की धारा ले अवतारा ||७|| 

सोमनाथ के शिव की महिमा त्रिभुवन में अपरम्पारा | 

इस ज्योतिर् लिंग की ज्योति ने जग को उजियारा ||८|| 


डमरूधर का जब डमरू डम डम डम ध्वनित कारा | 

घुश्मेश्वरम में परम भगत बम बम बोल पुकारा ||९|| 


नटवर नागधर नागेश्वर दारूकावन आधारा | 

गगन गगन में गूंज रहा शिव शम्भो का जयकारा ||१०|| 

          

शिव भस्म भूत अभय भयंकर शिव श्मशान विहारा | 

श्रीशैलम में शृंगप्रियम् का दर्शे दर्श न्यारा ||११||  


शिव सत्यम् शिवम् सुंदरम् शिव भव प्रलयंकारा | 

रुद्ररूपधर महादेव ने भीमा को उद्धारा ||१२||  

शिव प्रियंकर = रुद्राक्ष,धतूरा,बिल्वपत्र, इत्यादि 



Sunday, July 6, 2025

----- || राग-रंग 58 | -----,

|| राग दरबार || 

खिला है गुलशन फ़िजा है महकी,

गिरी वो शबनम वो गुल मुस्कराए.....  


तेरी वज़ू पे हमें यकीं है तू बंद परवर यहीं कहीं है 

प्रभो हमारी अरज यही है 

तुम्हारी रहमत के हो हम पे साए....  


इक दर्दे दरिया ये जिंदगी है और ऊँची हस्ती भगवन तेरी है; 

फंसी है तूफ़ां में सब की किश्ती, 

है कौन रहबर तेरे सिवाए.....  

वज़ू= अस्तित्व 

----- || राग-रंग 57| -----,

----- || राग-भैरवी || -----
           भक्तिकाल

बरखे रे पलकें कृष्ना साँझ सकारे..,

नैन गगन गहरत झरी लाए  बिन सावन घन घारे..,

पलक पँवारे निसदिन तुहरे पंथ निहारे

पंथ निहारत भै पथरीले  घरिभर पट नाहि डारे

 हरिदए बिरजवा बूड़त जाए बह अस असुवन के जल धारे

कासि गाँठि देय रसन पिरोए  जल माला कंठ उतारे

तापर प्यासे पिहु से दिनु राति तापर पिहु पिहु करत पुकारे

बूंद बूंद करि हरिअरि रे हरि निकसत तरफत प्रान हमारे

लेइ जाहु ए सनेस रे उद्धौ गह हम तोरे चरन जुहारे..,

कहँ जमुना तरु तृन तुल हमहि त्यज्यो बिनहि बिचारे

अपलक तुम्हरे पंथ निहारे

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----- || राग-भैरवी || -----
           रीतिकाल 
तुम बिन सुने रे मोरे साँझ सकारे 

Friday, July 4, 2025

----- || राग-रंग 56 || -----,

जयकार धुनि कर बजत दुंदुभि चढ़त बिप्रवर धुजा धरे । 

मुख शंख अपुरत भयो केतु मत् कासत कलस कै कँगुरे ॥ 

अरुन सारथी सौँ सुर पथ रबि रथ यान लेय आन खड़े । 

सप्त तुरग कै बाढ़े चरण जौं जगननाथ ऊपरि चढ़े ॥ 


बैसे रथ सोहत जगनाथा । सुभद्रा बल भद्र के रे साथा ।। 

बोलें भगत बाँधि के डोरे l कस कस करतल चल खैँचो रे ।l


बढ़े चलै लै रथ रतनारा | गुँजरहि जहँ तहँ जय जय कारा || 

नगर नगर पुर कै नर नारी | जुड़ जुड़ भई भीड़ अति भारी || 


राजित रथ हरि की छबि छलके  | मधुर मनोहर झाँकी झलके  | 

पंथ बिछावे पलक पँवारे | नैन निहार निहार न हारे || 


बाजै गह घन ढोल मजीरे | लेइ बढ़े रथ धीरहि धीरे || 
बारि निछाबरि हो बलिहारै | कौसुम अँजुरी नभ बौछारे || 

करहिं आरती जन बिच बीचा | सपत दिबस बस बास गुँडीचा ||  

अरुन रथी रथ चरन फेराए | निज मँगलालै नाथ बहुराए || 


साजै गौपुर गृह गली गली | जनु सब साखी रल मेलि चली || 

बाजै बाजन बृंद घनघोरा  | गगन भेद घन चहुँ दिसि ओरा || 

पूज नबैद्य चढ़ावहिं सब द्वारहि द्वार | 
जय जय कारी करत जन प्रनमत बारहि बार || 
 







बंदन कर जोरे | चरन पखारें 

छन छन सुमन कै अँजुरि छूटै | भर लोचन सब सोभा लूटै | 

 मंगल गावैं 

अति मनोहर छतर सिरु छावा  | रतन राजि रचि देय बनावा || 





Thursday, July 3, 2025

----- || राग-रंग 55 || -----,

हविर् धूम से आवरित, हंस हिरन संकास । 

पथ पथरिले लाँघ चरन,चले सोइ कैलास ॥

 :--पथरिले पंथो को उल्लॉघते हुए चरण उस कैलाश को चले जो होम के धूम्र से आवृत रजत स्वर्ण की आभा लिए है हंस संकाश = रजताभ हिरण्य संकाश= स्वर्णाभ 


हिम उरेखित ऊँ आकृत पर्वत के उस पार । 

दृष्टीगोचर हो रहा जहाँ यम का द्वार ॥ 

:-- हिम द्वारा प्राकृतिक रूप से उल्लेखित ॐ आकृति युक्त पर्वत के पारगम्य जहाँ यम का द्वार दृष्टि गोचर होता है..... 


शिव गति गहती औतरेँ चतुर नदीँ की धार। 

दिशा दिशा में दिव्यतम गूंज रहा ऊँकार ॥

 :--शिवगति= समृद्धि को गृहण करती जहाँ चातुर्य सरिताओं की धाराओं का अवतरण होता है ऐसे कैलाश पर्वत की दिशा दिशा में ॐ प्रणयाक्षर की दिव्यमय गूँज गुँजारित होती है 

शिव शंकर शंभु जी को प्रणमन सौ सौ बार । 

तिन्हके सपरिवार को विनयवत नमस्कार ॥ 


पाषणों से हो रहा अनहत का निहनाद । 

ईश्वर का रहस्य मय सृष्टी से संवाद ॥ 

:--पाषाणों से प्रस्फूटित होती ब्रम्हध्वनि से युक्त सृष्टी से ईश्वर के संवाद द्वारा परम तत्व के रहस्य की सात्विकता का आत्मानुभव अद्भूत है 


नक्षत्रों की माला गुँथे,चंद्र जोत जगराएँ । 

देव उतारे आरती, दिशा दिशा उजराएँ ॥

 :--नक्षत्रों की माला गूँथ चंद्र ज्योति जागृत कर दिशा दिशा प्रदीप्त करते देवता मध्य रात्रि के समय भगवान शिव की आरती करते है 


सत्वती पार्वती के मन मानस का ताल। 

कल कल धुनि कर विचरते, दरसे राज मराल ॥ 

:--सत्यवती माता पार्वती मन मानस का पवित्र सरोवर में कल कल की ध्वनि कर विचरण करते राजहंस दर्शनीय हैं 


कमंडल धर के निर्मल जल की बस एक बूँद । 

सेष सयन के ता सौँहि बिरथा सात समूँद ॥ 

:--कमंडल धारी शिव जी के इस पवित्र मान सरोवर की एक बूंद के सम्मुख शेष शयन भगवान विष्णु के सप्त सिंधु व्यर्थ प्रतीत होते हैं


Wednesday, July 2, 2025

----- || राग-रंग 54 || -----,

 सदरे जग से सुन्दर ए मेरे भारत देस। 

तेरे सम्मुख सिस सहित नत नत नैन निमेष ॥१||  


हिम गिरिवर मौली मुकुट तेरा सिस श्रंगार । 

सिंदूरि सी सूर्यकिरन देय तिलक लिलार॥२||  

लिलार=मस्तक 


हिम वान पर मानस सर शशि शेखर का शृंग। 

ऊँकार कर गुंज रहे, भँवर भ्रमरते भृंग ||३||   

हिम वान=कैलास ,हिमालय... मानससर=मानसरोवर शशिशेखर=शिवजी,श्रंग =जटा चोटीभ्रमर भ्रमरते भृंग= परिक्रमा पथ पर परिक्रमा करते भँवरे स्वरूप भक्त, मानस सर =मान सरोवर 

कलित कंढ को कर रही दे जय माल तरंग। 

हृदय तेरे उतर रही कल कल बहती गंग ।l४|| 

कलित=विभूषित 


शस्य शील ए वसुंधरा तुझको नमस्कार। 

तीन सिंधु यह कह रहे तेरे चरण पखार॥५||  


गाँव गाँव सब पुर नगर तेरे तीरथ धाम। 

घर घर मंदिर रूप है जन जन सीता राम ॥६||  


राम का आदर्श चरित्र,यह गीता का उपदेश l 

अखिल विश्व को दे रहा सद पथ का संदेश ll७||