Thursday, November 15, 2018

----- || राग-रंग १० | -----,

   ----- || राग-भैरवी || -----

सोहत सिंदूरि चंदा जूँ रैन गगन काल पे..,
लाल लाल चमके रे बिंदिआ तुहरे भाल पे..,

कंगन कलाई कर पियतम संग डोलते..,
पाँव परे नूपुर सों छनन छनन बोलते..,
छत छत फिरत काहे  दीप गहे थाल पे..,
जब लाल लाल चमके रे बिंदिया तुहरे भाल पे..,

चरत डगरी रोकि रोकि बूझत ए बैन कहे.., 
बिरुझे मोरे नैन सहुँ काहे तुहरे नैन कहे ..,
देइ के पट पाटली भुज सेखर बिसाल पे..,
लाल लाल चमके रे बिंदिया तुहरे भाल पे..,

गुम्फित छदम मुक्ता हीर मनि बल के रे..,
करत छल छंद बहु छन छब सी झलके रे.., 
रिझियो ना भीति केरी मनियारि जाल पे.., 
लाल लाल चमके रे बिंदिया तुहरे भाल पे.....

----- || राग-रंग ९ || -----,

धन धान सुख सम्पद दए बिरता दीप तिहार |
श्रम सिद्धि कर जोई के प्रमुदित खेतीहार ||

नाना बस्तु लेइँ चले सपताहिक के  हाट |
पंगत माहि सजाए पुनि बैसे चौहट बाट ||

बन गोचरी बनज गहे कुम्भ गहे कुम्हार |
हरिस हथौड़े कर लहे बैसे संग लुहार ||

आमल हर्रा बेहड़ा तीनि फला के मेल |
कतहुँ त बिकता मेलिआ कुम्हड़ कुसुम कुबेल |

रसना मदरस घोरि के मीठा मधुरिम बोलि |
काची खाटी ईमली धरे तुला दैं तोलि ||

लेलो लेलो मूँगफलि  रुपया में अध सेर |
कोउ ऊँचे हँकार दिए सौमुख लगाए ढेर ||

मूरि बैँगन रामकली सलजम सरकर कंद |
हेलिमेलि बतियाए रहि गाजरि गोभी बंद ||

हरिहर अरहर कीं फली उपजइँ गोमय खाद |
बाजरे केरि टीकड़ी तासौं देइ स्वाद ||

धनिआ तीखी मीरची चटनी केर प्रबंध |
अदरक सरिखा आमदा दए अमिआ के गंध |

कोउ कोपर थाल धरे अगर धूप सों दीप |
बेचें मनिमय झालरी दए मुक्ता सहुँ सीप ||

रसदालिका सिँगार के मंडपु दियो रचाए |
सालि ग्राम के सोंह रे तुलसी देउ बिहाए ||

धुजा पताका पट दिए बाँधौ ए बंदनिवारि |
मंगल कलस सुसाजिहु ए कदली देइ दुआरि ||

कहत जगो हे देवता सागर सदन त्याज |
जागरत आरंभ किजिओ जगकर मंगल काज ||





Wednesday, November 14, 2018

----- || राग-रंग ८ || -----,

ए बागे-वतन की वादे-सबा ठहरो तो ज़रा दमभर के लिए..,
मिरे दिल की दुआ तुम ले जाओ अपने अंजामे-सफ़र के लिए..,

ओ पैक़र मुल्के-सिलाही से ये पैग़ामे-मुहब्बत कह देना..,
इस काग़ज़े-नम को पढ़कर के अहदे-वफ़ा को रह देना..,
अब तक ये शम्में रौशन हैं सरहद के चरागे-सहर के लिए..,

बेलौस तुम्हारी राहों को रोकेंगे खिजाओं के साए..,
रख्खेगें तुम्हारे शानों पर शोला-ओ-सरर को सुलगाए..,
इस जाँ को हिफ़ाजत से रखना अपने जानो-दिलबर के लिए.....

Tuesday, November 13, 2018

----- || राग-रंग ७ | -----,

----- || राग-भैरवी ||-----

सरद रितु की भोर भई खिली रूपहरि धूप |
सहुँ सरोजल दरपन दृग दरसत रूप अनूप ||

जग जगराति ज्योति जौं सोइ पलकन्हि मूँद |
निद्रालस मुखमण्डल तौं गिरीं ओस की बूँद ||

नैन वैन मलिहाए के गहे मलिन मुख ओज |
नभगत बिकसत बालरबि सरसत सरस सरोज ||

रुर जल नूपुर चरन दिए चलत सरित सुर मेलि |
तीर तरंगित माल लिए भेला संगत भेलि || 

कटितट मटुकी देइ के घट लग घूँघट घारि | 
आन लगी पनिया भरन पनघट पे पनहारि || 


पुहुप रथ पथ चरन धरत प्रस्तारत पत पुञ्ज | 
सुरभित भई कुञ्ज गलीं कुसमित भयो निकुञ्ज ||

जगार करत रंभत गौ गोठ गोठ सब गेह | 
बाल बच्छ मुख चुम्बती बरखत नेह सनेह || 

रैन बसेरा बिहुर के छाँड़ बहुरि तरु साखि |
पंगत बाँधत उड़ि चले गहे पाँख नव पाँखि ||

मंदिरु खंखन देइ रे अपुरावत मुख संख |
अब लगि बिकसे न ललना तुहरे पलकनि पंख ||

अगजजगज जगराए के रैनि चरन बिहुराए | 
सुनहु लाल तू सो रहे नैनन नींद बसाए || 

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सरद रितु की भोर भई खिली रूपहरि धूप |
सहुँ सरोजल दरपन दृग दरसत रूप अनूप ||

जग जगराति ज्योति जौं सोइ पलकन्हि मूँद |
निद्रालस मुखमण्डल तौं गिरीं ओस की बूँद ||

नैन वैन मलिहाए के गहे मलिन मुख ओज |
नभगत बिकसत बालरबि सरसत सरस सरोज ||

रुर जल नूपुर चरन दिए चलत सरित सुर मेलि |
तीर तरंगित माल लिए भेला संगत भेलि || 

कटितट मटुकी देइ के घट लग घूँघट घारि | 
आन लगी पनिया भरन पनघट पे पनहारि || 


पुहुप रथ पथ चरन धरत प्रस्तारत पत पुञ्ज | 
सुरभित भई कुञ्ज गलीं कुसमित भयो निकुञ्ज ||

जगार करत रंभत गौ गोठ गोठ सब गेह | 
बाल बच्छ मुख चुम्बती बरखत नेह सनेह || 

रैन बसेरा बिहुर के छाँड़ बहुरि तरु साखि |
पंगत बाँधत उड़ि चले गहे पाँख नव पाँखि ||

मंदिरु खंखन देइ रे अपुरावत मुख संखि |
अब लगि बिकसे नाहि हरि तुहरे पलकनि पंखि ||

अगजजगज जगराए के रैनि चरन बिहुराए | 


सुनहु देव तुअ सो रहे नैनन नींद बसाए || 

Friday, November 2, 2018

----- || राग-रंग ६ | -----

----- || राग-भैरवी || -----

जगलग ज्योत जगाओ रे, 
चहुँपुर निबिर अंधियार भयो हे जगन्मई पधराओ रे .., 

धरिअ करतल प्रभा प्रसंगा प्रगसो हे देवि हरि संगा.., 


दिसि-बिदिसि उजराओ रे ..... 

पंथ कुपंथ केहि न बूझे, चलेउ कहाँ अजहुँ न सूझे,

माया मोह दुराओ रे .., 

जल जल भयउ दीपक रीते यह मावस करि रतिया न बीते


भूति बिभूति भर जाओ रे.,

दीपक संग जोत जगे  देहरि संग द्वार |
प्रगसो हे ज्योतिर्मइ दूर करो अँधिआर || 

Wednesday, October 10, 2018

----- || राग-रंग ५ | -----

----- || राग-रंग | -----

मौज़ूदा वक़्त-ए-तंग तू होजा ख़बरदार |
आने वालि नस्ल तिरी होगी फाँकेमार || १-क ||


जमीं के ज़ेबे तन की दौलतें बेपनाह |
जिसपे एक ज़माने से है बद तिरी निगाह || ख ||


बता के तू है क्या रोज़े हश्र का तलबग़ार |
मौज़ूदा वक़्त-ए-तंग तू होजा ख़बरदार || ग ||


देख तो इस रह में कोई सहरा है न बाग़ |
होगी वो मासूम याँ बेख़ाब बे चराग़ || घ ||


क्या नहीँ है वो इस मलिकियत की हक़दार
मौज़ूदा वक़्त-ए-तंग तू होजा ख़बरदार || ड़ ||

ये मालो-मुलम्मा ये रँगीन सुबहो शाम |
ये ज़श्न ये जलसे ये जलवे सर-ओ-बाम || च ||


बेलौस हँसी पे तिरी (वो) रोएगी जाऱ जाऱ |
मौज़ूदा वक़्त-ए-तंग तू होजा ख़बरदार || छ ||

Monday, August 13, 2018

----- || प्रभात-चरित्र ३ || -----

सोमवार, १२ अगस्त, २०१८                                                                                          
जुगत कतहुँ लघु लघु जन जूथा | अरु कहुँ अतिसय सघन बरूथा || 
बासत बसति बिरल बसबासा | कतहुँ भयउ सो सघन निवासा || 
कहीं तो छोटे छोटे जन समूह से और कहीं सघन स्वरूप में वृहद् समुदाय से युक्त वस्तियों में वासित कहीं विरल तो कहीं अत्यधिक सघन निवास थे। 

दए चौहट बट बीथि बनाई  | भयउ गाँउ पुर  नगर निकाई || 
रचत कुटुम नर संगत नारी |  जोग जुगावत गेह सँवारी ||  
मार्ग व् चौमुख मार्ग से युक्त पणग्रंथियों के निर्माण से  ग्राम व् पुर नगर निकाय में परिणित हो गए | पारिवारिक ईकाई की रचना करते हुवे अब नर  के संगत नारी समस्त साजसामग्रियों से गृह सुसज्जित करने लगे | 

भए निबास अब लखी निबासा | गह भू सम्पद भवन बिलासा || 
निवासहि कर ए सुँदर रचना | बरनन बरन न सबद न बचना ||
यह सुजज्जित निवास अब जैसे लक्ष्मी निवास हो गया पृथ्वी की विभूतियाँ  धारण कर मानव रचित भवन शोभा से युक्त होते चले गए | 

चारि भीति भा सुठि पहरारू | गेहि गहनि कह निज भरतारू || 
देहरि लोचन पलक किवारी | निगमागम लखि करिहि जुहारी ||  
चार सुन्दर रक्षकों के स्वरूप लिए चार भित्तियाँ की सरंचना से युक्त ये भवन गृही व् गृहणी को अपना स्वामी कहते | ये रक्षक देहली लोचन द्वार पट की पलकों से निगमागम का अभिवादन करते प्रतीत होते | 

मात पिता मह सह पितु माता | कहँ जनिमन निज जनिमन दाता || 
पुत पुतिका सन भगिनी भाई | एहि बिधि एहि संबंधु जनाई || 

प्रबेस द्वार रचत सहुँ आँगन देइ बिसाल |  
सयन सदन संग रचेउ  बिलगित भोजन साल || 
इन भवनों में प्रवेश द्वार के साथ एक विशाल आँगन निर्मित होता, अन्तस्थ में बहुतक शयन सदन के साथ एक पृथक भोजन शाला भी निर्मित की जाती | 

गेह गेह गहपति मिले बिरचत बृहद आगार | 
धरनि धाम धन धान ते भरे रहे भंडार || 
विशाल आगारों की रचना कर यह काल भूमि, भवन, धनधान्य के भंडार से परिपूर्ण था, दासत्व व् पाशविकता से दूर इस काल में गृह गृह में स्वामी मिलते | 

नियत नेम नै बाँध बिधाना | रचेउ जन जन केर प्रधाना || 
मुखिया राजन बोलि पुकारिहि | राज तंत्रन तहाँ संचारिहि |
कतिपय नियम-निति का नियतन कर फिर इन ग्राम्य व् नगरों में जन जन के प्रधान की रचना हुई, जहाँ इस प्रधान मुखिया को राजन कहा जाता वहां राजतांत्रिक शासन व्यवस्था संचालित होती | 

नेम लंघि हुँत रचे नियंता | राजन कहबत तब जन कंता || 
गाँव नगर पुर भए जब देसा | काल बिगत कहलाए नरेसा || 
नियमों का उल्लंघन करने वालों के हेतु अब न्यायकर्ता की रचना हुई तब यह राजन ( जन प्रमुख ) जनकान्त ( जनस्वामी ) कहलाने लगा |  ग्राम्य नगर पुर का यह समाहार जब देश में परिणित हुवा तब कालान्तर में यह जनकांत नरेश  ( जन जन का ईश्वर ) कहलाने लगा | 

गहे मंत्र कछु संगत मंत्रा | निपजे अस जन चारन तंत्रा || 
द्विजप सासन केरि इकाई | क्रमबत पँचक भाग बिरताई || 
कतिपय मन्त्रणाओं व् यत्किंचित मंत्रियों के संगत इस प्रकार जन्संचलान तंत्र का प्रादुर्भाव हुवा | ब्राह्मणों द्वारा संरचित वैदिक काल में प्रशासनिक ईकाई कुल, ग्राम, विश ( बीस ग्राम का समूह ) व् राष्ट्र में विभक्त थीं । 

कुल में कुलप गाँवाधिप, बिस में रह बिसितेस । 
जन के पत राजन कहत राजिहि देस नरेस ॥ 
कुल का प्रमुख कुलप, कुल के समूह ग्राम अथवा गाँव कहलाने लगा जिसका प्रमुख को  ग्रामाधिपति, बीस (२०)गाँव के अधिपति को ग्रामीण विंशतीश कहते । गाँव जब समृद्ध वसति में परिणित हुवा तब वह जनपद होकर नगर कहलाने लगा जिसके अध्यक्ष  को राजन कहा गया, कालांतर में यही राजन राष्ट्र अथवा देश का नरेश कहलाने लगा ॥

रचत देस रचिता कहे प्रथम बेद यह मंत्र । 
कतहुँ राजा राज रहे कतहुँ प्रजा के तंत्र ॥ 
भारत निर्माण के पश्चात् इस प्रकार वेद रचयिता ने प्रथम वेद में यह मन्त्र उद्घोषित किया कि यहाँ वैदिक युग में राजतंत्रात्मक शासन के सह कतिपय जनपदों में प्रजातंत्रात्मक शासन प्रणाली भी प्रचलित थी ॥


बेद काल सह क्रांति काखा | प्रथमहि भुवन कोष परिलाखा || 
पढ़ ताहि दए भूत बिग्याना | बरगिकरन करि जिउ जग जाना || 
वैदिक काल में क्रांति कक्ष के सह सर्वप्रथम ब्रह्माण्ड को रेखांकित किया | ततपश्चात उसके अध्ययन कर संसार को भौतिक विज्ञान से परिचित करवाया | जीवों का वर्गीकरण कर जंतु जगत से परिचित हुवा | 

 पढ़त सोधत रसायन नाना |  दीन्हि जगत औषध बिहाना || 

तदनन्तर नाना रसों का अध्ययन कर संसार को औषधि विज्ञान प्रदत्त किया