|| राग मालकोंस ||
Sunday, June 15, 2025
----- || राग-रंग 36 | -----,
II राग दरबारी II
Friday, June 13, 2025
----- || राग-रंग 35 | -----,
सब रूप में सब रंग में तू | रोम रोम अंग अंग में तू ||
क्या कहूं प्रभु/के तू कहाँ नहीं | व्योम व्योम विहङ्ग में तू ||
जो अगजग के पाप को हरे | जो संताप आताप को वरे ||
तरी धरा पे जो स्वर्ग से | उस गिरिवरम् की गंग है तू ||
मेरे प्रेम मेरी प्रीत में | मेरे साँसों के संगीत में ||
तू सात स्वरों के तार में | रागों की जल तरंग में तू ||
तू बाँसुरी की रवकार में | तू झांझती झंकार में ||
तू कंठ की श्री माल में | कर ताली में मृदंग में तू ||
कहीं उड़े गगन तो क्षण लगे | वही राग कण आ चरण लगे ||
जो चढ़े सौभाग्य शीश पर | उस श्रृंगार के सुरंग में तू ||
भाव सिंधु को विस्तार दे | करतार बनके तू तार दे ||
इस संसार के उस सार का | है प्रशान्तमनम् प्रसंग तू ||
मिल दीप्त दिया की रेह में | और डूब उसके स्नेह में ||
बिरहा अगन में जल उठे | ऐसे प्रियतम पतंग में तू ||
कभी डरे डरे डेग भर चलूँ | कहीं दूर कोई डगर चलूँ ||
तब हो फिर क्यूँ किसी का डर | जब हो प्रभो/पिया मेरे संग में तू||
ये जगत की भूरि सम्पदा | रही पास में ना कहीं सदा |
कर वचन जो ये सुविचार दे | उस वाचनीय व्यंग में तू ||
Saturday, May 22, 2021
----- || राग-रंग ३४ || -----,
नियति गति अस मानस करि बाधा | ब्यापत जगत रोग असाधा ||
रोगित जन जन मरै अकाला | औषध हीने औषध साला ||
मात पिता सों भ्रात भगिनी | बिछुरत मरत जीवन संगिनी ||
भयऊ बिषानु सरिस ब्याला | गहे अजहूँ रूप बिकराला ||
देस नगर कि बस्ती कि गांवा | गली गली पैसारत पाँवा ||
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ऐसो मरघट आँख न देखे,
भाग भरे
Sunday, November 10, 2019
----- || राग-रंग 33 | -----,
------॥ छंद॥ -----
जागौ सागर सिंधुःशयनम् I जागौ जगमोहन जगन्मयम् ॥
जागौ सागर सिंधुःशयनम् I जागौ जगमोहन जगन्मयम् ॥
उठौ हे देव जगदीस हरे। जोए कर जन जन बिनती करे ॥
जागौ भवभूति बिभूति वरं। जागौ सुदर्शन पाणिर्धरं ॥
माया बसिभूत सबु मूढमति । देएँ जिउ ताप करैं पाप अति॥
भरपूरत सुखसंपद सबही I भरे कोष परि मन तोष नही ॥
उठौ हे देव जग जाग करौ l जागतिक पाप संताप हरौ ॥
उठौ हे देव जग जाग करौ l जागतिक पाप संताप हरौ ॥
अजहुँ मन न भगति भाव भरे। तव चरनन नहि ध्यान परे॥
जागौ सागर सिंधुःशयनम् I जागौ जगमोहन जगन्मयम् ॥
जागौ सागर सिंधुःशयनम् I जागौ जगमोहन जगन्मयम् ॥
उठौ देव हे जगदीस हरे।जोए कर जन जन बिनती करे ॥
जागौ भवभूति बिभूति वरं। जागौ सुदर्शन पाणिर्धरं ॥
माया बसिभूत सबु मूढमति।देएँ जिउ ताप करैं पापअति॥
भरपूरत सुखसंपद सबही I भरे कोष परि मन तोष नही ॥
भरपूरत सुखसंपद सबही I भरे कोष परि मन तोष नही ॥
उठौ हे देव जग जाग करौ l जागतिक पाप संताप हरौ ॥
अजहुँ मन न भगतिभाव भरे। तव चरनन नहि ध्यान परे॥
नहि साँच बचन नहि बदन गिरा।भई दारिद दीनहीन धरा॥
भमरत बहु पातक भार गही।जासु भय मोचनएकतुम्हही॥
जागौ जगपति जगदानंदम्l जागौ देव दीनदयाकरम्॥
उठौ हे भू भार भंजनम्Iत्याजो अजहुँ सिंधु: सदनम् ।
Sunday, October 6, 2019
----- || राग-रंग 32 || -----,
डगर डगर सबु गृह नगर, लघुत त कतहुँ बिसाल |
मंगल रचना सों रचे,परम बिचित्र पंडाल || १ ||
नगर के सभी मार्गों एवं गृहों में कहीं लघु तो कहीं विशाल रूप में मंगल रचनाकृति से परम विचित्र पंडाल रचे गए हैं|
ध्वज पताक तोरन सों गइँ सब गलीं सँवारि |
बंदनबारि बँधाइ के दमकत दहरि दुआरि || २ ||
धवज पताका तथा तोरणादि सामग्रियों से सभी गालियां सुसज्जित हैं बन्दनवाल विबन्धित कर देहली और दीवारी दमक रहीं हैं |
बर बर भूषन बसन सँग साज सुमंगल साज |
जगन मई जग मोहनी भीतर रहहिं बिराज || ३ ||
उत्तम वस्त्राभूषाणों व् सुमांगलिक श्रृंगार से श्रृंगारित होकर जगन्मई महामाया उनके अंतस में विराजित हैं |
बिप्रबृंद अस्तुति करैं गहे आरती थाल |
ढोलु मँजीरु के संगत करत धुनी करताल || ४ ||
ब्राह्मण देव के समूह आरती थाल ग्रहण किए उनकी स्तुति करने में संलग्न हैं | ढोल मंजीरे की संगती करते करतल से मधुर ध्वनि उत्पन्न हो रही है |
कलित केस मौली मुकुट तिलक लषन दए भाल |
कानन कुण्डल सोहिते कंठ मुकुत मनि माल || ५ ||
केशों से विभूषित शीश पर मुकुट तथा मस्तक पर सुन्दर तिलक लक्षित है उनके कानों में कुण्डल तथा कंठ में मणि माल सुशोभित हो रहे है |
जगमग जगमग जोति जग जगत करत उद्दीप |
मग मग मनि मंजरी से बरै मनोहर दीप || ६ ||
स्थान स्थान पर मणियों की पंक्तियों से मनोहर दीपक प्रज्ज्वलित हैं जिसकी जगमगाती ज्योति जागृत होकर समूचे संसार को उद्दीप्त कर रही है |
नौ सक्ति कर दरसन हुँत भईं भीड़ अति भारि |
होत चकित बिलोकि चलत सह बालक नर नारि || ७ ||
नवशक्ति के दर्शन हेतु भारी भीड़ उमड़ पड़ी है | नर नारी बालकों सहित माता की अनुपम झांकी को चकित होकर विलोकते चल रहे हैं |
आजु नगर मनभावनी छाइ छटा चहुँ ओर |
कहत नागर एक एकहि सहुँ होतब भाव बिभोर || ८ ||
सभी नागरिक एक दूसरे से कहते चल रहे हैं कि भई आज तो नगर में चारों ओर मनभावनी छटा छाई हुई है |
छाए गगन आनंद घन चहुँ दिसि भरा उछाहु
भाव भगति सों भरे भएँ प्रमुदित मन सब काहु || ९ ||
गगन में तो जैसे आनंद से परिपूर्ण हो रहा है चारों दिशाओं में उत्साह भरा हुवा है | भाव भक्ति से परिपूरित आज तो सभी का मन आल्हादित है |
मंगल रचना सों रचे,परम बिचित्र पंडाल || १ ||
नगर के सभी मार्गों एवं गृहों में कहीं लघु तो कहीं विशाल रूप में मंगल रचनाकृति से परम विचित्र पंडाल रचे गए हैं|
ध्वज पताक तोरन सों गइँ सब गलीं सँवारि |
बंदनबारि बँधाइ के दमकत दहरि दुआरि || २ ||
धवज पताका तथा तोरणादि सामग्रियों से सभी गालियां सुसज्जित हैं बन्दनवाल विबन्धित कर देहली और दीवारी दमक रहीं हैं |
बर बर भूषन बसन सँग साज सुमंगल साज |
जगन मई जग मोहनी भीतर रहहिं बिराज || ३ ||
उत्तम वस्त्राभूषाणों व् सुमांगलिक श्रृंगार से श्रृंगारित होकर जगन्मई महामाया उनके अंतस में विराजित हैं |
बिप्रबृंद अस्तुति करैं गहे आरती थाल |
ढोलु मँजीरु के संगत करत धुनी करताल || ४ ||
ब्राह्मण देव के समूह आरती थाल ग्रहण किए उनकी स्तुति करने में संलग्न हैं | ढोल मंजीरे की संगती करते करतल से मधुर ध्वनि उत्पन्न हो रही है |
कलित केस मौली मुकुट तिलक लषन दए भाल |
कानन कुण्डल सोहिते कंठ मुकुत मनि माल || ५ ||
केशों से विभूषित शीश पर मुकुट तथा मस्तक पर सुन्दर तिलक लक्षित है उनके कानों में कुण्डल तथा कंठ में मणि माल सुशोभित हो रहे है |
जगमग जगमग जोति जग जगत करत उद्दीप |
मग मग मनि मंजरी से बरै मनोहर दीप || ६ ||
स्थान स्थान पर मणियों की पंक्तियों से मनोहर दीपक प्रज्ज्वलित हैं जिसकी जगमगाती ज्योति जागृत होकर समूचे संसार को उद्दीप्त कर रही है |
नौ सक्ति कर दरसन हुँत भईं भीड़ अति भारि |
होत चकित बिलोकि चलत सह बालक नर नारि || ७ ||
नवशक्ति के दर्शन हेतु भारी भीड़ उमड़ पड़ी है | नर नारी बालकों सहित माता की अनुपम झांकी को चकित होकर विलोकते चल रहे हैं |
आजु नगर मनभावनी छाइ छटा चहुँ ओर |
कहत नागर एक एकहि सहुँ होतब भाव बिभोर || ८ ||
सभी नागरिक एक दूसरे से कहते चल रहे हैं कि भई आज तो नगर में चारों ओर मनभावनी छटा छाई हुई है |
छाए गगन आनंद घन चहुँ दिसि भरा उछाहु
भाव भगति सों भरे भएँ प्रमुदित मन सब काहु || ९ ||
गगन में तो जैसे आनंद से परिपूर्ण हो रहा है चारों दिशाओं में उत्साह भरा हुवा है | भाव भक्ति से परिपूरित आज तो सभी का मन आल्हादित है |
----- || राग-रंग31 | -----,
------ || राग-यमन || -----
देखु सिआ ए साँझि सेंदूरी | रुनझुन नुपूर चरन अपूरी ||
उतरि घटा ते धीरहि धीरे | चरत जहँ तहँ उठै रँग धूरी ||
कबहुँक आनि पुरट घट लेई | करसेउ रहट मुख पट देई ||
कबहुँ पनघट परि लट बिथुराए | बिहरत बावरि सुध बुध भूरी ||
कर कल कंकन कानन बूंदे | दरसत दरपन पलकनि मूंदे
माथ परि हिरन कनिका | हंसक देइ अँगूरी ||
निर्झरनि जर मुकुत बखेरे | गह गह आँचर माहि सकेरे ||
बैसत बहुरि पवन करि डोला | बरखावत अह गहे अँजूरी ||
धरत मनोहर दीप दुआरा | करिअति सबु देहर उजियारा ||
आगत रैनि दरस नभ चंदा | लेइ बिदा पिय गेह बहूरी ||
देखु सिआ ए साँझि सेंदूरी | रुनझुन नुपूर चरन अपूरी ||
उतरि घटा ते धीरहि धीरे | चरत जहँ तहँ उठै रँग धूरी ||
कबहुँक आनि पुरट घट लेई | करसेउ रहट मुख पट देई ||
कबहुँ पनघट परि लट बिथुराए | बिहरत बावरि सुध बुध भूरी ||
कर कल कंकन कानन बूंदे | दरसत दरपन पलकनि मूंदे
माथ परि हिरन कनिका | हंसक देइ अँगूरी ||
निर्झरनि जर मुकुत बखेरे | गह गह आँचर माहि सकेरे ||
बैसत बहुरि पवन करि डोला | बरखावत अह गहे अँजूरी ||
धरत मनोहर दीप दुआरा | करिअति सबु देहर उजियारा ||
आगत रैनि दरस नभ चंदा | लेइ बिदा पिय गेह बहूरी ||
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