Friday, August 16, 2013

----- ॥ सूक्ति के मणि 14।। -----

बितत दुइ चारि दिवस बहोरे । लेइ उबकाए बधु एक भोरे ॥ 
बधु समुझत छिनु लागहि नाहीं । कहि मन माह मैं गर्भ धराहीं ॥ 

पलभर हुँत बधुटी बिझुकाई । रहि चितबत सुधि बुध बिसराई ॥ 
होहहिं साँस नीचकिन नीचे / तँह पुनि गहनै अंतर खींचे ॥ 

मलिन बदन बधु दरसत पियाए / बूझत कहि भए सकल कुसलाए ॥ 
पलक नयन असमंजस बासे । बिचित्र रंग मुख रंजन रासे ।। 

बिखरित आखर अधर जुहाने / भाव अर्थ लै जुग मुसुकाने ॥ 
पंच शब्द सूकुति संधाने / मृदुलित कहि हम गर्भा धाने ॥ 

ऐसेउ शब्द श्रवन कै,प्रियतम रहहि अवाक । 
सुस्मित मुख बिस्मै नयन अपलक बधु रहि लाख ॥ 

शनिवार, १७ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                            


भाव प्रबनत बधू भइ रुआँसी । एहि  कहत लेइ मुठिका कासी ।। 

ए कह मुख दुइ  धमुका धारे । जे सब भए किए कार तिहारे ।। 

पुनि रद पद हँसि हंसक घारे । मुख मानस पिय हंस बिहारे ॥ 

कहिं माने हम कारन बारे । थोरइ न तवहु रचना कारे ॥ 

तब बधु के बार बदन अगासे । गहन मलिन चिंतन घन बासे ॥ 

बोली एक संकट तव ताईं । ता पर एक अरु सीस धराईं ॥ 

अब कारें तुहरे सेवकाए । कि धार गर्भ नउ जीउ जनाएँ ॥ 

कभु  को तौ कभु कोउ प्रपंचे । माम जीवन का रचित बिरंचे ॥ 

भयऊ का आपन हाथ, कहत बधु के नाह । 

जैसे मानख आचरन, तैसे समउ के चाह ॥ 

रविवार, १८ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                                 


इहाँ लिखन आखर जुग टेरे । जुगल पीठ भू अवगत केरे ॥ 

दोउ जुगल रहि जेइ समाजे । रीत चरित तँह तेइ बिराजे ।। 

पुर प्रियजन रहि पुत लोभाईं। पुतरी तुल पुत जनम सुहाईं ॥ 

जब जब ते दोनउ अनुहारी । तब तब परि पुत जातक भारी ॥ 

पुतरी गत बत संग पिया के । पुत रहहि सदा मात-पिता के ॥ 

पुत कर अन धन कर्म कमाई। पुतरी जातक भई पराई ॥ 

नारी पौरूख तिर्यक लाखें । ते कर तिनके राखन राखे ॥ 

एहि देसज भए पुरुख प्रधाने । नारि जात कँह भए सनमाने ॥ 

बिटवा के रजस सारत, आपन बंसज रेल । 

बिटिया के गर्भ घारत, दूजन के कुल बेल ॥ 

सोमवार, १ ९ अगस्त, २०१३                                                                                                    


एहि मति सम्मति गहि समुदाई । पियहु तेइ मत जोग मिलाईं ॥ 

बधुटी के तौ मतिहि  भरमाए । पुत जनाए कि पुतिका जन्माए ॥ 

घेरत गहन ज्ञान उजियारे । मति भरमत घन किए अँधियारे ॥ 

जेइ बखत कछु सूझ न पाईं । ते सूझै जौ जग बूझाईं ॥ 

जब लग जीवक जगत जिउताए । तब लग अंतस बहु झुर झुराए ॥ 

पावन जीवन प्रीत प्रतीती । परत निभावन जग के रीती ॥ 

का भए अघ अरु का पुन होहहि । मति भरमै तो कछु नहिं तोहहि ॥ 

तेइ करम कर कारन चाहे । जेइ जीउ धर सुख चर लाहे ॥ 

जीउ बुझौबल बूझत केरे । अवने गवने जन बहुतेरे ॥ 

आवत जो जग दरसन देखे । को निज को पर कुकरम लेखे ॥ 

सोइ लेखनी जगत सुहाई । जोइ लेखनी आप कहाई ॥ 

कुकर्म बहुस होत सरल, बरनन बर्नन आप । 
पर होवत बहुसहि कठिन, कथनत किए निज पाप ॥

मंगलवार, २० अगस्त, २ ० १ ३                                                                                      

एहि बिधि बधु बर जुगत बिबेका । रही सौतुख तीख प्रस्न अनेका ॥ 
सुरसा मुख सों छेक दुआरे । पावन उत्तर पंथ निहारे ॥ 

करत परस्पर संधित साथी । ऊरु फलक जुग जहि भलि भाँती ॥ 
जुगत चरण का लघु बर होहीं । बिकट प्रस्न मति  पूछत जोहीं ॥ 

दूजत बूझत भये अधीरे । का प्रियतम भू चरिहि सुधीरे ॥ 
जे चरिहि तौ कर्म का किन्ही । गृह संचारन कण को दिन्ही॥ 

भए घर ते बिनु घर गोसाईं । कौन ठाँव कँह गृहस बसाईं ॥ 
बहुस  कठिन भै बखतएँ भावइ । होहहि दुखकर बहुस भयावइ ॥ 

जों जों मन सुमिरत आगिन के । तों तों तन हहरत हारिन के ॥ 
पिय संकट अरु गर्भ गहीं कै । बयस भइ जस फंस नागिन के ॥ 

जस सुरसा बाढ़े बदन, करि अतिसय बढ़ खोर । 
तसहि ठहरे जीउ सदन, दुआरि  प्रस्न कठोर ॥ 

बुधवार, २१ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                      

एक चिंता रहि मोले घर के । बूझत मति तिन हरुबर धरके ॥ 
रोचमन नयन कहत कहानी । दिए ऊतरु तर पख के पानी ॥ 

संकट मुख कारत प्रस्नाई । पिया चरन बधु पंथ रचाई ॥ 
जुग धरि जे निधि कर्मन ताईं । ते करि चिंतन तनि लघुताई ॥ 

मित ब्यय करत गृह संचारे । मोले घर दुज अंस उतारे ।।
दंपति चातक गृह भए चंदू । सो संपद बहु देइ अनंदु ।।  

गेहहु उसरत रहि बहु धीरे । बार बधुटीहु रहि न अधीरे ॥ 
एकै बस्तु जे भै सुख दाहीं । नहि त संकट रहि थोर नाहीं ॥ 

कठिन बिषय बय जे बड़ नाईं । लघुतम के तौ का कहि जाई ॥ 

जुगल दंपति जीवन  उत, बिलोकित जल तरंग ॥ 
लेखनी बरन गहत इत, गत रत कहत प्रसंग ॥ 

गुरूवार, २ २ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                         

इत बर के लघु बहिनइ ताई  । लगन धरे दिन लगे अवाई ॥ 
लिखि  बरनत करि लगन पतरिका । नाम धरे बर अरु बहिनहि का ॥ 

मात-पिता सह कँह जन्माईं । दोनौ कुल जन किए बरनाई ॥ 
बार सुन्दर अच्छर किए हेला । पानि गहन करि मंगल बेला ॥ 

अरु बरनत  कहि भँवर लगाईं   । समदन पुर थरि लगन बिठाईं ॥ 
पात पटल बल बरत बलीते । ता पर सुन्दर कलस कलीते ॥ 

प्रथम हुति जन गन अधिनाई ।  पुनि पुरप्रिय जन लिखि हूताईं ॥ 
कृपा करत कहि चरनन चिन्हें । नउ दम्पति निज असीस दिन्हें ॥ 

सकल जोइ कर पाए सुअवसर गुरुजन अयसु सिरु धरे । 
गवने पुर देहरि ससुर भसुर हरि, चरन लगन पत्र उहरे ॥ 
देव निमंत्रण गत भवन भवन, गवन प्रिय परि जन पुरे । 
बोधित श्री मन अवाई लगन बहु याचन करत कर जुरे ॥

लगन लग दिवस उत पिया, धरि बहु उरस उराउ । 
असक कसक परे खटिया, करि हठ गवनु बिहाउ ॥  

शुक्रवार, २ ३ अगस्त,२ ० १ ३                                                                              

हठ पद लगि जब चढ़न पहारी । बढ़ बहियर कर धरत ठहारी ॥  
पपीया कलस करु परिहरु चाहीं । रिरिनत रत कहि नाहीं नाहीं ॥ 

रिर धरि भरक घरि भै रिसहाए । रिरत बधुटी एहि कहत बुझाए ॥ 
चरत बहनु लइ चरन हिलोरे । भयउ बिलग लग जोजित जोरे ॥ 

रलन लगन पिय गवनै ठाने । बधू के कही एकै न माने ॥ 
बहुरि पिहरु जन अरु ससुराई । चित चेतस बर बहु समुझाई ॥ 

कहइ गवनु अरु हठ ना धराहू । बेदउ मन्त्रन  केर मनाहू ॥ 
जे मह रहि जी के  कल्याना । मान भली तेइ बिधि बिधाना ॥ 

पहिलै हठ के परिहरै, लिए मन दूजन माँड़ । 
कह बधु तईं तुम गवनौ, मम सेवापन छाँड़ ॥ 


शनिवार, २ ४ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                    

एहि श्रवनत  बधु सोच जराही । अजहुँ परे पिय सयनइ माही ॥ 
बॉस बसन नित करमन कारें । भोजन जोजन साँझ सकारे ॥ 

जे मैं लगन गवन मेलाहूँ । ते पिया किमि खा अन्हवाहू ॥ 
कहत अंगारि भरके ऐसे । असहै रिसहै मनाउँ कैसे ॥ 

धरि साहस पुनि कहि सिरु नाई । पिय तुम महिम की लग्नाई ॥ 
श्रवनत एहि पिय कहिं रिसिहावत । करकत कह एक दूइ कहावत ॥ 

एकन्ह एक सन धुनी कहेही । रयन सयन माह परे परे ही ॥ 
अरु कहि एही मम आयसु होही । प्रिय लगन बधु नयन जल जोही ॥ 

पुनि कातर बधू नयन निहारे । कहत मृदुल पिय बचन सुखारे ॥ 
बधु होंत कुल बंस सोभाई । मिलन समदन लगन सोहाईं ॥ 

रे प्रान समा मोरि प्रियतमा तनि पिय के कहि लहनौ । 
मरजादा घर लावन श्री कर लगन के लाहन बनौ ॥ 
लगन घरी दिन, कुल बधु के बिन समुदाए जन का कही । 
मानु मम कहिन पुनि दैनंदिन जेइ सुअवसरु न लही ॥

भयउ बिधि बाम बखत एहि, किए मोहे असहाए । 
नहि त रिरत रह न तव सों, गवनै रहहि बिहाए ॥ 

 रविवार, २५ अगस्त, २ ० १ ३                                                                             

तिन अवसरु धरि बदन बिषादू । डरपत पिय परिहरत बिबादू ॥ 
कार सकल प्रियतम के काजू । जथा जोग करि साज समाजू ॥ 

श्रुत भँवरन हुँत नंदनि नादी । अँकबर पितु कर करबर बादी ॥ 
ललित कलित करि कंठ मालिका । अंगुरि धर चरि संग बालिका ॥ 

दोनउ एक संबंधिन संगे । चले मिलन सुभ लगन प्रसंगे ॥ 
चरत दोपहरि साँझ ढराई ॥ चंद्रोदय पूरब पैसाई ॥ 

जा गृह जन सन मेल मिलाई । जे पुर पैसएँ पहिलै ताईं ॥ 
भेस भरे बर लोग लुगाईं । अलिन्दन अँगन भवन बियाईं ॥ 

मंगल कालारंभ अचारहिं । चारत अष्टक बिप्र गुंजारहिं ॥ 
काम धुनी कर कोमल बानी । दै मंगल प्रद मौलिहि पानी ॥ 

भावी जुगल बर दंपति, बरे पंच परिधान ॥ 
तिलक रीति प्रीति पूरत, समदै गह सयान ॥ 

सोमवार, २६ अगस्त , २ ० १ ३                                                                                              

दोउ जामिनी लागि लुभावन । कोउ रागिनी रागि सुरागन ॥ 
बिरति तिलक कारत रतजागे । दूज दिवस किए सगुन सुहागे ॥ 

सोन सुरंगन साजि सिंहासन । एक पुर धुर ऊपर आसन ॥ 
बलि अलि अंबर बर अंबारी । दरस बिपद धर नग नख घारी ॥ 

फूल हार लरि झालरि साजी । भवन बसन बसि भा बर काजी ॥ 
भेरि दुंदुभी ढोल मृदंगे । घन घरजन कर नादित संगे ॥ 

सुर कम्पन कर ग्राम सुहाई । बिरधिन्ह कंठ मंगल गाईं ॥ 
सँवर समधि बार जनेत चढ़ाए । भाइ-बंधु सह जामा जमाए ॥ 

चढ़े रथ बाजि दुंदुभी गाजि रजबर राजि बाहिनी ।  
भेस भरि भ्राजि साजत समाजि पथचर लाजि भामिनी ॥  
जूँ साजि धाजि दामिनी दाजि रूप धर लाजि गामिनी । 
अगुवन बिराजि तारि तर ताजि छितकर छाजि जामिनी ॥ 

दरसत जनेत पख बधू, किए कल नंदत नाद । 
समधी समदनै अस जस, तज दौ दधि मरजाद ॥ 

मंगलवार, २७ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                             

जनेत जन दिव दरसन दिन्हें । नभ मंडल प्रभ मलनइ किन्हें ॥ 
मौली मुकुट कटि कटारि साजे। लोकित बर जस को महराजे ॥ 

बार पख रहि बड़ हरिदै धारे। खान पान कर आप सँभारे ॥ 
बाज गाज सब साज समाजू । करि निज बिधि पर किए बर काजू ॥ 

सुधा सरिस नाना पकवाने । रचित सुरूचित बहुस बिधाने ॥ 
छरस भोग जन केरि बढ़ाई । कहुँ अपरम कहुँ बिधि उपराई ॥ 

मंडल मंडित मंडप देसे । पानि ग्रहन बधु बर उपबेसे ॥ 
भँवरे पुनि कर मह कर राखे । भरे बचन बनि अगनी साखे ॥ 

बरखे सुमन कुँअर कुँअरि , भररि भाँवरि जब सात । 
भए पुलक पाहुन प्रियजन, गहि सों साँवरि रात ॥ 

बुधवार, २८ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                           

दुलहिन बर घर बहियर पाईं ।रितत रयन जन लेइ बिदाई ।। 
बिलगत धिय रोदन करि कैसे । ह्रदय लगत घरि गिरिजा जैसे ॥ 

दान-मान दै बर उपहारे । धिया पिया दुल्हा कर धारे ॥ 
मात-पिता लै दुइ कर जोरीं । रहहि हमरि अजहुँत पत तोरीं ॥ 

नउ मास लगे उदरन घारी । जननि जिन्ह जा जनम जुहारी ॥ 
बिहउत बिहबल सजल निहारी । देइ दान करि झोरिन खारी ॥ 

उत बहुरत रत केत जनेता । इत बहुरन निज नगर निकेता ॥ 
दैं पर दुलहिन पख पहुनाई । जोए सँजोए गवनु हरुवाईं ॥ 

पाछिन परिहरु प्रियतम हेते । बधु चितबन धरि चिंतन चेते ॥ 
निंद मगन  नंदिनी जगाई । जगे प्रात सन जामि बिहाई ॥ 

मान अधि सकल नेगि कर, बियाहु रीति निबेर॥
दान धी  बेगि आप घर, निकसे मुँहू अँधेर ॥ 

गुरूवार, २९ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                           

बिहनै चारत बधु थकि हारी । आवत प्रियबर जोखि सँभारी ॥ 
पूछत कार निज कवन किन्हें । जस तस कहत  पिय उतरु दिन्हें ॥ 

सुरतत बहिनि नयन जल गाढ़े । करत काल घन पलकन बाढ़े ॥ 
बरख परे तब ली उसाँसे । ललकिन रत केसउ पत कासे ॥ 

बूझे उर भर धर तनि सांती । बिदा भइ बहिनइ भली भाँती ॥ 
थकित चिरित बधु कहि किए देहू । जे हमरे कहि पर संदेहू ॥ 

बोलसि कुटिल कटि भृकुटि ऐंचे। कहु त देखाएँ जे चित्र खैंचे ॥ 
तुम तौ बिय बन बरनन पेरू । कहि पिय लड़वन नित हुँत हेरू ॥ 

तुम चह आरती दिवस राती । देइ उतरु बधु बल खाती ॥ 

भाँवरि सात बचन भरे, कहि पिय भए तव नाथ ।
आरती करें चह लरें,  बाँधे बंधन साथ ॥ 

शुक्रवार, ३० अगस्त,  २ ० १ ३                                                                                      

करम सिराई बहिन बिहाई । भयउ मास एक परे सैनाइ॥ 
सीध सयन सइ पीठ लिलाई । बँधे बाहु किए दाहि न बाईं ॥ 

सुहाउ सुभाउ जे रहि अति चारू । रहत घरे बिगरे ब्यबहारू ॥ 
श्रम कर प्रिय अरु कारज हीना । यूँ तरपत जूँ जल बिनु मीना ॥  

नित किरिया तँह तँहहि अन्हाएँ। असन बसन तँह देहिहि धराएँ ॥ 
दरसन गोचर न जग बहिराए । अंग प्रत्यंग सका अठियाएँ ॥ 

हत आहत हरि काल भली करि। आह करत पिय अह अह घरि घरि ॥ 
आहित स्वन बचन बिनयाने । आह्वयन भगवन अह्वाने ॥ 

गिरत परत बिनुधर चरत, ताप धरत दिनु रात । 
राम राम प्रतिपल करत पिय रहिं बखत बितात ॥  

शनिवार, ३१ अगस्त २ ० १ ३                                                                                               

घरे घाउ भरि सका सुधीरे । संधिहि बंधन पर भए ढीरे ।। 
बैदु अहोरन दै तिथि आई । दोइ चारि दिन अवर धराईं ॥ 

तेइ डगर चरि तेइ नगरिया । तेइ चरन पुनि तेइ चरइया॥ 
तेइ बाह पर दूसर बाही । चरे सकल तिन बैदक पाहीं ॥ 

लगे हरन मन दरसन डाहिर । बहुस दिवस पिय निकसे बाहिर ॥ 
चारि चरनि बहि सरनि सुधीरे । भावइ अति मन त्रिबिध समीरे ॥ 

कहुँ नग कहुँ नदि नन्द निनादे । कहुँ बन थरि फर फूरत राधे ॥ 
पिय श्री मुख जे लोकित सांति । बरनन बरन न सक कहुँ भांति॥ 

धरत दृष्टि पिय सुख बृष्टि, परत उरस संतोख । 
पर बधु चित पिछु बहि आगु, चरत रहहि बर चोख॥ 


       
   








Thursday, August 1, 2013

----- ॥ सूक्ति के मणि 13॥ -----

देह पतित पद भू पथ पाथर / बेदन बिध करि तन मन थरथर //
तापर हलहर सीतरताई / अस जस करुबर नीम चढ़ाईं //

तबहि दूर एक बाहन देखे / धावत आवत रहि पद रेखे //
ज्यूँ ज्यूँ नियरे हमरे तेई / त्यूँ त्यूँ कासित कर टेई //

जसहीं हम हत दरसन दिन्हें / ढारत बहि एक कूलक किन्हें //
पूछे तुम्ह कौन हो भाई / आह बयस अस रैन बिहाई //

तब सब घटना बिबरन देईं /  कारत आपन परखन तेईं //
रहहि निकट जे तव बहनोई / तेहि जन तासु परिचित होईं //

अरु सब सदजन पर पहिचाने / उठइ हमहि तुर जनपद लानै //

तहवाँ लेइ दूरभास, बहनुइ देइ उदंत /
हमहि कृतार्थ करत ते आए तुर तुरंत //

शुक्रवार, ०२ अगस्त , २ ० १ ३                                                                                         

भावक अरोग गृह ले गवनै / जहँ मो प्रथम उपचार दवनै //
पाहिले पद अंतर छबि तारे / तब एक काचन पतिका सारे //

भंग अंग मग चारन हारउँ / बार बार मैं जननि गुहारउँ//
अकुल बियाकुल भै मन भारी / भगिनी भावक मोहि सँभारी //

आपन  भाँति कहत समुझाईं / अस छतवत तन रहत लहाईं //
सरीर सेल कलेवर कारौ / बिषादु तज तनि धीरज धारौ //

ते बखत तासु बचन सुहाईं / पीर परत मन धीर धराईं //
लावन पुनि जनि नगरि हरुआए / जोगत परखत बाहिन बिसाए //

ले बाहिता बाहनु के, पद मद्धम गति कार /
जामिनी जाम पइसाए, तुर जनि नगरि दुआर //


शनिवार, ०३ अगस्त , २ ० १ ३                                                                                                  

अस प्रियतम उत्तर पुर भौंरे / बरतमान जग अवतर पौरे //
तत पर भए मुखरित मुख मौने / जस पग फेरत बधुटी लौने //

पिय दुर्गत के सकल बखाना / सुनत रहि बधु देवत धियाना //
घटन ऐसेउ बोल बताईं / घटिका जस पिय सों दरसाईं //

ले बहु बरन बचन भर बानी / ते कारन  भए कंठ गिलानी //
कहत पर पिय अधर तिसनाई / तुरत बधु अधर तोइ धराईं //

धुरि पुर पट्टन कारत पारे / पथ पुल कुंजन कूल कठारे //
नहकत घन बन भँवरत थौरे / पहुँचाइ बहि चमक पुर पौरे //

जिन के चिन्ह बैद दाए, जे रहहि जननि बास /
हतक पथिक आए तहँ जहँ, तिनके निरुज निवास //

रविवार, ०४ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                                 

तहँवाँ बैसत भए तनि बेरे / रहहि नाड़िया रोगिन घेरे //
देखत निरखत दु चंदु चारी / आगत प्रिय के परखन पारी //

काँपत  नारी धरकत छाँती / हट प्रद पिय जोगत भल भाँती //
प्रथम पुरातन पद चित्र पेखे / पुनि एक नउ अंतर छबि रेखे //

रोगिहि हुँते सयनइ पौढ़ाए / सइत सजन एक सदन पैठाए //
हतपद उँगरि तिर धर टेरे / ऊरु फलक जे भंजन केरे //

कौसल तस ते सिध संधाने / संधि बांध रत पटिक बँधाने //
बहुरि सकल जन भीत बुलाईं / सँधित बँधित पिय चरन दिखाईं //

भंग अंग हर कारत बरनन / अरु बोले अस बचन सुहावन //
चीरन करतन लागहिं नाहीं / ऐसेउ भाल भाँति जग जाहीं //

पर मोरे एक बचन दानहू / भयउ कुसल लग कहहि मानहू //

भसुर भाइहि सहित बधू, लाहत उर उत्कर्ष /
प्रतीत सँदेह भाउ जुग, हर्षित बैद सँदर्ष //

सोमवार, ० ५ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                                    

बहोरि बैद कहि एहिहि ठौरे / पंच दस दिवस लग परि होरे //
हमरे निरखन मह भलसाई / जोग परख पद करक जुराईं //

असक कसक अस पटिका कासें  / मानहु पद दैं कारा बासे //
अट्टक पट्टक अस लपटाईं / दंडक जस दंडिका बंधाईं //

कर अंतर पद फेरत केरे / धौली मटिका गृह भित घेरे //
तपत श्रमकन अंतर रिसाईं / कलपन कीट जिमि कुलबुलाईं //

कहि  दंडक जे लै हिंडोले / कोर्ट रोरत इत उत डोले //
तब तव दोनउ चरन बँधाहूँ / दंड अवधि अरु दै बैसाहूँ //

कारत अंजनु भाउ बियंजनु पीर भंगित पाद की /
सार सुरंगन बरनत बरननधीर बदन बिषाद की //
पिय हतभागी रयनइ लागी करत अँधियार नयन /
मध पथ सरसर भल्लक भय कर दै धन बर्जिता सरन //

आह भंगन पाउँ धरे, भन भन करत पियाए /
बैदक अस पट्टक करे, कोउ भाँति न सुहाए //

मंगलवार, ०६ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                                         

बितत दिवस भै रतियन कारी / पटिक चरन तन आरत भारी //
बिहान भयउ न रयनी बिहाए/ असन रसाए न देही सुहाए //

जागत पहलइ रैन  बिताई / बर तरपन लिख कही न जाई //
प्रात काल सयनिन्ह सयनाए / नित्य करम पिय तहहि निपटाए //

कहहिं बंधुगन भा बार काजा / नहि त रहिहि हम सल्य समाजा //
पर अजहुँत मन संसइ कारीं  / का ए भाँति पद संधि सहारीं //

पंथ जोग कर बखत लहाहीं / गवने दोनौ बैदक पाहीं //
बैसत सन्मुख तिनके आसन / बोले बरतत बहु अनुसासन //

जे तुम कहु पूछे तनि बाते  / मत अनुरूप निज हित के नाते //
हमरे मति एक संसै लाही / सल्य रहित पद जुग  तौ जाही //

रोगिन संजुग के बचन, संविदित चित साध /
संका संवारत बैद, वादिन अस संवाद //

बुधवार, ०७ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                                     

मानख बपुधर बिटप सरूपा/ बाल रूप अँखुआ अनुरूपा //
पोषत तिन सत सार अहारे / बिटप साख जस अस्थि सहारे //

सीध साध कहुँ आँठन गाँठी / अस्थि ऐसेउ जस को लाठी //
ऊरु फलक धरि अस आकारे / घुटरुहु कटि पद संधित सारे //

भंग लकुटि जस तिर्यक ताईं / तव प्रिय पद एहि बिधि भंगाई //
भय दोइ खंड धर दुइ खाँचे / दरसत अस जस को दुइ साँचे //

दोउ खगन कर खचत खचीते / खाँच खचावट जोगि सुधीते //
असहि परस्पर पाए प्रसंगे / जुग जहि रहि जे अस्थिहि भंगे //

पर बखत तनि लागि अधिक, कारत बहुस बिश्राम /
मेटत दुःख सकल दिन के, अरु  लहहु मोरि नाम //

गुरूवार, ०८ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                               

मन संसै सो पूछ निवारे । दुनौ बंधु पुनि सदन पधारे ॥
हड्डी पसली गाछि लकूटी । कहत समुझाए बार बधूटी ॥ 

बधु मन मज्जन चिंतन रंगे । दरसे दुखि मुख तीर तरंगे ॥ 
धनवन धनुर धर धारिहि धाए । एक दरसन पर दूज दरसाए ॥ 

गेह प्रधान पदक पिय पाएँ । जे काम कर कारीषिन्हि लाएँ ॥ 
ते बिपद संग परे खटियाए । भाग अठियाए त  को न उपाए ॥ 

सकल दसा दिस भा प्रतिकूला । सोचत बधु बैसत मति कूला ॥ 
अस चिंतत लोकत घन गाढ़े । लोचन तर घन्बर घाँ बाढ़े ॥ 


हृदय हाय घनकात घन, घनरस कन बरखाए । 
आह बन बाह बहा बहत, अधर समुंद समाए ॥  


शुक्रवार,०९अगस्त, २ ० १ ३                                                                                                       

बहुरि एहि सोच चित समुझाई / अनभल अहोइ भली हुआई //
काम कर्मधन आवन जावन / भै सोहन जौ सों मन भावन //

धार अधर सागर मन तोषे / कलकल नैन सकल जल सोषे //
इत पिय रहि रत पटिक पिराई / कुंचन लुंचन सहि नहि जाई //

अजहुँत असह दिन दोइ बीते / अगहुड़ न जानै कितौ कीते ॥ 
कवन पीरक अगन सितलाही / ऊरु फलक का करहि मिताई ॥ 

कर्मन कर्मठ रहहुँ उछंगू । भयउँ न मैं कहुँ परबस पंगू ॥ 
होउँ कुसलत जाउँ बलिहारी । रहहि प्रभु दया दीठ तिहारी॥ 

अस पिय जगद जननि नाथ, बिनयत निज कर जोर । 
कहत प्रभु धरौ सिस हाथ, पाँ परऊँ में तोर ॥  

शनिवार, १० अगस्त, २ ० १ ३                                                                                    

बहुरि अग दिवस रहि एहि नाईं । उतन भसुर बहुरन हरवाईं ॥ 
बधू के भाइहि कहत अगोरे । करत बिनति अरु किछु दिन होरें ॥ 

तब भसुर निज विवखा बखाने । कहि तानी मोरि बिबसता जाने ॥ 
बहुस कठिन कर कह मृदु बानी । होहहिं बहुसह कर्मन हानी ॥ 

ता पर बहिनै लागि बिहाहा । आगवनु लग लगे लग्नाहा ॥ 
अजहुँ बाँचे करम बहुतेरे । कारक मैं अह एकै अकेरे ॥ 

लघु भ्रात कहु कर्म के नाही । सो सोइ करि जोइ मन माही ॥ 
रहि कर्मठ मँझ भ्राता मोरे । एहिहु तोर पद परे खटोरे ॥ 

कारन अस श्रुत बिनत हमारी । कवन्हु कर बधु लेइँ सँभारी ॥ 

अस बिबसइ बचन भाषन, दिए अधर मुख भींच । 
अरु मलिन प्रभा किए भसुर, नयन पलक करि नीच ॥   

रविवार, ११ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                          

प्रियतम भाइहि पुर पख धारे । बधु होरन बहु अर्चन कारे ॥ 
कहि दिन होरउ दु चंदु चारी । रहहि भल दया दीठ तिहारी ॥ 

बधु भाषन पर एकहु न माने । बास नगर पुनि भसुर पयाने ॥ 
तब बधु भ्रात कहि चिंत न कारु । मैं ठारत सबै लेइ सँभारु ॥ 

नहि नहि कहि बर तुमहु पयानौ । बेर बहुरि भलि लेवन आनौ ॥ 
पुनि नहि कह अस बोलइँ भाई । बिकट बरी अरु नगरि पराई ॥ 

ता पर लघु बालक बस भगिनी । तुहरे कारज बहुसह रहिनी ॥ 
पंच दस दिवस कछु न बिगोई । एकइ अकेरे भल दुइ होई ॥ 

एहि बिधि भाए बधुटि बचन,  एकहू दिये न कान । 
सकल ससुरारी सन्मुख, राखे कुल के आन ॥ 

सोमवार, १ २ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                               

अस बधु बर लगि निरखत जोगे । सहि औषधि घर सेवक लोगे ।। 
औषधि घर जे नगर निबासी  । बधु बर बहिनै रहि तँह के बासी ॥ 

असन के अस रहि न कठिनाई । जोइ रसोई बहनै लाई ॥ 
इत पिय पट्टिक ऐसन बँधेइ । परे खाट बट करवट न लेइ ॥ 

जस जस दिन जामिन बिरताईं । तस तस पिय मुख छबि कुम्लाईं ॥ 
आरत बिनु मुख दरसत कैसे । नाथ बिनु कुचित कुमुदिन जैसे ॥ 

बिनु तन नंदन बिनु मन मोदू । बाहिर अंतर रहित बिनोदू ॥ 
सयन राध बिनु असन सुवादे । बारहि बार धरी अवसादें ॥ 

कसकत टसकत कहि पिया, धारें दंड कठोर । 
न जान को अघ किये जो, डारे प्रभु अस ठोर ॥  


मंगलवार, १ ३ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                             

धरे गोद मह लघु लरिकाई । करत रहहि बधु  पिय सेवकाई ॥ 
चरत रहि कनी घुटुरुन माही । तेहि बखत पद धारति नाही ॥ 

एक दुपहर बहु अचरज कारी । नीक कनी कर केलिक धारी ॥ 
ललकित मुखरित लेइ हुँकारी । मोदु मगन हिलगन महतारी ॥ 

हिय बाँधत तनि चरनन चिन्हीं । पग पग पाइल छम छम किन्ही ॥ 
एक छिनु ठारत  भँमरि पुहुमिहि । परसत पद पावन भइ भूमिहि ॥ 

निरत करत जस धरनिहि दोली । हिरत डुरत अस ललनी लोली॥ 
अरसत परसत जस पौ पौने । पुहुप पटल तस भाँवर भौने ॥ 

लखि लवन बदन बाल नयन मूर्धन तेज पुंज लही । 
रखि कमन करन राग कपोलन अधरोपर कंज गही ॥ 
झाबर कंकनि दिए मधुर धुनी चमकत चारू चँवरी । 
लै हिलकोरत हिलगत लोलत दोलत जस लघु  भँमरी ।। 

लख अपलक बाल लरिकी, अनुरागित पितु मात । 
पुलकित मोदु मुदित मन की, भावन कहि नहि जात ॥ 

बुधवार, १४ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                                       

बहुस दिवस पर पिय सुहसाई । लगे सुहावन मुख पर छाई ॥ 
बाल कनी पितु लोकित कैसे । बाल ससी मुख चातक जैसे ॥ 

भए दुइ मयंक एकै अगासे । एक बालिका एक पिय मुख भासे ॥ 
एक भुर भँमरत चितबत ठारे । एक भाँवर पथ दोलत चारे ॥ 

आखर देइ अपूरब दर्सन । अलोकित बरन बिस्मय लोचन ॥ 
पीर कमल मुख मल प्रभ छाई । मुदरित मुद कौमुद प्रफुराईं ॥ 

मानस मुख बिहरत हँसि हंसे  । कलित मुकुति रद अलि अवतंसे ॥ 
बिषाद बकूल इत उत दौरे । दिसि दरसत अरु ठौरत ठौरे ।। 

कबहु मात कबहुक पिता, बाँध कंठ भुज सीस । 
लल रसन दीपित लोचन, के कारत बर रीस ॥ 

गुरूवार, १ ५ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                             

अस औषधि गृह दिवस पूराए । बैद चरन नउ पटिका चढ़ाए ॥ 
पुनि करक पिय निर्देसन दाए । सुतत रहिहु पद बिनु हिलराए ॥ 

बहुरि चौपद एक बाहि जुगाए । डगर अहोरे तहहि बहुराए ॥ 
असन गेह पिय निद्रा बियोगे । अनाकनी कर भोजन  भोगे ॥ 

काल रयन गिर भए अस पंगू । छिनु मह भए छत परे पलंगू ॥ 
चरन पटिक अस भै दुखदाई । बाम बिधि कछु कर सक न जाई ॥ 

जे कुरोग औषधि एहि माही । बहुस मास तन सयन बसाही ॥ 

दीन दसा देह दारिद, दुःख दुसही दिन दून । 
तिनकित तिलछित तिजहरी, पात रात चौगून ॥ 


 








Tuesday, July 16, 2013

----- ॥ सूक्ति के मणि 12॥ -----

रथ रोहत एक दिवस बहोरे । अटपट संकट साधन जोरे।
जूते हरि गण गन सरुप हरासे । उछ्बासन के किरनन कासे।।

हत  चेतन जीवन प्रभ लाखे । अवसेश सूत लाखन राखे ॥
बाहिक चरन हराहरी हारे । बाहक बाहन बहनु हँकारे ॥

कहि रथी हथाह्थ रथ चारे । भरी  भोर बधु पट पैसारें ॥ 
तँह कुटुंबिक चरन संचारे । तीर तरंगन द्रुत गति धारे ॥  

सकल नगरी गह निद्रा सोई । कार काल कोलाहल होई ॥ 
मंद कांति  कर गामिनि छाए । कर कलरव जल कुमुद कुमलाए ॥ 

आकर प्रभा कर बरनै, बरनन अरन अलिंद । 
दहरि दुआरि धर चरनै, अवतर अररि रविंद ॥ 

बुधवार, १ ७ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                               

नग ऊपर तरि धूँधर धूने । नगरि नदी नद नागर सूने ।। 
अनसु जाल घर अम्बर भारी । कछुक उजयारि कछू अँधियारी ॥ 

हरि हरि कर हिरनै संकासे । नभ मूँदरि हीरक हरि कासे ॥  
श्री सुम कलि अलि बल्लभ लासे । नीर नील नौ नलिन निकासे ॥ 

कारित कलबर नभस नभोचर । जोगत भगत जगत हरि मंदर ॥ 
चौपथ रथ सथ रुदथ चिघारे । संचारत चर चरनन चारे ॥ 

चारिन रथ पौरक पुर पारे  । तँह वधु के गृह सनमुख ठारे॥ 
थिरकौंहत रत रथ पद थाई । तरी थारी पर दुइ परछाई ॥ 

भेद भेद भर हरिदै गाढ़े । छाइ चरन दुआरि पुर बाढ़े ॥ 

पाट कपाट कुंडी कर  , कस करकस खटकाए  । 
धवनि तरंग धर घर भर, कलबर कर गुंजाए ॥ 

गुरूवार, १ ८ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                                  

इत बहियर कहुँ गहियर खोई । निद्रा मगन भै सयनै सोई ॥ 
कंपित हिय गत पिय सपनाई । मुँदे नयन दर्पन छबि छाई॥ 

सह सुति सूना बधु भुज पासे । सत गति साँसे कभु उछबासे ॥ 
औचट खट खट के खट्कारे । गहन कूलाहल खटका धारे ॥ 

ततपल अँखि रखि अंचल खोरे । बहियर गोचर गोलक डोरे।।
धीरहि धीरै धिय थपकाई । उपोत पोत परत  उसराई ॥ 
  
आलस भंजत बसन सँभारे । चरे चरन पुर भवन दुवारे ॥ 
अरबर कर धर पटर उघारे । अर्रर अररी कंठन कारे ॥ 

बधु दृग दिरिस का दरसे, आगत जागत सूत । 
मंद कांति मुख वधु सों, ठाड़े दहरि दू दूत ॥  

शुक्रवार, १ ९ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                        

दरस तिन्ह बधू ते बखताई । छे वादन पर अचरज भाई ॥ 
वधु मतिहि मत तरंगन छाई । एक आवन पर तुर एक जाई ॥ 

एक दूतक रहि बार भौजाई । रहि बहिनइ दूत बियाई ॥ 
कहि दोनउ दुआरि पर ठाढ़े । चलौ तुरत तुम संग हमारे ॥ 

बरन बरन बधु बदन सहारे। विरल वानी वचन सम्हारे ॥ 
पद रद छादन हहरित हारे । हत  चित चेतन नयन निहारे ॥ 

कहत तिन्ह तइ बिस्मइ घेरे। तुम दोनौ अरु एहि भल बेरे ॥ 
पूछी वधु सत साहस जोई । कहु को कँहु होनिहि होई ॥ 

कहि दोनउ धर मुख मलिनाई । बेर भला ना भई भलाई ॥ 
अरन मुकुति दुःख तार पिरोई । अरु कहि प्रिय सन अनभल होई ॥ 

भै ते दुर्घटना ग्रसित, किए औषधि घर बास । 
कहत ए कंठी कल कसित, लिए दोनउ उछबास ॥

शनिवार, २ ० जुलाई, २ ० १ ३                                                                                             

 देहि पर जस तस बसित बसाए । सयनित सुता कर कंठ लगाए ॥ 
अकुल बियाकुल हहरत छाँती । गच्छइ बधु जेहिं तेहिं भाँती ॥ 

मन ही मन भगवान सुरताई । सुमिरन करत चरण सिरु नाई ॥ 
मति गति मत गत प्रिय बय काईं। प्रबसहिं एक निर्गम तहँ ताईं॥ 

आगिन आगिन  दूतक गवनै । पाछिन बधु पद चरित लहनै ॥ 
बैसत बाहनु दिए गति बाही । पय सैम पंथ तिरत अवगाही ॥ 

नीर नयनन पट तीर तरुबर । बधु तिन्ह बिलोकति बहु कातर ॥  
कर पद पत कर तन तरु कोटर । बहि बहि सीतर काँपइ थर थर॥ 

अरत गरत दरत दोलत, पंथ परत किए पार । 
सरित सेतु बंध उतरत, चिंतन चढ़े पहार ॥ 

उतरि भावज बहिनहि सथ, सुरतात चित हत हानि । 
देही छति छत कर गिनत, भए केतक परिमान ॥ 


रविवार, २ १ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                      

मति मंथन किए बिगलित केसे । जुगति जाल दिए बिखरित भेसे । 
विकलित बहस सम्हरित लेसे । औषधि घर बधु  चरन प्रबेसे ॥ 

प्रबिसत चास अस चहुँत बिलोके । जनु मनु अगवनु को जम लोके ॥ 
रमत रहहिं तहँ प्रमथित लोगे । परत  पाप जिमि  नारक भोगे ॥ 

अबुध बधू रय भय ताहू । कानी धारि कर कंठ प्रबाहू ॥ 
प्रबुधित ततछिनु बहिनइ भासे । बसित प्रबासन पिया प्रभासे ॥ 

सास ससुर साथ सह ससुराई । सकल प्रियजन पिय रहि घिराईं ॥ 
तहँ दी न कोउ वैद दिखाई । रोगित जोगित आवत जाईं ॥ 

अचरा कर लिन्हें, पथ पद चिन्हें, हियरा धीरजु राखे । 
जब अंतर किन्हें दरसन दिन्हें, साजन सनमुख आखेँ ।।
अलि अलक अकासे, मुकुति अभासे, लाखात लोचन पाखी । 
बरखे बरखा से, भीजत साँसे, भै बरन धुनी भाखे ॥   

प्रिय मलिन प्रभा मुख, दीन दसा दुःख, टसक कसक कहि कथनै । 
देहि छति छत पाए, बसन मलियाए, सयनइ रहि सों सयनै ॥ 
गह घंबर पीरा घन गंभीरा बाह जी कम्पन करै /
कभु बिकल अकुलाए, नैन उघराए, कबहुँ झपक मूँद धरै //

भै जीउ जब होन बिबस, होनइ सब करि हारि /
होहहि सोइ किंचित है, एही धारनमन धारि//

सोमवार, २ २ जुलाई, २०१३                                                                                               

करुना कंदन मन प्रस्फोरे / साखी मति गति पत पत कोरे //
फुरित संतोष सुमनस तोरे / निज अंतर बधु करत  कठोरे //

बार बधूटी चाष झरोखे / हतगत कनखत परख बिलोके //
बलि बल्कल बल चोट चपेटे / भयउ भेंट पिय लेटहि लेटे //

लाम चाम छद छालि छिलाई /  चमरस चस चसकर उघराई //
ऊरू फलक सिध संधि अंगे / ते अस्थि भइ दु पाट प्रभंगे //

पीर बहुस कर धीर न धारे / कहि प्रियतम हम राम सहारे //
भए हत भागित हहरत हारे / हाय करत प्रभु भगत पुकारे //

कहुँ हत कहुँक छत छित्रित, लाहत रुधिर सुरंग /
कहुँ पीरित देहि भितरित, भयउ पद अस्थि भंग //

मंगलवार, २३ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                 

माघ चढ़े पद पख अँधियारे /  गह पिय दुर्गत घटना कारे //
सीत सरन चरि सरयू सर सर / पीर लहत मुख कांति पट हर // 

ऐसेउ बयस बिधे प्रात सिधाए / पिय दुःख धरत बहु बखत सिराए //
रोगी जोगत पंथ निहारे / बेर भइ न को बैद पधारे //

दुसर पहर सोन जब अगुवाईं / सूझत रहि न अरु को उपाई //
अगीत पछीत जन समुदाई / बिदित बैद दिए बदन दिखाई //

धौला गिरी सम कापर धौरे / तापर मनिधर सर सर डोरे //
कहत प्रभु जिन्ह जन जन मानस / रहहि दानउ तेहि मन अंतस //

हतगत अधोपत कसकत, बोले अंतर हाड़ /
निरखत बैद उपरोपर, बाढ़े अगवनु बाड़ //

बुधवार, २ ४ जुलाई, २ ० १ ३                                                                          
जोगत रहहि पिय पंच परिजन / लागि बैद पहि मेल मिलावन //
लहि नहि रहि घटना के बिबरन / बधू अजहुँत तेहि कर कारन // 

परिजन उर धर आरत भारी / करत परस्पर बूझ बिचारी //
गवनु सकल जन बेदज पाहीं / तै परतस अस बैद बताहीं //

ऊरु फलक जे दुटूक धरहीं / सल्यक्रिया सन तेहि सुधरहीं //
दै दंड ते संधि संधाही / ता पर एक पटिका बंधाही //

सेष सकल जे भै तन घाते / सनै सनै ते सुधरहि साथे //
तुरत तुरग तुल दै निर्देसे / गत जाने को अंतर देसे //

बैद बचन सुन वदनन लाखे / रहहि पंच पै भयउ अबाके //
अस श्रवनत बधु लइ उछ्बासे / रोगि अरत पिय हहरइ साँसे //

करत पिया चिंतन मनन, रोग सयन लह रेष /
गए कर कर्मना कर्मन, ता पर काइ क्लेष //

गुरूवार, २ ५ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                 

उत बैदक हहरत हलवाहीं / कहत हरुअन महहीं भलाई //
इत प्रिय परिजन भए हरहाई / सकल बदन हरदी छाई //

भँवरी मति गति कवनइ किन्हें / तब पुर जन पहि चरनन चिन्हें //
बूझत दरसत तब बुधवंते / सबहि सुधित दै बर मत मंते // 

कार अलस जिनके मन माया / तिनके कर्तन काल समाया //
सल्य कार जे भए अनिबारे / कोउ औरन नगर चिन्हारें //

गवने एक बुध बैदक पाहीं/ तासु सकल ब्यथा परचाहीं //
परख दसा बहु सोच कहिन्हें / मति मंथत ते मंत्रन दिन्हें //

ऊरु फलक भय दूई टूके / सल्योपचार ते नहि चूकें // 
नहि टी चारण होहि कठिनाई/ एक पद लघु एक बड़न लहाई //

तब ते बिदित बैद राज, सुझाइ ऐहि बिचार/
रोगि जोगि साज समाज, जाहू लेइ बहार //

बाहन साधन जोरि कै, गवनउ नगर बिलास /
तहाँ रहहि एक बैद बिरध, नाम ते धीर दास //

शुक्रवार, २६ जुलाई, २० १ ३                                                                                

ततपर परिजन बेर न कारीं / जुगति जोग बाहन  पद चारी //
पीछ पीठ पुर पिय पौढ़ाईं / यतन जतन बहु चरण मढ़ाईं //

बाल कनिक कंधन कनियाँई / बधु प्रियतम भुज पास बिसाई //
भसुर सहित बधु के बर भाई / बैसे सह सम सहस सहाईं //

तहवाँ पर पुर करैं पयाने / रह्जाँ बैद बिरध सयाने //
गरक बरे बाहन रलि रोरे / हड़क पदक हिदोलक दोरे //

पंजर सह जब हाड हिलोरे / प्रियतम हदकत पुनि कर जोरे //
दन्त बसन बधु बदन दसाई / बहुस बेर मह हँसि मुख छाई // 

हदक पदक पर कुँअर हड़काए / तुम्हरे पोषन हाड़ गवाएँ //
पुरुख कि जान प्रसव के पीरा / नारि न जान पुरुख गंभीरा //

सुहास बदन सजल नयन, अंतर निलय अधीर /
करी याचन बधु मनहि मन, पावन प्रियतम पीर //

शनिवार, २ ७ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                      

चरन पीर परि बदन स्यामा / मन चिंतन धन कारज कामा //
अधर अधस पिय धरे अधीरे / लहि बहि बाहनि धीरहि धीरे //

जोग समउ बधू पिय मुख देखे / बरन बचन धन अधरं लेखे //
का भइ कस भए कहु समुझाईं / घटना बिबरन पूछत पाईं //

ताप सहत पिय साहस जोरे / रद छादन तनि बरन बटोरे //
जब प्रियतम ध्यान पर चाढ़े / श्रवनत बधुचित चित्बत ठाढ़े // 


पीठ पास गत चित्र अनुरेखे / कहत कथन पिय करम सुरेखे //
दिसा सीध पिय दसा बिपरिते / दीठ मूँद किए अधर मुखरिते // 

बाँधतबचन प्राग कथन, अरनन बरनन सार /
बोले प्रानधन पत पुनि, प्रान पत्नी उचार //

रविवार, २ ८ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                            

प्रातह थापन थरि एक बारे / मम दिन चरिआ चरन अचारे //
गवनउँ जनपत भीत बसेरे / जोगत निरखत कारज केरे //

बहुरि नभास चार बहु कलरउ कर/ बहुरि हलिक हल हलिकर हरबर//
कुंजन कोइल कलिक कुलाहल / हरिअरि भू भर लयनै हलचल //

अंबर डंबर जे जुग सारे // ते कर केर सकेर सकारे // 
किरन कासि कर किए एक कोरे  / बुट जुट संपुट बाजत डोरे //

लाखी गवाखि सांझ दुआरी / मंद चारि दरपन कर धारी //
सिस सस नैनन काजर डारे  / रैनी बेनी माँग सँवारे //

मैं सथ एक अरु मोर सहाई / निज निवासन आन हरुहाईं //
सकल दिसा दरसन दृग अम्बरि / दिवस मुद्रा भै हमहु हराहरि //

करत कहुँ रयनी भोजन, सकल सँजोइ जोए /
लिये दोइ चरन बाहिनी, बाहक बाहिन दोए //

सोमवार, २ ९ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                             

तबहि एक बासि देइ उदंते / मंत्र मूल मंतुक लघु मंते //
देवन मंत्रन मंच पधाईं / ते चहि श्रवनन ते तहँ जाईं //

मैं अरु सहचर संग बिचारे / श्रवन मंत्र मंचन पुर चारे //
तेहि कारन दु होरक होरे / कारत कारत थोरहि थोरे //

तहँ ते निकसत भै तानी बेरे / तहँ लग रैनी लिए घन घेरे //
तत पर लै बहि चरे दुनोई / सरनि चरनि चर सर सर होई //

अहा बहिक बहु बहि हहराई / भइ सीतर सरदा के नाईं //
बहुरि चरन अति द्रुत गति धारे/ पंथ गहत करि पार पहारे //

गोचर  नयन बिपिन गहन, रूप घन कुंतल काल /
रचना रचित सरिस सरन, बाहन कासित लाल //
 
मंगलवार, ३ ० जुलाई, २ ० १ ३                                                                                          

केस बिटप बार बन घन घोरे/ जहँ जिउ जंतु जस कीट डोरे //
द्रुम कंटिक कहुँ बट बर षंडे / साख हिरन जिमी कीटक अंडे //

जूँ जून बलयित बहि पद रोले / करत कुलाहल कलबल बोले //
तों तों  धुरियत दूर नहाके / लख घर बीथीं धूरै लाखे //

उठइ धूरि धुर ऊपर छाई / चमक चंदु मल मुख धुँधराई //
बही अस जस चंद्रिकाभिसारी / मिलन बिकल जिमि पिया दुआरी //

औचट बिचरत घन बन देसे / निकस आए एक दीर्घ केसे //
पग धारत पथ कारत पारे / आगत सन्मुख सोइ हमारे //

एक तौ बहि बहु गति गहराई / ता पर रयनइ गहनइ छाई //
दरसत मम दृग ते अस हाई / सहरत हहरत चित हरवाई //

फेर लगे बहु डगमगे, कभु  दाहिन कभु बाम /
बहनु गति नियंतन लगे, गत कर गिरे धराम //

बुधवार, ३१ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                               

धरा साइ भए अस मम गाते / चढ़े कोउ जिमि साख निपाते //
गिरे बाहनु सह ऊपर मोरे / हत  कारत मम पंजर तोरे //

दसा दीनतस दिसि अँधियारे/ सूल कुलिस पट अँगवनहारे //
तापर घन बन तम अधिकाई / अस दरस दृग भयउ असहाई //

लसित तनिक हत मोर सहाई / तेहि बहि पाछु पटक धराई //
लाहत आहत पतन अधारा / सूझि न मति का करिअ बिचारा //

सहचर मति अस संकट छाई / मो परिहरु न बनत कहुँ जाई //
परे परे मंझन पथ ठौरे / दोउ नयन को पथिक अगौरे //

पथ निर्जन जामिक घन घोरे / भयजनि जंतु बन रहि न थोरे //
ते डरपत भै चित भयभीते / छत पत हतप्रद भुज बल रीते //

जोगत पथिक पथ निहार, फेर लगे दउ छोर /
दरसन दैं दु चंदु चार, कोउ अहोर न होर // 






Monday, July 1, 2013

----- ॥ सूक्ति के मणि 11॥ -----

सोम/मंगल, ०१/०२ जुलाई, २ ० १ ३                                                                  

पद रहि मरजादित नित कृतिया । परिश्रम धन भृत हुँत अध भृतिया ॥
जोगता रहहि अभिधा यंता । महमुनि मतमह गति मंता ॥
पद संविदा पर आधारित एवं पूर्ण कालिक था । और परिश्रम धन भृत्य के पारिश्रमिक से भी आधा था ॥ और( न्यूनतम) योग्यता थी अभियंता की उपाधि साथ में ऊंचा अनुभव, बुद्धिमान और विचारवान ॥ 
   
कारु करतब सहज न होहिन्हि ।  रहत कठिनई करत बोधिन्हि ॥
पद थापन थरि रहि बहु दूरे । दोइ तिनी सौ जोजन धूरे ॥
कार्य कर्तव्य भी सरल नहीं था , करने में कठिन था जिसे  सोचा समझ कर क्रियान्वयित करना था ॥ पद स्थापना स्थल बहुंत ही दूर था यही कोई दो तीन सौ योजन के आस पास था ॥ 

दसा बिबस पिय भयउ निरासे । बहियर हुँत अस बचनन भासे ।।
सोचतहूँ लेइ सकल उपाधि । दुइ टूक कर कहु धरौं समाधि ।।
अपनी स्थिति से विवश होकर प्रियतम निराशा से भर गए । और वधु से इस प्रकार के वचन कहने लगे :-- सोचता हूँ साड़ी उपाधियों को लेकर उनके दो टूकड़े करके कहीं समाधि ले लूँ ॥ 

अस सुनि बधु बहु कह समुझाई । अधस मनोबल ऊंच उठाई ।।
करमही सई करमहि साईँ । तेहि परत अरु को न उपाई ।। 
ऐसा सुन कर वधु ने प्रियतम को बहुंत ही समझाया बुझाया । उनके गिरते मनोबल को ऊंचा उठाया ॥ । कर्म ही से बढ़ती है, कर्म ही में भगवान है कर्म ही समस्याओं का एक अंतिम उपाय है इसके पश्चात और कोई दूजा हल नहीं रह जाता ॥ 

श्रवनत पिय अस लै उछ्बासे । करमन करतन कर कटि कासे ।। 
पद पदवि रहि पुरातन नाहीं । रहे निजोजित पुरसहु ताहीं ॥  
जब पिया ने वधु के वचन सुने तो एक लम्बी सांस ली और कर्त्तव्य कारित करने हेतु करधनी कस ली । यह पद और यह पदवी कोई नवीन नहीं थी प्रियतम पहले भी इस पद पर नियोजित होकर कार्य कर चुके थे ॥ 

गवने पुनि कारज करन, अवली लिए कर धार । 
करत हस्त आखर चिन्ह, धारे कारज भार ।। 
कार्यालय जाकर फिर कार्य-सूचि हाथ में लेते हुवे उन्होंने हस्ताक्षर चिन्हित करते हुवे कार्यभार ग्रहण किया ॥ 

बुधवार ० ३ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                  

पथरील पथ परबत करि हेला । चरि थापन थरि किए जन भेला ॥ 
भँवरत कारज दरसन देखे । लै लिखनिहि आलेखन लेखे ।। 
पतःरिले पथ और पर्वतों को सेतु स्वरूप करते हुवे प्रियतम स्थापना स्थल को प्रस्थान किए और वहां के निवासियों से भेंट की ॥ लेखनी से आरेखन चित्र उकरते घूम घूम कर दिए गए कार्यों का निरिक्षण किया ॥ 

जीउति जीवन करतब कारे । एक कण श्रम धन कर नहि धारे ॥ 
गहति जितै धन मास पूराए । उतै छह दिन मह गयउ सिराए ॥ 
जीवित रहने हेतु आजीविका के कारण वो यह कर्त्तव्य कर रहे थे अभी तक श्रम धन का एक भी कण ग्रहण नहीं किया था ॥ जितना धन एक मास के पूर्ण होने पर प्राप्त होता उतना तो छह दिन में ही समाप्त हो गया ।। 

तँह पिय दुमन लिए दूर भासे । दूर बधुटि सन मधुरित भासे ॥ 
जेहि सेउकाए सौं गृह खाई । तुम्हहि कहु अब का करि जाई ॥ 
तत पश्चात प्रियतम खिन्न मन से दूर भास् लिए और दूर बैठी प्रियतमा के साथ, मधुरता पूर्वक ऐसे बोले । यह सेवा आजीविका तो घर को भी खाने वाली के सदृश्य है अब तुम्ही कहो क्या किया जाए ।। 

अधि का कहुँ कहि बधु सकुचाई । उहि करौ जौ सब सुख हिताई ॥ 
श्रुत अस प्रिय कहि मधु मुसुकावत। अध परिजोजन अधपद जावत ॥ 
तब वधु ने संकोच करते हुवे कहा अधिक और क्या कहें वही करो जो सब जनों के हीत एवं सुख के लिए हो ।। ऐसा सुनकर प्रियतम ने मुस्कराते हुवे कहा आधी बनी परियोजन आधा अधूरी ही रह जाती है ।। 

भवरौ पाथर परबत डोरी । श्रम धन केवल धरु सौ कोरी ॥ 
करक करम करमना दुकौरी । कपट लेखी कर बनौ करोरी ॥ 
पथरीली पर्वती भूमि में भ्रमण करो और श्रम धन के नाम पर केवल सौ कौरी ( एक कौरी = २० ) रखो ।कठोर कर्म और कर्मण्या दो कौड़ी की । छल कपट भ्रष्ट आचरण करो और करोडपति बनो यही है राजा की योजनाएं ।। 

चाहे पूरन तल गहे, कृतत तलैया ताल । 
चाहे तो अध तल लहे, कार कपट के जाल ॥  
सद आचरण कर अपने घर से धन लगा कर चाहे तो ताल-तालाब पूर्ण स्वरूप में खनन करो या भ्रष्ट आचरण करो और उसे आधा ही रहने दो ।। 


 गुरूवार, ० ४ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                        

जे  जन्पदि मह थापन थाई । तहहि पिया एक ठिया बनाईं ॥ 
खेत खलिहन खेत बन श्रामा । रहहि सेवक के करमन धामा ॥ 
जो जनपद, प्रियतम का स्थापना स्थल था । वहां प्रियतम ने एक निवास बना लिया था ॥ खेत खलिहान छोटे गाँव और वन आश्रय, राजा के उस सेवक की कर्म सथाली थी ॥ 

जदपि सेवा जोजन रत हुँते । कारत कपट धन रही बहुंते ॥ 
श्रमन कारजहु गहे न थोरे । बहुर रयनि पिय निकसत भोरे ॥ 
यद्यपि उस सेवानियुक्ति में लगे रहने से और कपट कार्य करने में धन बहुंत था किन्तु साथ ही श्रम कार्य भी थोड़ा नहीं था प्रियतम जनपद से भोर में निकलते तो लौटते लौटते रात हो जाती थी ॥ 

तमस तमा तस बन घन घोरे । रहे जिउ जंतु दन्तक खोरे ॥ 
कहु कोउ पूरा बीच पहारा । ता पर संचय जल की धारा ॥ 
काली रात के जैसे वन में घन घोर अन्धकार रहता और उस्समें जीव जंतु भी दांतों से काटने वाले थे ॥ कहीं कोई गाँव पहाड़ों के बीच स्थित था तो उस पर से निकलती जल की धारा को संचयित करना होता ॥ 

पथिक अपथि पद पदिक रचियाए । थकि हारत कभु छाए ना पाए ॥ 
कबहु एक बेर रहि भूखाईं। कंद मूल कभु फल फुल खाईं ॥ 
थे तो यात्री किन्तु बिना पथ के अपने ही पद चिन्ह से पथ बना लेते । थके हारे प्रियतम को कभी तो कहीं विश्राम भी नहीं मिलता ॥
  कभु को श्राम सयन सरन, रहहि न करपर ठोर । 
मारग अगम भूमि धरे, काँकर कंट कठोर ॥ 
कभी कोई शरण स्थली न कोई शरण न शयनिका न ही कोई सर के ऊपर अन्य छत ही होती ॥ कांटे कंकड़ और कठोर स्वरूप धारण किये भूमि और उस पर दुर्गम मार्ग का आवागमन ॥ 

शुक्रवार, ० ५ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                               

एहि बिधि कभु प्रिय सुरतित करती। चित चिंतत बधु सुमिरन धरती॥ 
को घरि पद गह पंथ बहूरे । रहि धूरे भए पंथी दूरे ॥ 
इस प्रकार वधु कभी प्रियतम का ध्यान करते हुवे, मन में चिंता धरते उनका स्मरण करती । कि जाने किस घडी  उनके चरण मार्ग पकड़ेंगे और वह वापस लौटेंगे । जो वधु  के निकट थे अब वह दूर के पथिक हो गए हैं ॥ 

बहुरत प्रियतम बहुतहि दिन पर । कबहु दस कबहुक पञ्च ऊपर ॥  
दिवस जात मुख अंत प्रभा से । प्रिय पपिहा से प्रेम पिपासे ॥ 
और प्रियतम बहुंत-बहुंत दिनों के पश्चात लौटते कभी दस दिन तो कभी पांच दिन ऊपर हो जाते । लौटते तो जैसे दिनभर का परिश्रम कर दिनान्त पर लौटती प्रभा और पपीहा के जैसे प्रेम के प्यासे रहते ॥  

ते बखतै धिय लै अरूनाई । रूप संपद के मह निधि पाई ॥ 
कंठ कलित कल केरि हुँकारे । मोह मुदित पितु गोदि उछारे ॥ 
उस समय बालिका बाल मुकुन्दनी ( कुछ मास की अवस्था को प्राप्त हो ) लावण्यता लेकर सुरूपता के महा भंडार से युक्त हो गई थी ।। उसका कंठ मधुर हुंकार भरने लगा  । और पिता  उसके बाल स्वरूप में मोहित होकर गोद में लेकर उछालते ॥ 

कोमल तन जल मल अन्हवाएँ । लइ पुर पन नउ बसन पहिनाएँ ॥ 
माइ करत कुम कुम सिंगारे । लोचन पथ पल मल मसि डारे ॥ 
उसके कोमल तन को जल से मल मल कर नहलाते । और नगर के हटवार से नए वस्त्र लाकर उसे पहनाते । माता कम कम का श्रृंगार करती ।  दृष्टि क्षेत्र एवं पलक आच्छादन को मल कर काजल  लगाती ॥ 

 मुख उचारित जब अति मृदु बानी । मधु मिस जनु खग कूजन सानी ॥ 
कटि किंकिन कल कर पद जोरी । चरि घुटरुन माई तृन तोरी ॥ 
जब वह मुख सी अति कोमल वाणी का उच्चारण करती तो वह मदरस से मिश्रित होती और ऐसी प्रतीत होती मानो कोई पक्षी चहचहा रहा हो ॥ 

धौली अरुन धिय गोद गहि, जनी पवित पय पाए । 
किलकत इत उत दोल रहि ओदन मुख लपटाए ॥  
श्वेत उस पर अरुणाई लिए हुवे वह बाल मुकुंदिनी गोद में भरी  का प्रेमरस प्राप्त कर मुख में भात लपटाए  किलकारी करते हुवे इधर-उधर डोलती फिरती ॥ 

शनिवार, ० ६ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                

एहि बरसहु जन नंदित दीठे । कृषि करमन पन श्रम पद पीठे ॥ 
हरी भरी भइ भूमि पहारे। सरस सरिल सर सरिता सारे ॥ 
इस वर्ष भी  कृषि कार्य, व्यापार श्रम आदि के पदों पर आसीत पुरजन सुखी व् आनंदित दिखाई दिए। भूमि पहाड़ हरे भरे हो गए सरोवर सरिताएँ अधिकाधिक जल धरान किये हुवे थे ॥ 

बास पुरी सुख देत सुहाई ।  रहि सब सुख प्रभु के प्रभुताई ॥ 
भोर भास् सन नयन मिलाई । साँझ सुरंगत सीस नवाई ॥ 
निवास नगर सुख देता हवा अत्यंत सुहावना प्रतीत होता । यह सब सुख एश्वर्य प्रभु की प्रभुता ही थी ॥ भोर में भानु के संग नयन मिलाते संध्या को सुन्दर रंग से युक्त होकर नगरी नत मस्तक हो जाती ॥ 

तापस के बस तापि दुपहरी । तपन तरंगन तन पौ पहरी ॥ 
तपनोपल अवतरे अवनि तल । जलधि चरण चल जोए गगन जल ॥ 
ग्रीष्म ऋतु के वशीकृत होकर दुपहरी तपती । ताप की तरंग धरे तन पर गर्म हवाओं के वस्त्र पहनी रहती ॥ सूर्यकांत मणि जैसे धरती पर ही अवतरित हो जाते और सागर पर पद संचारित कर गगन में जल संचित करते ॥ 

जल सुत सारी बहु सुख धारी । झनझन चहुँकन बरखी बारी ॥ 
अरन बरन कंचन कन जाई । खेतन खलिहन भू हरियाई ॥  
जल के इन मोतियों को एकत्र करते हुवे अत्यधिक सुख ग्रहण की हुई बरखा झन झन करती चारों और बरसती ॥ इन जल के कानों को ग्रहण कर खेत खलिहान की भूमि हरितमय हुई, सोने जैसे अन्न के कानों को उपजाती ॥ 

सीत काल तरि चरि चौबाई ।  रयनि अगनि भै बहु सुखदाई ॥ 
गहनि रयनि कर जल भरि लाईं। तनि रतिगर तनि साँझ धराईं  ॥ 
फिर शीत ऋतु अवतरी और चारो और शीतल हवा बहने लगी ।रात्रि में अग्नी बहुंत ही सुख देती । रात गहरी होती तो हाथों में ओस के कण भर लाती और थोड़े प्रभात को एवं थोड़े से संध्या को दे देती ॥ 

सहस मौली मुर्धन जब, निरखत तीनौ लोक । 
श्रव्य दृश्य कबित्त रचे सृजन समहित श्लोक ॥ 
जब सहस्त्र मस्तक धारी प्रभो जनन्नाथ की कृपा दृष्टी तीनों लोको पर रहती है होती है तब श्रिष्टी श्लोकों को संग्रहित कर दृश्य एवं श्रव्य काव्य की रचना करती है ॥ 

रविवार  ७ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                    

रहहि सब सुख बधू ससुराई । लाभ लब्ध कर काम कमाई ।। 
धिहा बिहावन चिन्तति माई । राम जोग जुग लागि सगाई ।। 
वधु के ससुराल में सभी प्रकार का सुख व्याप्त था,हाथ में काम था कमाई थी और उससे लाभ भी प्राप्त होता ॥ पुत्री के विवाह हेतु माता चिंता करती सो राम जी के जोड़ी मिलाने से पुत्री की सम्बन्ध भी ठहर गया॥ 

जे कर उजबल मन मल हीना । दया सील दृग दरसत दीना ।। 
जह सम सुख दुःख भाउ अभावा । तह गृह जन श्री श्रिय के पावा ।। 
जिसके कार्य उज्जवल एवं ह्रदय मलिनता से विहीन हों और दृष्टि दया शील हो जो दुर्दशा गर्स्तों पर कृपा बनाए रखती हो । जहां सुख दुःख एवं भाव/सम्पन्नताएवं अभाव/ विपन्नता  को समान दृष्टि से देखा जाता हो उस गृह के लोग सदा श्री के कल्याण को प्राप्त होते हैं ॥ 

उहाँ बधू के मइकें ताईं । लब्ध नाम लखि लाभ रिसाईं ।। 
जदपि धरम के चारन चारी । रहहि सकल जन कृपा धिकारी ।। 
उधर वधु के मातृ-निवास में के निमित, पारिवारिक प्रतिष्ठा अपेक्षित उद्देश्यों को प्राप्त नहीं हो रही थी और ( कमाई से ) लाभ भी जैसे रूठ गया था ॥ यद्यपि गृह  धार्मिक आचरणों पर चलने वाला था  और गृहजन समस्त कृपाओं के पात्र थे ॥ 

प्रथमै मातु भइ देहि अन्ते । तात ह्रदय रहि घात गहंते ।। 
तिस पर अरु एक रोग लगाईं । पखा घात तन पा पैसाईं ।। 
पहले ही माता का देहांत हो चुका था । और वधु के पिटा को ह्रदयाघात का रोग भी था ॥ उस पर उन्हें एक और रोग ने पकड़ लिया, पक्षाघात ने भी उनके शरीर में अपने पाँव पसार लिए ॥ 

पीरत कसकत तात किए बास अरोग निकाइ । 
दोउ भ्रात सह भोजाइ, सेवा धरम निभाइ ।। 
कष्ट पाते कसकते हुवे पिता का  चिकित्सालय में निवास हो गया। वधु के दोनों भ्राता तथा साथ में दोनों भावज अपना सेवा धर्म निभा रहे 
थे ॥ 

सोमवार, ८ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                                

पितु उदन्त श्रुत बधु भरि छाँती । गइ प्रिय सन जेहिं तेहिं भाँती ॥ 
नलिन नयन जब तात निहारे । नीर निहार पलक परिहारे ॥ 
पिता का समाचार सुनकर वधु भरे ह्रदय से प्रियतम के साथ जैसे तैसे करके उअनके पास गई ॥ नलिन जैसे नयनों ने जब पिता को निहारा तो पलकें जल की बूंदों का त्याग करने लगीं ॥ 

दरस दसा तिन जी भर रोई । सोक मगन बहु नेहत सोई ॥ 
प्रथमहि प्रिय कर जननी खोई । ताके दुःख रहि हिरदै गोई॥ 
उनकी दशा देखकर और शोक मग्न होकर उनसे स्नेह करती वधु जी भर कर रोई । वधु पहले ही स्नेह रखने वाली जननी को खो चुकी थी और उनका दुःख हृदौ में दबाए हीन थी ( ऊपर से पिता की यह दशा व्याकुल करने वाली थी )॥ 

भयउ बाम जब दिरिस बिधाता । परे बैर तब आगिन गाता ॥ 
देहातीत ऐहि संसारा । सुख सुभाग सब होहिं दुखारा ॥ 
जब विधाता की दृष्टि विपरीत हो जाती है तो सबसे पहले इस देह ही से बेर करती है ॥ देह के रहित भी इस संसार में समस्त सुख-चेन और धन-मान  दुःख के ही समान हो जाता है ॥ 

रोग घात भै दुःख के जातक । काल कल्प कुल के सुख पातक ॥ 
मात पिता जिन जन के छाहीं । तिन्ह धूप के चिंतन नाहीं ॥ 
रोगों का प्रहार दुखों का उत्पादक है जो प्राणों का शत्रु और परिवार के सुखों का नाशक है ॥ जिन परिजनों के ऊपर मात-पिता  की छाँया रहती है उन जनों सुख-दुःख रूपी धूप की चिंता नहीं सताती ॥ 

भई सबहि कुल के संताना । मातु धरा पितु गगन समाना ॥ 
मात रहित जे जातक जाती । होहि ऋन ते चरन धन धाती ॥ 
कुल के समस्त संततियों हेतु माता धरती के समान और पिता गगन के समान होते हैं । जो संतानें माता विहीन होते हैं उंके चरण धरणी की युक्ति से निर्युक्तक हो जाते हैं ॥ 

जनिक जननी जनयित कर, तिन्ह के सुख असीस । 
जनम जीवन सफल करै, होहि जिन्ह के सीस ॥ 
जन्म देने वाले मात-पिता का श्री कर और उनका सुख आशीष, जिन संतानों के सिर  पर होता है, उनका जन्म एवं जीवन सफल हो जाता है ॥ 

मंगलवार, ९ जुलाई,२ ० १ ३                                                                                      

चहही तहही धिय लहि दूरें । मात पिता के पुत रहि धूरें ॥ 
जगत बिचित्र बिधि रचित समाजू । दान गहइ कर बर लघु दाजू ॥ 
चहेती होने पर भी बेटियाँ मातापीता से दूर होतीं हैं और पुत्र निकट होते हैं ॥ इस जगत में समाज ने विचित्र नियम बना रखे हैं दान ग्रहण 
करने वाले हाथ बड़ा होता है और दान देने वाला छोटा ॥ 

अस सुमरत बधु दृग जल झूरे । दुमन प्रिया ले पिया बहूरे ॥  
पैस भवन लिए तनिक अहारे । लइ उपबहरन सयन  सहारे ॥ 
ऐसा ध्यान करते वधु के लोचन में जल अश्रु आ गए । और दुखित प्रिया को पीया अपने साथ लेकर घर वापस लौट चले ॥ घर में प्रवेश किया और थोड़ा आहार लिया । फिर शयनिका और तकिये का आश्रय ले लिया ॥ 

पितु धन वैभव बधु दृग दीठे । पुरजन आसन बर पद पीठे ॥ 
दीन दया करि दानन दिन्हे । सकल पितु के नाम धर चिन्हें ॥ 
पिता  के धन संपती का वैभव, वधु के आखों देखा हुवा था । नगर जनों ने ने सम्मान रूपी उछ आसन में उन्हें बैठा रखा था ।। वे दिनों पर दया करते और यथा योग्य दान सहायता करते । पिटा को सभी लोग उनके नाम से पहचानते थे ॥ 

भोग तिस्न जग  बिषय बिलासे । अस पितु मति मह रहि न ललासे ॥ 
सरल सहज गृह  भोजन भेसा । लब्धिहि लोलुप रहहि न लेसा ॥ 
सांसारिक भोगों की कामना और इन्द्रियार्थ विलासिता की लालसा पिता के मस्तिष्क में कभी नहीं रही ॥ सामान्य सा घर, साधारण भोजन और उनकी वेश भूसा भी सहज ही थी। उपलब्धियों की लोलुपता उनके मन लेश मात्र भी नहीं थी ॥ 

तेहि दिवस पितु पर अनुरागी । सकल रयनि मृग नयनी जागी ॥ 
नींद रति रत अलसत भोरे । दोइ ओस कन पलकन छोरे ॥ 
उस दिन हिरन जैसी आँखों वाली वधु ने  पिता के स्नेह से आसक्त होकर सारी रात जागरण किया ॥ पौ फटते समय ही निद्रा पर आसक्त होते हुवे दो ओस रूपी अश्रु के कणों  को पलकों के कगार पर लिए उससे अनुलग्न हुई ॥ 

लावन लोचन लोइ, लखत ललामिन नलिन दोइ । 
मुकुलित मनुहर सोइ, मुख सरुवर वरे जल सुत ॥ 
लाल लोचन  लावण्यता लिए दो लाल कमलों के जैसे दर्शित हो रहे थे वे अधमुँदे कमल स्वरूप लोचन अत्यधिक मनोहर प्रतीत हो रहे थे । सरोवर रूपी उस मुखड़े पर उक्त नयन कमल अश्रु रूप में ओस सवरुप में मोतियों को वरण किये हुवे थे ॥ 

बुधवार, १ ० जुलाई, २ ० १ ३                                                                                        

बयस बिरध तन लहत कुरोगे। जाने पितु को करनी भोगे ॥ 
पाछिन के करि आगिन आईं । आगिन  के धरि पाछिन पाईं ॥ 
वृद्धावस्था में शरीर को  दुष्ट रोग ने पकड़ लिया था । पता नहीं वधु के पिता कौन सी करनी भुगत रहे थे ॥ पीची के कर्म कभी आगे आ जाते हैं कभी आगे के कर्मों का भोग पीछे ही प्राप्त हो जाता है ॥ 

गहन लखन गह बैद निवासे । जितै दिन कहि उतै दिन बासे ॥ 
लीख कहत सत औषधि लवने । दइ अवकास तौ निज गृह गवने ॥ 
वैद्यशाला में पिता गहन निरिक्षण में रहे वैद्य ने जितने दिन रहने का परामर्श पिता ने उतने दिन वहां निवास किये ॥  परामर्श के अनुसार यथोचित औषधियाँ ली । और जब अवकाश दिया तो अपने निवास चले आए ॥ 

भ्रात किये बहुत सेउकाई । करहि जोग दोनउ भोजाईं ॥ 
घटनाबली तुर जुग मिलाईं। बर बहिअर के  जीवन ताईं ॥ 
वधु के भ्राताओं ने पिता की बहुंत सेवा की । दोनों भावजों ने भी देखभाल की ॥ घटनाओं के क्रम ने बड़ी ही शीघ्रता पूर्वक वर वधु के जीवन से बड़ी ही शीघ्रता पूर्वक योग मिलाया ॥ 

बरस दिवस पहरइँ सिरु नाई । काल कवल तनि घरी बिहाई ॥ 
एक बरस तेइ जात न जाने । एक एक दिन मनु पल पल माने ॥ 
वर्ष और दिवस को पहरों ने प्रणाम किया । और समय के ग्रहण करने के कारण वश किंचित घड़ियाँ समाप्त हुई । एक वर्ष कैसे  व्यतीत हवा उन युगल दम्पति को ज्ञात ही न हुवा ॥ एक एक दिन मानो एक एक पल के समान था ॥ 

रूप निधि मुख पर सँजोई, भोजन देही पोष । 
धरि धिया बयस कर एक, काल ग्रंथि बय कोष ॥   
मुख पर सुन्दरता का आगार सँजोए और भोजन द्वारा देह का पोषण कर पुत्रिका ने एक स्वास्थ वर्द्धक वर्ष को अपने आयु कोष में ग्रहण कर लिया ॥  

गुरूवार, १ १ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                           

पद पत केसर कर मुख लाला । आकर घर कर कमलिक बाला ॥ 
उदर भीतर गहि नाभि नाला । जननि जनि तेहि सीतल काला ॥ 
पाँव पत्र और पाणि केसर के सदृश्य एवं लाल मुखाकृति कर उस कमल जैसी बालिका ने घर को कमलाकर कर दिया था ॥ जिसकी नाभि नाल को उदार में धारण कर उसकी जननी ने उसे शीत काल में जन्म दिया था ॥ 

नयन कमल कस कामिनि काखी । नउलि पल्लवन पलकन पाखी ॥ 
धौल सुरंगन अंगन रंगे । सरिस सीतर धूप कर संगे ॥ 
कमल नयन पर सुन्दर भौं कसी हुई थी । और पलक नव पल्लव के पंख के सरिस थी ॥  उसके अंग-प्रत्यंग श्वेत रंग के सह सुन्दर लाल रंग में अनुरक्त हुवे ऐसे प्रतीत होते मानो शीतल धूप में किरणों के कण घूले हों ॥ 

मुग्ध मुचक मुख अधर मुखरिते । जनक जनी दौ धूनि धवनिते ॥ 
धवनि धिया मुख लागत कैसे । प्रभु वंदन नीराजन जैसे ॥ 
सुकुमारता को प्राप्त हुवे मुख के अधर  शब्दायमान हो उठे जो माता-पिता स्वरूप में दो शब्दों का उच्चारण करने लगे ।। बिटिया के मुख से वे शब्द कैसे लगते जैसे की भगवान की वन्दना-आरती ही हो ॥ 

नीरद छादन दुइ रद झांके । सुकुति भवनु मनु मुकुतिक लाके ॥ 
लाल रसा प्रेम रस रसियाए । अन कन ओदन लवन लसियाए ॥ 
दन्त रहित अधरों की आड़ से दो दन्त दर्शित होने लगे । मानो मुख रूपी सीप में दो दन्त स्वरूपी मोती चमक रहे हों ॥ लालिमा ली हुई जिह्वा माता के अमृत रस का स्वाद लेकर अन्न कणों, नमक भात की लालसा करने लगे ॥  

चहचहत चिरिया चुनचुन, किलकत खेलत केलि । 
उपबन बाल सुमन बने , बेलि बेलि तरु बेलि ॥ 
चिड़ियों के जैसी आनंद भारी बोली लिए वह बालिका किलकती अटखेलियाँ करती । उपबन के नन्हे पुष्प उसके मित्र बन कर वृक्ष से बेलों के सदृश्य लिपट जाते ॥ 

शुक्रवार, १ २ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                              

जेई दिन दृग दरसन जोईं। तेई अगूत होए अगॊई ॥ 
जन्म दिन भै बरस धर पूरे। छा छबि धिय मुख भूरहि भूरे ॥ 
दृष्टि जिस दिवस के दर्शन की प्रतीक्षा कर रही थी । वह दिवस सम्मुख प्रकट हुवा ॥ वर्ष पूर्ण होने पर जन्म दिन आया । और ( एक वर्ष को होने पर) बालिका के मुख की शोभा और अधिक बढ़ गई॥ 

सीस सिखर जे कुंतल कूरे । उर भए पउने गवने दूरे ॥   
ऐसेउ रूप लहत रुराई । दरसत हाँसे सुमन सहाई ॥ 
उसके शीश पर जो केश राशि थी । उस राशि का दो तिहाई अंश उड़ कर कहीं दूर चला गया ॥ बालिका इस प्रकार के सवरुप में भी उसका रूप सुन्दर लगता । उसे उड़े हुवे केश भूषा में  उसके साथी बने हुवे सुमन उअसे देख-देखकर हंसते ॥ 

माए नउलि झगुली कर धारी । कली कलापक कारि कगारी ॥ 
भाउँति मनु तन लै पिन्हाई । एकटक रहे नैन पट ताईं ॥ 
माता के हाथों में नई झाबली थी । जिसके किनारियों एवं करधनी में कलियों की कलाकारी की गई थी ॥ मन को बहाने वाली उस बालिका को वह झाबली पहनाई गई ॥ नयन के पलक सथिर होकर उसे तकते रहे ॥ 

देवत हूतहि सकल बुलाईं । प्रिय पुर जन पिहरन ससुराईं ॥ 
कमल छबि मुख मौलि मह माई। तूल तिलक दुति निंदत लाई ॥ 
आमत्रण देते हुवे नगर के प्रिय जनों को पीहर और ससुराल से सबको बुलाया गया ॥ कमल की शोभा से युक्त मुखोपर  के माथे पर महामाता ने द्युति की भी निंदा करता हुवा लाल तिलक लगाया ॥ 

बर भेसु बनाई,नयन सुहाई, अरन बरनक्रम बरनै । 
मह पितु सह माई,धिय परनाई, मंदिर भगवन चरनै ॥

जोती उजयारी, पूजन कारी, मधुरपरक अधर धरे । 
पा पितु महतारी, कनी कनियारि, परसाए पद आपने ॥  
नयनाभिराम स्वरूप में सुन्दर रूप धरे अक्षर, वर्णों के क्रम से बने चित्र रूप में वर्णन रूप में बालिका के इस रूप का वर्णन कर रहे हैं ॥ पितामह एवं मातामह ने प्रभु के मंदिर में उनके चरणों में पुत्रिका का प्रणाम अर्पित किया ॥ जयोति प्रज्ज्वलित की पूजा अर्चना की, और अधरों से चरणामृत ग्रहण करवाया ॥ फिर जब माता-पिता  ने गोद में लिया तब उस कनकचम्पा स्वरूप कन्या ने देवी रूप में 
अपने चरण स्पर्श करवाए ।। 

मधु धूर धान कन मेल, गौ रस सारे क्षीर । 
सकल बाल उपवन खेल, लखे लोचन अधीर ॥  
 उद्यान में क्रीडारत रहने  के पश्चात सारे बालक शर्करा,चावल के  मिश्रण  और गाय का दुग्ध ग्रहण की हुई क्षीर को लालसा भरी हुई आँखों से देख रहे थे ॥ 

शनिवार, १ ३ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                  

वातारि दूध जुग दल द्राखा । तीख गंध कर केसर राखा ॥ 
खीर पूरी पो पूए पकाईं । लाग लगन जुग लोग लुगाईं ॥ 
बादाम से युक्त उस दूध में दाख मिलाई गई थीं । और छोटी इलायची एवं केसर से सुपोषित थीं । ऐसी क्षीर के साथ घर के सभी स्त्री-पुरुषों ने बड़े ही लगन पूर्वक मिलजुल कर पुड़ियाँ बेली और पूवे पकाए ॥ 

तेज पुहुप पत पूरिक लावन । तीख गंधा  रति रस भरावन ॥
दलित दाल दल तैल तिराई । पिष्ट पाक भित कनक सनाई ॥  

लवण-कचौरी, जिसमें लौंग, तेजपत्र, अजवाइन से युक्त  चटपटा भरावन  जो की दली हुई दाल-समूहों ( मूंग-मूठ उड़द आदि) के साथ  तेल में बघारा हुवा था जिसे  महीन गेहूं के गुँधे हुवे आटे की लोइयों में अनुलग्न कर  कडाही में तला गया ॥  

कहे रहि पिस पिस पिसन हारे । बड़ भारी जन दिवस तिहारे ॥ 
पन पन पंगत निकसत भीते । अन्न धन्न दे गाहक जीते ॥ 
पिसने वाले जब पिस पिस कर हार गए तो कहने लगे यह तुम्हारा जन्म दिवस भी न्यारा ही है॥ आवारिकाओं की पांतों से  पंक्तिबद्ध होकर विक्रेता बाहर निकलते और सेवा पूर्वक अन्न धन्न  दे कर ग्राहक का मन जीतते ॥ 

सब बालक सौ बधु धर थारी । खीर पूए सन पुरिका घारी ॥ 
बाल मुकुंद रसिक रस राधे । तूर चूर भरपूर सुवादे ॥ 
वधु ने सभी बालकों के सम्मुख थालियाँ रखीं क्षीर, पूड़ी के साथ कचौडियाँ परोसी । बालकों ने तत्काल ही कचौड़ियों को तोड़ कर उसके  स्वादिष्ट रसों के  स्वाद का आनन्द लिया । 

साध सकल एक बालक लौना । कहत सकुचित तनिक  अरु दौना ॥ 
असन रसन मुख अधर मधुराए । भरे भू भवन सबहि पहुनाए ॥ 
जब एक सुन्दर बालक ने सारा भजन समाप्त कर दिया तो संकोच करते हुवे कहने लगा किंचित और दो ना ॥ भवन में जितने भी अतिथि थे सभी ने उक्त भोजन के रसों का अपने मुख अधरों से स्वाद लिया ॥ 

उदित मुदित छुधा निवृते, तिसत तोए मुख धार  । 
पाछून पाहून बिदा लिए, धिय के कर दै उपहार ॥ 
भूख शांत करके सभी प्रसन्न चित होकर उठे और प्यास को जल धार कर शांत किया । तत पश्चात अतिथियों ने पुत्रिका के हाथों में उपहार देकर विदा ली ॥ 

रविवार, १ ४ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                        

तटी तरंगित  गहि रहि रनियाँ । कबहु कोउ कबहुक को कनियाँ ॥ 
उपबन खावन खेलन खोई । ते दिन धी बहु नंदत सोई ॥ 
सुख और आनन्द से भरपूर रानी के जेसीइ पुत्रिका कभी किसी की गोद में तो कभी किसी की गोद में रही ॥ इस प्रकार गृह उद्यान में खेल-खाकर वह उस दिन बहुंत ही प्रसन्न चित मुद्रा में सोई ॥ 

भोर भई रय रयनि बिहाई । सरित चरन धर नगरि नहाई ॥ 
प्रात स्नात प्रिय गत सयनिका । मुख चुम्बत सुती पलन पुतिका ॥ 
रात समाप्त हुई और भोर हुई, सरिता में चरण उद्धृत किये सारी नगरी नहाने लगी ॥ परत: स्नान आदि के पश्चात प्रियतम शयन सदन में गए । और पलंग पर सो रही पुत्रिका के मुख पर चुम्बन अंकित किया ॥ 
  
 दरसे वधु के मुख ससि सोभा । खावन अँगार पी मन लोभा ॥ 
जुग अरु अंबर प्रान समाई । जावन प्रीतम लिये  बिदाई ॥ 
वधु की श्री मुख पर चंद्रमा की  शोभा का साक्षात्कार हो रहा था । चूँकि चकोर अंगार भक्षी है अत: पीया का ह्रदय भी अधरों पर के अंगारों की लालसा करने लगा । नयनों और अधरों को प्राण समा के अधरों से संयुक्त करने के पश्चात प्रियतम ने स्थापना  स्थली में जाने हेतु विदाई ली ॥ 

भए पट दौ पल नयन दुआरे । पूर उघारे पिया  निहारे ॥ 
दृग दर्पन दरसन छबि धारे । भए दरस तीत तब पट ढारे ॥ 
दो पलकें नयन भवन का द्वार हो गईं । जो पूर्णतया अनावृत होकरप्रियतम को निहारने लगी ॥ नयन दर्पण में प्रियतम  दर्शन की छवि को धारण किया और उनके दर्शानातीत होने पर द्वार बंद कर लिया ॥ 

हियरा हूते दौ दीठ, गवने प्रीतम पीठ । 
पर हरिदै बहुरे नहीं, बहुरी बहुरी दीठ ॥ 
ह्रदय को दो  ने आमंत्रण दिया,  और  प्रियतम के पीछे हो लिए । नयन तो वापस लौट आए, किन्तु वधु का ह्रदय वापस नहीं लौटा ॥ 

सोमवार,१ ५ जुलाई, २०१३                                                                                         

गवने तौ लघु बहिन बिहावन । बहुसहि  चिंतन रहि प्रिय के मन ॥ 
यतन जतन कर कारज सोई । सुरतत रहि तँह कोइ न कोई  ॥ 
गए तो प्रियतम के मन मस्तिष्क में छोटी बहिन के विवाह की बहुंत चिंता रहती । उससे सम्बंधित कोई न कोई युक्तियुक्त कार्य सम्पादन हेतु मनन करते रहते ॥ 

देवन द्रव धन दान दखीना । जोवन लगि रहि भाइहि तीना ॥ 
सब सँजोइ जूत जोइ जोऊ । को पुरतित भै अध भै कोऊ ॥ 
उपहार सामग्री एवं दान दक्षिणा देने हेतु उसके प्रबंध में तीनों भी लगे रहते । सभी साथ में दान योग्य सामग्री को संगढ़ित करते हुवे विवाह की तैयारी में जुटे थे । कोई तैयारी पूर्ण हो चुकी थी कोई शेष थी ॥ 

जोगवना जे धन पत पाईं । तेहि तात लै प्रिय कर दाईं ॥ 
तनि तिथि पूरित तानी रहि सेषा । जे रहि लावन भूषन भेषा ॥ 
वह पत्र स्वरूप में जो धन संचित था, पिता ने उन्हें प्रियतम के हाथ में थमा दिया //  उनमें से कुछ की तिथियाँ पूर्ण हो चुकी थी और कुछ की अवधि पूर्ण होनी शेष थीं // जो वसन -भूषण के क्रय करने हेतु था //

गवने ले पत जोग प्रयोका । दवने सत परखत अवलोका ।। 
असन  बसन क्रय कार पूरिते । निज रुचिकर को वर पख कहिते ॥ 
प्रियतम उन अवधि शेष पत्रों को लेकर महाजन के पास गए जिसको महाजन ने देख परख कर उसका  उचित मुल्य लिया \\ भोजन-वसन क्रय करने का कार्य पूर्ण हो गया जो कुछ तो वर पक्ष की रूचि के अनुसार था तथा कुछ अपनी रुचिनुसार था //

लागे लगन जथा जोग, परिजन सोहनु साज ।
आपन सम अर्थ पूरित, करत रही सब काज ।।   
विवाह की यथा योग्य शोभा सुश्रुता में परिजन लगे थे ,सभी अपने अपने सामर्थ्यानुसार,  कार्य कर रहे थे //