Tuesday, January 1, 2013

----- ।। बर-अहोरा बधु-बहोरा ।। -----

पद्य पद्य पथ पत पत पावा । सुर रूर नूपुर नत नत नावा ।।
कहत कोपलि कुसुम के काना । निरखु सुरनारि तवहि समाना ।।
उपवन के पथ के कगारों पर की पंगडंडियों पर चलते सुन्दर स्वरमय नूपुर से युक्त पाँव को पत्ते अवनत होकर प्रणमन कर रहे हैं | कोपलियाँ कुसुम के कानों में कहती हैं देखो इस देवांगना को यह तुम्हारे ही समदृश्य है | 

 पल्लव पव रव काननचारी । फिरि भुजि बंधन उपरन धारी ।।
उरि उरि बहु फुर कार कुराई । अगिन उठाई पछिन ढहाई ।।

 पद चाप से पवनमय पल्लवों में मधुर ध्वनि उत्पन्न करती  वह उपवन में विचरण कर रही है  भुजा बंधों उपरन धारण किए इधर-उधर भ्रमण करते ह हुवे उडते उपरन  को आगे से उठाकर पीछे ढहाती है जिससे उसपर की हुई फूलकारी एकत्र होकर उपवन में उपवन की सी शोभा दे रहे हैं  | 

पद अनुगमन पव अलक अलिके । पावन ढूँढ़इ पल झलकि पी के ।।
मृगदृगि कहँ बन साजन बूझी । अरुन अरुन बन अरुरै सूझी ।।
मस्तक पर के अलक पवन के पदानुगामी हो रहे हैं  प्रीतम के एक पल का झलका प्राप्त करने हेतु प्रीतम को ढूंढती,  मृगलोचनि ने  उपवन से पूछा  साजन कहाँ हैं ?प्रीतम की  झलकी न देकर संध्या की अरुणिमा से अरुणित उपवन को कष्ट देने की ही सूझी है  | 



 हँसि कौसुम गहि पिय कर बाहीं  । अगहुन पठाहि पछिन बैसाहीं ।।
अरन दर्पन दरसन दरसाएँ । तरस न धराएँ दरस न कराएँ ।।
प्रीतम की भुजाओं को गहे कुसुम हास-परिहास करते कभी उन्हें आगे भेज देते कभी पीछे बैठा देते | जल दर्पण का दर्शन हो रहा है किन्तु कौसुम  प्रिया पर तरस नहीं करते हुवे  उसपर प्रीतम की छवि का दर्शन नहीं करवाते |  

जल बिनु मीनु जस अस तरपाएँ । मनु दुबर दुइ आसार सिराएँ ।।
मरू मृग तिसने तोय पियासे । लभ बल्लभ दइँ दकन अकासे ।।
वधु को जल बिन मीन के जैसे  तड़पाते हुवे वह  मानो दुबले पर दो आषाढ़ समाप्त कर रहे थे | मरुस्थल में जिस प्रकार मृग तृष्णा को जल की प्यास होती है उसी प्रकार वधु को वल्लभ के दर्शन की प्यास है और वह मरीचिका के जल प्रतिबिंबि में आभाषित स्वरूप में प्राप्त हो रहे हैं 

दरस न दैं देइँ तरपन दर्पन दरपन तार ।
दयित न दयित दुखन दुगन दुलहन दरस अधार ।। 
मृग मरीचिका का दर्पण  प्रियतम का दर्शन न देकर तड़पन दे रहा है  | नवब्याहता को प्रियतम के दर्शन की आस है और वह उसे प्रियतम को न देकर उनके अदर्शन का  दुगुना कष्ट देते हैं | 

बुधवार, 2 जनवरी, 2013                                                                       

फूल मूल फल तरुबर बृंदा  ।  अलापत अलि पिय लुपुत नदिंदा  ।।
एकै गाँछि तुर लवइ लुकाठी । कर तल धरै गहै लइ गाँठी ।।
फूल मूल फल एवं वृक्षों का श्रेष्ठ समूह तथा नदी  तट के आलाप करते भौरों ने पिया को छुपा रखा है तत्पश्चात वधु ने एक वृक्ष की टहनी  को तोड़कर उस हथेली पर लेकर उसे अँगुलियों से आबद्ध कर लिया  ।।

 सार दुइ चार लगाए सोंटे । धूरि ध्वज धाए धूरि ओंटे ।।
पिछु पिछु सुमन पंख सुकुवाँरे । घुरइ सुकुरै भय के मारे ।।
और सार कर हवा में दो चार सोंटे लगाए जिससे धुल से अटी वायु  तिव्र गति से 
दौड़ने लगी  ।वायु  के पीछे पीछे भागते भयभीत होकर पुष्प के कोमल पंख भी सिकुड़ कर प्रिया को घूरने लगे । 

ताड़ तिरछ करि दृग कोदंडे । गंध मदनि रँग कोमलि गंडे ।।
कास मुठिक मुठ लकुटि उठाई । मृदुल अधर सुमधुर हँसि छाई  ।।
पुष्प के भय युक्त मनोभावो का आभास कर वधु ने भंवें कुटिल करते हुवे 
दिखावटी क्रोध का प्रदर्शन किया । जिसके कारण उसके कोमल गाल लाख के 
रँग जैसे लाल हो गए । मुट्ठि में लाठी की मुठ कस कर ( ज्यों ही )
उठाई । ( त्यों ही ) उसके मृदुल  वधु के अधरों पर मीठा सुहास 
छा गया  ।

छाँड़ छरि धरि परिहर पारे । पुनि पुचकारत पुहुप बुझारे ।।
निज स्वास सुख  गंधन घोले । कुंज कुंज गुँज मंजरि बोले ।।
 उसने छड़ी को छोड़ दूर कही फेंक दिया । और पुचकारते हुवे फिर पुष्पों से 
पिया का पता पूछा |  अपनी स्वांस से  वायु में सुगंध घोलते हुवे वन वन में कुसुम मंजरी गुंजायमान होकर बोल उठी  -

रहसन रहस रहस रमन दयत देंय संकेत ।
उ बैसे तव मन भावन केत निकुंज निकेत ।।   
 दयावस प्रिया को प्रीतम  के स्वर्ग निवास का रहस्य चिन्ह देकर उनका 
पता बताते हुवे कहा कि वे बैठे तुम्हारे मन भावन, लतामंडप 
के नीचे केतकी के वास स्थान के निकट ।।

गुरूवार,  03 जनवरी, 2013                                                                  

तबहि तरुबर  छाँह तरियाई । पल्लौ बिच पिय  दियो दिखाई  ।।
हहरत चापत चरन धराहीं । धरकत हिय ते  पहुँचि पिय पाहीं ।।
तभी पेड़ की छाँव के निचे बैठे पल्लवों के मध्य पिय दिखाई दिए ।
प्रिया, पिया मिलन की उत्सुकता के कारण कांपते पद चाप व् धड़कते ह्रदय से  पिय के
पास पहुंची ।।

अदरस प्रियबर दरसन कैसे । मनु मन मंदिर देवहि बैसे ।। 
तन चितहर  रंग घनेरा । रोहि पूस रथ जनु घन घेरा  ।।
अदर्शित प्रियवर का साक्षात दर्शन कैसा है मानो मन के मंदिर में मन के देव 
विराजमान हों  पिया का विग्रह  चित को चुराते हुवे ऐसे गहरे रंग से रंगा है मानो बूंदों के रथ पर आरोहित बादलों का घेरा हो  ।।

चितब छबि जब चितवन जोरे । छिनु छित चित्र चित रेखन खोरे ।।
पिय हिय होरे खिंच लइ डोरे । दरस प्रगस सिँगार एकु ठोरे  ।।
पिया की छवि का दर्शन करते जब नैन से नैन मिले तब क्षण भर में ही छवि के कण बिखर कर 
ह्रदय पर रेखा उकेर चित्र में परिणत हो गए    ह्रदय चित्र पर स्थिर प्रिय को नयनो की डोरियाँ 
 खिंच कर साक्षात स्वरूप अर्थात निर्गुण रूप से सगुण स्वरूप में ले आईं ।  साक्षात 
दर्शन ऐसा है मानो सारा श्रंगार रस उस एक छवि में एकत्र हो गया हो ।।  
 
मगन प्रीतम  प्रियाहि निहारे । रुँधी प्रिया पट नयन  दुआरे ।।
अरुन रूप बिरहारति हारे । हिय दुखारे ते भए सुखारे ।।
प्रिय निमग्न हो प्रिया को निहार रहें है । प्रिया ने पलको से नयन रूपी द्वार को बंद 
कर लिया । अरुणमय रूप ने पिया की विरह पीड़ा को हरते हुवे दुखित ह्रदय को सुख-
मयी कर दिया ।।

झूर झूर पात कुसुम साथ मिलन मंडप सजावहीं ।
डारि डारि भरी फुरवारी घेर घारी सुहावहीं ।।
कर कल  कंगन लोलहि सुमधुर  सुर सरगम धारिके ।
 गहत लसित प्रीतम करषत कहत तनि उर सँभारिके ।।
 कुसुम के साथ पल्लव  झूल झूल कर मिलन -मंडप अभिमण्डित कर रहे हैं भरी पूरी शाखाओं से घिरी फूलवारी अत्यंत मनमोहक प्रतीत हो रही है | स्वरों की सुमधुर  सरगम को धारण कर कलाइयों पर कंगन हिल-डुल रहे हैं जिसे पकड़ कर खैंचते हुवे प्रियतम कहते हैं किंचित हृदय को संभाल रखिए | 

प्रतीति दूबि प्रीति पयस ते निलय कँचन थार ।
अवनत पलक अवलि परस लइ पिय चरन पखार ।। 
 अवनत पलकावली से प्रियतम के चरण-स्पर्श कर  ह्रदय के कंचन थाल में प्रीति के पयस व्  दृढ़ विश्वास की दूर्वा लिए  प्रक्षालन करते हैं  - ( आतिशयोक्ति अलंकार )

शुक्रवार, 04 जनवरी, 2013                                                              

पूछ कुसल कहिं पिय मम हीना । कवन बिधि बीते कहु तव दिना ।।
पूरे न दिन साँझ हो आई । पूरन देब तब दएँ कहाई ।।
और कुशल क्षेम पूछते हुवे  प्रियवर कहत्ते है  : - कहो तो मेरे बिना आपके दिन किस भांति व्यतीत हुवे ? अभी संध्या की बेला है दिवस पूर्ण नहीं हुवा है उसे पूर्ण होने दो फिर कह सुनाएंगे ( प्रिया ने कहा ) | 
हँसे पिय कहे का बात कही । हंसगमनि तक तव चातकही ।।
पियूख मयूख मुख परिहारे | पय पियास तज तवहि निहारे ।।
प्रियतम ने हंसकर कहा  : -- अहा ! क्या बात कही हे हंसगमनी ! तुम्हें तो चातक भी तकते हैं | चन्द्रमा के मुख का तिरष्कार कर स्वाति बूँद को त्याग वह तुम्हारे रूप का रसपान करते हैं | 

भनिति भीति भर रस सिंगारे । हास बीच कर करून कगारे ।
रूप गुन गिन कीर्तित कारें । पिय कविकर बर भाग हमारे ।।
श्रृंगार रस से परिपूरित भनिति में हास्य के मध्य करुण रस का आलम्बन लेकर हमारे रूप का गुणगान कर रहे हैं, अहो भाग !  प्रियवर कितने श्रेष्ठ कवि हैं | 

बैन बचन भरि बिंग नैनी । पुंख पुंगित फर श्रँगी सैनी ।।
भरे भर पूर उर इव भाथे । तव रन निबिरन बाहन नाथे ।।
नैनों के बाणों से व्यंग भरे वचन वो भी पंख की सघन राशि वाले ? जिनके संकेत स्वरूपी फल तीक्ष्ण हैं | तुम्हारा ह्रदय इन बाणों से भरपूर तूणीर है जो इस रण की रक्षा पंक्ति का सेनापति भी है | 
  
प्रेम ब्रम्ह नग निर्गुन रूपा । रूप सगुन गुनी अगिन सरुपा ।।
भेष भूषन भयउ बर भाले । बसन दसन धर दन्त कराले ।।
तुम्हारा प्रेम निर्गुण ब्रह्म स्वरूप में अदृश्य है तुम्हारा अलौकिक रूप अग्नि के स्वरूप में दृश्यमान है | तुम्हारी अभरित आभूषण सुन्दर भाले हैं और ये यह वेश भूषा उसके विकराल दंष्ट्र हैं | 

लव निमेष परमानु जुग कलप सर सिंगारि ।
मंत्र मुग्धा साध सजुग प्रियतम ह्रदय निहारि  ।।
तुम्हारा श्रृंगार लव,निमेष, परमाणु, युग और कल्प नामक प्रचंड आयुध हैं | जो प्रियतम को मंत्र मुग्ध कर उसके हृदय का लक्ष्य किए हुवे हैं |   

शनिवार, 05 जनवरी, 2013                                                       

देखहु रुर जुर उर उपरैनी । का हम लागत तव सों सैनी ।।
मति मंद गति धरि धूरिन धूमि । एहिं सुन्दर बन नहीं रन भूमि ।।
हमारे ह्रदय से लगी यह  सुन्दर ओढ़नी  देखो । क्या हम तुम्हें सैनिक जैसे लगते हैं ? 
तुम्हारी बुद्धि की वैचारिक गति  धूल-धूमिल होकर धुंधला गई है । ( क्यों कि )
यह सुन्दर उपवन है कोई युद्ध भूमि थोड़े ही है ।।

हे मृगनयनी हे पिक बैनी । बउर फुर भँउर पउँ मउरैनी ।।
कोर काय कर कंचन काँची । एहिं उपमति मन रंजन राँची ।।
पिया कहते हैं हे मृग के जैसे नयनों वाली हे ! कोयल के जैसी वाणी की स्वामिनी ।
बौर के फूलते ही अर्थात वसंत ऋतु में नृत्य करने वाली मोरनी । तुम्हारे हाथ के कगारे 
पर का स्वर्ण तुम्हारी काँच सी काया में प्रतिबिंबित है । क्या यह तुलना तुम्हारे मन 
को प्रभावित कर ( मेरे प्रति ) अनुराग के वर्द्धन के योग्य है ।।

ए उपजुगति अस लोगन जोगहि । रच्छन रत जौ बिरहा रोगहि  ।।
कटख कथन कस धँसि जस गाँसे । ररकत साँसे पिय बहु हाँसे ।।
इसका उपयोग तो ऐसे लोगों के लिए उपयुक्त है जो विरह की रोगजनित पीड़ा से 
रोग प्रतिरक्षा कर उससे निवृत्ति चाहते हों ।। ऐसे कसे हुवे कटाक्ष कथन ह्रदय में गाँसे 
के जैसे धंस गए । और प्रियतम त्राहि त्राहि कहते हुवे ( दिखावे स्वरूप ) अतिशय परिहास करते हैं  ।।

सायक लछ  लग पिय हिय माढ़े । तासु राग जुज  रंजत  गाढ़े ।।
अरसन परसन पिय अनुरागे । रति रूप पुहुप परागन लागे ।।
इस प्रकार प्रेम बाण लक्ष्य साधते हुवे पिया के ह्रदय में स्थित हो गए। और वह उसके अनुराग 
में रागान्वित होकर गहरे आनंद को प्राप्त हुवे । प्रीतम के इस अनुराग के स्पर्श प्राप्त कर 
उपवन के कुसुम भी रति का रूप लिए परागित होने लगे ।।

करत हास परिहास दुहु रसिक गमनहि कर गहि 
पेखत रास बिलास मंजरी मुद मुगुध मगन 
हाथों में हाथ लिए हास-परिहास करते क्रीड़ाप्रेमी युगल दम्पति टहल रहें हैं ।
और इस प्रेम-क्रीडा को पुष्प-मंजरियाँ आनन्द विभोर हुई 
मंत्र मुग्ध होकर  देख रही हैं ।।

रविवार, 06 जनवरी, 2013                                                          

भए दिन अंत दिन कंत सिराए । नदी नग नभ नव पट पहिराए ।।
बिखरेउ किरन सुमन सम सोंहि  | बहुरन अरुन रथ रबि अबरोहि || 
सूर्यास्त होकर दिन का अत हुवा । आकाश ने नदी, पहाड़ आदि को नव वस्त्र पहनाए ।। विकरित किरणे,  पुष्पों के सदृश्य प्रतीत हो रही है | सूर्यदेव लौटने हेतु अरुण रथ में आरोहित हो गए हैं 

आह एहि रंगबिरंगि रोरी | चले रबिहि पथ देउ रँगोरी | 
चौंक  सजाउ अगोहन साँझी  । बाँधै बहनु फिरत कहँ माँझी ।।
( सांझ के स्वागत में ) माँझी घर लौटने हेतु नाव बांधते मांझी कह रहे हैं चौंक सुसज्जित कर सांझ की अगवानी करो  

बिथिक बिथिक बिज बिचरहिं बाँके । धर बर कर बधु पटिका झाँके ।।
बिति पहर भै साँझ हो आई । बेर भयउ कहि देव बिदाई ।।
हवा में थके हुवे से पक्षी भी टेड़े-मेढ़े विचार कर रहे हैं । ( इस प्रकार का पहर देख ) वधु ने 
वर के हाथ बंधी घडी में समय देखा और कहा अब पहर व्यतीत हो रहा है संध्या हो आई है 
बहुंत देर हो चुकी अब हमें जाने  की आज्ञा दो ।।

नैन लगा गहनहि गाहे । निबियहुत नहि हम भए बियाहे ।।
कह गह लंपट लिपटइ लाहे रहिं गल बाहें बिथुरन काहे ।।
नयनों से नयन बांधे प्रियतम गहरे गोते लगाते हुवे कहा कि बिना ब्याहे थोड़े ही हैं 
बियाह हो गया हमारा ऐसा कह कर कामलुब्ध पकड़ कर लिपटाते हुवे मेलमिलाप 
कर आलिंगन करते हुवे कहा कि हम अब विलग क्यों हों ??

बही बियाहीं सागर सारें । पूर रीति जन पुनि नग धारें ।।
सरिस सुर सरित धरित पहारा । धरी तरीं तब ही तव धारा ।।
विवाह कर बहते बहते हम सागर रूपी पीया संग जा मिले ।  पुराइ  लोगों की पुरानी 
रीति निभाने हेतु   पर्वत पर अर्थात पिता के घर आए । अब तुम्हारी इस वधु रूपी 
गंगा को हिमालय धारे हुवे हैं । पुन जब धरा पर बहेगी तब ही यह गंगा की धारा 
तुम्हारी होगी ।।

फूल सइ प्रफुलित बारी बानि बानि के संग ।
चंद्र सइ रतियन कारी सजनी मैं किस अंग ।।
फूलो के साथ उद्या प्रसन्नचित है रंग के साथ चमक 
काली रात के साथ चाँद है हे! सजनी में किसके साथ मन रमाऊँ ??

चिठिया सँगत हरकारा आखर कारे रंग ।
बाँचि प्रिया कर धार के सजनी मैं किस ढंग ।।   
चिट्ठी के साथ डाकिया है अक्षर काले रंग के साथ ।
उसे  हाथो में रख प्रिया ने बांच लिया 
सजनी ये कहो मुझे कौन बांचेगा  ।।

सोमवार, 07 जनवरी 2013                                                                  

धूरि धरा धर निधान । धूली मूल संधान ।।
मूल तन तरुबर तान । तरुबरी डारि बितान ।।
धूल को धरा सहेज कर रखती है । धुल जड़ क साधे रखती है ।।
जड़ तरुवर(पाधे)  के तने को ताने रखता है । पौधा डाली को तान 
कर रखता है ।।
  
डारि डारि पात धार । फूर फुर पाति अधार ।।
फूर दल कोष कपाट । दल गंध उपबन पाट ।।
डालियाँ पत्तियों को धारण किय हव है । पत्तियों पर पुष्प प्रफुल्लित हो 
कर आधारित है । पुष्प पर उनका दल समूह संचयित है । इन दल समूहों 
की सुगंध से उपवन अटा हुवा है ।।

फुरहर फूर दल पुंज । बवर झवर भवर गूँज ।।
रुर सुर मधुर मधुर रुंज । खील खील मुकुल निकुँज ।।
 स्फुरित फूलों क दल समूह पर भँवरे बावरे होकर गुंजत हुवे चक्कर लगा
रहे हैं सुंदर मीठे मीठे सुर बज रह हैं और उपवा में अधखिली कलि पुष्पित 
हो रहीं हैं ।।

बिलस बिपिन सोभन हास । लखी चिन चंदन बास ।।
रँग धरि हर हरदि लाल ।मालन माल ।।
वन में कमल एवं वनहास नामक पुष्प सुशोभित है । चीड़ एवं सुगंधित 
चन्दन शोभा वर्द्धन कर रह हैं । हल्दी अर्थात पीले हरे एवं लाल रंग से 
रँगे पुष्पों को धारण किये वनपालिका उहे पो कर मालाओं में पुर रही है ।।


बउर पउर फुर मंजरि । झूर डोर डोर फीरि ।।
धुर ऊपर फर फैरे । साम काम सर पैरे ।।
बौर अर्थात अमिया के छोटे छोट पुष्प पुष्पित हो गए ।
जो डालियों की डोर से झुले के जैसे झूल रहे हैं । कोमल आम
पैरे अर्थात धान की सुखी पत्तियों के मध्य विराजित है ।।

धान धान भरी बाल । फली फली धरी दाल ।।
धान मिसाए ओखरी । चाक पात दार दरी ।।
 बालियाँ धान से भरी हुई हैं । दाल फलियों में फली है ।।
धा ओखली में कूटा जा रहा है । दाल चाकी में दली जा रही है ।।


तार तर तीर तरंग । ताल ढोलक के संग ।।
राग राज बँसरि रंध्र । रुर सुर समीर सुगंध ।।

सुर तरंगे तारो में उतर कगारों पर विराजित हैं । ताल ढोलक के साथ है ।।
राग बाँसुरी के क्षिद्र में विराजित है । हवा में सुन्दर सुर एवं गंध विराजित हैं ।

 सुधाकर कर मयूख । अगनी सूरज के मुख ।।
धर भर मन बिरहन दुःख । सजन सजनी नयन सुख ।।
सुधा का आकर चन्द्रमा की किरणों में है । अग्नि सूरज के मुख में स्थापित है ।
मन में विरह का दुःख भरे । साजन सजनी के नयनों में चैन प्राप्त कर रहे हैं ।।

घट पनघट घटा प्यास धरा घटा के पास ।।
धारा धरि सागर आस मैं साजन के साँस ।।
शरीर पनघट में तृप्त होता है । धरती घटा स तृप्त होती है ।
धारा सागर की आस धरे है साजन मे तुम्हारे साँस में हूँ ।।

मंगलवार, 08 जनवरी, 2013                                                         

असन बचन कहि एक ही सांसा । बन साजन धर उरस निरासा ।।
पहलि परिहरइ भुज सँह साथे । तहँ छुर चुनर करज महँ हाथे ।।

उर उर ऊपर उपरन अंचल । धरि अंतर पद कमलिन कोमल ।।
चल तौ दिए अस रसे रसेऊ । कहु कर परिहर उरस बसेऊ ।।

बिहर गए घर बर बधु बिहीना । सहन बिरहन बस बिति दुइ दिना ।।
बसंत अगवन फुर दिन फिरे । तस लवनइ दिन अवनइ धीरे ।।

भोरि भवन बर पाट पटीरे । नील बरन अपबरन पहीरे ।।
लग दुअर सथ सिबीरथ साजे । धृत धुरबह बर धीर बिराजॆ ।।

धूर दूर रथ चरन सँचारे । द्रुत गति पहिं पहुँचे ससुरारे ।।
एक लघु पुर के लघु गुन गाही । जे सुनत जाहिं अति सुख पाहीं ।।

गए पहुँचहिं निज ससुरार परिजन पाए अगोर ।
सबहिं करँय जय जुहार अगुवन बर कर जोर ।।

बुधवार, 09 जनवरी, 2013                                                          

लै घर भीतर कोत कुठारे । सादर आसन पर बैठारे ।।
बैसे बर के सोभा कैसी ।  राज रतन रति मुँदरी जैसी ।।
वर को घर के अन्दर कक्ष की और लेजाकर आदर सहित ( सुन्दर ) आसन पर बैठाया ।।
बैठे हुवे वर की शोभा ऐसी है मानो किसी मुद्रिका में कोई रत्न अनुलग्न होकर विराज 
रहा हो ।।

चीर रुचिर सरूप रूप रतन निधि । दीपित दिनमन जनु गगन परिधि ।।
मगन मुद मंजुल छबि निहारी । देखत रही पुलक महतारी ।।
सुन्दर वस्त्र से रूप का स्वरूप  साक्षात विष्णु रूप में ऐसे दैदीप्यमाँ है मानो आसन रूपी गगन 
की परिधि में स्वयं दिनकर ही हों ।। मगन एवं प्रसन्नचित होकर वर की सुदर छवि को निहारते 
माता पुलकित होकर जडवत हो गईं ।

सुधित सुधा जल सुखफल थारे । मधुर मोदकिक परुस अगारे ।
करू करू कहिं कँवरजी कलेवा । भावहिं भवन भामिनी सेवा ।।
थाल में सुव्यवस्थित मधुत्रय मिश्रित दूध,रसाला, ठंडाई,गर्मपेय, सुखेफल जैसे काजू,
 मधुर स्त्रवा, मिश्री, फलस्नेह(अखरोट) , बादाम, अंजीर,द्राक्षा, दारुफल(पिस्ता) आदि 
तथा मधुर मिष्ठान बर के सामे परोसटे हुवे मनुहार पूर्वक करते हुवे कहा कुँवर जी कलेवा 
कीजिये । घर की स्त्रियाँ ऐसे सेवासुश्रुता कराती मन को प्रस कर रही हैं ।।
    
भोज पहर सुघर जेवनारि । बनवन बिंजन बहु छरस चारि ।।
जोग जामातु भोज जिमाई । लोक रीति कर मंगल गाई ।।
भोजन के समय स्रुचिपुर्वक भोज में नाना प्रकार के षष्ट रस युक्त (जैसा कि वेदों में 
वर्णित है ) व्यंजन बनवाए ।। प्रतीक्षारत होकर जवाईं को भोजन करवाया एवं लोक 
रीति का निबाह कर मंगल गान गाए ।।

दीठ पीठ भित करे धर प्रिया करज महँ कान ।
नैन सन नैन लरे तर पिया अधर मुसुकान ।।
भीत से पीठ टिकाकर प्रिया अपनी उंगलियों में का को धारण किये वर को निहार 
रही है ऐ मिले तो वर के अधरों पर मुस्कान उतर गई ।।

गुरूवार, 10 जनवरी, 2013                                                                            

गोर गात तहँ सारंग सारी । चित चोरइ प्रान ते प्यारी ।।
कनखन सजवन नखत तै सिखा । मृदु मन अरु तन सुमन सरीखा ।।
शुभ्र शरीर उसपर सुन्दर रंग युक्त साड़ी प्राणों से प्यारी जैसे चित को चुरा रही है ।
पिया ऐसी सजावट को नख से शिख तक काखियों से देख रहे हैं । एक तो कोमल मन 
उस पर फूलों के जैसा शरीर ।।

बिगत बेर धरि कोर कलाई । लइ प्रिया पिय पौर चढ़ आई ।।
गव निज खन भित पलंग डसाए । फेन बहनु पर पिया बैसाए ।।
( थोड़ा ) समय व्यतीत होने पर प्रिया ने प्रियतम की कलाई को पकड़ कर सीडिया 
चढ़ कर निज कक्ष में ले गईं और समुद्री फे के सामान कोमल बिछावन पर बैठाया ।।

जुग सजुगबध सजन तन संगा । भुज दंड कर सर सिखर अंगा ।।
अधर कंज भर कंज कपोले । मनु मुकुलित कलि मधुकर कोले ।।
सजन के तन के साथ संयुक्त होकर हाथो को कंधो पर धरते आलिनगा बद्ध किया ।
पिया ने अधरों में कमल के जैसे कपोल का अमृत भरा मानो अधखिली कलि को 
भ्रमर आलिंगन कर रहा हो ।।

लइ कर धर पिय दृग भर देखे । मेहँदी के कृति कारि लेखे ।।
सोभन सुभगा सुभ सिंगारे । रँग सुरंग सुरभित गंधारे ।।
और  प्रिया के हाथ को विह्वल नयन से उस पर रचित मेहंदीकी रेखाओं को 
देखन लगे । यह सौभाग्य श्रृंगार पतिप्रिया को शोभायमान कर सुन्दर रंग से 
रंगा सुगंध से भर रहा है ।।

तल्प तल नव जुगल लाग अस खन भवन कुठार ।।
दुइ अलि बल्लभ अनुराग जस रति रतन अगार ।।
भवन के उपरी खंड कक्ष में पलंग ऊपर नव युगल ऐसे लग रहे हैं ।
जैसे की समुद्र में दो लाल कमल अनुराग रत हों ।।

 शुक्रवार, 11 जनवरी, 2013                                                  

जूत सँजूत सब जॊउ जोरें । साँझ संग महुँ जावन मोरे ।।
अय लवन तौ जवन न लासें । एक दौ दिन मम पितु गह बासें ।।

सुन पिय हाँसे हाँस बिलासे । राग रंग रस राज पियासे ।।
चंद्र बदन बर बिम्बहिं बासे । भुज के कासे सिन्धु संकासे ।।

सयन सदन तव पंथ निहारें । पर परिहारे गहन गुहारें ।।
मम सइ कहवइ सहइ तुर आएँ । पिया पलोवन लाग छुराएँ ।।   

हँस बधु कहि हम गहि पद अंका । रमन रूप राज हम रम रंका ।।
हम दयनिय तुम दया निधाने । भए दीन दसा तुम धनवाने ।।

नाम दयाकर अभिधान धरे । हैं दीन बंधु अभिमान करें ।।
धर्म चरन चर कर दव दाने । तव अभिधाने तब ही माने ।।

ओढ़ जतन उत पाँव पसारें । देव न सक तौ लव न उधारे ।।
दीन दया धर हीन न धारें । हीन श्रम हर देन परिहारे ।।

कॊऊ दरसन को तरस कोऊ परसन तरस ।
प्रिया पिया पीहु पारस सबहिं हिरन को करस ।।



 प्रियतम प्रिया परस तरस पपीहा दरस तरस ।
 पीतर तरस लस पारस सब हिरन कर्षन बस ।।


शनिवार, 12 जनवरी, 2013                                                             

तब लेंइ बन धन दुहाए धारु । दूँ मूलक सहि बियाजु उतारूँ ।।
एहि बखत तौ दुज अंस धराएँ । तर मूर तुर सुर सिंधु नहाएँ ।।
( प्रियतम कहत हैं ) स समय तो तुमने बनाते हुवे सौगंध लेकर धन उधार लिया था 
कहा था कि तुम्हारे मूल को ब्याज सहित उतार देवेंगे ।। सो इस समय ब्याज्का दूसरा 
भाग दें फिर शीघ्रातिशीघ्र मूल चुका कर गंगा नहाए हो जाएँ ।।

जान भए तुम्ह को करि आसा । रास बिलासँय पेम पिपासा ।।
कहें बर अजहु लहनहु थोरे । चित चीतन जे चाँद चकोरे ।।
वधु ने कहा हम जा ग तुन्हें किस की आशा है । प्रेम के प्यासे  कामक्रीडा 
का तुम्हें लोभ है ।।  वर ने कहा अभी तो हमें थोड़े की ही चाह है । चाह वही जो 
चाँद से चकोर चाहता है ।।

केस कपोले कर तल धारे । प्रिया अधर पिय अधर पधारे ।।
करस कस लस सुधा रस सोषे । सुध बुध बिसरा तन मन तोषे ।।
गाल को और उस पर के केश को हथली पर धारण कर प्रिया के  अधरों पर पिया  ने 
अपे अधर रख दिए । और उसके आकर्षण में दबावपुर अवस्था में उस परके रसामृत का 
पान करते हुवे सुध बुध बुला कर तन और मन को जसे तुष्टि प्रदान करने  लगे  ।।

  रत अनुरागत रंजन रंगे । रमा रति रूपक रमन अनंगे ।।
अस रूप अनूप सरूप सरोबर । सरस सरसीज मधुप मनोहर ।।
अनुराग के पाश में आबद्ध आनन्द प्राप्त करते युगल दम्पति ने  रति- मदन का ही रूप
प्राप्त कर लिया  । रूप ऐसा अद्वितीय जैसे की किसी सरोवर के सरस कमलिन में सुन्दर 
मधुप उसका रस पा कर रहा हो ।।

काँप काँप काया कँपन अधर अधर बस  बंध ।
लग बिलग बधु अभिषंजन निसँसन साजन कंध ।।

अधर से अधर के  बंधन  वश वधु की काया के कंपन से कानो के कर्णफूल कम्पन करने  
लगे   अधरों से अलग हो, आलिंगन वश साजन के कंधे पर वधुय की सांस द्रुत गति से 
गमन करने लगी ।।

रविवार, 13 जनवरी, 2013                                                              

अटपट लपटइ लट गल बाहीं । तूल तरुबर बेली बलाही ।।
चंद्रानन लवन पिय अगहुड़े । नयन दर्पन सजन सन जुड़े ।।
अटे वस्त्र लपटी हुए केश और ग्रीवा में बाँह तरुवर में वलयित लतिका के तुल्य 
प्रतीत हो रही हैं । चन्द्रमा के जैसे मुख को पीया ने आगे की ओर किया तो 
दर्पण स्वरूप प्रिया के  नयनों में पिया की छवि से जुड़ गए ।।

भावइ पियबर अंतर ताड़े । चलउ हटउ कहि मनुहर छाँड़े ।।
उझक उझप रुझ भुज बल गीवाँ । लही बही जिमि धरि सरि सीवाँ ।।
पिया के अंतस ( रति) भाव को भांप कर चलो हटो कह कर छोड़ने का मुहार करे लगी ।।
भूली हुई सुध का संज्ञान ले काठ से उलझी भुजाओं को विमुक्त किया । और ऐसे चली 
जैसे कोई सरिता लहरा कर अपि मर्यादा में चलती हो ।।

पेम के आदि मध्य न अंता । न्यून न अति न नियत नियंता ।।
भव भव बिभव नहीँ एहि भाँति । न सम्मोहन अस सुपत सुपाति ।।
प्रेम का न तो आरम्भ ही है न ही मध्य है एवं न ही कॊई अंत है । इसका न तो कोई 
न्यूनतम है अ ही अधिकतम इसका अ तो कॊई निर्धारक है न ही कोई इस पर शासन 
कर सकता है ।। ससार में सर्वव्यापक हुवा अहि कोई इसके जैसा । प्रेम के जैसा न तो 
कोई सम्मोहन है अ ही इससे कोई प्रितिष्ठित है और न ही पात्रता प्राप्त ।।

  बूढ़ भए अधिक अधिक अधिकाए । गह गह गहरन गहन गहराए ।। 
घना घन गगन मगन बिबराए । कन कन कंचन बिभन बिथुराए ।।
जो जितना अधिक डूबा वह और अधिक डूबता चला । जिसने जीतनी गहनता प्राप्त की 
वह और गहराता चला । जैसे घना मेघ गगन में निमग्न हो गहरा वर्ण ले कर चमकता 
हुवे स्वर्ण कण बिखराता है उसी प्रकार भी प्रेम गहरा हिकार स्नेह के कण की वर्षा करता
 है ।।

 सब लोकन तें एक लोक लोकन लोग बिलोग ।
कभु रत कभु बिरह सोक बस जहँ प्रेमी जोग ।।
लोगो ने देखा है कि सभी लोकों में एक ( उत्तम ) लोक है जहां कभी मिलन 
तो कभी विरह के शोक वश प्रेमी युगल का वास रहता है ।।

सोमवार, 14 जनवरी, 2013                                                                   

गइ पूरिते प्रभा पग फेरे । भास भानु चौखट पट भेरे ।।
ढरि ढरि डहरहि सांझ सुहाई । स्याम बरन बर रतियन छाइ ।।
किरओन ने अपनी  पूर्णता प्राप्त कर जब चरण फेरे तो सूर्य ने भी अपि कल्पन के 
चौखट के द्वार बंद कर लिए ।। डगर पर ढलती हुई संध्या भी अति सुहावनी प्रतीत 
हो रही है । और सुन्दर श्याम वर्ण में रजनी ने अपनी छाया बिखरा दी ।।
    
प्रभा प्रिय ससी भूषन सीसा । नीलय निलय नभ बिलय निभ निसा ।।
दूर धरनि धुर उर उजियारे । दिक् गति दर्सन दीपक बारे ।।
चाँद का  मुख मंडल तारो के मोतियों के आभूषण से युक्त हो कर प्रकाशित है । नभ के 
ह्रदय की नीलिमा भी प्रकाशित निशा में विलापित हो गयी ।। दूर धरती की धुरी तक 
उसके ह्रदय में उजाला भरते जलता हुवा दीपक  दृष्टि की पहुँच तक दृश्यमान है ।।

साँझ बिरत भए भोजनु काला । एक ते एक हैं भोग रसाला ।।
अहार बिहार रुचिबर  किन्हें । कह बीनितइ बर अब बिदइ दिन्हें ।।
सांझ बीती भोज का समय हुवा । विभीन्न रसों से युक्त शुद्ध, मार्जित, मीठा, मधुर, रसीला 
सुपाच्य, सुस्वादु भोजन- आवास को औराग पूर्वक ग्रहण किया ।। तत्पश्चात विनय पूरित
वाचा से जाए की आज्ञा मांगी ।।
  
ले लवन तूल तिलकन माथे । मान दान देइ दृढ़ मूल हाथे ।।
सन सनमान धर सीस सुभागे । सास ससुर बर पागन लागे ।।
तात-मात ने सुदर लाल तिलक माथे पर लगाया । तथा मान  सम्मान पूर्वक दान सहित 
 नारिकेल भेंट स्वरूप दिया ।। सम्मान सहित उसे शीश पर धार अपना सौभाग्य मान 
वर इ सास-ससुर के चरण सपर्श किये ।।

अंब अंबर धर अंजन छाए । धीय उर धुर मिल  सलिल बहाए ।।
तात मात बर सौंप धराए । समधिक समदन कर धिय बिदाए ।।
पुत्री के काले नयन में काले बादल छ गए फिर भारी मन से सबसे मिलकर जल बरसाइ 
लगे । अतिशय उपहार प्रदान कर टाट मात इ पुत्री को वर के हाथों में सौप कर विदा की ।।
  
लय ह्रदय भर  धीर राख सिबीरथ धिय बैसाए ।
ता पर बर अँधेरपाँख तुर अति आतुर धाए ।। 
भरे ह्रदय में धीरज को धरा कर पुत्री को सिवीरथ में बैठाया ।
उस पर बैठे बार ने अधेरे के पंखों पर सिवीरथ को अत्यधिक 
द्रुत गति से दौड़ाया ।।


 मंगलवार, 15 जनवरी, 2013                                                                        

लह लह बाहनु बह बह जाही । तीर त्रिबिध बध बायु बहाही ।।
पग पग खग मृग तरुबर बृंदा । नग नग नदी बन मगन निंदा ।।
 लहराती हुई वाहनी दूर होती चली गई । बाहनी के कगारे तीन प्रकार की ( शीतल, मंद, 
सुगन्धित) वायु प्रवाहित होने लगी ।  चरन ,चरन पर पशु, पक्षी एवं वृक्षों के समूह व 
पर्वत-पर्वत तथा नदी-वन सब निद्रामग्न हैं ।।

निरव रथय रव पथ कोलियाए । डगर ढुकाए ढुर घर नियराए ।।
पंथ पुरी जन सोए समूचे ।  भँवर भँवर पी पँवरी पहुँचे ।।
शांत सकरे पथ पर रथ के पहिये कोलाहल करते डगर को पार कर गम करते घर के 
निकट आए । पथ एवं अड़ोसी-पडोसी सब सो चुके हैं । घूमते-घुमाते पिया के घर पहुच 
गए ।।
 
बधु सहित बर भित दुअर धामा । तिलक-दान दे मात प्रनामा ।।
तात जाउ कह करें बिश्रामा । आवन जुगल तब सयन श्रामा ।।
 वर -वधु साथ में घर के भीतर पधारे । तिलक-दान माता को देकर कर चर स्पर्श किया ।।
फिर पिता ने वर-वधु से कहा जाओ अब विश्राम करो । तब युगल सयन-मंडप में विश्राम 
हेतु आए ।।
 
 भर भुजंतर बर बधु  धारे । ऋनोद गहन कर समुद्धारे ।।
 बर ने वधु को गोद में उठाकर ऋण धारिणी वधु से सम्पूर्ण
ऋण ग्रहण कर ऋन धारी का ऋणोंद्धार किया  ।।

लव लाल भाल ललित गाल हिरनय होठी धरावहिं ।
हर हहर अधराधर गहन उतर हिम कन पिय पावहिं ।।
पेम पियूष परस पूस परागन रागन रजस रजे ।
अधस्तात अधीर रात रति पिय नाथ मंदिर सजे ।। 

तापित धरनि जलधि आस जलधित कासिक कास ।

पिय तिय तन मन धन त्रास बूँद सभी के पास ।।      
तपती हुई भूमि बादल की बूंदों के आस है समुद्र प्रकाश वान के 
आकर्षण में  अर्थात सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र ( विशेष कर स्वाति ) के आकर्षण है 
प्रियतम प्रियतमा के तन-मन  रूपी धन के प्यास को तरसे है जबकि बुँदे 
( धरती के पास समुद्र, समुद्र के पास जल, पियाके पास हिरण्य ) सभी के पास है ।।





Thursday, November 1, 2012

------ ।। मधुर मिलन ।। -----



          गुरूवार, 25 अक्टूबर, 2012                                                                             

           साँझ दिनु भए सकेर सकारे । गउ गोरू पग फिरहिं दुआरे ।।
           भयो स्यामल गगनहि गौरा । सुमनस हरिदय गुंजहि भौरा ।।
 प्रभात को  को समेट कर दिवस संध्या में परिणित हो गया है | गाय गोरू अपने घर लौट रहे  हैं, गौर वर्ण गगन कृष्ण रुप धारण कर चुका है, भौरा मगन हो पुष्प के ह्रदय में गूंज रहा है ।         
                
              चैन के बँसरि अधर पधारे । रागनुराग के रे रस अधारे ।।
              थिरकत संग तरंगिहि माला ।  अंजन रँग  तट तरुअ तमाला ।।
 चैन की सुन्दर बांसुरी के सुर अधरों पर विराज गए, राग एवं प्रेम के रसों को धारण किये हुवे,तरंगों की (सुर) मालाओं  के साथ थिरकते तट के वृक्ष  श्याम रंग में रंग कर मानो तमाल (शीशम )के वृक्ष हो गए ।          

           लहर बहर बहि बहु बहिलाहीं ।  बलभी भरि बल्लभ गल बाहीं ।।
           सलग्न बलग्न बदन निहारे  । सरसै सरित सरट सुर सारे  ।।
 आनंद एवं सुख रूपी वायु  बहुत प्रकार से बहला रही हैं, प्रिया अपने प्राननाथ को आलिंगन किए हुवे थे प्राणनाथ के करधन को संलग्न किए वह उनके मुख मंडल को निहार रही है , सुरों से युक्त होकर हवा, नदी सहित सभी आल्हादित हैं ।

          फुरे फूर तैं भरि फुलबारी । झौंर झौंर जलकन झरहारी ।।
          हेम अंक अंग पत अनुगामा । हिमकन बन जिमि हिमबल  हिम धामा ।।
           फुले फुले सुन्दर फूलों से वाटिका  भरी हुई  हैं , जो हवा के झौंके से झूमते हुवे  ओस बिंदुओं को बौछार कर रहे हैं 
               जैसे काले आकाश में चन्द्रमा मोती स्वरूप में शोभाय मान है 
              उसी प्रकार पुष्प पर ओस की बूंद व प्रिया के स्वर्णांकृत अंक में प्रियप्राननाथ सजे हुए हैं 
   हेमांक +अंग = स्वर्णालङ्कृत            
 अनुगामा = सहचरणी 
                 
             हेमांड अचलंत हेम चंद्र लंकार किए   ।
            आए हुलस हेमंत हिम मई ऋतु परसहि पद  ।।    
 (चाँद रूपी प्रिया) सोने के चंद्र से अलंकृत  ब्रम्हांडका स्थिर मन सुशोभित है ओसमयी चाँद रूपी ऋतु, उल्लसित हेमंत के आगमन पर चरण छू रही है ।         
     

           शुक्रवार, 26 अक्टूबर, 2012                                                             

           लगन लगनबट लट लहरावै  । लाल ललामिहि लहि लहिकावै ।।
           लरि लरि लल करि ललित प्रहारा । लय बध बेधहिं बारंबारा ।।
प्रेम बंधन में बंधे  ( प्रिया के)केश लहरा रहे हैं, लाल रंग की सुन्दर बुँदे हिल डुल रही हैं, हिलती दुलती लड़ियाँ परस्पर लड़ कर प्रियतम को मधुर आघात कर रहीं हैं वारंवार के इन आघातो से  पिया की लय बाधित हो रही है ।

           मन ही मन पिय मोह बिहसाहिं । धरि करि मरुरै मनोहरु ताहिं ।।
           मसकहि कस कहि कुलहि कलैया । सिसकहिं अकुलहिं लहँ सहुँ सैयाँ ।।
 मन ही मन प्रियतम मोहक विहास करते हैं , कान की बूंदों की कड़िया पकड़कर मोड़ते हुवे हाथ से कस कर पीड़ा पहुंचा भिन्न क्रीडाएं करते हैं, सिसकती हुई व्याकुलित (प्रिया ) सैंया सम्मुख ले आते हैं।         

           बिनत बहु बिधि बिकल भइ भारी । स्याम सजन सुनैनि निहारी ।।
           हूँकत हूँटत  होट हुकारे । देखि दसा पिय हँसै हुँकारे ।।
सुनयना सलोने सजन को  निहारते हुवे बहुत प्रकार से विनती कर रहीं कि यह पीड़ा अधिक हो गई है पीड़ापूर्ण होंठ ( बूंदों को ) पृथक करने हेतु निवेदन कर रहे हैं पिया हाँ हाँ कह प्रेयषी की ऐसी दशा देख हँस पड़े | 

             
           कसत अस त कहि कटकिहिं  काना । दीन नीर बिनु मीन समाना ।।
           पिय कहिं खड़कइ अब लय मोरी ? नहिं नहिं गोरी कहि कर जोरी ।।
जल के बिना तड़पती हुई मीन के समान प्राणप्रिया  कहती है कि ऐसे कसने से तो कान ही कट जाएंगे, प्रिय कहते हैं कहो मेरी लय को अब भंग करोगी ?? प्रिया हाथ जोड़ कहती हैं नहीं !नहीं!! 

           हिलगत पिय हियहि हिलगइँ  पियतमा भइ अधीर ।
           हँस हँस हरत हिय हिरकहिं,  हरे न हिय के पीर ।।
पिय प्रेमवश प्रियतमा को ह्रदय से लगा लेते हैं  किन्तु प्रियतमा  व्याकुल हो उठती है तब प्रियतम हँस कर हृदयालिंगन करते वह ह्रदय  का तो हरण कर लेते हैं किन्तु पीड़ा को नहीं हरते।   
            
           
           शनिवार, 27 अक्टूबर, 2012                                                        

           अरझइ अरचइ करज छुराई । रसमस कस अस लबक लखाई ।
           दीठ पीठ बत बैस बिरुझई । बोल न बोधहि झुठि मुठि रिसई ।।
           उलझती व अर्चना करती एवं अँगुलियाँ छूड़ाकर  क्रोधपूरित  नेत्रों  से निहारते हुवे प्रिया 
               कहती है  ऐसे आकर्षण से भी कोई आनंदित होता है क्या ??और इसप्रकार  प्रियतम से उलझ गई और  पीठ 
               फेर अबोली होकर झूठ मुठ ही रुठ बैठी ।      

           अछ बस जस सस अकड़ अगौहीं । सौरइ ससि सहुँ सहसहि सोही ।।
           निभ नछत पथ नभ चमस खींचे । भुजदंड पास भास भरु भींचे ।।
           जैसे अक्ष के वशीभूत चाँद  आगे बढ़ अपनी अकड़ दिखला रहा है वैसे ही हंसते सांवलेसांवरे 
              प्रिय के  सम्मुख चाँद स्वरूप प्रियतमा भी शोभायमान है,जिस प्रकार नभ चाँद की किरणों को 
              समेटे हुवे है उसी प्रकार प्रीतम भी अपनी भुजाओं के पाश में अपनी प्रेयषी के प्रेम को कर्षे हुवे है । 
               
               
           बिसुरइ रुझनइ लछनउ लाखा । लुबुधहिं बोधइ लखन सलाका ।।
           उरुज भुज सेखर हनु टेके । लूक लूक लोचन लेखिहिं देखे ।।
             रूठती,मचलती प्रेम से पीड़ित प्रियतमा ऐसे  दृश रहीं है मानो प्रेममग्न प्रियवर  से कह रही 
               हो कि यह लक्ष्मण रेखा है जिसे पार करना कठिन है,प्राणप्रिया के उरूज कन्धों पर 
               ठुड्डी टेक उसके क्रोधपूरित लोचन को चोरी-छुपे से देखते हैं । 

           परसत खटिकन पुछत सकुचाए । करन खगन भए बहुल बितताए ।।
           करक सरक कहि हिय भरि लाई । पिया न जानिब पेम पिराई ।।
             कर्ण -छिद्र को स्पर्श कर फिर  संकोच वश पुछते है कि  ये कानों की चुभन अधिक टीस दे रही है क्या ? 
                तब प्रिया हाथ झटक कर दूर सरकते हुवे भरे ह्रदय से कहती हैं पिया न तो प्रेम पहचानते 
                है न ही पीड़ा ।

               पलक पताका लड़क लड़ाका चटपट बत बढ़चढ़ चढ़ी ।
           छिटक छिटक छट लहर लहट लट जनु झटफुटत फुलझड़ी  ।।
           नयन लगाईं के मेल मिलाई के काहे कर धर कानन कड़ी ।
           ललित लोचनि लवनय ललौहनी लखी लड़ी लर्झरी ।।
           हे मृग लोचनी तुम छोटी सी बात को  बड़ा रही हो एवं इस तरह 
               से दूर हट रही हो मानो फुलझड़ियों से चिंगारी निकल रही हों 
               पिया तुमने  नयन मिला किसलिए इतनी  कस के बुँदे खीची??
               हे सुनयना तुम्हारी आँखों का यह क्रोध बहुंत ही आनंदमयी है ।

               खींच खीच बिनयन भींच  बाहु प्रलंब बिचलन  ।
           जनु कार्तिक के घन घिंच बीच बिजुरी बिरचन ।।
              
               मान मनुहार करते पिया प्रिया को खिंच कर बाहु में भींच लेते हैं 
               वह इस प्रकार विचलित हो रहीं है मानो कार्तिक में बादलों के 
               मध्य बिजली ही रूठी हुई हैं ।


              रविवार, 28 अक्टूबर, 2012                                                              

           छिनु छिनु छितिजहि छबि छहराई । छलनि डार के छाज उराई ।।
           बिनतहिं बत कहिं बारहिं बारे । बाहु जोरंत जय जोहारे ।।
           छण में ही छितिज छन-छन करती जो विद्युत की चमकती शोभा बिखरी हुई है 
               वह मेरी छोटी भूल से उपजी तुम्हारी क्रोध की चिंगारी का स्वरूप है विनय पूर्वक 
               वचन कहते कहते अंत में हाथ जोड़ चरण पकड़ने को हुवे तब : --

           नहिं नहिं अस बस अरच न करहीं । मृदु मन तन तव रस रूप सकलहिं ।।
           नयन अंजनउ  दरस तिहारे । तमि धन दर्पन तवहिं अधारे ।।
          ( प्रिया कहती है ) नहीं नहीं बस ऐसे अर्चना मत कीजिये मेरा यह कोमल मन, तन यह रूप 
               यह प्रेम रस सारे तुम्हारे ही है यह काले नयन तुम्हारे ही दर्शन स्वरूप है मल बिन दर्पण 
               अन्धेरा बिना चाँद का अस्तित्व नहीं उसी प्रकार हरि बिन हरिप्रिया का भी कोई आधार 
                नहीं ।
                
               लसित रसित रतिरस रसवंता । बलित जुबनित  सरित हरि रंता ।।
           कनपत करजहिं करखन कोरे । कित कतिक कहब का का मोरे ।।
           क्रीडाशील प्रसन्न, आनंदित हो प्रेम में मगन रस में सराबोर प्रियतम कान की बूंदों 
              को छू उन्मादपूर्वक जोड़ अंगों को उँगलियों से स्पर्श कर कहते हैं कहो तो कहाँ, 
              कितने व कौन-कौन  से ( अंग) मेरे हैं ।

              दसन बसन धन दूर धचकाहिं । धत दुतकर कहि कोरहिं काही ।।
          मद भरू बिहबल मोह मुकुलिता । मतिभरम गति हीनहु मन मिता ।। 
           मदोन्मत्त अधमुँदी काम के वश पिया से प्रिया मुस्कराती  हुई साथ ही दूर (हल्के से )
              धकियाती धत धत कहती हैं तुम  ऐसे क्यूँ छू रहे हो ये मन मीत की बुद्धि, निर्बुद्धि  
              हो, बुद्धू हो गए हैं ।

             मदन कंटक आतुर मधुर परसहिं मर्म स्थान ।
          लचक मचक नभ चमस धुर मर मर जिअत जान ।। 
          प्रेम-अनुराग को आलिंगन कर कामदेव के वश प्रिय कोमल अंगो को 
             स्पर्श करते है जिस कारण प्रिया रूपी चाँद नभ में अपनी धूरी पर लचकती 
             चाल से प्राण हरने वाली मधुर ध्वनी उत्पन्न हो रही है ।

             मंगलवार, 30 अक्टूबर, 2012                                                                 

          बहि बहु पहर भय कहि पियाही । फिरि बहु अब गह मुर दर दाहिनाहिं ।।
          कमलिन बंधइ मनोहर जोरी । बहर बहल बन बहहिं बहोरी ।।
          बहुत अन्धेरा होने पर प्रियाने प्रियसे कहा -- हेप्रिय बहुत घूम चुके अब हमारा घर लौटना 
          उपयुक्त होगा । बंधा हुआ यह कमलों का सुन्दर जोड़ा प्रसन्न करने वाले वन से मन बहला 
              लौट चला 

              अधंगन्हिं गह अध बर बहियाँ । बहहिं बैसार बहनइ सैंया ।।
           बसह बधहि धर बैस अधारिहिं । बाहि बाहित बह बहनु बाहिहिं ।।
           आधी बाहों के बीच अर्धांगनी को भर सैंया ने उठा कर वाहन में बैठा दिया । ( और )
              बैल की रस्सी को नियंत्रित कर गाड़ीवां के बैठने के स्थान पर विराज वहन करने 
              वाले वाहन को ले वापस लौट चले ।

              जिमि जिमि झल चल जल जुन्हैया । तिमि तिमि तुर दुर धुर धुरैया ।।
           धूलि ध्वज पटल पिछु पिछारे । थिर तर धुरीन  निअर दुआरे ।।
           जैसे जैसे ज्योतिर्मय रात ज्योति झलकर जलती चलती जा रही थी । वैसे वैसे गाड़ीवान 
               भी गाढ़ी के पहिये को तेज चला जा रहा था । धुल रूपी बादलों को पीछे छोड़ पिया प्रधान 
               ने गाडी ( घर के ) द्वार के पास किनारे पर लाकर रोकी ।

               पौर पौर पुर पहुँचहिं बेला । भव भवन चरन नतैत भेला ।।
               सरन गमन गह सयनागारे । धारागह फुहरहिं निस्तारे ।।  
            नगर, घरद्वार पर समयपूर्वक पहुँच गृह-प्रवेश कर नाते दारों से भेंट किया ।
                चरण विश्राम ग्रहण  हेतु शयन कक्ष की और प्रस्थान किये । ( वहां )
                स्नानागार गार में फुहारों के निचे स्नान कर तरोताजा हुवे ।

                भारइ भरू भुज दल भरन पूँछइ भए भूखन भक्ष ।
               भावुक भाव गति गहन मुसुकहिं गहिं भक्षन कक्ष ।। 
            प्रिय को बाहू में भर कर जब प्रिया ने पुछाकी- भूख लगी है??
            उनके रुवांसे से भावों को समझ कर मुस्कराती हुई 
               भोजन कक्ष की ओर( भोजन लाने हेतु ) बढ़ चली ।      

              बुधवार, 31 अक्तूबर, 2012                                                                        

           तुरतहि गवनइ भवन भंडारा । हरिहुँत हथ लइ अवन अहारा ।।
           कोर कोर कर  कवल   करारे । प्रीति  बरध  धर अधर कसारे  ।।
           ( प्रिया) तत्काल रसोई गृह गईं एवं प्रीतम हेतु भोजन ले आई । एवं प्रेमपूरित  भोजन के 
               छोटे-छोटे, कौर कर प्रीतम के मुख पर रखती गईं ।।

               प्रियबर बचन भव बदनु भाषे । तव परसब यब रस रस रासे ।।
            तुम्हउ बदनउ बहुहु लबारी । भुक्ति भुखन तव भुगतहु भारी ।।
            प्रियतम के मुख से यह सुन्दर वचन बोले ।  ( हे प्रियतमा ) तुम्हारी उँगलियों के स्पर्श से भोजन
                सरस व स्वादिष्ट हो गया । (प्रियतमा बोली ) तुम्हारे बोल अत्यधिक ही प्रशंसा पूर्ण हैं । तुमने भोजन 
                हेतु भूख को अत्यधिक सहा (अत: भोजन स्वाद पूर्ण प्रतीत हो रहा है) ।

               उदर  पुजन कर अगन भुझाई । कर धर पग भर छति पर आहीं ।।

           मंजु मुख गवनि चितब सुहाई ।  लजन सजाए सजन समुहाई ।।
           भोजन कर तृप्त हो कर (हरि संग प्रिया) हाथ पकड़ चलकर छत पर आए । मनोहर मुखाकृति 
               धर हंसगमनी ( हर के) नयन व ह्रदय को सुहावनी प्रतीत हो रही है ।  लज्जा से सुसज्जित सजनी (
               सजन के सम्मुख आईं  ।

                सजनि हाथ पुनि गह निज हाथा । गहि भुज अंचलु चलिअहिं साथा ।।
           खतमालु गालु  केश घनेरे । भए बिगलित जनु नभ लएँ  घेरे ।।
आँचल को भुजाओं में समेटकर हाथों में हाथ  लिए  प्रिया प्रीतम के साथ चलने लगी | गालों और कन्धों पर बिखरे  काले बादलों जैसे घने कुंतल मानो नभ को घेर लेने की अभिलाषा में हैं ।

                 संकेत निकेतन नयन संक्रम क्रमनक क्रमन ।
             संकुलित कुल झुलहि सुमन सकुचइ संगहिं सयन  ।।
              प्रिया व् प्रीतम अपने डग भर कर एक स्थान  से दूसरे स्थान गमन करते हैं 
। कलियों से आच्छादित सुमन झूले पर सजनी सयन हेतु 
                  संकोचपूर्वक सिमटी हुई है ।

              


               कंठ निकेतन माल रँगे प्रीत के रंग ।
             शुभग दर्शन शयन काल भय सुहावन संग  ।।
           प्रियतम के कंठ में गले में  माला सुशोभित हो रहीं हैं अनुराग पूरित 
                 काम क्रीडा रसमग्न है शयन सैया पर भाग्य प्रदान करने वाले श्री के अंग अंगारों
                 के सदृश शोभायमान हैं ।

               सजी सुहागन रैन  बिभावर मुख कान्त कर  ।
              मंझन मंजुल नैन बिभूति भूषन भेष धर  ।।
              चाँद तारों से प्रज्वलित ज्योत्सना से परिपूर्ण सुहागों वाली सुख रात्रि  सुसज्जित हुई।
                   श्री,अनुराग पूर्ण आभूषण एवं वस्त्र धारण किये श्रीधर के नयनों में विराजमान हैं  ।।       

      
            सोमवार, 29 अक्टूबर, 2012                                                                

           नलिनि सयन बिच लोचन जोरे । तरे चरन धर पलकन कोरे  ।
           नौ तरन तरुन नवल अनंगा । पूर निभाननि जोबन रंगे  ।।
         
           कमल समूह से सुसज्जित शयनिका के मध्य प्रियतम के कमल की पँखुड़ी-से लोचन 
            प्रिया के लोचन से सम्मिलित हुवे  । पलकों की कगारों पर चरण धृत कर प्रियतम नयनों में उतर गए ।  पूर्णिमा के चन्द्रमा के सी प्रियतमा के यौवन में अनुरक्त  मुग्ध करने वाली नव यौवना के नयन-झील में 
              नौकायन से तैरने लगे ।  

             अवतमस तरन तरित तर ताहि । अवन मन बद्ध अवनिहि धाही ।।
           नयन पदम् पद पथहु बिहारे । निकुंज करि कर कुंचन कारे ।।
           अल्पन्धकार में उतरते उतरते हरि झील के किनारे पहुंच ह्रदय रूपी धरती पर 
               छायादार पथ पर पग रख दिए । कमल जैसे कोमल पग से विहार 
               करते हरि को ( हरिप्रिया ने ) नयनो के उद्यान में कुण्डी लगा कर बंद कर लिया ।

              नयन निमित मित चरनहु नाई । नमत नमत नत निमिखहि झुकाइ ।।
           मुखमंडल कार्मुक कामुक किमि । जुबनइ जामि  मीर जलजल जिमि ।।
            नयनों में मनमीत के चरण चिन्हों को प्रणाम किया । स्वामी को नमन करते हुवे झुके बादल 
               स्वरूप पलकें भी झुक गईं । झुका हुवा मुखड़ा  व् झुकी भवें कासी कामुक लग रही हैं जैसे कि 
               तरुणई रात्रि में जलता हुवा  तरुण चाँद समुद्र के जल में  शीतलता प्राप्ति हेतु व्याकुल हो ।
              सजन बदन रस परसहिं माथा । छिनु छिनु निछिनु  नयन पट नाथा ।।
          मुख कांति कमल कपोल रागा । अभिरति रत पत अधर परागा ।।
            
              पिया का अधर अमृत ललाट को स्पर्श करने लगा । क्षण भर में मोदपूर्ण पिया ने पलकों 
              को चुम्बित कर दिया । कमल से खिले मुखड़े पर सौंदर्यपूर्ण लाली शोभाय मान हो रही है  
           प्रेमलगन में सलग्न पिया के अधरों का पुष्प पराग प्रिया के गालों पर विराजमान हो गया ।

           
                      बुधवार, 07 नवम्बर, 2012                                                                          

                      रसै रसै रत रिस भइ अंता । रतिभर रतिगर भइ रतिवंता ।।
                      पदमन दर्पन जल कन दरसिहि । पदम अंतर तर पनपत परसिहि ।।
                       शनै: शनै : रात्रि रिक्त होकर  समाप्त हो रही है रत्तीभर किन्तु सुन्दर  सवेरा होता दिखाई दे रहां है ।
                               सरोवर  रूपी दर्पण में जल कण दर्शित हो रहें हैं ,सरोवर के हृदय में उतरकर   कमल ह्रदय में उतरकर 
                               करने हेतु स्पर्शित हों ।
                        भास भास भए भवनउ भोरे । बिरतत रत रतनिधि नीड रोरे ।।
                      नींदउ भंजन नयन निथारे । बीथि बीथि बिज बियत बिथारे ।।
                      भवन प्रकाशित हुवे, मुर्गे बोलने लगे, भोर हुई । रात के व्यतित होने पर पंछी घोसलें में 
                              कलरव करने लगे । नीद खुली आँखों को मसलते हुवे अम्बर पथ पर पंक्तियों में पंख 
                              फैला दिए ( नए लक्ष्य हेतु )

                     रय रयरथ धरि रविरय राजे । प्रियकर सुन्दर सारथि साजे ।।
                     रयनि रयन रय रवनहहिं धाए । रतन प्रभ बाहु गर्भ गह आए ।।
                      धूल रूपी गति वाहित को धारण कर सूरज राजा विराजमान हुवे । लाल कमल के सदृश्य 
                              किरण रूपी सारथी भी सज गए । रजनी के सह सयुक्त हो अर्थात अंधेर-सवेर में रवि राजा 
                             ( पंछियों के कलरव से युक्त) शब्द करते चले । रत्न के सामान दैदीपमान विष्णु अर्थात विश्व 
                              व विष्णु प्रिया अर्थात धरती के घर आए ।

                     रचित रतन करि भूषन माला । परखनु  अचलउ राजित साला ।।
                     सहस चित चरनउ नयन नवाए । सहस सस बदनउ गुनगन गाए ।।

                      कुबेर के द्वारा गुंथी रत्नों की खान में रत्नों के ढेर में से परखे माणिक जड़ी (ओस रूपी )माला 
                            हाथ में लेकर हजार चरण वाले भगवान श्री विष्णु को सूर्य ने  प्रणाम कर दशतिदश प्रकार 
                            से दशतिदश मुख से दशातिदश गुणों का गुण गान किया ।  
                             
                     हे जगती जगत धारी हे जगती जग जोत ।
                     हे जगत कर्ता कारी वन्दे चरन स्त्रोत  ।। 
                     हे पृथ्वी सकल विश्व के धारण कर्ता हे पृथ्वी वे संसार के आलोक ।
                            हे सृष्टि के कारण स्वरूप परमेश्वर  तुम्हारे चरण की स्तुति- वन्दन करता हूँ ।

                    गुरूवार, 08 नवम्बर, 2012                                                                        

                    हे जगमोहन छबि जग मोही । बिस्व रूपी तव  रूप अति सोही ।
                    बिस्वथा  मनस मय बिस्वासे । बिराट अवनउ अबसु अबासे  ।।
                    विश्व को मोहित करने वाले हे ! जगमोहन हे ! विश्व रूपी विबीन्न रूपों में प्रकट हो 
                           तुम अत्यधिक सुहाने प्रतीत होते हो । हे ! सर्व व्यापी विश्व स्वरूप सबके मन मानस 
                            विश्वास पुर्णिता, सब पर शासन करने वाले सब पर उपकार करने वाले सर्वज्ञ विश्व के 
                            आधार ईश्वर ।    
                 
                     जग पुजित जेहिं बंदउँ सारे । बिस्व बिभावन बिदित बिसारे ।।
                    जै जग जनयन जन हित कारे । धरन भरन  भरू धरनी धारे ।।
                    सर्वत्र  पूज्यनीय जिसकी वन्दना संसार भर में होती है हे ! विश्व की रचाना करने वाले 
                           तुम्हारी ख्याति तो सर्वत्र प्रसारित है । विश्व का धारण-पोषण करने वाले धरणी को 
                           धारण करने वाले समस्त मानव जाति हित करने वाले लाभ करने धरणी पति की 
                            जय हो !  
              
                     बिस्व अधिपत सहाहु स्वामि । जग कारक  करि अंतर जामी ।
                    बेद गुहयउ कारूक दल दृष्टा । बेद बिद सारु जै जग कृष्टा ।।
                     हे ! विश्व के राजन हे ! धरनिस्वामी ! हे! अन्तर्यामी प्रभु हे! बिष्णु हे ! चतुश्पत रूपी 
                            ब्रम्हस्वरूप चतुर्भुज वेदों के सार स्वरूप  सबके प्रति सद्भाव रखने वाले वेदज्ञ तुम्हारी जय हो !  


                    बंदउँ जग गुरु गोचर चरना । सख सातम सहि सकल सृज करना ।।
                    बिस्वनयन कहि करि कल्याना ।  कूट करम करि केतु बखाना ।।
                     समस्त विश्व के पिता स्वरूप सर्वत्र दृश्यमान के चरणों की में वन्दना करता हूँ ।
                             सूर्य देव ने संसार का हित करने वाले की हिमालय की चोटी पर किर्णित कर 
                             सर्व सारग्रन्थ स्वरूप गुणों का वर्णन किया ।

                    सुदरसन चक्र पानि धरन सुमिरनु मंगल स्वर ।
                    सूक्त बचन बदनु भजन सुनाद निगद दिनकर ।।   
                      
                     सौह्रदय निधि नलिन धरन  सुमिरनु मंगल स्वर ।
                     सूक्त सहस बदन भजन सुनाद निगद दिनकर ।।
                     सद्भावन के निधि कमला पति का ध्यान स्मरण कल्याण कारिकारी स्वरों में 
                             श्री विष्णु भगवान का सुन्दरता पूर्ण कथन भजन सूर्यदेव  शंख ध्वनी युक्त 
                             पाठ कर रहें हैं ।

                     गुरु/शुक्र 08/09 नवम्बर,2012                                                                     
  
                     नाम किरति करि नाम न होई । नाम धरन धरि नाम न सोई ।
                     भू भुवन भूरि भूति भलाई । करित करम करि जस तस पाई ।।
                     ईश्वर अथवा महापुरुषों का नाम जपने से मनुष्य ईश्वर अथवा महा पुरुष नहींहो जाता 
                            उनका नाम रखने से भी मनुष्य ईह्वर अथवा महापुरुष नहीं हो जाता । पञ्च भूत व प्राणी 
                            मात्र को अधिकाधिक भला कर उपकृत कर्ता को यश भी उसी प्रकार से प्राप्त  होगा ।

                     बंदउँ मंगल चरन अचारा । काम कलस करि मंगल कारा ।।
                     भुयहु भूयस भाग बिधाता । भाजन भुवन भूरि धन दाता ।।  
                      मंगल कामना करने वाले मंगल मंदिर में शुभ घड़ी में योग्यतानुसार जन धन 
                             से पूरित करने वाले भाग्य बिधाता के चरण की मैं बारम्बार वंदना करता हूँ । 

                      बिस्व जित जुद्ध जोनि जोधा । बीज भव भरत सकल प्रबोधा ।।
                      नाभि नाथ धृति पालन हारे । पउ पाचनु पति पोषनु धारे ।।
                      हे! विश्व युद्ध विजित, विश्व के योद्धा हे!विश्व के  मूल कारक ब्रम्ह स्वरूप ईश्वर हे! विष्णु 
                             तुम  समस्त जन को जागृत करने वाले हो हे विष्णु ! तुम सबकी रक्षा करने वाले, 
                             सबका पालन पोषण करने वाले समस्त तत्व को धारण करने वाले तुम ही विघटन शक्ति 
                             के धारन करने वाले विश्व के केंद्र बिंदु हो  ।

                      सहस सिखर कर धौतउ धामा । सहसस निगदहि अर्चन नामा ।।
                      कंठ बरन बर कुलि कर कोरा । जप जपनी जल जोरन जोरा ।।
                       दशतिदश किरणों से विन्ध्य पर्वत श्रेणी को दशतिदश बार धोकर सूर्यदेव दशतिदश
                              प्रकार के नामों का जाप  कंठ से सुन्दर उच्चारण करते हुवे हाथ जोड़ के किनारे ओस रूपी
                              ( माणिक कण )जल कणों से गुंथी माला ले कीर्तन वंदन करते है  |

                               
                       हरि कथन कीरत करन्ह क्रांत गीत गृह कर ।
                       हरि हरि हरिअरी हरिअन हरि हरि हरि अरी हर ।। 
                       हरी की कीर्ति कथा करने हेतु किरणों ने हरी मंदिर को ( किरणों की )लताओं में आवृत 
                              कर लिया । हरी हरी हरियाली को हरियाने हर्य ने हरी के शत्रु रूपी तिलचट्टों का हरण कर लिया ।
                              अथवा हल की आरी रूपी नोकों को तेज किया अथवा रावण सीता हरण के फेर में है । 

                      शनिवार, 10 नवंबर, 2012                                                                           

                      प्रति दिन जौं भयऊ भिनुसारे । दुइदिग उदभिद भीत हमारे ।
                      भोग तजन फल ताहिं जनइता । एक दसमुख ते दुज तेहिं जिता ।।
प्रत्येक दिवस में भोर होने पर हमारे भीतर  भोग और त्याग फल के द्वारा  उत्पन्न दो दिग्गज जागृत होते हैं एक रावण तोदुसरा उसे जितने वाला |                       

                            एक धुत चरिता दइत अचारी । दुज देउ कृत करि ब्यवहारी ।।
                     हिरन हिरन हन हरि जहँ जाहीं । हरनु हुँत तहँ  हरानत आहीं ।।   
  एक धूर्त चरित दैत्य के आचरण का है तथा दूसरा देव रूपी व उन्हीं के जैसा व्यवहारी है जहां त्याग रूपी राम, माया रूपी सोने के हिरन का वध करने गए, वहां  (सद चरित्र रूपी) हरिपत्नी को हरण हेतु नत मस्तक हो रावण आया | 
                          

                             तरु तृन ललहत कृमि कृत काई । दुइ रसन खग रूप रमिताई ।।
                     जंतु जिगमिषु मनु जोनि  कैसे  । काम क्रोध लुभ मद मन जैसे  ।।
तरु और तृण कृमि की काया धारण करने हेतु लालायित रहते है। सरीसृप को पक्षी की देह लुभाती है जंतुओं को मानव शरीर प्राप्त करने की अभिलाषा कैसे होती है जैसे मनुष्य के मन को  काम , क्रोध, मद व लोभ की होती है ।  
                   
                              

                       श्रुति गोचनि धर रंजन राखा  । सब्द कारि गह सहसस साखा ।।
                       नलिन नैनि के पलकन पाँखी । लाखहिं चहुँ दिसि तै सहसाखी ।।
सूर्यदेव की मधुर ध्वनी  कानों में सुनाई देने लगी  दशतिदश शाखाओं वाले वेद के क्षोभ वायु तरंग द्वारा कान ग्रहण कर रहे हैं  । सहस्त्र चक्षु वाले सूर्य देव चारों दिशाओं से कमल के समान नयनों वाली सुंदरा की पलक पंखुड़ियों का लक्ष्य कर रहे थे |   

                                

                               हरुअ हरुअ दुहु पटल प्रफुराए  । परस पिया पद रज सिरु आए ।

                       अभिरति रत जे बचन उचारे । भई उसर भए निलय अधारे  ।। 
दोनों पलक पटल हल्के हल्के  प्रफुल्लित हुए और प्राणपति के चरण स्पर्श कर उन्होंने धूलि को प्रिया के शिरोधार्य किया | अनुराग की रयनि  द्वारा उद्धृत हुवे वचन, उषा होने पर हृदय में आत्मसात हो गए |                              

                                  

                                निभ के निभरत नीद उपारी । नव जिउ सर्जन चरनन धारी ।।
                        प्रथम किरन सम  नव दइताई । धार गेह नद पद पैसाई ।।
चमकदार प्रकाश के प्रकाशित होने पर नववधू सुसुप्त अवस्था से जागृत अवस्था को प्राप्त हो निद्रा को दूर करते हुवे सृष्टि   के नव जीवन का  सृजन करने हेतु अग्रसर हुई | सूर्य की प्रथम किरण के समान चरण धार्य करते उस नवविवाहिता ने  स्नान गृह रूपी नदी में प्रवेश किया । 
  


                         निर्मल जल तहँ कर अन्हायो  । जिमि सुर सिन्धु सरित सुहायो 
                         भरन भवन पुनि चरनन धारे । बरन बरन के बसन बैसारे ।। 
वहां निर्मल जल का स्नान  गंगा स्नान के समान ही सुहा रहा था  तदनन्तर  वेशभूषा के कोष्ठ के सम्मुख चरण रख रुचिनुसार वर्ण का चयन कर वस्त्र धारण किये ।
                           
                         
                           भूषन अभरे धरनि के सुभ दरसन सुभांग ।
                           सिरोधार किए प्रिया निज प्राननाथ के  रंग ।।  
आभूषणों से भूषित हो धरणी रूपी प्रिया का सुन्दर दर्शन मंगलमय व् शुभ शगुनों का संसूचक था सेंदुरि श्रृंगार के स्वरूप में प्राण नाथ को धारण किए हुवे है।
                            


                          रवि/सोम, 11/12 नवम्बर, 2012                                                                       

                            कंचन कुंदन कंगन कारे ।  कलप कारु कर कियो कगारे ।।
                            कानन लाल ललामिक लतिका । लवंग कलिका कियउ नासिका ।।
कांच पर कुंदन का कार्य किए हुवे कंगन से कलाइयों को संवारा । सेंदुर की आभा लिए सुहागा  से युक्त  बूंदों से कानों को एवं लौंग कालिका को नासिका में सुशोभित किया सुशोभित हुई ।
                       
                          
                          लसिहि ललित ललाटूल टीका । कंठ मनि कंठि संग कूनिका ।।
                          मंजुल गमनि चरन सिंगारे । मंजीर मंडल मनोहारे ।। 
 सुन्दर ललाट पर सुन्दर माँग टीका  कंठ में मणियुक्त हार व ( वाणी में ) वीणा सुशोभित हुई । (तत्पश्चात )मंजुल गमनि ने नुपूर मयी झांझ से चरणों  पर मनोहारी श्रृंगार किया । 
               

                          सुर सुरूप सैन्दूरु सिरु साजै । मनहुँ सजन मनि सदन बिराजै  ।।
                           राग रंग रज सूरज सोहा  ।  रागारुण रथ रमनहि रोहा ।।
 शीश पर देव स्वरूप सुन्दर लाल सिंदूर शोभायमान है मानो प्रीतम रूपी  मणि ही शीश मंदिर में विराजित हो  । अनुराग की धूलि में रंग कर बिंदिया रूपी सूरज शोभायमान है मानो अनुराग युक्त लाल रंग के रथ पर स्वयं प्रियतम ही विराज मान हों ।                      

                                    मंजुल मुकुलित  मुकुर बिहसाए  । कमल कांत मुख चित्र कन छाए ।।
                           रति रत रमन नयन उन्नैने । लुरक लुरक लर लुरिअन लइने ।।
                            कमल के जैसा आभा मंडित मुख के छवि  कण छाने लगे तो दर्पण भी अधनिंदे से 
                                     विहास करने लगा । प्रियतम के अनुराग  में अनुरक्त नयन ज्यों ही झुके कर्ण के की बुँदे इन्हें 
                                      पाने के लिए आपस में ही लपट-झपट पड़ी  ।

                                      कृष कृष कूर्पर पद कर कुम्भकार कटि अंग ।
                             कुशय कुशेशय कलेवर कैशिक केशव संग ।।
                              दुबले पतले कुहनी व् घुटने युक्त हाथ व पैर हैं कुम्भ की आकृति युक्त कटिप्रदेश हैं ।
                                       रवण रूपी श्रृंगार से श्रृंगारित   ( कुम्भ में ) जलमग्न कमल के जैसी देह है ।।

                            पँवर पँवर पर पउँ पउनारे । पंथ गहन सुरबन पइसारे ।।
                            पउँर नुपुर पुर सुमधुर धारे । खनक कनक कन छनक झँकारे ।।
                            
                            निहार निहार हार निहारे । निहोरहिं होरहु हो रहुँ हारे ।।
                            गहनहु गुहनहु गहनि गुहारे । भँवर भरन भए बारहिं बारे ।।   
                               
                           सुर बन बल्लभि पथ पद पारे । मुकुति सुकुति प्रसु प्रसुन प्रसारे ।।
                           प्रात पुजन पुन बंदनी बंदि । सुमुख मनि मत मति मधुर नंदी ।।

                           पुहुपक सुरबलि सिंच सुहाए । पुहुप रचन बरन भूषन भाए ।।
                           सिंच सरित सरि श्री श्रुति साधे । देउ कुट चरन चरइ अराधे ।।

                           दीप कालि कलि बर्तिक माला । अलि अधार धर अंकुर थाला ।।
                           दीपित बरन बर बृत अन्बिता । हरि भवन भित भविनन्ह प्रीता ।।

                          जगमग जग जगन्मयी जगमग ज्योति ज्वाल ।
                          जगर-मगर धर जगजयी ज्योतिमय जयमाल ।।     

                          बुधवार, 14 नवम्बर, 2012                                                                                   

                         कपूर प्रसंगित अगरु सुगंधा । भनिति बिनति भलि करि कर बंधा ।।
                         बंदन भजन श्रवनहि बनबारी । बद्धानंदन घन घाँ  घर घारी ।।

                         कला कलुक कर कलि कलिसाई । कलित कला कृत कलि कलियाई ।।
                         कली कलुष कर कलि कलुषाई । कलित कली भृत कलिजुग आई ।।
                          पैजनी की कला सेव कला मयी रचना से  अर्थात कला -संगीत को गृहित कर (शाखाएं में )
                                 नई नई कलियाँ उत्पन्न हो प्रस्फुटित हो  जाती हैं । ( किन्तु ) झगड़ा, पाप कृत्यों से तो एक युग 
                                 कलुषित हो जाता है,  युद्ध के कारण ही  कलयुग का आगमन हुवा था । 

                          नत नव नूतन नलिन निकासे । मूल फूल भए बहुल बिकासे ।।
                          छंद प्रबंध पद रसबत  रवने । सुनि पबि पबितउ पालउ प्रबने ।।

                          पब पब पबमन पबि पबिताई । भवन्हू बहु बन महुँ पहुनाई ।।
                          पदुम कर करित लसित ललसाए । पुहुप पत परस प्रसादनु पाए ।। 

                         पुन्न करमनी काल के कृतौ करहिं कीर्तन ।
                         पुनी पुर रजन पाल के जय जय कहहिं पुरजन ।।

                          
                         
गुरूवार, 15 नवम्बर 2012                                                                        

                         सुमनस मन अस सुम सुहाए । सुमित मिलहुँ सहुँ करज महुँ आए ।।
                         देखु देखु कहि गहिं पहुनाई । चलत फिरत चहु दिसित दिखाई ।।

                         तरु भुज मंडित बिलसहिं कैसे । बिलस सदन धनु सादन जैसे ।।
                         तलक तलक तरी तरु बिकसाए । तलप तले जनु दसन दसनाए ।।
                         धनुकर कानन कासउ काही । जनु धनु धनिअन धनिकहिं ताही ।।
                         धूम अयन पथ केतन कैसे । नयन भवन दय दयितहिं जैसे ।।

                          धूल न धूरे धूलि धुलिका ।  उबटहिं अभ्र इव बरन बधुहि का ।।
                          भुइँ भुइँ मुँदर बूँद फुँद पिरोए । जिमि नव कुँवरि के कुंडल कोए ।।

                          देखु सागर सैन सईं भसित तूल सइ सैन ।
                          समझ सैन सुमन मुसुकइ दिरिसहिं तिरछत नैन ।।