Sunday, July 22, 2018

----- || प्रभात-चरित्र २ || -----

बुधवार, १८ जुलाई, २०१८                                                                                            

सुपंथी तेउ भयउ कुपंथा | गुपुत गिरि भए लुपुत सद ग्रंथा || 
अब न कहंत नहि श्रुतिबंता | साधु साध बिनु भए सतसंता || 
सन्मार्गी से जब वह कुमार्ग गामी हो गया तब सद्ग्रन्थ किसी गुप्त गिरि में जाकर विलुप्त होगए | अब न तो उत्तम वक्ता ही रहे न श्रोता | साधू साधना से विहीन होकर संत व् सज्जनों की पदवी को प्राप्त होने लगे | 

रहत बिदेसि कहत जबु देसी | होत  गयउ तब  देसि  भदेसी || 
दुर्गुन बसै जहँ उपनिबेसा | बिगरै तहाँ सकल परिबेसा || 
भिन्न देश के होते हुवे भी जहाँ विदेशी भी देशी कहलाते हों वहां भद्र देशी भी अभद्रता को प्राप्त होते चले जाते हैं  | जहाँ उपनिवेशों में दुर्गुण निवास करते हैं उस देश का समूचा परिवेश ही विकृत हो जाता है | 

रहँ मलीन सो होएं कुलीना | कुलीन दिन दिन होइँ मलीना || 
भाषन भाष न भेस न भूषन | दरसि दहुँ दिसि दूषनहि दूषन || 
सुकृत परिवेश के विकृत होने से मलीनता सद्गुण ग्रहण कर कुलीनता में व् कुलीनता दुर्गुण ग्रहण कर दिनोंदिन मलीनता में परिवर्तित होती चली गई |  जब सर्वत्र  दोष ही दोष दर्शित होने लगे  तब भाषा भाषा नहीं रही, भेष भेष नहीं रहा, भूषण भूषण नहीं रहे |  इस दूषित परिवेश के प्रभाव में ये भी दोषयुक्त हो गए | 

भूमि सुर जोधिक ब्यौहारी | अलपहि मति अतिसै श्रमहारी || 
कहँ सो ऋषिमुनि कोल किराता | रहँ जौ हमरे जनिमन दाता || 
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, अल्पमति किन्तु अत्यधिक श्रम सहिष्णु वह क्षुद्र कहाँ हैं वह ऋषिमुनि कहाँ हैं वनों में विचरण करते वह आदिवासी कहाँ हैं जो हमारे जन्मदाता हैं | 

साखि कहाँ कहँ हमरे मूला | जासु बिआ हम जिनके फूला || 
कहँ सो फूरन के बनबारी | पुनि बुए कहँ तहँ संग उपारी || 
कुञ्ज कुञ्ज सो कलित निकेतू | तहँ सोंहि उपरे केहि हेतू || 
कवन कहा हम कहँ सोंहि आए | सनै सनै एहि सुरति बिसराए || 

हम कहाँ से व्युत्पन्न हुवे कहाँ फलीभूत हुवे हम जिनके बीज है, फूल हैं, हमारा वो मूल कहाँ है हमारी वे शाखाएं कहाँ है, फूलों का वह उपवन कहाँ है वहां से उखड़ कर फिर कहाँ वपन हुवे, उपवनों से सुसज्जित उस वसति से हम किस हेतु उत्खात किए गए | हम कौन थे क्या थे कहाँ से आए थे फिर शनै:शनै: यह स्मृति भी हमें विस्मृत हो गई | 

बिछुरत संगत आपुने भए बिनु छादन बास | 
बिनहि जल बिनु खाद पुनि बसे केहि बसबास || 
अपनों से वियोजित होकर वासनाच्छादन से वियुक्त, भरण पोषण से वंचित फिर हम किस निवास के वासी हुवे | 

परबसिया जहँ दरसिया बसबासत सब कूल | 

कहँ भारत कहँ भारती कहँ भारत के मूल || 
सीमावर्ती प्रदेशों में जहाँ तक देखो वहां पराई शाखाएं ही निवास करती दिखाई देती हैं ऐसी परिस्थिति में भारत कहाँ है, भारतीय कहाँ हैं, और भारत की वह जड़ें कहाँ हैं जिनसे यह राष्ट्र परिपोषित हुवा यह समृति भी हमें विस्मृत हो गई | 


बृहस्पतिवार, १९ जुलाई, २०१८                                                                                     

अजहुँ त अहैं सहित हम मूला | बसत बिनस मुखि बिधि कर कूला || 
अजहुँत समउ भरे कठिनाई | होवनहारि कहा कहि जाई || 
मौलिकता के विनाशोन्मुखी विधान के निकट निवास करते हुवे भी हम अभी तो मूल सहित हैं | अधुनातन समय की चाल अत्यंत कठिन  है आगे के विषय में यह अनिर्वचनीय है कि उसका भी मूल संरक्षित रहता है अथवा नहीं   || 

दिसा भरमी दसा दुर होई  | दिग्दरसकहु दिसै न कोई || 
जाएँ चरन कहँ  केहि न सूझै | पंथ कुपंथ चरन न बूझैं || 
 वर्तमान में दिशा भ्रम को तथा  दशा दुर्दशा को प्राप्त है कोई मार्गद्रष्टा भी दृष्टिगत नहीं होता और कोई  पंथ कुपंथ में  नहीं होता  ये चरण जाएं कहाँ यह किसी को नहीं सूझता | 

नगरि अँधेरी चौपट राजा |  स्वतोबिरोधि देस समाजा || 
ताते पूरब भएँ निरमूला | परे धूरि मुख बिथुरै पूला || 
समाज अपने ही स्वत्व का विरोधी हो चला है  देश का द्वार पट विहीन है यहाँ  नीति व् न्याय का अभाव है  जो चाहे जब चाहे  इस पर शासन कर सकता है इससे पूर्व की हमारी मौलिकता नष्ट हो जाए,हमारी अस्मिता धूमिल हो जाए और हमारा अपना समुदाय छिन्न-भिन्न हो जाए | 

होत सजागर सजग सचेता | रहँ जागरूक जोग निकेता || 
हेर लगे निज स्वताधारा  | अरु कह सकै ए देस हमारा   ||  
हम अपने राष्ट्र की सुरक्षा के प्रति सजग सचेत व् सावधान रहे | जो समय के साथ  विस्मृत हो गया  उस स्वकर्तव्य के विषय में सतर्क रहते हुवे अपने उस स्वत्व के आधार को ढूंढे जिसके बल पर  हम गर्व से कह सकें कि ये देश हमारा है |  

अचेतन होत जहँ जन मानस रहे उदास | 

तहँ की सब सुख सम्पदा बसे परायो बास || 
(क्योंकि ) जहाँ जनमानस अपने अस्तित्व के बौद्धिक तत्वों से अनभिज्ञ होते हुवे सुषुप्त अवस्था को प्राप्त  होता है वहां की सभी सुख सम्पदाएँ पराए देशों में जा बसती हैं और वहां निर्धनता का वास हो जाता है |

होत जात सो देस निज संप्रभूत तैं दूर || 
मौलि अधिकृति ते अधिकृत भवतु परायो मूर | 
(क्योंकि ) वह राष्ट्र अपने सम्प्रभुत्व से दूर होता चला जाता है जिसके संविधान में स्वयं से भिन्न अन्योदर्य मूल, मौलिक अधिकारों से संपन्न हों |  

शुक्र/शनि, २०/२१  जुलाई, २०१८                                                                                  

सकुचित मानसन्हि अनुहारी | भएँ श्रुति बिरोधि सब नर नारी || 
देस धर्म जब देइ त्याजू | राजत तब दिग भरम समाजू  || 
संकुचित मानसिकता का अनुशरण करते हुवे विद्यमान समय में हम भारतीय अपने ही धर्म ग्रंथों के विरोधी हो गए | जब देश में प्रचलित आचार-विचार त्याज्य हो जाते हैं तब दिशा विभ्रमित समाज उसपर शासन करने लगता  हैं | 

जन्मद जेहि देस जनमावैं  | जातकहु तहाँ केर कहावैं || 
धरमचरन अनुहरत चलि आए | लोकगत रीति देस गति पाए || 
जिस देश में जन्मदाता जन्म लेते हैं उसके जातक भी वहीँ के कहलाते हैं |  पीढ़ियां जब धर्म के आचरण का नियमपूर्वक परिपालन करती चली आती हैं तब किसी देशविशेष में लोक मान्यताएं व् लोक प्रथाएं प्रचलित होती हैं | 

जीउनाचरन होतब जैसे  |  अचारबिचार होतब तैसे || 
धर्मन चारन  होतब जैसे | देसाचारहु प्रचरत तैसे || 
जीवन चर्या जैसे होती है मनुष्य के आचार विचार भी वैसे ही होते हैं  | उसी प्रकार धर्मचर्या जैसी होती है देश विशेष में वैसे ही आचार-व्यवहार प्रचलित होते हैं | 

देस भूमि जौ पटतर खेहा | सुघडपन संस्कृति सम नेहा   || 
देसधरम जल पवन सरूपा | जन जन तासु उपज समरूपा || 
कोई देश भूमि यदि कृषिक्षेत्र के समान हो तो सभ्यता व् संस्कृति उसकी मीट्टी के पोषक  तत्त्व के समान होती हैं ॥  देश विशेष में  प्रचलित आचार-व्यवहार उसकी जलवायु के जैसे व्  राष्ट्रजन उस क्षेत्र की उपज के समरूप होते हैं  ॥ खेत जैसा होगा उपज भी वैसी ही होगी ॥ 
भूखन जस जल पोषन पावा | उपज रूप तस जन निपजावा || 
भूषा भाष भेष जहँ जैसे  | पनपे परिबेसु तहँ तैसे  || 
देस रूपी खेत को जैसा जल व् पोषण प्राप्त होता है जन स्वरूप में वहां वैसी ही उपज होती है | जहाँ जैसी भाषा व् वेशभूषा होती है वहां परिवेश भी वैसा ही पनपता है | 


धर्म चर्जा गरभ गहि पावै | सँस्कार संस्कृति जनमावै || 
जेहि धर्म चहु चरनाधारै | होनहार तेहि होनिहारे ||  
धर्म चर्या के गर्भ को प्राप्त होकर ही संस्कार व् संस्कृति व्युत्पन्न होते हैं | धर्म जब सत्य, तप, दया, दान इन चार चरणों पर स्थित होता है तब उसके द्वारा व्युत्पन्न संतति उत्तम होती हैं | 

जन्मद जहँ जन्माइया जनिमन तहँ कि कहाए | 
संस्कृतिहु तहँ केरि कहँ जहाँ धरम प्रगसाए   |  
जन्मदाता जहाँ जन्म लेते हैं संतान भी वहीँ की कहलाती है धर्म का जहाँ प्राकट्य होता है संस्कृति भी वहीँ की कहलाती है | 

बिचु बिच उरेहु बिंध्य पहारा | बहति गईं जहँ सुरसरि धारा || 
खेह खेह गत हल हल हेले | बीर भूमि गत सागर मेले  || 
मध्यभाग को विंध्याचल पर्वत श्रेणी से अवरेखित कर जहाँ गंगा की धारा प्रवाहित होती हुई खेत खेत के हल हल से परिचित होते हुवे वीर भूमि से होती हुई सागर में समाहित हो जाती है | 

तीनि सिंधु जुग चरन पखारें | पूरब दुआरकेस दुआरे || 
उत्तरु सर्ब निलै कैलासा | हिमगिरि आबरति न्यासा || 
तीन सिन्धुओं का संगम जिसके पदप्रच्छालन करता है पूर्व में द्वारकेश का द्वार में तो उत्तर में सर्ववासी कैलाश को स्थापित किए यह गिरिराज हिमालय के चारों ओर के क्षेत्र में विन्यासित था | 

चारि काल सहुँ छहुँ रितु राजै | जनु पर्कृति तहँ साखि बिराजै || 
रहँ बन बिटप बिरउ बहु भाँती | बिचरहि जंतुहु अगनित जाती || 
चारों काल के संगत षड ऋतू की उपस्थिति के साथ मानो प्रकृति यहाँ साक्षात विराजमान थी || वनों में भाँती भाँती के विटप व् पौधे सुशोभित थे जहाँ अनगिनत जाति के जीव-जंतु विचरण किया करते थे | 

चलिए चहुँ पुर पवन पुरबाई |  मलय गिरि बन  गंध अपुराई || 
भयउ सुखद सम्पद सबकाला | कतहुँ आपद न भयउ अकाला || 
चारों ओर यहाँ पूर्वी हवाएं चलती जो मलयगिरि में स्थित चन्दन वन के गंध से परिपूर्ण रहती | यहाँ सभी काल सम्पद काल होते हुवे सुखमई होते आपदा होती न किसी वस्तु का अकाल ही होता || 

परबत जहँ  प्रगसाइहीं भुईँ सम्पदा भूरि 
बहतिं रहति जित तित सरित निर्मल जर भर पूरि || 
भावार्थ : - जहाँ पर्वत अतिशय भू सम्पदा प्रकट करते हैं , निर्मल जल से भरीपूरी सरिताएं जहाँ-तहाँ प्रवाहित रहती थीं |  

हम बासिहि ता देस के सरजत  जगत बिधात | 
जग महुँ सबते पाहिले जनमिहि जहँ मनु जात || 
सृष्टि की रचना करके विधाता ने मानव जाति  को विश्व में सर्वप्रथम जहाँ जन्म दिया हम उस देश के निवासी है 

तीर तीर बसबासिहि बासी | सुरुचित भेस भूस मधु भासी || 
धरम परायन सहित सुग्रंथा | करम जुगत कर चरन सुपंथा || 
तटवर्ती क्षेत्रों में सुरुचित वेश भूषा धारण किए मधुर भाषी भारतवासी निवासरत थे |  ये धरम परायण थे  सद्ग्रन्थों से युक्त इनके हस्त की कर्मों में अनुरक्ति थी चरण सन्मार्गगामी थे | 



बासहि जग जब घन बन गूहा  | भाषहि बिनु बर बैनत हू हा || 
प्रगसि तहाँ  बुद्धिन कहुँ देई | रागमई सरगम सहुँ सेई || 
जब विश्व का मानव समुदाय भावाभिव्यक्ति के साधन से विहीन हूँ हा के घोर शब्द करते हुवे बीहड़ वनों एवं दुर्गम गुहाओं में निवास कर रहा था तब इस देश में  रागमयी सप्त स्वरमालिका से सेवित बुद्धि की देवी का प्राकट्य हुवा | 

ग्यानदीठि देइ बरदाना | भयउ अंतस ज्योतिष्माना || 
कलित करत कल बीना पानी | बदन देइ वांग्मय बानी ||  
उसने ज्ञानदृष्टि  का वरदान देकर उसके अंतस को ज्योतिर्मय व् हस्त को मधुरिम वीणा से सुसज्जित करते हुवे वदन को वांग्मय वाणी से युक्त किया | 

बरन समूह सों संपन्न  सुर सम्पद कर जोग । 
सरित रूप प्रगसित भई देउ गिरा कहँ लोग ॥ 
 इस संस्कृति के संग वर्ण समूह से संपन्न हस्त कमल में स्वरों की सम्पदा संकलित किए सूत्र रूप में फिर एक समृद्ध भाषा देव गिरा प्रकट हुई, जो प्राचीनतम् भाषा के पद पर प्रतिष्ठित होकर सस्कृत नाम से प्रसिद्ध है ॥ 

वीरवार, २२ जुलाई, २०१८                                                                                          
                                                                                                                                 

जेहि जुग पाषानु जग जाना | मानसहु जहँ लहउ पाषाना || 
अमिष भुक को निरामिष कोई | सारंगज सियारु जस होई || 
संसार में जो युग पाषाणयुग के नाम से विख्यात है जहाँ मनुष्य परिष्कृत न होने कारण स्वयं पाषाण के समतुल्य था | सारंग व् शेर-शियार जाति  के समान ही कोई अमिष भक्षी  तो कोई निरामिष था | 

मानस जाति निरामिष होई | कहत भारति जनहि सब कोई || 
अधर संगत पयस जौ पावै | साक पात सो जीव पवावै || 
मनुष्य जाति प्रारम्भ से निरामिष रही, ( होंठ से जल ग्रहण करने के कारण )  ऐसा भारत के सभी जनों का कहना है क्योंकि जो जीव होंठ से जल ग्रहण करता है वह शाकपत्र का आहारी पाए गए  | 

 भरिअब जब जग बिपिन ब्याला | जनमि मनुस ते आरंभ काला 
बहुस समउ लगि रहिइ लमाना  || कहइँ जाब सो काल पषाना  ||
जब संसार सघन वनों और  वन्यप्राणियों से पूर्णित था और मानव जाति की उत्पत्ति के उस प्रारम्भिक काल को पाषाण काल कहा गया वह काल बहुताधिक लम्बे समय तक रहा | 

ताहि जुग करि बयस अनुमाना | पाँचि लाह बत्सर बिद्बाना || 
मानस तब गहेउ जड़ताई | पाहन जुग एहि हुँत कहाई || 
विद्वानों के अनुमानानुसार उस काल के आयु पांच लाख वर्ष थी | मनुष्य की बुध्दि उस समय जड़त्व को प्राप्त थी इसलिए उसे पाषाणकाल कहा गया | 

घिरे घोर घन बन हिंसि  जन्तु लाखन्हि लाख | 
पाहन के आजुध गढ़े राखन आपुनि राख || 
सघन दुर्गम वन लाखों लाख हिंसालु जंतुओं से घिरा हुवे मनुष्य ने अपनी सुरक्षा हेतु पाषाणों के आयुध गढ़े | 
   
पलौ उहारन पलौ बिछावा | पलौहि परधन देह बसावा ||
जग बन मानुष जबहि कहावा | निपट सो उज्जड पन गहावा || 
वृक्ष के पल्लव आच्छादन व् पल्लव के ही अंगवस्त्र धारण कर  विश्व जब वनमानुष की संज्ञा धारण कर नितांत उज्जडता को प्राप्त था | 

निकसत बन सों भारत बासी  | बसा बसति भय तासु निवासी 
बसे बिपिन बसन बिनु बासा | बसा बसति एहि बसत निबासा  || 
तब भारत वासी वन से निष्कासित होकर बस्तियां बसा कर निवासी की संज्ञा को प्राप्त हो चुके थे  जब वह दुर्गम वन में वेश व् वास विहीन होकर जब विश्व बेहड़ वनों में निवास करता था तब यह देश वसतियाँ अधिवासित कर निवासों में वास करने लगे थे |

सरजत कर्षिनि अन्न ज्यायो  |  पाहन सोध धातु जग दायो || 
पाहनहि सों अगन प्रगसायो | भाजन सोंहि जगत परचायो || 
कृषि का आविष्कार कर इन्होने  अन्न व्युत्पन्न किया व् पाषाण का शोधन कर संसार को धातुमय किया |पाषाणों से ही अग्नि को प्रकट किया और संसार को भाजन से परिचित करवाया | 
बसति बसति पुनि बसत सुपासू   | भयउ पुरा पुर नगर निवासू || 
भोजन संग अगन बसबासी | भू लख्मी गह माहि निवासी || 
वस्तियों में सुखपूर्वक निवास करते हुवे तदनन्तर ग्राम पुर व् नगरों का निवासी हो चले थे  | इस प्रकार भोजन के संग अग्नि का निवास हुवा तब भूमि पर व्याप्त धन- लक्ष्मी गृहों में प्रतिष्ठित हो गई | 

बस्ति बस्ति रहेउ बसत नव पाहन जुग सोह | 
अबर बसन बिन बास जब रहे सघन बन खोह || 
पाषाण से नवपाषाण युग में प्रवेश करते हुवे वह भारत तब बस्तियों में निवासरत था, जब अन्य देश के निवासी वस्त्र व् आवास से रहित होकर सघन वनों के भीतर गुफाओं में रहा करते थे ||



भयऊ तब सो नागर जूहा | बसिहि जबहि जग जन बन गूँहा |  


छायँ उरेहु लिखे जस खाँचे  | दरसिहि अयताकारित ढाँचे || 
बासु बसति पंगति दरसाई | कहिब मानस बसहि अस्थाई || 
छायाचित्र में जिस प्रकार के खांचे चित्रित हैं और आयातकार ढांचा दर्शित होता है वह पंक्तिबद्ध आवसीय वसति को दर्शाता है यह उद्घोषणा करते हुवे कि मानव अब स्थायी निवासी हो चला था | 

जूह समूह समोए के पुरबल रहँ बन बासि । 
बसे नगर भए नागरी मानस रहैं सुपासि ॥ 
छोटे छोटे झुंड व् समूह में समेकित जो जनमानस वनों में अधिवासित था अब वह कर्मशील होकर समष्टि में रूपान्तरित हो गया और एक समृद्ध वसति में सुखपूर्वक निवास करने लगा ॥ 

तजत पसुता जोए जिउत करि करि जबु श्रम कर्म । 
धी  गुन धरे प्रगस भया धीर रूप में धर्म ॥ 
नगर और निवास में निवासित मानव अब पशुता का त्याग कर  जीवन यापन के लिए श्रम और कर्म करने लगा । कर्म के साथ बुद्धि के आठ गुणों को धारण किए संतोष स्वरूप में धर्म का प्राकट्य हुवा | 


प्रथम बुद्धि पुनि आए ग्याना | दिसि दिसि दरसत दियउ ध्याना || 
निस्पृह नैन निरखि चहुँ पासा | भए चित्र लिखि से चितब अगासा || 
सर्वप्रथम बुद्धि आई तत्पश्चात ज्ञान आया तब उसने दृष्टिआक्षेप कर दिशाओं का ध्यान पूर्वक अवलोकन किया | निश्पृह नेत्रों ने चारों ओर के वातावरण का निरिक्षण कर जब आकाश की ओर दृष्टि की तब वह चित्रवत रह गए | 

एहि बन परबत एहि पुरबाई |  ए बहति नदिया कहँ ते आई | 
आए पथ्यापथ्य करि ग्याना | कृत्याकृत ते होइ सुजाना | 
(फिर उसने विचार किया ) ये वन ये पर्वत ये पूर्वी पवन ये नदी का आगम कहाँ से हुवा | फिर खाद्याखाद्य का ज्ञान आया तब कर्त्तव्याकर्त्तव्य के बोध से वह सचेत हो गया || 

चेतस मानस कियउ बिचारा | अहहि जगन को सरजनहारा || 
सर्जन सक्ति सामरथि कोई  | जीवाजीउ जनक जौ होई ||
चैतन्य मनो-मस्तिष्क ने विचार किया कि इस संसार का कोई सृजनकर्ता है अवश्य ही कोई भवधरण है जो सृजन शक्तियों से सामर्थ्यवान हो इस जीवाजीव का जनक स्वरूप है | 

जटाजूट धर पुनि सिव संकर | पसु पति नाथु रूप जोगेसर || 
मानस दरस दियो भगवाना | त पूजहि परम् पितु अनुमाना || 
तदनन्तर मानव को पशुपति नाथ जटा जूट धारी शिव शम्भू के योगेश्वर रूप में ईश्वर दृष्टिगत हुवे जगत के कारण स्वरूप परम पिता परमेश्वर अनुमान कर वह उनका वंदन करने लगा | 

मंद मति जग ग्यान बिहीना  | रहिब पसु सम धर्म ते हीना || 
बुद्धि मंत पद होत असीना | भगवन महु ए रहब लय लीना || 
ज्ञान विहीन, अल्पधी विश्व जब पशु के सदृश्य धर्म से निरपेक्ष था तब बुद्धिमन्त के पद पर आसीत होते हुवे यह देश ईश्वर का निरूपण कर ईश्वर में लयलीन था || 

मरनि देहि दहन किरिया करम दिए चिन्हारि | 
संबिद सों संबिदि होत भयो पुनि संस्कारि || 
मृतप्राय देह की दहन के द्वारा अंत्येष्टि यह संसूचित कराती है कि यह देश अपनी सम्यक अनुभूति के फलस्वरूप सर्वप्रथम संज्ञा पद को प्राप्त होते (नामधारक : - जैसे ये राम है, ये कृष्ण है ये शिव है )हुवे संस्कारित होता चला गया | 

जान जलहि सो बुझहि पिपासा  | बायु संगत चलहि जिमि साँसा  || 
बसत चले  तरंगिनि तीरा | तीर तीर भए मानस भीरा || 
जल ही जीवन है जल से ही तृष्णा का क्षय होता है वायु के संगत स्वास का संचरण होता है  यह संज्ञान कर प्रथम सभ्य मानव जाति अनूपग्राम में अधिवासित होती गई  इस प्रकार नदियों के समस्त तटवर्ती क्षेत्र मानव समूह से संबाधित हो गए | 

प्राग भारउ पारु परजंता | लेखि  सिंधु सरित सीमांता  || 
मझारि भाग लिखि सुर गंगा | चली परसति बीर भू बंगा || 
हिमालय पर्वत के अग्रभाग के उस पार तक सिंधु नदी ने इस देश की सीमारेखा उल्लेखित कर तत्पश्चात  मध्य भाग को देवनदी ने रेखांकित किया गया जो वीरभूमि ( बंगाल का प्राचीन नाम ) वंग-प्रदेश को स्पर्श करती हुई प्रवाहित होती है | 

हेलमिली सागर सों आनी | सीँव किए त्रय पयधि के पानी || 
उतुंग सिखर गगन करि चिन्हा | पर्कृति जनु पाहरु बर दिन्हा ||
और आकर सागर से सम्मिलत हो जाती है त्रिसिंधु के जल से इसकी सीमाएं आबद्ध होती है | हिमालय का ऊँचा शिखर गगन पर की सीमाऍं को चिन्हित करता हुवा इसके ऊँचे शिखर से युक्त हिमालय पर्वत को प्रकृति ने जिसे वरदान स्वरूप दिया है | 

प्राग समउ कृसानु परजारा | रहि अतिसय सो कारज भारा  || 
तासु सजोवन कुंड बनाईं | काल परे हबि गेह कहाईं || 
प्राचीन समय में अग्नि को प्रज्वलित रखना कठिनाई से भरा हुवा कार्य था इसके संकलन हेतु कुंड की रचना की गई कालान्तर में यही कुंड हवन कुंड में रूपांतरित हो गए || 

दियो जगत कर हल रु हथौरे  | काठि करित बहु कटक कठौरे || 
पूजत तरु अरु पशुपतिनाथा | भूमि मातु कह नायउ माथा || 
हल-हथौड़े देकर विश्व को यंत्रों से युक्त किया | वृक्ष और  पशुपतिनाथ वंदना कर भूमि को माता कहकर  सैधव नतमस्तक होता | 

करम खेत हलमारग रेखे | भाग रेख निज निजहि उलेखे || 
इष्टका चित भवनु गच ढारिहि | गढ़े चाक गहि बसहा गारिहि || 
कर्मों ने  खेतों में हलमार्ग अवरेखित कर अपनी भाग्य रेखा को आप ही उल्लेखित किया |  इष्टिका निर्मित परिपक्व भवनों को संरचित किया | चक्र गढ़े  वृषभ वाहन ने ग्रहण  | 

करषत भूमि हलहि कर धारी ससि संपन्न जग करे | 
भवन भरयारी भयउ भंडारी भूति केर भंडार भरे || 
मधु मकरंदु सोंहि मधुरि गहत रसन रसन मधुरई बसे | 
दिसा दरसावत सदन सदन सुभ सुवास्तिका लषन लसे || 
हल धारी हाथों से भूमि का कर्षण कर  इस विश्व को अन्न से समृद्ध किया |  भरेपूरे भवनों के भण्डारपति होकर संसार को ऐश्वर्य से परिपूर्ण किया | मधुरस से माधुर्यता ग्रहण की तब जिह्वा जिह्वा में मधुरता वास हुवा  को दर्शाते हुवे सदन सदन में स्वास्तिका का मंगल चिन्ह सुशोभित होने लगा || 

भेष भूषन बसाए तन भाष बिभूषित भास् | 
करत करषि निपजाइआ जौ कन कनक कपास ||  
भेषाभूषण आभारित देह थी और भाषा अलंकारों से सुसज्जित थी | कृषि करते हुवे वह जौ कणिकाएं गेहूं और कपास की उपज व्युत्पन्न करते  | 

बासन संग बसे पुनि भूषन  | बरतत  कतिपय सील आचरन || 
त बसि श्री भए श्रील सब देहा | धरे भूति श्रीधर भए गेहा  || 
तत्पश्चात उत्तम वेशभूषा के साथ भूषणों का निवास हुवा | और मनुष्य सभ्य होते हुवे यत्किंचित शील व् सदाचरण का  व्यवहार करने लगा तब मानव देह शोभा से संपन्न हो गई  और जगत विभूति को धारण किए समस्त गृह- गृह  गृहस्वामियों से सुशोभित होने लगे | 

पर्कृति रूप तोय तरु पूजत | गढे देइ कह मृण्मय मूरत || 
सिल्प कला संगत धनवाना  | पूरबल किएँ कलाकृति नाना || 
प्रकृति के प्रतिक स्वरूप जल व् वृक्ष की वह वंदना करते मृण्मय मूर्तियां गढ़कर उन्होंने उसे देवी कहकर पुकारा | शिल्प कला के तो वह धनी ही थे उस प्रागकाल में भी नाना भांति की कलाकृति करते  | 

चहु पुर सुरुचित नगरु प्रबन्धन  |  बनाइ नाव करिहि नौकायन || 
कतहुँ त चलिहि चरन धर चाके | जोरि भवनन इष्टिका पाके || 
चारों ओर एक सुव्यवस्थित नगर प्रबंधन था यातायात के साधन हेतु नौका निर्मित कर वह नौकायन करते | कहीं कहीं तो वह चक्रयान द्वारा परिचालन किया करते  | उनके भवन परिपक्व इष्टिका से संरचित थे | 

परिघा परसु कि छुरपर आरा | रचे आजुध रचत कुलहारा || 
मंगल परब बजावहि ढोला | दियो जगत ए ग्यान अमोला || 
कुल्हाड़ी की रचना के साथ ही  परिघा, फरसा, क्षुरप्र व् आरे आदि आयुधों का आविष्कार किया | मंगल पर्व में वह ढोल बजाते हुवे संसार को अनमोल यह ज्ञान दिया | 

जीवन धन सहुँ साधन धारत  | धरम सापेख  बहुरि ए भारत || 
प्रचरत चोख चरन संसारत | उन्नति गिरन्हि सिखर बिराजत || 
 तदनन्तर जीवन धन के संगत सुख साधनों को धारण कर द्रुतगति से संचालित होते हुवे यह भारत धर्मसापेक्ष होकर उन्नति गिरि के शिखर पर विराजमान हुवा | 


बाहि परच दए चले अगाड़ी | पूजत बैला बिरचत गाड़ी || 
जब जग धरनि धरै नहि पाँवा | तासु चरनन्हि चाक बँधावा || 
भारत  ने वृषभ की चरण वंदना  कर बैलगाड़ी की रचना की और वाहन से परिचित हुवा  जब अन्य देश अपने चरणों पर स्थित भी नहीं हुवे थे तब वह चरणों में चक्र विबन्धित किए अग्रदूत के पद पर प्रतिष्ठित होकर प्रगति के पथ पर अग्रसर होता गया  |


अर्थ ते बड़ो धर्म किए नेम नियत यह देस |

प्रगति केरे पंथ रचत देत जगत उपदेस || 
अर्थ की अपेक्षा धर्म को प्रधानता देकर इस देश ने प्रगति के पंथ का निर्माण किया  व् कतिपय नियमों का निबंधन कर विश्व को उपदेश देते हुवे कहा : - 

अर्थ तै रचित एहि पंथ  धरम करम कृत सेतु |
जीवन रखिता होइ के बरतिहु जग हित हेतु || 
पथ की अपनी मर्यादा होती है अर्थ के द्वारा निर्मित यह प्रगति पंथ भी धर्म व् कर्म की मर्यादा से युक्त हो |  जीवमात्र की रक्षा करते हुवे विश्व कल्याण के हेतु इसका व्यवहार हो |

मंगलवार,०१ जनवरी २०१९ सम्पादित                                                                                       

सैंधु सुघरपन जेसिउ पावा | बैदिक धर्महि किअउ प्रभावा || 
लखि गिरादि देउता देई | तासु ए धर्म भवन गहि नेईं || 
 सिंधु सभ्यता जिस भांति ज्ञात हुई उससे वैदिक युग भी प्रभावित रहा | लक्ष्मी,सरस्वती आदि देवी देवता ने इस युग में प्रादुर्भूत धर्म के भवन की नींव रखी |  

भाजन माहि किन्ही अहारा | प्रसाधन सों करत सिंगारा ||
मनिमय मुकुता मनकाभूषन | रचत बसन भए भूषित जन जन ||
भाजनों में भोजन करते हुवे यह नाना प्रसाधनों से अपना श्रृंगार करते | वस्त्रों की रचना के सह मणिमय मुकुता व् मनकों के आभूषणों से इस सभ्यता के लोग सुसज्जित रहते | 

परबोत्सव रु बाजैं ढोला | धरे देह सुठि सुन्दर चोला || 
तरु सिउ पूजन सथिया चिन्हा | कहत ताहि विद सैंधव दिन्हा || 
पर्वोंत्सवों में ढोल बाजे का प्रयोग देह में सुरुचित सुन्दर वस्त्रों धारण करना | वृक्षों एवं भवगवान शिव का पूजन के साथ स्वास्तिक का चिन्ह आदि सिंधु सभ्यता की देन है ऐसा इतिहासकारों का कहना है | 




सोमवार, ३० जुलाई, २०१८                                                                                           

सहस चतुरारध बत्सर आगे | तीनी अरध पूरबल लागे || 
उदयत सिंधु सरित तट सोंही | एहि सुघरता अस्तगत होंही || 
सिंधु सरिता के तट से इस सभ्यता उदयास्त का काल साढ़े चार सहस्त्र वर्ष पूर्व से लेकर साढ़े तीन सहस्त्र वर्ष पूर्व तक रहा || 

किछु कलिसाइ बरत निज भासा | लिखेउ ए भारत के इतिहासा || 
भूति भवन कि जन जीउनाई | गयउ कालन्हि गरक समाई || 
कतिपय आंग्लभाषी ईसाईयों ने अपनी व्यवहार जनित भाषा से भारत का यह इतिहास उद्धृत किया | वह ऐश्वर्य हो भवन हो कि जनजीवन, सभी काल के गर्क में समाहित हो गए | 

सिंधु सुघरता कस बिनसायो | बुद्धिजीबि मत भिद भरमायो || 
प्रवान बिनु कीन्हि अनुमाना | अनेकानेक जगत बिद्बाना || 
सिंधु सभ्यता का पतन कैसे हुवा इस सम्बन्ध में बुद्धिजीवों के मतों में भेद है जो सटीक न होकर भ्रम जनित हैं | अनेकानेक जगत पुरातात्विक वेत्ताओं ने प्रमाण विहीन अनुमान किए | 

सिंधु नगर बसेउ भा कैसे | कत कब गै कैसेउ बिनैसे || 
को कहँ बाढ़ कोउ भूचाला | को कहिब आपस जनित अकाला || 
सिंधु नगरी कैसे वासित हुई फिर यह क्यों कब व् कैसे विनष्ट हो गई | किसी इसका कारण बाढ़,  भूकंप कहा तो किसी ने आपदा जनित अकाल को इसका कारण संज्ञापित किया  | 

सँस्कारगत भारत पुनि  एक संस्कृति सँजोए । 
जगत सिरोभूषन होत  पूरन उदयित होए ॥

भावार्थ : -- पाषाण युग के भारत की मानसिक शिक्षा सहित समय समय पर परमार्जन व् सुधारीकरण के पश्चात पुनश्च एक सभ्य-संस्कृति ने जन्म लिया और विश्व  के सिरमौर होते हुवे भारत-वर्ष के रूप में इसका पूर्ण अभ्युदय हुवा ।|

मंगलवार, ३१ जुलाई, २०१८                                                                                                      

जेहि प्रगति पथ ए  देस रचाए | जाग बिनहि जग धावतहि जाए ||
चढ़े सिरोपर बिकासि भूता | होड़त बनन बिनास के दूता || 
इस देश ने जिस  प्रगति पंथ की रचना की थी जागरूकता के अभाव में वर्तमान जगत उस पंथ पर  दौड़ता ही चला जा रहा है उसके शीश पर मानो विकास का भूत आरोहित हो गया है और विनास का दूत  बनाने के लिए एक अंधी स्पर्धा हो रही है | 

आँग्लभाषि कै ए मत आही  | बसत नगर जौ भवनन माही || 
भूति बिभूति भौति भव भोगा | समरथ सील सुघर सो लोगा || 
पाश्चात्य संस्कृति के आविर्भावक  आंग्लभाषियों का एक ही सिद्धांत है जो भवनों में निवासरत नगरों के निवासी  है जो सांसारिक ऐश्वर्य के भोक्ता है एवं अतिसय भौतिकवादी है वही सामर्थ्यशील  हैं वही  सभ्य व् सुसंस्कृत  हैं | 

बसत गाँव सो होत गँवारू | अनगढ़ सब बसबासित बनहारू || 
तन बर बसन न भोग बिलासी | अनपढ़ ताहि कहत उद्भासी || 
 ग्रामीण  जन उज्जड व् जो घने जंगलों के निवासी नितांत ही असभ्य होते हैं | जो उत्तम उत्तम वस्त्र धारण नहीं करते जिनकी जीवन चर्या में भोग विलासिता नहीं है उन्हें वह अशिक्षित कहकर उद्भाषित करते हैं | 

जौ मनमानस मति ते दूरा | जीव हंतु ब्यालु इब क्रूरा || 
हित साधन हुँत पसुवत होई | अनगढ़ अनपढ़ जग महुँ सोई || 
वस्तुत: जो मनोमस्तिष्कसम्यक ज्ञान से रहित है जो जीवों के हत्यारे हिंसक जंतुओं के समान क्रूर स्वभाव के हैं, अपनी स्वार्थसिद्धि हेतु जो पशुवत आचरण करते हैं संसार में वही अशिक्षित व् असभ्य है |  

सुघरपनहु जिन दरस लजावा | परनकूटि कृत करनिक छावा || 
बेस बिपिन ऋषिमुनि हाथा | रचे बेद ग्यान मय गाथा || 
सभ्यता जिनके दर्शन कर लज्जित हो जाए कोपलों व टहनियों से निर्मित पर्णकुटी में निवासरत  वनों के वासी उन  ऋषिमुनियों परम ज्ञानमय वेदों की रचना की गई जोआंग्लभाषियों के सिद्धांत पर प्रश्नचिन्ह हैं  | 

आए बहुरि सो काल जब रचे बेद बिद बेद । 
पुनि आँगुल भाषिया बर भेद नीति करि भेद ॥ 
तदनन्तर  उस काल का आगमन हुवा जब वेदों की रचना हुई । भारत और भारतीयों में विभेद कर आंग्लभाषी ईसाईयों ने पुनश्च भेद नीति का प्रयोग किया विभाजन पश्चात् भारत के तात्कालिक सत्ता धारियों ने इसका अनुमोदित किया || 

हीन दीठि ते दरसत बेदा | भेद नीति सहुँ करिअ बिभेदा || 
कछुकन असाहितिक परसासी | आर्य पर दुइजाति सँभासी || 
 वेदों पर हीन दृष्टि निक्षेप करते हुवे कतिपय असाहित्यिक प्रशासियों ने भेदनीति का आश्रय लेकर आर्यों को विभेदकर उसे द्विजाति कहा | 
  बेद बचन कहँ भदरजन जेतु | एहि सबद ताहि संबोधन हेतु || 
भंग देस कर सत्ता धारी | अधभरमनआ  कहत पुकारी || 
जबकि वेदों में आए वचन अथवा मन्त्रों में जितने भद्रजन थे यह आर्य शब्द उनके सम्बोधन हेतु उच्चारित किया गया | 

मूलगत कहुँ करत निर्मूला | मौलिकपना केर प्रतिकूला || 
कतहुँ त लिखिया यहु पसुचारी | कतहुँ लिखे नहि नहि बैपारी || 
इस प्रकार  निर्मूल करते मौलिकता के प्रतिकूल होकर कहीं तो इन्हें पशुचर उल्लेखित किया गया, कहीं कहा गया नहीं नहीं ये व्यापारी थे || 

सिंधु तीर बुए बिअ गह मूरा | बैदिक जुग अरम्भत अँकूरा || 
दिवस गहत बिरतत गै काला | बिकसत गत भए बिटप बिसाला || 


बरन हीन जग रहे जब आखर ते अग्यान | 

भूषन भूषित भाष ते लेखे बेद पुरान || 


शब्दहीन यह विश्व जब अक्षरों से भी अनभिज्ञ था तब इस देश ने स्वर-व्यंजनों व् अलंकारों द्वारा विभूषित भाषा से वेद पुराण जैसे ग्रन्थ लिखे | (कालान्तर में औपनिवेषिक शोषण के कारण यह देश अशिक्षित होता चला गया )

ऋग यजुर साम अथर्व रहेँ वेद कुल चारि | 
भूसुर क्षत्री बनिज क्षुद्र ए चातुर बरन अधारि || 

शुक्रवार, ०३/६ अगस्त, २०१८                                                                                           

रचेउ जेहि धर्म धुर धीरा | ऋषिमुनि बसि बन परन कुटीरा || 
ब्यास पीठ भूसुर सुजाना | बाँचत देइ जाके ग्याना || 
जिन्हें वनों में निवासित व् पर्ण कुटीर में अधिवासित धर्म की धुरी धारण करने वाले ऋषि मुनियों ने रचा था | व्यास पीठ पर
विराजकर सुबुद्ध ब्राह्मण देव  जिन ग्रंथों का व्याख्यान कर जनमानस को ज्ञानवान करते हैं ये वही वेद-पुराण हैं | 

अचलाधिप कर तलहटि पासा | बिँध्याचल परबत संकासा || 
पूरबापर सिंधु तट खेता | बसेउ द्विजप देस निकेता || 
हिमालय के तटवर्ती क्षेत्र से लेकर विध्याचल पर्वतके निकटवर्ती क्षेत्र व् पूर्वी समुद्र तट से लेकर पश्चिमी समुद्री तट का क्षेत्र आर्यों का निवास-स्थान था | 

कतहुँ त जगोपबित अभिजाता | कतहुँ निबासीहि कोल किराता || 
बसे जदपि कुटि जाति ए दोई | एक सुग्घड़ दुज उज्जड होई || 

ताम काँस सुबरन करि टोहा | बैदि जुग गत टोहेउ लोहा || 
करत बहुरि पाहन परिसोधा |  किए सो लौह कुसल जग जोधा || 
तांबा, कांसा व् स्वर्ण का अन्वेषण कर पाषाण का पुनश्चा परिष्करण करते हुवे  इस देश ने वैदिक युग में लोहे का अन्वेषण कर विश्वभर के योद्धाओं को अस्त्र-शास्त्रों से युक्त किया | 


जबहि जगत कर  धातु लहावा  | अधुनै काल धरिअ तब पाँवा || 
संगत यन्त्र तंत्र संयंता | भय पुनि प्रगति पंथ के गंता  || 
भारत ने जब जगत को धातु से युक्त किया तभी उसका आधुनिक काल में प्रवेश हुवा व् यन्त्र-तंत्र- संयंत्र के संगत वह भी प्रगति पंथ पर संचरण के योग्य हुवा | 

करतब कर पुनि पाइये यह उपधारन धार । 
बनचरनी अपावन मन सोधन करे विचार ॥
कर्म करो तत्पश्चात ही फल का सेवन करो  सम्यक चिंतन के पश्चात् यह बुद्धि आई किन्तु ज्ञान नहीं आया । मनुष्य का पशुवत स्वभाव जब यथावत रहा तब उसने वनचारी अपवित्र मन को पवित्र करने का विचार किया ॥ 

भाजन सोहि अगन बसबासी  | जदपि श्रील सब गेह निबासी || 
भूषन बसन तनु बास बसाए | रहेउ मलिन मन बिहुन धुराए || 
भजनों के संग अग्नि का निवास  के साथ यद्यपि सभी गृह शोभवान  हो चले थे देह रूपी निवास  में वस्त्राभूषण को वासित  करने के पश्चात भी  मनुष्य का परिशोधन से रहित अंतरतम मलिन था | 

जब लग धातु गहे मलिनावा | धोवत तासु न मल बिलगावा || 
तब लग कहे न निज गुन गाना | पाषान सहुँ रहे पाषाना || 
 धातु जब तक मलिनता से युक्त होती है व परमार्जन द्वारा मल से पृथक नहीं होती  तब तक वह अपना धात्विक गुण प्रकट नहीं करती और पाषाण के संगत पाषाण ही रहती है || 

मानस पाहन एकै सुभावा | धोए बिनहि धिग मर्म न पावा || 
कछु बुध प्रबुध पठत संसारा  | ताहि सोधन किन्ही बिचारा || 
 कतिपय बुद्ध प्रबुद्धों की बुद्धि ने  विश्व का सम्यक चिन्तन व् अध्ययन कर निष्कर्ष निकाला कि मलिनता से युक्त यह मानव  देह व्  पाषाण  का एक ही धर्म है एक ही स्वभाव है | सम्यक शुद्धि के बिना उसके मर्म को प्राप्त करना असंभव है एतएव मानव  को भी परिष्कृत होकर शुद्ध होना चाहिए |  

धातु संग सो होइब धाता | होतब गयउ जातिमत जाता || 
एहि बिधि द्विजप तैं निर्माना | उदइत भए नव जुगहि बिहाना || 
इस परिमार्जन के पश्चात ही भारतीय जनमानस धातुमय होते हुवे पालन पोषण करने वाले मातृत्व व् पितृत्व भाव को प्राप्त हुवा  जो पशु व् पाशविक प्रवृत्ति के मनुष्य में न्यूनतम पाया जाता है इस शुद्धिकरण के फलतस उसकी संतान अभिजात्य होती चली गई | इस प्रकार कतिपय अभिजात्य वर्ग द्वारा निर्मित इस वैदिक सभ्यता के अभ्युदय के फलस्वरूप मानव जाति के एक नए युग का प्रारम्भ हुवा | 

नर नारिसु सँजोग करत  रचे सुधित परिबारु  । 
समुदाय पुनि समाज भए, परिबारु समाहारु || 
स्त्री-पुरुष के सम्यक एवं पारस्परिक सु-सम्बन्ध पारिवारिक इकाई का निर्माण किया, परिवारों के समाहार से कालान्तर में समुदाय एवं समाज निर्मित हुवे  ॥ 

मंगलवार, ०७ अगस्त, २०१८                                                                                       

समबहारित समित समूहा | लोकत नाउ धरत जन जूहा || 
बसा बसति जब बसिहि सुखारा | बहुरि सुधिजन कीन्हि बिचारा || 
प्रबुद्ध जनों की बुद्धि ने फिर यह विचार किया  आवासों में अधिवासित यह मानव अब जन (प्यूपिल )की संज्ञा को प्राप्त हो गया अब इसका एक बाह्यजगत व् दूसरा अंतर्जगत हैं ॥ 

अजहुँ त तिनके दुइ संसारा | एक अंतर गह एक बहियारा || 
भीत जगत करत संस्कारित | बहियर कीन्हि करम अधारित || 
अब मानव के दो संसार हो चले थे, एक अंतर्जगत का तो एक बाह्यजगत का संसार | अंतर्जगत के संसार को उसने संस्कारों का आधार प्रदान  करते हुवे बाह्यजगत के संसार को कर्म  पर आधारित किया | 

भूषन बासन बसन सँवारे | लेख बद्ध कृत दुनहु सिँगारे || 
कछु नेम धर्म सहुँ घर बाँधे | कृत्याकृत्य सोंहि कर साधे || 
आवास, वस्त्राभूषण भूषण  से सुसज्जित कर लेखाबद्ध करते हुवे दोनों ही जगत श्रृंगारित हुवे | कतिपय नियम  धर्म के पालन की परिपाटी से गृह को अनुशासित  कर बाह्यजगत हेतु हस्त को करने  न करने योग्य कार्यों से  प्रतिबंधित  किया | 

अनूप गाउँ बसत चलि आईं | बहुरि जनपद माहि परिनाई || 
जनपद नगरिहि रूप धरायो | बासित जन नगरीअ कहायो || 
नदी तट पर समूह  में निवास करते चले आए कालान्तर में यह ग्राम्य जनपद में परिणित हो गए शनै: शनै: इस  जनपद ने नगर का आकार ग्रहण कर लिया और इस प्रकार नगर में निवासित जन समूह नागरिक की उपाधि को प्राप्त हुवा  | 

अजहुँ नगर चहिब को जन संचारन परबन्ध | 
बसि जनहि जौ बाँध सकै रचत नेम अनुबंध || 
अब इस नगर को एक जनसंचालन तंत्र की आवश्यकता अनुभूत होने लगी जो किंचित नियम-निबंधों की रचना कर निवासित जन समूह को अनुशासित कर सके | 

बुध/गुरु , ०८/०९ अगस्त, २०१८                                                                                                       

देस धुजा कि धुजीनि कि धानी | रहि ए भारत देसु कहुँ बानी || 
तासु बखानत बेद पुराना  | प्राग रूप महुँ देइँ प्रमाना || 
 'राष्ट्र' शब्द की परिकल्पना हो चाहे राज्य अलंकरणों की, एतिहसिक चिन्ह व् वृत्तांत इसका प्रमाण हैं कि ये राज्यांग ( राजा, अमात्य,राष्ट्र,  दुर्ग कोष बल मित्र  ध्वज आदि ) भारत की ही संस्कृति रही है,जिसका व्याख्यान वेद-पुराण करते हैं | 

लोक राज सासन बिधि दोईं | दुहु जनमानस हित हुँत जोईं || 
राज जहँ तहँ राज कै नीती | लोक जहँ तहँ बिपरीत रीती || 
लोक व् राजतंत्र ये दो प्रकार की  शासन प्रणाली प्रचलित थीं दोनों प्रणाली जनसामान्य के कल्याण का उद्देश्य सन्नद्ध थीं जहाँ राज तांत्रिक प्रणाली प्रचालन में थी वहाँ शासन की नीतियां  तो जहाँ लोकतांत्रिक प्रणाली प्रचलित वहां अनुशासन के नियम निबंधन थे | 

हेरत सासक बैदिक काला | करत सुगमतम जन परिचाला ||  
गठत किछुक नै नेम नियंता | रचि सो जन पालक जन कंता || 
जनसामान्य के सुगम संचालन हेतु कतिपय नियम व् निबंधंन की रचना करते हुवे वैदिक काल ने जनपालक व् लोकपति के रूप में शासक का निरूपण किया | 

कहत सरब मानी इतिहासा | मानस कर जन रूप बिकासा || 
भारत खंड माहि सो भयउब | जन संचारन तंत्रन दयउब  || 
यह सर्वमान्य इतिहास का कथन है कि विश्व को जन संचालन तंत्र प्रदत्त करते हुवे मानव जाति का सम्पूर्ण विकास भारत खंड में ही हुवा || 

राज कि जन तंत्र एहि बिधि, हेरे बैदिक  काल । 
घन बन बसति बसाइ के बासत बीच ब्याल || 
इस प्रकार वर्तमान में प्रचलित राज व् लोक सहित समस्त शासन प्रबंधन तंत्र सघन वनों में एवं हिंसक जंतुओं के मध्य वासित वस्तियों में निवासित वैदिक युग का ही अन्वेषण है | 


Wednesday, June 27, 2018

----- || प्रभात-चरित्र १ || -----

बुधवार, २८ जून, २०१८                                                                           

सरिदबरा की धार ते, पयदबान जौ देस | 
तीन देउ रच्छा करें ब्रम्हा बिष्नु महेस || १ || 

पद पद सदोपदेस इहँ ग्रंथ ग्रंथ सद ग्रंथ | 

भगवन पाहि पहुँचावैं दरसावत सत पंथ || २ || 

कहत भूमि निज मात जहँ रतनन कइँ आगार | 

भवन भवन भव भूति सों भरे पुरे भंडार || ३ || 

धौल गिरि के मौलि मुकुट जाके सीस सिँगार | 

तीन सिंधु कर जोरि के करिते चरन पखार || ४ || 

सील चरित के भूषना भाव भगति के भेस | 

बास बास हरि बास जहँ परम पवित परिबेस || ५ || 

यह देस सो देस जहां रहँ सब जीअ सुखारि । 
राम रमे बन बन तहाँ कुञ्ज कुञ्ज गिरधारि ॥६ ॥ 


जेहि देस कर मानसा रहे सहित परिबार | 
ताहि सीस नवाई के बन्दै चरन जुहार || ७ || 

भावार्थ : - गंगा जी की पवित्र धाराओं से जो देश सदैव पयस्वान ( जल से परिपूर्ण ) रहता है | ब्रह्मा, विष्णु महेश  जिसकी रक्षा करते हैं || १ || जहाँ पद पद पर सदोपदेश मिलते हैं, जहाँ के प्रत्येक धर्म ग्रन्थ धर्म के चार चरणों पर स्थित होकर सत्ग्रन्थ है जो  सन्मार्ग को दर्शाते हुवे ईश्वर के पास पहुंचाते हैं || २ || जिस देश में धरती को माता कहकर पुकारते हैं वह रत्नों की खान है वह धन धान्य से सम्पन्न है भंडारों को परिपूर्ण रखती है || ३ || जिस देश का शीश हिमालय पर्वत के शिखर मुकुट से श्रृंगारित  है, तीन सिंधु करबद्ध होकर जिसके चरण का प्रक्षालन करते हैं || ४ || शील व् चरित्र ही जिसके आभूषण हैं भाव -भक्ति जिसकी वेशभूषा है जहाँ का प्रत्येक निवास ईश्वर के निवास के समतुल्य है जहाँ का परिवेश परम पवित्र है || ५ || यह देश वह देश है एक समय जहाँ संसार के सभी जीवंतकों को जीवन का अधिकार था यहां वन वन में भगवान श्री राम का व कुञ्ज कुञ्ज में गिरधारी का वास हुवा ॥६ ||विद्यमान काल में भी जिस देश का जनमानस कुटुंब सहित निवास करता है  नतमस्तक होकर हम उस देश की चरण वंदना करते हैं || ७ || 

बृहस्पतिवार, २९ जून , २०१८                                                            

सत सत बंदन सो बिद्बाना | साधक गुरु जग सिद्ध सुजाना || 
आखरि ग्यान देयब मोही | कीन्हि धनि बिद्या मनि सोंही || 
उन विद्वानों का सत् सत् अभिवंदन है जो साधक है ज्ञानी है व् जगत सिद्ध गुरु है | जिन्होंने मुझे अक्षर ज्ञान देकर विद्या रूपी धन से धनवान किया | 

जाके बल मसि धरिअ उजासा | धर्म बिकासत पाप बिनासा || 
तासु कृपा सुर बिंजन माला | रररत होइँ मूक बाचाला || 
उस विद्या मणि की शक्ति से ही मलिन मलिनांबु ने उज्वलता धारण कर अधर्म का विनाश और  धर्म का विकास किया | उनकी कृपा से ही  स्वर व् व्यंजन मालाओं का अध्ययनोभ्यास कर यह मूक मुख भी वाचाल हो गया | 

सो गुरु दीप सीख भै जोती | पोथी सीप बरन कर मोती || 
चुनि चुनि पुनि मोरे कर धरयो | तामस अंतर गेह उजरियो || 
वह गुरु दीप स्वरूप व् उनकी  शिक्षा ज्योति स्वरूप है सीप स्वरूप पुस्तकों व ग्रन्थों से जिन्होंने शब्दों के मुक्ता को चुन चुन कर मेरे करतल पर अवधारित कर मेरे अंधकारमय अन्तर गृह को ज्योतिर्मय कर दिया || 

आन आन रतनन सन लस्यो  | रचत भनित मय भूषन बस्यो || 
बचन देसु रह निपट कुबेसा | भाष भेस दए कियउ सुदेसा || 
यह मुक्ता अन्यान्य रत्नों के संग सुशोभित होकर काव्यमय रचना के आभूषणों में निवासित हुवे | मेरा वाक्य देश का वेश नितांत ही निकृष्ट था किन्तु गुरुजनों ने भाषा के उत्कृष्ट वेश देकर इस देश को सुन्दर व् रमणीक देश में परिणित कर दिया |  

जानब सो सब सुबुधजन मम हरिदय तम घोरि | 
चरन चरन सचेत कियो चेतत जड़ मति मोरि || 
मेरे ह्रदय के घोर अन्धकार को भानते हुवे वह सभी सुबुद्ध जन मेरी जड़तम बुद्धि को चैतन्य कर चरण-चरण पर मुझे संज्ञावान करते रहे | 

शनिवार, ३० जून, २०१८                                                                                             

यहु अनंत अम्बर इब अंका | गुरूगह ताल जगति जस पंका || 
सकल गुरुजन अरबिंदु बृंदा | सिस अलि गन ग्यान मकरंदा || 
यह अनंत अम्बर एक स्थली के व् मानवीय संसार कीचड़ के समरूप है जहाँ गुरुशाला सरोवर के समान है | सभी गुरुजन कमल स्वरूप हैं,  शिष्य भ्रमर के तथा ज्ञान मकरंद के सरिस है | 

जौ सिस मिरदा गुरु घटकारा  | सार देइ घट लेइ अकारा || 
तीर तलावा जल भरि लावा | तृषा हरत सो जगत सुहावा || 
शिष्य यदि कच्ची मृदा है तो गुरु कुम्भकार है उसकी शिक्षा रूपी सार के द्वारा शिष्य कुम्भाकृति को प्राप्त होता है | इस आकृति के पश्चात वह पात्र स्वरूप हो जल स्त्रोतों से जल भरने में समर्थ होकर जिज्ञाषा रूपी पिपाशा को शांत करते हुवे संसार में सुशोभित होता है | 

अंक तंत्र गुरु मोहि जनावा | काल गतिहि पुनि गनि मैं पावा || 
भौनत भूमि भानु के मंडल | भूतमय भौति जगत चलाचल || 
गणित शास्त्र के गुरु के ज्ञान मकरंद ने  मुझे काल की गणना करने में समर्थ किया | भूमि सौर्य मंडल में घूर्णन करती है यह भौतिक जगत पदार्थमय है जो चल व् अचल दो प्रकार की गतियों से युक्त है यह भी मुझे गुरु के ज्ञान मकरंद से ही ज्ञात हुवा | 

नगर नगर बन नग नद नावा | देस दिसा कर पुनि सुमिरावा || 
जान रसायन जगि जिग्यासा | जानेउ सबहि जग इतिहासा || 
नगरों तथा नगरों में स्थित पर्वतों नदियों के देशों के तथा विभिन्न दिशाओं के नामों का स्मरण करवाया | रसायन विज्ञान का ज्ञान ग्रहण जब जिज्ञासा जागृत हुई तब मैने समूचे विश्व के इतिहास का परिचय प्राप्त किया | 

पाहन कर एहि जग निरजीवा | जीउ जंत ते होइँ सजीवा || 
अर्थ बिदूषक सीख दिए मोहि | अजहूँ त जगत अरथ गत होंहि || 
 जीव है जंतु है तभी यह संसार सजीव है अन्यथा यह पाषाणमय संसार निर्जीव है | अर्थ विदूषक ने मुझे शिक्षा दी कि अधुनातन यह जगत अर्थ पर आश्रित है (धर्म पर नहीं है ने यह ज्ञान गुरुओं की वाणी ने दिया )| 

बहिर जगत तेउ परचत दिए सीख ब्यौहारि | 
सकल बिद्याकर के कर अनगढ़ घट कृत कारि || 
बाह्यजगत का परिचय देकर मुझे इस गुरुशाला में व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हुवा  | इसप्रकार सभी विद्याकरों के ज्ञान  ने मुझ अनगढ़ को गढ़ कर  कुम्भ की आकृति प्रदान की | 

वीरवार, ०१ जुलाई, २०१८                                                                                                

दिसि बिनु नयन श्रवन बिनु काना | तन बिनु प्रान अर्थ बिनु दाना | 
धन ते पीन धरम ते दीना | होत कुम्भ तस कंज बिहीना || 
जल से विहीन कुम्भ की प्रकृति दृष्टि रहित नयन, श्रवण रहित कर्ण, प्राण रहित देह,  दान रहित अर्थ के तथा  धन से पुष्ट किन्तु धर्म से दीन धनवान के जैसे ही होती है | 

गुरु बिन गुन ग्यान नहि होई | कहिअ ए सुधि बुधिजन सब कोई || 
ग्यान बिनु जौ करिए बखाना | होइब फर बिनु बान समाना || 
 गुरु बिना ज्ञान उपलब्ध नहीं होता ऐसा सुबुद्ध जनों का कहना है | ज्ञान रहित व्याख्यान फल रहित बाण के समान होता है जो वांछित परिणाम नहीं देता | 

बिदयाकर दए घट आकारी | दूषन धारि कि गुन रस वारी || 
एक घट माया मद के गाही  | दूजे बरखत नभोद्बाही || 
विद्याकर अपने शिष्य को कुम्भ की आकृति प्रदान करते  है वह कुम्भ गुण व् दोष दोनों से युक्त  हो सकता है | एक कुम्भ माया रूपी मदिरा का धारक  तो दुसरा श्रावण मास के बरसने वाले बादलों जैसा हो सकता  है | 

भरोस बिनु न प्रीति के पोषा | ज्ञान दिसि बिनु दिसै न दोषा || 
पेम भक्ति सो अमरित धारा | तासों रहित सकल जल खारा || 
विश्वास से रहित होकर प्रेम पुष्ट नहीं होता और ज्ञानदृष्टि के बिना दोष दर्शित नहीं होते | प्रेम भक्ति से युक्त ज्ञान जल अमृत धारा के समान है उससे विहीन समस्त ज्ञान खारापन लिए होता है | 

निर्मल जल बरखाए ते बिकसै भनित निकुंज  | 
कबित कुसुम रस पाए के मधुप निकर करि गुंज || 
 प्रेम व भक्तिमय ज्ञान रूपी निर्मल जल के वर्षा से ही (युगकालीन )रचनाओं के निकुंज प्रस्फुटित होते हैं | कवित के कुसुम रस का पानकर उसपर कविता रसिक मधुकर के समूह सदैव गुंजन करते हैं, अर्थात प्रीति व् भक्ति मई ज्ञान रचनाए युग युग तक पठनीय होती हैं | 

सोमवार, ०२ जुलाई, २०१८                                                                                

धर्म ग्रन्थ श्रुति बेद पुराना |  अहँ पनियन केरे तट नाना || 
परम पुरुख सुभ कीन्हि चरिता | मोरे कलस हुँत भयउ सरिता || 
श्रुति वेद पुराणों सहित समस्त धर्मग्रंथ ज्ञान जल के विभिन्न स्त्रोत हैं इनके सहित महापुरुषों द्वारा कृत चरित्रावलियाँ मेरे कलश हेतु ज्ञान सरिता हुवे | 

साधु सुजन संतन करि बानी | होत गुनद अति निर्मल पानी || 
अस तौ बहत बहुंत परनाला | ताहि बरत जग करिअ कुचाला || 
साधू, सज्जन तथा संतों की वाणी भी अतिशय गुणदायक व् निर्मल जल स्वरूप है जहाँ से मुझे ज्ञानजल प्राप्त हुवा | ऐसे तो बहुंत से परनाले भी बहते दर्शित होते हैं जिसका उपयोग कर ही लोग कुत्सित आचरण करते हैं | 

अजहुँ त साधू संत भए थोड़े  | अधिक जोइ कहँ दिए जग छोड़े || 
कामिनि काँचन बासहि मन में | जति बलकल बसबासिहि तन में || 
विद्यमान समय में  साधू संत भी अत्यल्प हो गए | वह साधू संत अत्यधिक हो गए जो विरक्ति व् वैराग्य का दम्भ भरते हैं जिनके तन में तपस्वी का वेश विराजित रहता है किन्तु मन में स्त्री व् धन सम्पदा के प्रति कामासक्ति निवासित रहती है | 

बिनु सत्संग न होत बिबेका | बिबेक बिनु गुन दोषु रहँ एका || 
कलिमल सब अनभल संगोठी | काल कलुष कलंक करि कोठी || 
सत्संग के बिना हंस विवेक नहीं होता, विवेक से गुण- दोष को विभक्त करने का ज्ञान नहीं होता, इसके बिना यह एक से प्रतीत होते हैं | कलयुग की सभी संगोष्ठियां असाधुओं  की हो चली है ये सभी पापमयी व् दोषों से परिपूर्ण हैं अत: इस काल में सत्संग कठिन है | 

जाकी बानी बान समाना | जाकर पानि कटै पाषाना || 
सो सब जगगुरु सतगुरु मोरे | ता सहुँ रहौं सदा कर जोरे || 
जिसकी वाणी बाण के समान हो जिनके ज्ञान रूपी पाणी  (पानी इतना पैना होता है जो पाषाण को भी काटने में समर्थ  होता है युग के पाषाण काटने में वह भी असमर्थ होता है, पानी से पैना ज्ञान होता है ) युगों के पाषाण को  भी काटने में सक्षम है, वह सब जगत- गुरु मेरे सतगुरु हैं उनके सम्मुख ये हस्त सदैव जुड़े रहते हैं | 

बायन केहु दाहिन रहँ साँचा जिनका नाम | 

लोह परस भए पारसा तिनको सदा प्रनाम || 
जो अपने प्रतिकूल के भी अनुकूल रहते हैं सत्य जिनका नाम है जिनके स्पर्श से कुधातु स्वर्ण न होकर पारस हो जाता है उनको सदैव प्रणाम है |  

मंगलवार, ०३ जुलाई २०१८                                                                                   

अधुनै सब गुरु न कोइ चेला | करिअ मान मद संगत मेला || 
माया काया के भए  दासा | हिलग नित कीन्हसि सो हेला || 
अधुनातन तो शिष्य कोई नहीं है, सभी गुरु हैं जो नित्य मान मद के साथ इनका मेल-मिलाप है , ये माया व् काया के दास होकर इसके साथ नित्य ही राग-रंग में मग्न रहते हैं | 

अहहि जगत सत गुरु जो कोई | ता चरनन सब तीरथ होईँ || 
पग पग सन मारग दरसावै | अनुहारिहि  भगवद पद पावैं || 
इनमें में भी यदि कोई सतगुरु हैं तब निश्चित ही उनके चरणों में सब तीर्थ होंगे | वह चरण-चरण पर सन्मार्ग दर्शाते होंगे उनके अनुशरणकर्ता को अवश्य ही भगवद पद प्राप्त होगा | 

अजहुँ त जग जगदीस दुरायो | खेलन खावन माहि रमायो || 
जनजन धन सम्पद कै भूखे | गुन लच्छन नहि रस तै रूखे || 
विद्यमान समय में संसार से ईश्वर विलुप्त होते जा रहे हैं | समूचा संसार ही विषय भोग में ही संलिप्त हैं, जन-जन धन सम्पति की क्षुधा से ग्रस्त हैं अनीश्वरवादी होने के कारण उनमें गुण लक्षण का अभाव लक्षित होता है उनका जीवन नीरस प्रतीत होता है | 

कीरति कबित सुसम्पद सोई | जौ अग जग हुँत हितकर होई || 
भगतिमई कि ग्यान बिरागा | जासु बोध सोवत जग जागा || 
कीर्ति, कविता व् सम्पदा वही उत्तम है जो संसार भर के लिए कल्याणकारी हो | वह भक्तिमय हो अथवा ज्ञान मई हो या वैराग्य जनित हो जिसके बोधन से शयनरत जगत जागृत हो जाए | 

कीरत कबित सम्पत अस जे भगवद जन पाहि | 

सो अपार भव सिंधु सहुँ तरन हेतु जलबाहि || 
ऐसी कीर्ति, कबिता व् सम्पदा जिस भगवद जन के पास है | वह इस अपार भव सिंधु के पारग हेतु जलयान के समान है || 

बुधवार, ०४ जुलाई, २०१८                                                                                       

सबते मह बागीस बिधाता | सतगुरु साधु संत सुखदाता || 
जासु कीरत करत सब कोई | ता सहुँ जग कोबिद नहि होई || 
सबसे महतिमह कवि जगद्विधाता हैं वह सतगुरु व् साधु-संत स्वरूप सुख के प्रदाता हैं | जिसकी कीर्ति सभी सुबुद्धजन किया करते हैं उनके जैसे कविकुशल इस जगत में नहीं है | 

लिखे प्रथमतम अवनि अगासा | अनल अनिल पुनि दिए चहुँ पासा || 
चरन चरन जौं अरन न्यासा | ता संगत  एहि जगत बिकासा || 
सर्वप्रथम उन्होंने धरती व् आकाश लिखा ततपश्चात उसे वाय व् अग्नि से व्याप्त किया | चरण चरण पर जल न्यासित किया जिसके सनगत इस संसार का विकास हुवा | 

रचत नखत पथ रबि रजनीसा | बिरचिहि अहिर्निस दिसा बिदिसा | 
सिंधु सरित सर बन नग नाना | पुरयो भुइँ भव भूति निधाना || 
नक्षत्र का परिभ्रमण मार्ग रचकर सूर्य व् चन्द्रमा को रचा दिवस व् रजनी को रचकर ततपश्चात दिशा व् दिशाओं के कोण को रचा | समुद्र, नदी, सरोवर, वन व् अनेकानेक पर्वतों को रचकर इस भूमि को प्राकृति संपदाओं के भंडार से परिपूरित किया | 

रचत बहुरि भव सागर सरिबर | कीन्हेसि पुनि तिहु लोक उजागर | 
रचे जीवन मरनि के मंचा | दोषु गुन सन रचै परपंचा || 
इस संसार को सागर की भांति रचकर तत्पश्चात तीन लोकों को प्रकट किया | जीवन-मरण के  मंच की रचना कर दोष व गुण से युक्त सृष्टि को सृजित किया  | 

कीरत देह कबित सम प्राना | बिधस सम्पद हेतु कल्याना || 
गह अवगुन परिहर गुन कोषा | आपुनि भीत भरै सो दोषा || 
कीर्ति जीव देह हो गई प्राण कविता हो गए इस प्रकार विधाता की सम्पति देहधारियों के कल्याण हेतु नियोजित हो गई | फिर जिसने इस संसार में गुण कोष को त्यागकर अवगुण ग्रहण किए उसने अपने भीतर दोषों को संकलित कर लिया | 

कबहुँ भाग बिपरीत बिधि लेखिहि ससि सो राहु | 
अंत परै त  होइ भलो सो सब बिधि सब काहु || 
भाग्य के विपरीत विधाता ने कभी शशि के साथ उसे ग्रसने वाला राहु भी लिख दिया किन्तु अंत में यह भी सभी के लिए सभी प्रकार से कल्याणकारी ही सिद्ध हुवा | 

बृहस्पति/शुक्र, ०५/०६  जुलाई, २०१८                                                                                

जौ जगजीवन जग करतारा | बागिसरेसर जगदाधारा  || 
नमउँ अजहुँ सो अनंत अनादि | बंदत जिन मुनि देउ सनकादि || 
जो जगत के जीवन रूप परमेश्वर हैं जो जगत के कर्ता हैं जो जगत के आधार स्वरूप (जिनके आधार पर ही ब्रह्मा ने जगत की रचना की थी ) होकर ब्रह्मा के भी ईश्वर हैं जिसका नकोई अंत है न आदि है उन परमात्का को मेरा सादर नमस्कार है |  सनकादि (सनक= ब्रह्मा के पुत्र ) देव व् मुनिजन भी जिनके चरणों की वंदना करते हैं | 

सातु भुवन तिहु लोक उदारा | अबिनसवर अबिदित अबिकारा || 
बंदउँ कारज कारन रूपा | अनंद मय हरि बेद सरूपा || 
जिनके उदार में सप्त भुवन व् त्रिलोक अवस्थित हैं जो अविनाशी, अविदित व्  विकार से रहित हैं उन कार्य व् कारण स्वरूप आनंदमय वेदस्वरूप ईश्वर की में वंदना करती हूँ | 

भए पुरुषोतम हरि गुन सीला | औतर जग किन्ही बहु लीला || 
जबु जबु बरधिहि भू अघ भारा | तबु तबु प्रभु  लीन्हि औतारा || 
जगत में अवतरित होकर जिन्हें अपार लीलाएं की और गुण व् शील के निधाता होकर पुरुषोत्तम कहलाए | जब जब पृथ्वी पर पापों का भार बर्द्धित हुवा तब तब उन प्रभु ने अवतार ग्रहण किया | 

जासु कथा अगजग अनुहारिनि | पबित अतुल कलि कुल उद्धारिनि || 
अकुलीन को हो कि कुल हीना | कलुष हरत सो करत कुलीना || 
और अवतार स्वरूप उनकी कथाएं संसार भर के लिए अनुकरणीय हैं यह अत्यधिक पवित्र व् कलि तथा कुलों का उद्धार करने वाली हैं | 

भए स्वजन संकुल ए देस सब कुल कथा चरित नुहार के | 
राम रीति नीति निहछल प्रीति जोग लोक ब्यौहार के || 
ए चरित सोंहि भरेपूरे सबसुख साधन साम भयो | 
गेहनी सुहा गेहि स्वामिन गेह गेह सुरधाम भयो | 
इन कथाओं में विहित भगवान के अवतार चरित्रों का अनुशरण कर इस  देश के कुल स्वजनों से परिपूरित हुवे | दशम अवतार श्रीराम की रीति-नीति और निश्छल प्रीति तो सम्पूर्ण विश्व के व्यवहार योग्य है | इस चरित्र से से इस देश के गृह गृह सुख के साधन सामग्रियों से युक्त हुवे | गृहणी घर की शोभा कहलाई गृही को गृहस्वामी का पद प्राप्त हुवा और इस देश के घर घर देवधाम में परिणित हो गए | 

जहाँ नारी श्री सरूप पुरुख रूप श्रीमान | 
सुघड़ता गह होत तहाँ सीलवान संतान || 
जहाँ नारी शोभा व् विभूति व् सौंदर्य का स्वरूप होती है और पुरुष उसका धारक होता है|  सुसभ्यता ग्रहण कर वहां संततियां शील व् चरित्रवान होती है | 

शनिवार, ०६ जुलाई, २०१८                                                                                             

सत सत नमन सो शशि शेखरं | शिव शम्भु प्रभु गंगाधरं || 
जटालू धारी बाघाम्बरं | कंबु कर्पुर वपुर्धर धवलं || 
शीश शिखर पर चन्द्रमा एवं गंगा को धारण करने वाले प्रभु शिव-शम्भू को सत सत नमन है जटा धारण करने वाले, बाघ वस्त्र ग्रहण करने वाले, शंख व् कर्पूर से श्वेत श्री विग्रह वाले, 

भुजगेन्द्र हारं आत्मकं | कंबोज कंठ्य नील लक्षणं || 
भस्मभूति श्री अंग भूषणं | गरलपान कृतं त्रिलोचनं || 
गरल पान के कारण नील लक्षणी  शंख आकृति कंठ्य है जो  सर्प माल्य से युक्त है, उन त्रिलोचन धारी के अंग में भस्मविभूति भूषण स्वरूप है |  
जौ गौरी गिरि राज कुमारी | उमा पते बिरति तपोचारी || 
सर्वदेवमय सर्व कामदं | सर्व धनविन मर्दनं सर्वप्रदं || 
जो गौरी, गिरिराज कुमारी उमा के प्रियतम हैं तथा विरक्त तपस्वी हैं | सर्वदेव  निवास स्वरूप , समस्त कामनाओं को पूर्ति करने वाले, कामदेव का मर्दन करने वाले, सर्वस्व देने वाले वह प्रभु-  

बिधिस परपंचु कर संहारी | भव अपार कर प्रलयं कारी || 
कासी पति कैलास निवासी | रुद्रा पति शव भूमिहि वासी || 
विधाता द्वारा रचित जगत प्रपंच के संहारक है | जो इस अपार संसार को प्रलय द्वारा लय करने वाले हैं,| काशी व् कैलाश में निवास करने वाले रुद्रा के स्वामी व्  शव भूमि वासी हैं 

मो पर कृत कृपा नयन शंकर तपो निधान | 
जासु सकल रूप सरूप सर्व हेतु कल्यान || 
जिनका समस्त रूप स्वरूप सभी के लिए कल्याणकारी है वह तपोनिधान भगवान शंकर मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि करें | 

सोमवार, ०८ जुलाई, २०१८                                                                                  

वन्दे वरदायिनी शारदे | सर्व श्रुति: सर्व काम: प्रदे || 
प्रनमउ मातु जोए कर साथा | जा सहुँ नितहि रहउँ नत माथा || 

बरन छंद रस वीना पानी |  सरसति बिद्या बधु सुर बानी || 
मैं अध घट मम मतिहि बिमूढ़ा |  बिद्यावति तुम हंसाधिरुढ़ा || 

बुद्धि कर देई परम पबिता | मोर गुरु गिरा ग्यान सरिता || 
होइ जासु बल मोहि भरोसा | कबित्त कर्तन रूचि परिपोषा || 

कुसल कला कृत चहिअब आनी | उदार रूप मोहि बरदानी || 
आखर अरथ छन्द लंकारू | भाव करष रास भेद अपारू || 

बिचार बिनहि त परहि न पारा | अरु मो पहि नहि  एकउ बिचारा || 

निज मुखनि निज होनी जूँ  कहन चहइ रूचि मोरि | 
छमिब देब मम भोरि सो बिनति करौं कर जोरि || 

बृहस्पतिवार, १२ जुलाई, २०१८                                                                            

ए जग ए जिउ जग जीउन ज्याए  |  जननि जनक सहुँ जनमु बस पाए || 
एहि जग जातक जेतक होईं | जननि जनक बिहीन नहि कोई || 
यह जगत यह जीवन जगत जीवन स्वरूप ईश्वर द्वारा ही व्युत्पन्न हुवा है जननी जनक से केवल उसने जन्म प्राप्त किया है | इस संसार में जितने भी जातक हैं वह जननी जनक से विहीन नहीं है | 

जनम दात जाके प्रतिपालक | अति सोभाग सील सो बालक || 
मातुपिता बिरधा बट छावाँ | ताहि न आतप ताप सतावा || 
जन्म दाता ही जिनके पालक हैं वह बालक अत्यंत ही सौभाग्यशाली हैं ||  माता,पिता, बड़े वृद्ध वट वृक्ष की छाया स्वरूप होते हैं इस छाया से जीवन पंथ में दुःख रूपी आतप का ताप कष्टकारी नहीं होता | 

प्रनमउ जनम दात पितु माता | जासों जीउ प्रान मम गाता || 
प्रथमहि गुरु मम मातु स्नेही | बदन ज्ञान सबद मुख देही || 
मैं अपने जन्मदाता माता पिता को प्रणाम करती हूँ जिनसे मेरा जीवन है प्राण हैं यह देह है | मेरी प्रथम गुरु मेरी स्नेहिल माता है जिन्होंने मेरे मुख को अभिभाषण का ज्ञान देकर मेरी वाणी को शब्दमय किया || 

ताकर गुनद पयद करि पाना | भयउ मतिहि मम सुमति सुजाना || 
ताके धरे धरनि पगुधारी | बिरद रहत होयउँ पदचारी || 
उनके गुणकारी पयस रस के पान से मेरी बुद्धि ज्ञान से युक्त होकर प्रवीण हुई | उनके द्वारा ही  मेरे चरण धरा आधारित हुवे और दंतहीन अवस्था में ही मैने परिचालन सीखा || 

नगरी नागर नदी नेह से | दीप दीप्ति दुगध स्नेह से || 
अधम अधर्मिन माहि धरम से | अकरमि माहि करतब करम से || 
जो नगरी में नागरिक के जैसे नदी में नीर के जैसे  दीपक में दीप्ती के जैसे दुग्ध में नवनीत के जैसे  अधमी व् अधर्मियों में धर्म  के जैसे अकर्मण्य में कर्त्तव्य कर्म के जैसे होते हैं | 

ते जनक जननि के चरन प्रनमन बारहिबार | 
जाकी कृपा सों डीठि ए दरस रहे संसार || 
उन मातापिता के चरणों में वारंवार प्रणाम है जिनकी कृपा से आज यह दृष्टि संसार के दर्शन कर रही है || 

शुक्रवार, १३ जुलाई, २०१८                                                                                             

अजहुँ नमत गज बदन बिनायक | सिद्धि प्रद गौरीज गन नायक || 
रचना जगत कहुँ प्रनत बिसेसु |  आत्म चरित करत श्री गनेसु | 
सिद्धियों के प्रदाता गौरी पुत्र गजमुखी गण  के स्वामी श्री गणेशजी को नमन कर रचना जगत को विशेष प्रणाम करते हुवे अपनी आत्मकथा का श्री गणेश करते हुवे 

कृति कृत भुवन भनिति कर देसा | कबित भेस भर करउँ प्रबेसा || 
बसैं बासि जहँ देसि बिदेसी | सुरुचित सुचरित सुचित सुदेसी || 
 कविता का वेश धारण किए रचनाओं के लोक में स्थित कथाओं के देश में प्रवेश करती हूँ जो सुव्यवस्थित, चरित्रवान, पवित्र-पावन होकर वास करने योग्य स्थान है जहाँ देशज के सह विदेशी भी निवासरत हैं | 

नागर संकुल नगर निकेता | गाउँ पुरा यहँ केतनिकेता || 
मन मन महुँ मनि मंदिर रेखे | अराध्य देउ मूरति लेखे || 
इसके नगर निकेत नागरिकों से भरे पुरे हैं यहाँ कितने ही ग्राम व् पुर हैं ( यह रचना धर्मियों से परिपूर्ण कृति बाहुल्य देश है ) | यहाँ प्रत्येक मन में मणिमय मंदिर आरेखित हैं जहाँ  वह अपने आराध्य देव की मूर्ति प्रतिष्ठित किए हुवे हैं | 

देउ गिरा के अभरत बानी | रचइहि कतहुँ रामरज धानी || 
कबि हिय छबि धरि मुख हरि नावा | ग्रामगिरा कृत सरु बर गाँवा || 
देवगिरा संस्कृत से वाणी आभूषित किए यहाँ कहीं पर रामचंद्र की राजधानी रचित है | ह्रदय में जगत कारण भूत भगवान  की छवि व मुख पर उनका का नाम आधारित किए कवि का ग्रामीण भाषा के सरोवर से युक्त ग्राम है | 

कीरति करत सेबत हरि चरन | रचेउ भिति भिति ब्रज बृंदाबन || 
निगमागम कथ सत पथ चीन्हि | अमरितमय अमरावति कीन्हि || 
जगत ईश्वर  की कीर्ति कर उनके चरणों की सेवा में अर्पित उस देश के अन्तस्थ में ब्रज व् वृन्दावन भी रचित हैं | सन्मार्ग को संसूचित करते धर्म व दर्शन ग्रन्थ की  आख्यायिकाओं का अमृतमय स्वर्ग भी रचित है | 


चारि बेद रचत रचइता रचेउ चातुर धाम | 
धाम धाम धनीमानी गह सुख सम्पद साम  || 
रचयिता ने चार वेदों को रच कर यहाँ चार धामों की रचना की | प्रत्येक धाम साहित्यिक सुख सम्पति की साधन भूत सामग्री से युक्त हो समृद्ध व् प्रतिष्ठित हैं | 

शनिवार, १४ जुलाई २०१८                                                                       

जेहि देस मम चरन प्रबेसिहि | जनम भुइँ सो मोर स्वदेसिहि ||
जगत बिदित जाकर इतिहासा | रचिता तहँ बोलिहि बहु भासा ||
(इसप्रकार) जिस देश में मेरी प्रविष्टि हुई, मेरी जन्मभूमि के सह वह मेरा मूलगत देश है | जिसका  जगत विख्यात इतिहास है यहाँ के रचना धर्मी बहुभाषी हैं | 

बरनिका ताल तूलि तमाला  |  सबदाकर कर सैल बिसाला  || 
बिंजन माल मनोहर श्रेनी   | सुर सरिता की सुन्दर बेनी  ||
वर्णिका के सरोवर तमाल वृक्ष सी लेखनियाँ के सह यहाँ शब्दों  के भंडार स्वरूप  विशाल पर्वत  हैं जो व्यंजनमाला की मनोहर श्रेणियों से आबद्ध व् स्वरों की सरिता रूपी सुन्दर शिखा से युक्त हैं  | 

भवन कृतिहि बहु खन गचि ढारी | गगन परसि अति तुंग अटारी || 
द्योतिर्मई दुरग दुवारा | ग्यान मनिमत दीप अधारा || 
जो परिपक्व आच्छादन से युक्त कृतियों के बहुखंडीय भवन व् गगनस्पर्शी ऊँची अट्टालिकाएं हैं | ज्ञान माणिक्य रूपी दीपक  को आधारित किए यहाँ प्रकाशमय दुर्ग व् गोपुर है || 

अधुनै नगरु पुरा पुर सोभा | बिलोकत मोर मन अति लोभा || 
कबित नदि तट भनित बट छाँवा | बसाए चहइ सोइ तहँ गाँवा || 
आधुनिक नगरों व् पुरातन पुरों की शोभा देखकर मेरा मन भी लालायित हो गया | कविता की नदी के तट पर कथनों के वट की छाया में वह भी एक गाँव बसाने हेतु अभिलाषित हो उठा | 

जोइ काल प्रबिसिहि मम पाऊ | कबिन्दु मुख अधुनात कहाऊ || 
जद्यपि रहँ सो काल अधूना | कलि कलुषावत जौ दिन दूना || 
रचनाओं के देश में जिस काल में मेरा प्रवेश हुवा उस काल को श्रेष्ठ कवियों द्वारा आधुनिक काल कहा गया | वह काल  यद्यपि आधुनिक ही था जो कलियुग को शीघ्रता से कलुषित कर रहा था | 

नरनारी भूषन भरे परधन भेस बिसेसि | 
भूति बर्धि बिभूति बरे भाषै भाष बिदेसि || 
नरनारी,भूषणों से आभरित विशिष्ट वेश धारण किए हुवे थे ऐश्वर्य का वर्द्धनकारने वाली विभूतियों को वरण किए वह विदेशी भाषा के भाषिक थे | 
  वीरवार/सोम, १५/१६ जुलाई, २०१८                                                                                         

ग्राम गिरा अटपटि मम बानी | समुझ परै न भरम महुँ सानी || 
मोरी भनिति रीतिगत होई | अनगढ़ गाउँ गँवरु जस कोई || 
ग्रामीण भाषा होने के कारण मेरी वाणी विचित्र थी यह बोधमयी न होकर भ्रम से संलिप्त थी | मेरी कथा भी रीतिकालीन होते हुवे ऐसे प्रतीत होती थी जैसे वह कोई असभ्य ग्रामीण ही हो | 

अह अति गरुबर मम अभिलासा | हरुबर भासु जोग उपहासा || 
सोन बरन न त भूषन भारू | रूप कुरूप बिनहि लंकारू || 
मेरी अभिलाषा अत्यंत गुरुत्वमयी थी मेरी भाषा अतिशय लघु थी | न मेरा वर्ण स्वर्ण था न मैने  कोई भूषण आभरित किए हुवे थे मेरा कविता का रूप अलंकार विहीन होकर कुरूपता को प्राप्य थी || 

धीगुन हीन मलिन मन भावा | कबित कला मोहि एकु न आवा || 
गिरा ग्यान कर गोट न गारा | दीन दारिद न गाँठि बिचारा || 
मेरे काव्यगत मनोभाव मलीन व् श्रुश्रुषा श्रवण आदि बुद्धि के आठ धर्मों से वियुक्त थे | मुझे कविता की एक भी कला नहीं सिद्धि प्राप्त नहीं थी | ज्ञान रूपी गोटियों व गारों से विपन्न मेरी वाणी की  ग्रंथि उत्तम विचारों से भी रिक्त थी इस हेतु वह दीन व् दरिद्र थी | 

बसइ चलेउ गाह के गाँवा | चढ़न चहै गिरि जिमि बिनु पाँवा || 
भए धरनि बहु धुरीन धुरंदरु | कबित गिरि चर कलित कृति सेखरु || 
पंगु के द्वारा पर्वत लंघन की अभिलाषा के जैसे मैं ऐसी दरिद्र वाणी से गाथा का ग्राम अधिवासित करने हेतु अभिलाषित हूँ | इस धरती में अतिशय  प्रवीण व् कोविद कवि हैं जो कविता के पर्वत पर निरंतर आरोहण करते हैं उनकी कृतियां इस कवितामय पर्वत शिखर के आभूषण स्वरूप हैं | 

रूचि उपजात चितहि जौ चाहा | ताके बस सो करिए न काहा || 
पेम पयधि मन चहि औगाहन | सुख सुभागु मुकुता के लाहन || 

गुरुजन चित चिंतन करत सुरत जगत करतार | 
जोरि पानि नत सिस करौं बिनती बारहिबार || 

कबित खन खेह खेट घरु जौ करि चहैं बिहार | 
सद्गुन मोरे गहि लियो दुरगुन दियो परिहार || 

बुए बिआ कहनिहि लीक खीचें | देइब फर करनिहि जर सीँचे || 
रचेउँ परनकुटी दुइ चारी |  कथा केरि गढ़ि करनक ढारी || 

भगतिमय सुठि प्रीति की रीति | नीति मृण्मलि दियउँ भलि भीती || 
कुंज गली कृत कुसुम वाटिका | बरनाबलि सों लसे अंतिका || 

धरे दोइ पट दोहु द्वारा | परे छंद कर बंदनबारा || 
चौंक पुरावत चातुरि पाई | अंतर गेह पियहि पौढ़ाई || 

अर्थागन अर्थापन जेतू  | कछु निज कछु परमारथ हेतू || 
जा संगत जौ उपजै भावा | जीवन जोवन जोग जुगावा || 

तुलसी कृत मानस नहि दूरे | कलि महुँ निर्मल जल भर भूरे || 
बिरदाबली कहत सिय पी के | संग लगे बन बाल्मीकि के || 

बधिअ गौ सो पुण्य करम पापकरम सरि साँप | 
या संगत सुखसार है या संगत संताप || 

मंगलवार, १७ जुलाई, २०१८                                                                                        

रीति नीति सुठि प्रीति राम की | धरा धुरज धर धर्म धाम की || 
अवतार रूप पुनीत पबिता | कीन्हेसि नाना बिषद चरिता || 

रचिहि सुपंथ चरत  दे चीन्हि   | पुरबजहु तहाँ पायन्हि दीन्हि || 
पुर्बज पथ बिरधा अनुहारिहि | बिरध पथ पितु मात अनुसारिहि || 

हमहि तासु चरनहि अनुगामी | भए सुखि सुखसाधन सामी || 
सुकृता केर चरित चरितारथ | होत जीउ हित हेतु परारथ || 

होत जोग जग देसु समाजा | तरत पारग करत कृत काजा || 
सुचितात्मन पुरइनी जाके  | होइँ चरितबअ जीवन ताके || 

सुचिता पुर्बज पुरइनी भा हमरे बढ़ भाग | 
अजहुँ के अस चलन दियो तिनके पंथ त्याग || 

बुधवार, १८ जुलाई, २०१८                                                                                            

सुपंथी तेउ भयउ कुपंथा | गुपुत गिरि भए लुपुत सद ग्रंथा || 
अब न कहंत नहि श्रुतिबंता | साधु साध बिनु भए सतसंता || 

 रहत बिदेसि कहत जबु देसी | देसज होतब गयउ भदेसी || 
दुर्गुन करिअ जहाँ उपनिबेसा | बिगरै तहाँ सकल परिबेसा || 

रहँ मलीन सो होएं कुलीना | कुलीन होइब दीन मलीना || 
भाषन भाष न भेस न भूषन | दरसि दहुँ दिसि दूषनहि दूषन || 

कवन कहा हम कहँ सोंहि आए | सनै सनै एहि सुरति बिसराए || 
साखि कहाँ कहँ हमरे मूला | जासु बिआ हम जिनके फूला || 








 



































Monday, June 25, 2018

----- || राग-रंग ४ | -----


----- || राग-मालकौंस || -----


श्री रामायन कलिमल हरनी.., पुनीत पबित जगत अनुसरनी.....


सिय के पिय की प्रीति सुठि रीति कल कंठ कलित कर बरनी.., 
थकै पंथि हुँत तरुबर छाईं तिसनित हुँत यहु निरझरनी.., 
एहि भव सागर सरिस अपारा तासु तरन हेतु यह तरनी.., 
जगति राति की जरति जोत सी अगजग जोतिर्मय करनी.., 
अधबर पंथ अँधियारे पाँखि महुँ यह उजियारा भरनी.., 
श्रवन मृदु मधुरिम श्रुति रंजन गायन मंजुल मनहरनी.., 
 भगवन्मय यहु भगति भगवती सरूप भगवद पद परनी.., 
भव बंधन मुकुति कर मुकुता गहै याके मारग चरनी.., 
साधू सज्जन संत जन सहित दीन दुखियन केरि सरनी..,

Thursday, June 21, 2018

----- || राग-रंग ३ | -----,


----- || राग -मियाँ की तोड़ी || -----

हे जग बंदन अब अवतरौ तुम्ह..,
कलि काल कर कलुष हरौ तुम्ह..,

हिय संताप नैन भर बारी | धेनु रूप धर धरति पुकारी ||
तरस प्रभु दृग दरस परौ तुम्ह..,

तलफत भू कलपत बहु रोई | तुम्ह सोंहि प्रभु अबर न कोई ||
मोर हरिदय चरन धरौ तुम्ह..,

बोहि बोह सिरु पाप अगाधा | गहबर पंथ चरन गहि बाधा ||
पातक भारु हरन करौ तुम्ह..,

गिरि सरि सागर हरुबर मोही | भा गरुबर एक धर्म बिद्रोही ||
प्रगस सगुन सरूप धरौ तुम्ह..,

दुःख दारुन कर रैन मँझारे  | धरै दीप सम नैन दुआरे || 
दिनकर के रूप अभरौ तुम्ह.., 

चारिहुँ ओर घोर अँधियारा | निद्रालस बस भयो संसारा || 
करत भोर अँजोर भरौ तुम्ह.., 

लोग भयऊ मोर बिपरीता | अपकरनि ते भयहु भयभीता ||
भवहि केरि बिभूति बरौ तुम्ह.....

भावार्थ : - हे जगत वंदनीय ईश्वर अब आप अवतार लो | और अवतार लेकर कलियुग की कलुषता से मुक्त करो || ह्रदय में संताप और नेत्रों में जल भरकर  गाय रूप धारण की हुई  धरती ने आर्त होकर भगवान को पुकार कर कहा -- हे भगवन ! अब दया कर इन अश्रुपूरित नेत्रों को अपना दर्शन दो || तड़पती हुवे रूदन के द्वारा  अपनी अंतर वेदना को व्यक्त करती हुई भूमि ने फिर कहा हे प्रभु! आपके अतिरिक्त इस संसार में मरा कोई नहीं है मेरे ह्रदय में अपने चरण धरो | मेरे शीश पर अगाध पाप के गठरी का बोझ है मेरा भ्रमण पंथ दुर्गम है उसपर मेरे चरण आपदा स्वरूप बाधाओं से बंधे हैं, प्रभु! अब आप इन पापों का हरण करो | पर्वत, सरिताएं और सागर भी मेरे लिए भारहीन हैं किन्तु एक धर्म विद्रोही का भार मुझे अतिशय भारी प्रतीत होने लगा है | हे अन्तर्यामी ! अब प्रकट होओ और सगुण स्वरूप धारण करो | दुःख व् दरिद्रता की अर्ध रात्रि में द्वार पर धरे दीपक के समान ये नयन प्रतीक्षारत है  | हे प्रभु ! अब आप दिनकांत के रूप का आभरण करो | चारों और घोर अन्धकार व्याप्त है संसार निद्रा व् आलस्य के वशीभूत हो गया है हे भगवन ! अब भोर कर अपनी दीप्ती से जगत में उजाला भर दो | ये सांसारिक लोग मेरे विपरीत हो चले  है इनके कुकर्मों सेस्वयं भय भी भयभीत है अब इस लोक की वैभव विभूति को आप ही वरण करो हे राम अवतरण करो.....