Monday, July 1, 2013

----- ॥ सूक्ति के मणि 11॥ -----

सोम/मंगल, ०१/०२ जुलाई, २ ० १ ३                                                                  

पद रहि मरजादित नित कृतिया । परिश्रम धन भृत हुँत अध भृतिया ॥
जोगता रहहि अभिधा यंता । महमुनि मतमह गति मंता ॥
पद संविदा पर आधारित एवं पूर्ण कालिक था । और परिश्रम धन भृत्य के पारिश्रमिक से भी आधा था ॥ और( न्यूनतम) योग्यता थी अभियंता की उपाधि साथ में ऊंचा अनुभव, बुद्धिमान और विचारवान ॥ 
   
कारु करतब सहज न होहिन्हि ।  रहत कठिनई करत बोधिन्हि ॥
पद थापन थरि रहि बहु दूरे । दोइ तिनी सौ जोजन धूरे ॥
कार्य कर्तव्य भी सरल नहीं था , करने में कठिन था जिसे  सोचा समझ कर क्रियान्वयित करना था ॥ पद स्थापना स्थल बहुंत ही दूर था यही कोई दो तीन सौ योजन के आस पास था ॥ 

दसा बिबस पिय भयउ निरासे । बहियर हुँत अस बचनन भासे ।।
सोचतहूँ लेइ सकल उपाधि । दुइ टूक कर कहु धरौं समाधि ।।
अपनी स्थिति से विवश होकर प्रियतम निराशा से भर गए । और वधु से इस प्रकार के वचन कहने लगे :-- सोचता हूँ साड़ी उपाधियों को लेकर उनके दो टूकड़े करके कहीं समाधि ले लूँ ॥ 

अस सुनि बधु बहु कह समुझाई । अधस मनोबल ऊंच उठाई ।।
करमही सई करमहि साईँ । तेहि परत अरु को न उपाई ।। 
ऐसा सुन कर वधु ने प्रियतम को बहुंत ही समझाया बुझाया । उनके गिरते मनोबल को ऊंचा उठाया ॥ । कर्म ही से बढ़ती है, कर्म ही में भगवान है कर्म ही समस्याओं का एक अंतिम उपाय है इसके पश्चात और कोई दूजा हल नहीं रह जाता ॥ 

श्रवनत पिय अस लै उछ्बासे । करमन करतन कर कटि कासे ।। 
पद पदवि रहि पुरातन नाहीं । रहे निजोजित पुरसहु ताहीं ॥  
जब पिया ने वधु के वचन सुने तो एक लम्बी सांस ली और कर्त्तव्य कारित करने हेतु करधनी कस ली । यह पद और यह पदवी कोई नवीन नहीं थी प्रियतम पहले भी इस पद पर नियोजित होकर कार्य कर चुके थे ॥ 

गवने पुनि कारज करन, अवली लिए कर धार । 
करत हस्त आखर चिन्ह, धारे कारज भार ।। 
कार्यालय जाकर फिर कार्य-सूचि हाथ में लेते हुवे उन्होंने हस्ताक्षर चिन्हित करते हुवे कार्यभार ग्रहण किया ॥ 

बुधवार ० ३ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                  

पथरील पथ परबत करि हेला । चरि थापन थरि किए जन भेला ॥ 
भँवरत कारज दरसन देखे । लै लिखनिहि आलेखन लेखे ।। 
पतःरिले पथ और पर्वतों को सेतु स्वरूप करते हुवे प्रियतम स्थापना स्थल को प्रस्थान किए और वहां के निवासियों से भेंट की ॥ लेखनी से आरेखन चित्र उकरते घूम घूम कर दिए गए कार्यों का निरिक्षण किया ॥ 

जीउति जीवन करतब कारे । एक कण श्रम धन कर नहि धारे ॥ 
गहति जितै धन मास पूराए । उतै छह दिन मह गयउ सिराए ॥ 
जीवित रहने हेतु आजीविका के कारण वो यह कर्त्तव्य कर रहे थे अभी तक श्रम धन का एक भी कण ग्रहण नहीं किया था ॥ जितना धन एक मास के पूर्ण होने पर प्राप्त होता उतना तो छह दिन में ही समाप्त हो गया ।। 

तँह पिय दुमन लिए दूर भासे । दूर बधुटि सन मधुरित भासे ॥ 
जेहि सेउकाए सौं गृह खाई । तुम्हहि कहु अब का करि जाई ॥ 
तत पश्चात प्रियतम खिन्न मन से दूर भास् लिए और दूर बैठी प्रियतमा के साथ, मधुरता पूर्वक ऐसे बोले । यह सेवा आजीविका तो घर को भी खाने वाली के सदृश्य है अब तुम्ही कहो क्या किया जाए ।। 

अधि का कहुँ कहि बधु सकुचाई । उहि करौ जौ सब सुख हिताई ॥ 
श्रुत अस प्रिय कहि मधु मुसुकावत। अध परिजोजन अधपद जावत ॥ 
तब वधु ने संकोच करते हुवे कहा अधिक और क्या कहें वही करो जो सब जनों के हीत एवं सुख के लिए हो ।। ऐसा सुनकर प्रियतम ने मुस्कराते हुवे कहा आधी बनी परियोजन आधा अधूरी ही रह जाती है ।। 

भवरौ पाथर परबत डोरी । श्रम धन केवल धरु सौ कोरी ॥ 
करक करम करमना दुकौरी । कपट लेखी कर बनौ करोरी ॥ 
पथरीली पर्वती भूमि में भ्रमण करो और श्रम धन के नाम पर केवल सौ कौरी ( एक कौरी = २० ) रखो ।कठोर कर्म और कर्मण्या दो कौड़ी की । छल कपट भ्रष्ट आचरण करो और करोडपति बनो यही है राजा की योजनाएं ।। 

चाहे पूरन तल गहे, कृतत तलैया ताल । 
चाहे तो अध तल लहे, कार कपट के जाल ॥  
सद आचरण कर अपने घर से धन लगा कर चाहे तो ताल-तालाब पूर्ण स्वरूप में खनन करो या भ्रष्ट आचरण करो और उसे आधा ही रहने दो ।। 


 गुरूवार, ० ४ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                        

जे  जन्पदि मह थापन थाई । तहहि पिया एक ठिया बनाईं ॥ 
खेत खलिहन खेत बन श्रामा । रहहि सेवक के करमन धामा ॥ 
जो जनपद, प्रियतम का स्थापना स्थल था । वहां प्रियतम ने एक निवास बना लिया था ॥ खेत खलिहान छोटे गाँव और वन आश्रय, राजा के उस सेवक की कर्म सथाली थी ॥ 

जदपि सेवा जोजन रत हुँते । कारत कपट धन रही बहुंते ॥ 
श्रमन कारजहु गहे न थोरे । बहुर रयनि पिय निकसत भोरे ॥ 
यद्यपि उस सेवानियुक्ति में लगे रहने से और कपट कार्य करने में धन बहुंत था किन्तु साथ ही श्रम कार्य भी थोड़ा नहीं था प्रियतम जनपद से भोर में निकलते तो लौटते लौटते रात हो जाती थी ॥ 

तमस तमा तस बन घन घोरे । रहे जिउ जंतु दन्तक खोरे ॥ 
कहु कोउ पूरा बीच पहारा । ता पर संचय जल की धारा ॥ 
काली रात के जैसे वन में घन घोर अन्धकार रहता और उस्समें जीव जंतु भी दांतों से काटने वाले थे ॥ कहीं कोई गाँव पहाड़ों के बीच स्थित था तो उस पर से निकलती जल की धारा को संचयित करना होता ॥ 

पथिक अपथि पद पदिक रचियाए । थकि हारत कभु छाए ना पाए ॥ 
कबहु एक बेर रहि भूखाईं। कंद मूल कभु फल फुल खाईं ॥ 
थे तो यात्री किन्तु बिना पथ के अपने ही पद चिन्ह से पथ बना लेते । थके हारे प्रियतम को कभी तो कहीं विश्राम भी नहीं मिलता ॥
  कभु को श्राम सयन सरन, रहहि न करपर ठोर । 
मारग अगम भूमि धरे, काँकर कंट कठोर ॥ 
कभी कोई शरण स्थली न कोई शरण न शयनिका न ही कोई सर के ऊपर अन्य छत ही होती ॥ कांटे कंकड़ और कठोर स्वरूप धारण किये भूमि और उस पर दुर्गम मार्ग का आवागमन ॥ 

शुक्रवार, ० ५ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                               

एहि बिधि कभु प्रिय सुरतित करती। चित चिंतत बधु सुमिरन धरती॥ 
को घरि पद गह पंथ बहूरे । रहि धूरे भए पंथी दूरे ॥ 
इस प्रकार वधु कभी प्रियतम का ध्यान करते हुवे, मन में चिंता धरते उनका स्मरण करती । कि जाने किस घडी  उनके चरण मार्ग पकड़ेंगे और वह वापस लौटेंगे । जो वधु  के निकट थे अब वह दूर के पथिक हो गए हैं ॥ 

बहुरत प्रियतम बहुतहि दिन पर । कबहु दस कबहुक पञ्च ऊपर ॥  
दिवस जात मुख अंत प्रभा से । प्रिय पपिहा से प्रेम पिपासे ॥ 
और प्रियतम बहुंत-बहुंत दिनों के पश्चात लौटते कभी दस दिन तो कभी पांच दिन ऊपर हो जाते । लौटते तो जैसे दिनभर का परिश्रम कर दिनान्त पर लौटती प्रभा और पपीहा के जैसे प्रेम के प्यासे रहते ॥  

ते बखतै धिय लै अरूनाई । रूप संपद के मह निधि पाई ॥ 
कंठ कलित कल केरि हुँकारे । मोह मुदित पितु गोदि उछारे ॥ 
उस समय बालिका बाल मुकुन्दनी ( कुछ मास की अवस्था को प्राप्त हो ) लावण्यता लेकर सुरूपता के महा भंडार से युक्त हो गई थी ।। उसका कंठ मधुर हुंकार भरने लगा  । और पिता  उसके बाल स्वरूप में मोहित होकर गोद में लेकर उछालते ॥ 

कोमल तन जल मल अन्हवाएँ । लइ पुर पन नउ बसन पहिनाएँ ॥ 
माइ करत कुम कुम सिंगारे । लोचन पथ पल मल मसि डारे ॥ 
उसके कोमल तन को जल से मल मल कर नहलाते । और नगर के हटवार से नए वस्त्र लाकर उसे पहनाते । माता कम कम का श्रृंगार करती ।  दृष्टि क्षेत्र एवं पलक आच्छादन को मल कर काजल  लगाती ॥ 

 मुख उचारित जब अति मृदु बानी । मधु मिस जनु खग कूजन सानी ॥ 
कटि किंकिन कल कर पद जोरी । चरि घुटरुन माई तृन तोरी ॥ 
जब वह मुख सी अति कोमल वाणी का उच्चारण करती तो वह मदरस से मिश्रित होती और ऐसी प्रतीत होती मानो कोई पक्षी चहचहा रहा हो ॥ 

धौली अरुन धिय गोद गहि, जनी पवित पय पाए । 
किलकत इत उत दोल रहि ओदन मुख लपटाए ॥  
श्वेत उस पर अरुणाई लिए हुवे वह बाल मुकुंदिनी गोद में भरी  का प्रेमरस प्राप्त कर मुख में भात लपटाए  किलकारी करते हुवे इधर-उधर डोलती फिरती ॥ 

शनिवार, ० ६ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                

एहि बरसहु जन नंदित दीठे । कृषि करमन पन श्रम पद पीठे ॥ 
हरी भरी भइ भूमि पहारे। सरस सरिल सर सरिता सारे ॥ 
इस वर्ष भी  कृषि कार्य, व्यापार श्रम आदि के पदों पर आसीत पुरजन सुखी व् आनंदित दिखाई दिए। भूमि पहाड़ हरे भरे हो गए सरोवर सरिताएँ अधिकाधिक जल धरान किये हुवे थे ॥ 

बास पुरी सुख देत सुहाई ।  रहि सब सुख प्रभु के प्रभुताई ॥ 
भोर भास् सन नयन मिलाई । साँझ सुरंगत सीस नवाई ॥ 
निवास नगर सुख देता हवा अत्यंत सुहावना प्रतीत होता । यह सब सुख एश्वर्य प्रभु की प्रभुता ही थी ॥ भोर में भानु के संग नयन मिलाते संध्या को सुन्दर रंग से युक्त होकर नगरी नत मस्तक हो जाती ॥ 

तापस के बस तापि दुपहरी । तपन तरंगन तन पौ पहरी ॥ 
तपनोपल अवतरे अवनि तल । जलधि चरण चल जोए गगन जल ॥ 
ग्रीष्म ऋतु के वशीकृत होकर दुपहरी तपती । ताप की तरंग धरे तन पर गर्म हवाओं के वस्त्र पहनी रहती ॥ सूर्यकांत मणि जैसे धरती पर ही अवतरित हो जाते और सागर पर पद संचारित कर गगन में जल संचित करते ॥ 

जल सुत सारी बहु सुख धारी । झनझन चहुँकन बरखी बारी ॥ 
अरन बरन कंचन कन जाई । खेतन खलिहन भू हरियाई ॥  
जल के इन मोतियों को एकत्र करते हुवे अत्यधिक सुख ग्रहण की हुई बरखा झन झन करती चारों और बरसती ॥ इन जल के कानों को ग्रहण कर खेत खलिहान की भूमि हरितमय हुई, सोने जैसे अन्न के कानों को उपजाती ॥ 

सीत काल तरि चरि चौबाई ।  रयनि अगनि भै बहु सुखदाई ॥ 
गहनि रयनि कर जल भरि लाईं। तनि रतिगर तनि साँझ धराईं  ॥ 
फिर शीत ऋतु अवतरी और चारो और शीतल हवा बहने लगी ।रात्रि में अग्नी बहुंत ही सुख देती । रात गहरी होती तो हाथों में ओस के कण भर लाती और थोड़े प्रभात को एवं थोड़े से संध्या को दे देती ॥ 

सहस मौली मुर्धन जब, निरखत तीनौ लोक । 
श्रव्य दृश्य कबित्त रचे सृजन समहित श्लोक ॥ 
जब सहस्त्र मस्तक धारी प्रभो जनन्नाथ की कृपा दृष्टी तीनों लोको पर रहती है होती है तब श्रिष्टी श्लोकों को संग्रहित कर दृश्य एवं श्रव्य काव्य की रचना करती है ॥ 

रविवार  ७ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                    

रहहि सब सुख बधू ससुराई । लाभ लब्ध कर काम कमाई ।। 
धिहा बिहावन चिन्तति माई । राम जोग जुग लागि सगाई ।। 
वधु के ससुराल में सभी प्रकार का सुख व्याप्त था,हाथ में काम था कमाई थी और उससे लाभ भी प्राप्त होता ॥ पुत्री के विवाह हेतु माता चिंता करती सो राम जी के जोड़ी मिलाने से पुत्री की सम्बन्ध भी ठहर गया॥ 

जे कर उजबल मन मल हीना । दया सील दृग दरसत दीना ।। 
जह सम सुख दुःख भाउ अभावा । तह गृह जन श्री श्रिय के पावा ।। 
जिसके कार्य उज्जवल एवं ह्रदय मलिनता से विहीन हों और दृष्टि दया शील हो जो दुर्दशा गर्स्तों पर कृपा बनाए रखती हो । जहां सुख दुःख एवं भाव/सम्पन्नताएवं अभाव/ विपन्नता  को समान दृष्टि से देखा जाता हो उस गृह के लोग सदा श्री के कल्याण को प्राप्त होते हैं ॥ 

उहाँ बधू के मइकें ताईं । लब्ध नाम लखि लाभ रिसाईं ।। 
जदपि धरम के चारन चारी । रहहि सकल जन कृपा धिकारी ।। 
उधर वधु के मातृ-निवास में के निमित, पारिवारिक प्रतिष्ठा अपेक्षित उद्देश्यों को प्राप्त नहीं हो रही थी और ( कमाई से ) लाभ भी जैसे रूठ गया था ॥ यद्यपि गृह  धार्मिक आचरणों पर चलने वाला था  और गृहजन समस्त कृपाओं के पात्र थे ॥ 

प्रथमै मातु भइ देहि अन्ते । तात ह्रदय रहि घात गहंते ।। 
तिस पर अरु एक रोग लगाईं । पखा घात तन पा पैसाईं ।। 
पहले ही माता का देहांत हो चुका था । और वधु के पिटा को ह्रदयाघात का रोग भी था ॥ उस पर उन्हें एक और रोग ने पकड़ लिया, पक्षाघात ने भी उनके शरीर में अपने पाँव पसार लिए ॥ 

पीरत कसकत तात किए बास अरोग निकाइ । 
दोउ भ्रात सह भोजाइ, सेवा धरम निभाइ ।। 
कष्ट पाते कसकते हुवे पिता का  चिकित्सालय में निवास हो गया। वधु के दोनों भ्राता तथा साथ में दोनों भावज अपना सेवा धर्म निभा रहे 
थे ॥ 

सोमवार, ८ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                                

पितु उदन्त श्रुत बधु भरि छाँती । गइ प्रिय सन जेहिं तेहिं भाँती ॥ 
नलिन नयन जब तात निहारे । नीर निहार पलक परिहारे ॥ 
पिता का समाचार सुनकर वधु भरे ह्रदय से प्रियतम के साथ जैसे तैसे करके उअनके पास गई ॥ नलिन जैसे नयनों ने जब पिता को निहारा तो पलकें जल की बूंदों का त्याग करने लगीं ॥ 

दरस दसा तिन जी भर रोई । सोक मगन बहु नेहत सोई ॥ 
प्रथमहि प्रिय कर जननी खोई । ताके दुःख रहि हिरदै गोई॥ 
उनकी दशा देखकर और शोक मग्न होकर उनसे स्नेह करती वधु जी भर कर रोई । वधु पहले ही स्नेह रखने वाली जननी को खो चुकी थी और उनका दुःख हृदौ में दबाए हीन थी ( ऊपर से पिता की यह दशा व्याकुल करने वाली थी )॥ 

भयउ बाम जब दिरिस बिधाता । परे बैर तब आगिन गाता ॥ 
देहातीत ऐहि संसारा । सुख सुभाग सब होहिं दुखारा ॥ 
जब विधाता की दृष्टि विपरीत हो जाती है तो सबसे पहले इस देह ही से बेर करती है ॥ देह के रहित भी इस संसार में समस्त सुख-चेन और धन-मान  दुःख के ही समान हो जाता है ॥ 

रोग घात भै दुःख के जातक । काल कल्प कुल के सुख पातक ॥ 
मात पिता जिन जन के छाहीं । तिन्ह धूप के चिंतन नाहीं ॥ 
रोगों का प्रहार दुखों का उत्पादक है जो प्राणों का शत्रु और परिवार के सुखों का नाशक है ॥ जिन परिजनों के ऊपर मात-पिता  की छाँया रहती है उन जनों सुख-दुःख रूपी धूप की चिंता नहीं सताती ॥ 

भई सबहि कुल के संताना । मातु धरा पितु गगन समाना ॥ 
मात रहित जे जातक जाती । होहि ऋन ते चरन धन धाती ॥ 
कुल के समस्त संततियों हेतु माता धरती के समान और पिता गगन के समान होते हैं । जो संतानें माता विहीन होते हैं उंके चरण धरणी की युक्ति से निर्युक्तक हो जाते हैं ॥ 

जनिक जननी जनयित कर, तिन्ह के सुख असीस । 
जनम जीवन सफल करै, होहि जिन्ह के सीस ॥ 
जन्म देने वाले मात-पिता का श्री कर और उनका सुख आशीष, जिन संतानों के सिर  पर होता है, उनका जन्म एवं जीवन सफल हो जाता है ॥ 

मंगलवार, ९ जुलाई,२ ० १ ३                                                                                      

चहही तहही धिय लहि दूरें । मात पिता के पुत रहि धूरें ॥ 
जगत बिचित्र बिधि रचित समाजू । दान गहइ कर बर लघु दाजू ॥ 
चहेती होने पर भी बेटियाँ मातापीता से दूर होतीं हैं और पुत्र निकट होते हैं ॥ इस जगत में समाज ने विचित्र नियम बना रखे हैं दान ग्रहण 
करने वाले हाथ बड़ा होता है और दान देने वाला छोटा ॥ 

अस सुमरत बधु दृग जल झूरे । दुमन प्रिया ले पिया बहूरे ॥  
पैस भवन लिए तनिक अहारे । लइ उपबहरन सयन  सहारे ॥ 
ऐसा ध्यान करते वधु के लोचन में जल अश्रु आ गए । और दुखित प्रिया को पीया अपने साथ लेकर घर वापस लौट चले ॥ घर में प्रवेश किया और थोड़ा आहार लिया । फिर शयनिका और तकिये का आश्रय ले लिया ॥ 

पितु धन वैभव बधु दृग दीठे । पुरजन आसन बर पद पीठे ॥ 
दीन दया करि दानन दिन्हे । सकल पितु के नाम धर चिन्हें ॥ 
पिता  के धन संपती का वैभव, वधु के आखों देखा हुवा था । नगर जनों ने ने सम्मान रूपी उछ आसन में उन्हें बैठा रखा था ।। वे दिनों पर दया करते और यथा योग्य दान सहायता करते । पिटा को सभी लोग उनके नाम से पहचानते थे ॥ 

भोग तिस्न जग  बिषय बिलासे । अस पितु मति मह रहि न ललासे ॥ 
सरल सहज गृह  भोजन भेसा । लब्धिहि लोलुप रहहि न लेसा ॥ 
सांसारिक भोगों की कामना और इन्द्रियार्थ विलासिता की लालसा पिता के मस्तिष्क में कभी नहीं रही ॥ सामान्य सा घर, साधारण भोजन और उनकी वेश भूसा भी सहज ही थी। उपलब्धियों की लोलुपता उनके मन लेश मात्र भी नहीं थी ॥ 

तेहि दिवस पितु पर अनुरागी । सकल रयनि मृग नयनी जागी ॥ 
नींद रति रत अलसत भोरे । दोइ ओस कन पलकन छोरे ॥ 
उस दिन हिरन जैसी आँखों वाली वधु ने  पिता के स्नेह से आसक्त होकर सारी रात जागरण किया ॥ पौ फटते समय ही निद्रा पर आसक्त होते हुवे दो ओस रूपी अश्रु के कणों  को पलकों के कगार पर लिए उससे अनुलग्न हुई ॥ 

लावन लोचन लोइ, लखत ललामिन नलिन दोइ । 
मुकुलित मनुहर सोइ, मुख सरुवर वरे जल सुत ॥ 
लाल लोचन  लावण्यता लिए दो लाल कमलों के जैसे दर्शित हो रहे थे वे अधमुँदे कमल स्वरूप लोचन अत्यधिक मनोहर प्रतीत हो रहे थे । सरोवर रूपी उस मुखड़े पर उक्त नयन कमल अश्रु रूप में ओस सवरुप में मोतियों को वरण किये हुवे थे ॥ 

बुधवार, १ ० जुलाई, २ ० १ ३                                                                                        

बयस बिरध तन लहत कुरोगे। जाने पितु को करनी भोगे ॥ 
पाछिन के करि आगिन आईं । आगिन  के धरि पाछिन पाईं ॥ 
वृद्धावस्था में शरीर को  दुष्ट रोग ने पकड़ लिया था । पता नहीं वधु के पिता कौन सी करनी भुगत रहे थे ॥ पीची के कर्म कभी आगे आ जाते हैं कभी आगे के कर्मों का भोग पीछे ही प्राप्त हो जाता है ॥ 

गहन लखन गह बैद निवासे । जितै दिन कहि उतै दिन बासे ॥ 
लीख कहत सत औषधि लवने । दइ अवकास तौ निज गृह गवने ॥ 
वैद्यशाला में पिता गहन निरिक्षण में रहे वैद्य ने जितने दिन रहने का परामर्श पिता ने उतने दिन वहां निवास किये ॥  परामर्श के अनुसार यथोचित औषधियाँ ली । और जब अवकाश दिया तो अपने निवास चले आए ॥ 

भ्रात किये बहुत सेउकाई । करहि जोग दोनउ भोजाईं ॥ 
घटनाबली तुर जुग मिलाईं। बर बहिअर के  जीवन ताईं ॥ 
वधु के भ्राताओं ने पिता की बहुंत सेवा की । दोनों भावजों ने भी देखभाल की ॥ घटनाओं के क्रम ने बड़ी ही शीघ्रता पूर्वक वर वधु के जीवन से बड़ी ही शीघ्रता पूर्वक योग मिलाया ॥ 

बरस दिवस पहरइँ सिरु नाई । काल कवल तनि घरी बिहाई ॥ 
एक बरस तेइ जात न जाने । एक एक दिन मनु पल पल माने ॥ 
वर्ष और दिवस को पहरों ने प्रणाम किया । और समय के ग्रहण करने के कारण वश किंचित घड़ियाँ समाप्त हुई । एक वर्ष कैसे  व्यतीत हवा उन युगल दम्पति को ज्ञात ही न हुवा ॥ एक एक दिन मानो एक एक पल के समान था ॥ 

रूप निधि मुख पर सँजोई, भोजन देही पोष । 
धरि धिया बयस कर एक, काल ग्रंथि बय कोष ॥   
मुख पर सुन्दरता का आगार सँजोए और भोजन द्वारा देह का पोषण कर पुत्रिका ने एक स्वास्थ वर्द्धक वर्ष को अपने आयु कोष में ग्रहण कर लिया ॥  

गुरूवार, १ १ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                           

पद पत केसर कर मुख लाला । आकर घर कर कमलिक बाला ॥ 
उदर भीतर गहि नाभि नाला । जननि जनि तेहि सीतल काला ॥ 
पाँव पत्र और पाणि केसर के सदृश्य एवं लाल मुखाकृति कर उस कमल जैसी बालिका ने घर को कमलाकर कर दिया था ॥ जिसकी नाभि नाल को उदार में धारण कर उसकी जननी ने उसे शीत काल में जन्म दिया था ॥ 

नयन कमल कस कामिनि काखी । नउलि पल्लवन पलकन पाखी ॥ 
धौल सुरंगन अंगन रंगे । सरिस सीतर धूप कर संगे ॥ 
कमल नयन पर सुन्दर भौं कसी हुई थी । और पलक नव पल्लव के पंख के सरिस थी ॥  उसके अंग-प्रत्यंग श्वेत रंग के सह सुन्दर लाल रंग में अनुरक्त हुवे ऐसे प्रतीत होते मानो शीतल धूप में किरणों के कण घूले हों ॥ 

मुग्ध मुचक मुख अधर मुखरिते । जनक जनी दौ धूनि धवनिते ॥ 
धवनि धिया मुख लागत कैसे । प्रभु वंदन नीराजन जैसे ॥ 
सुकुमारता को प्राप्त हुवे मुख के अधर  शब्दायमान हो उठे जो माता-पिता स्वरूप में दो शब्दों का उच्चारण करने लगे ।। बिटिया के मुख से वे शब्द कैसे लगते जैसे की भगवान की वन्दना-आरती ही हो ॥ 

नीरद छादन दुइ रद झांके । सुकुति भवनु मनु मुकुतिक लाके ॥ 
लाल रसा प्रेम रस रसियाए । अन कन ओदन लवन लसियाए ॥ 
दन्त रहित अधरों की आड़ से दो दन्त दर्शित होने लगे । मानो मुख रूपी सीप में दो दन्त स्वरूपी मोती चमक रहे हों ॥ लालिमा ली हुई जिह्वा माता के अमृत रस का स्वाद लेकर अन्न कणों, नमक भात की लालसा करने लगे ॥  

चहचहत चिरिया चुनचुन, किलकत खेलत केलि । 
उपबन बाल सुमन बने , बेलि बेलि तरु बेलि ॥ 
चिड़ियों के जैसी आनंद भारी बोली लिए वह बालिका किलकती अटखेलियाँ करती । उपबन के नन्हे पुष्प उसके मित्र बन कर वृक्ष से बेलों के सदृश्य लिपट जाते ॥ 

शुक्रवार, १ २ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                              

जेई दिन दृग दरसन जोईं। तेई अगूत होए अगॊई ॥ 
जन्म दिन भै बरस धर पूरे। छा छबि धिय मुख भूरहि भूरे ॥ 
दृष्टि जिस दिवस के दर्शन की प्रतीक्षा कर रही थी । वह दिवस सम्मुख प्रकट हुवा ॥ वर्ष पूर्ण होने पर जन्म दिन आया । और ( एक वर्ष को होने पर) बालिका के मुख की शोभा और अधिक बढ़ गई॥ 

सीस सिखर जे कुंतल कूरे । उर भए पउने गवने दूरे ॥   
ऐसेउ रूप लहत रुराई । दरसत हाँसे सुमन सहाई ॥ 
उसके शीश पर जो केश राशि थी । उस राशि का दो तिहाई अंश उड़ कर कहीं दूर चला गया ॥ बालिका इस प्रकार के सवरुप में भी उसका रूप सुन्दर लगता । उसे उड़े हुवे केश भूषा में  उसके साथी बने हुवे सुमन उअसे देख-देखकर हंसते ॥ 

माए नउलि झगुली कर धारी । कली कलापक कारि कगारी ॥ 
भाउँति मनु तन लै पिन्हाई । एकटक रहे नैन पट ताईं ॥ 
माता के हाथों में नई झाबली थी । जिसके किनारियों एवं करधनी में कलियों की कलाकारी की गई थी ॥ मन को बहाने वाली उस बालिका को वह झाबली पहनाई गई ॥ नयन के पलक सथिर होकर उसे तकते रहे ॥ 

देवत हूतहि सकल बुलाईं । प्रिय पुर जन पिहरन ससुराईं ॥ 
कमल छबि मुख मौलि मह माई। तूल तिलक दुति निंदत लाई ॥ 
आमत्रण देते हुवे नगर के प्रिय जनों को पीहर और ससुराल से सबको बुलाया गया ॥ कमल की शोभा से युक्त मुखोपर  के माथे पर महामाता ने द्युति की भी निंदा करता हुवा लाल तिलक लगाया ॥ 

बर भेसु बनाई,नयन सुहाई, अरन बरनक्रम बरनै । 
मह पितु सह माई,धिय परनाई, मंदिर भगवन चरनै ॥

जोती उजयारी, पूजन कारी, मधुरपरक अधर धरे । 
पा पितु महतारी, कनी कनियारि, परसाए पद आपने ॥  
नयनाभिराम स्वरूप में सुन्दर रूप धरे अक्षर, वर्णों के क्रम से बने चित्र रूप में वर्णन रूप में बालिका के इस रूप का वर्णन कर रहे हैं ॥ पितामह एवं मातामह ने प्रभु के मंदिर में उनके चरणों में पुत्रिका का प्रणाम अर्पित किया ॥ जयोति प्रज्ज्वलित की पूजा अर्चना की, और अधरों से चरणामृत ग्रहण करवाया ॥ फिर जब माता-पिता  ने गोद में लिया तब उस कनकचम्पा स्वरूप कन्या ने देवी रूप में 
अपने चरण स्पर्श करवाए ।। 

मधु धूर धान कन मेल, गौ रस सारे क्षीर । 
सकल बाल उपवन खेल, लखे लोचन अधीर ॥  
 उद्यान में क्रीडारत रहने  के पश्चात सारे बालक शर्करा,चावल के  मिश्रण  और गाय का दुग्ध ग्रहण की हुई क्षीर को लालसा भरी हुई आँखों से देख रहे थे ॥ 

शनिवार, १ ३ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                  

वातारि दूध जुग दल द्राखा । तीख गंध कर केसर राखा ॥ 
खीर पूरी पो पूए पकाईं । लाग लगन जुग लोग लुगाईं ॥ 
बादाम से युक्त उस दूध में दाख मिलाई गई थीं । और छोटी इलायची एवं केसर से सुपोषित थीं । ऐसी क्षीर के साथ घर के सभी स्त्री-पुरुषों ने बड़े ही लगन पूर्वक मिलजुल कर पुड़ियाँ बेली और पूवे पकाए ॥ 

तेज पुहुप पत पूरिक लावन । तीख गंधा  रति रस भरावन ॥
दलित दाल दल तैल तिराई । पिष्ट पाक भित कनक सनाई ॥  

लवण-कचौरी, जिसमें लौंग, तेजपत्र, अजवाइन से युक्त  चटपटा भरावन  जो की दली हुई दाल-समूहों ( मूंग-मूठ उड़द आदि) के साथ  तेल में बघारा हुवा था जिसे  महीन गेहूं के गुँधे हुवे आटे की लोइयों में अनुलग्न कर  कडाही में तला गया ॥  

कहे रहि पिस पिस पिसन हारे । बड़ भारी जन दिवस तिहारे ॥ 
पन पन पंगत निकसत भीते । अन्न धन्न दे गाहक जीते ॥ 
पिसने वाले जब पिस पिस कर हार गए तो कहने लगे यह तुम्हारा जन्म दिवस भी न्यारा ही है॥ आवारिकाओं की पांतों से  पंक्तिबद्ध होकर विक्रेता बाहर निकलते और सेवा पूर्वक अन्न धन्न  दे कर ग्राहक का मन जीतते ॥ 

सब बालक सौ बधु धर थारी । खीर पूए सन पुरिका घारी ॥ 
बाल मुकुंद रसिक रस राधे । तूर चूर भरपूर सुवादे ॥ 
वधु ने सभी बालकों के सम्मुख थालियाँ रखीं क्षीर, पूड़ी के साथ कचौडियाँ परोसी । बालकों ने तत्काल ही कचौड़ियों को तोड़ कर उसके  स्वादिष्ट रसों के  स्वाद का आनन्द लिया । 

साध सकल एक बालक लौना । कहत सकुचित तनिक  अरु दौना ॥ 
असन रसन मुख अधर मधुराए । भरे भू भवन सबहि पहुनाए ॥ 
जब एक सुन्दर बालक ने सारा भजन समाप्त कर दिया तो संकोच करते हुवे कहने लगा किंचित और दो ना ॥ भवन में जितने भी अतिथि थे सभी ने उक्त भोजन के रसों का अपने मुख अधरों से स्वाद लिया ॥ 

उदित मुदित छुधा निवृते, तिसत तोए मुख धार  । 
पाछून पाहून बिदा लिए, धिय के कर दै उपहार ॥ 
भूख शांत करके सभी प्रसन्न चित होकर उठे और प्यास को जल धार कर शांत किया । तत पश्चात अतिथियों ने पुत्रिका के हाथों में उपहार देकर विदा ली ॥ 

रविवार, १ ४ जुलाई, २ ० १ ३                                                                                        

तटी तरंगित  गहि रहि रनियाँ । कबहु कोउ कबहुक को कनियाँ ॥ 
उपबन खावन खेलन खोई । ते दिन धी बहु नंदत सोई ॥ 
सुख और आनन्द से भरपूर रानी के जेसीइ पुत्रिका कभी किसी की गोद में तो कभी किसी की गोद में रही ॥ इस प्रकार गृह उद्यान में खेल-खाकर वह उस दिन बहुंत ही प्रसन्न चित मुद्रा में सोई ॥ 

भोर भई रय रयनि बिहाई । सरित चरन धर नगरि नहाई ॥ 
प्रात स्नात प्रिय गत सयनिका । मुख चुम्बत सुती पलन पुतिका ॥ 
रात समाप्त हुई और भोर हुई, सरिता में चरण उद्धृत किये सारी नगरी नहाने लगी ॥ परत: स्नान आदि के पश्चात प्रियतम शयन सदन में गए । और पलंग पर सो रही पुत्रिका के मुख पर चुम्बन अंकित किया ॥ 
  
 दरसे वधु के मुख ससि सोभा । खावन अँगार पी मन लोभा ॥ 
जुग अरु अंबर प्रान समाई । जावन प्रीतम लिये  बिदाई ॥ 
वधु की श्री मुख पर चंद्रमा की  शोभा का साक्षात्कार हो रहा था । चूँकि चकोर अंगार भक्षी है अत: पीया का ह्रदय भी अधरों पर के अंगारों की लालसा करने लगा । नयनों और अधरों को प्राण समा के अधरों से संयुक्त करने के पश्चात प्रियतम ने स्थापना  स्थली में जाने हेतु विदाई ली ॥ 

भए पट दौ पल नयन दुआरे । पूर उघारे पिया  निहारे ॥ 
दृग दर्पन दरसन छबि धारे । भए दरस तीत तब पट ढारे ॥ 
दो पलकें नयन भवन का द्वार हो गईं । जो पूर्णतया अनावृत होकरप्रियतम को निहारने लगी ॥ नयन दर्पण में प्रियतम  दर्शन की छवि को धारण किया और उनके दर्शानातीत होने पर द्वार बंद कर लिया ॥ 

हियरा हूते दौ दीठ, गवने प्रीतम पीठ । 
पर हरिदै बहुरे नहीं, बहुरी बहुरी दीठ ॥ 
ह्रदय को दो  ने आमंत्रण दिया,  और  प्रियतम के पीछे हो लिए । नयन तो वापस लौट आए, किन्तु वधु का ह्रदय वापस नहीं लौटा ॥ 

सोमवार,१ ५ जुलाई, २०१३                                                                                         

गवने तौ लघु बहिन बिहावन । बहुसहि  चिंतन रहि प्रिय के मन ॥ 
यतन जतन कर कारज सोई । सुरतत रहि तँह कोइ न कोई  ॥ 
गए तो प्रियतम के मन मस्तिष्क में छोटी बहिन के विवाह की बहुंत चिंता रहती । उससे सम्बंधित कोई न कोई युक्तियुक्त कार्य सम्पादन हेतु मनन करते रहते ॥ 

देवन द्रव धन दान दखीना । जोवन लगि रहि भाइहि तीना ॥ 
सब सँजोइ जूत जोइ जोऊ । को पुरतित भै अध भै कोऊ ॥ 
उपहार सामग्री एवं दान दक्षिणा देने हेतु उसके प्रबंध में तीनों भी लगे रहते । सभी साथ में दान योग्य सामग्री को संगढ़ित करते हुवे विवाह की तैयारी में जुटे थे । कोई तैयारी पूर्ण हो चुकी थी कोई शेष थी ॥ 

जोगवना जे धन पत पाईं । तेहि तात लै प्रिय कर दाईं ॥ 
तनि तिथि पूरित तानी रहि सेषा । जे रहि लावन भूषन भेषा ॥ 
वह पत्र स्वरूप में जो धन संचित था, पिता ने उन्हें प्रियतम के हाथ में थमा दिया //  उनमें से कुछ की तिथियाँ पूर्ण हो चुकी थी और कुछ की अवधि पूर्ण होनी शेष थीं // जो वसन -भूषण के क्रय करने हेतु था //

गवने ले पत जोग प्रयोका । दवने सत परखत अवलोका ।। 
असन  बसन क्रय कार पूरिते । निज रुचिकर को वर पख कहिते ॥ 
प्रियतम उन अवधि शेष पत्रों को लेकर महाजन के पास गए जिसको महाजन ने देख परख कर उसका  उचित मुल्य लिया \\ भोजन-वसन क्रय करने का कार्य पूर्ण हो गया जो कुछ तो वर पक्ष की रूचि के अनुसार था तथा कुछ अपनी रुचिनुसार था //

लागे लगन जथा जोग, परिजन सोहनु साज ।
आपन सम अर्थ पूरित, करत रही सब काज ।।   
विवाह की यथा योग्य शोभा सुश्रुता में परिजन लगे थे ,सभी अपने अपने सामर्थ्यानुसार,  कार्य कर रहे थे //




    









  

Sunday, June 16, 2013

----- ॥ सूक्ति के मणि 10॥ -----

गहराए रयनि  धीरहिं धीरे । हरियर बाढ़त गयऊ पीरे ॥
धारत पीर तनि अवधिहि बिते । लागे साजन बाहन सुधिते ।। 
धीरे धीरे रात गहरी हो रही थी और पीड़ा भी धीरे धीरे बढ़ रही थी ॥ पीड़ा सहते हुवे थोड़ा समय बिता तो प्रियतम वाहन 
 की व्यवस्था करने में लग गए ॥ 

धरनी तल रजनी जल रीसे । भइ रजताकर कर रजनीसे ॥ 
गहत रजोरस गगन अवासे । लहत दिवस बस पूरन मासे ॥ 
धरती पर ओस टपक रही थी और वह चंद्रमा की किरणों से वह चांदी की खान के सदृश हो गई ।। गगन गृह अधेरा ग्रहण 
करते गया और और पूर्णिमा दिवस बस होने ही वाला था ॥ 

प्रसूति प्रसवन वेदन गहती । एक ते ऊपर एक अरु लहती ॥ 
प्रसवन धर्मन सथरी पावन । भए उदयत पिय बधु लै जावन ॥ 
प्रसूति फल उत्पन्न करने की वेदना सहती गई ।  एक के ऊपर एक उठती लहरों सी वेदना को प्राप्त होती गई ॥ प्रियतम 
सन्तति प्राप्त करने हेतु वधु को प्रसव स्थली में ले जाने की तैयारी करने लगे ॥ 

ततपर कर बधु बहनु बिठारे । कहत बाहि ले जाहू ढारे ॥
जुग दम्पति पथरन पथ चारी । सरद ऋतु उपर बरखत बारी ॥
 शीघ्रता करते हुवे वधु को वाहन में बैठाया और चालक से कहा वाहन को ढुलकाते हुवे सावधानी पूर्वक ले चलना ॥ युगल 
दम्पति जब पत्थरों के पथ पर चलने लगे तो एक तो शरद ऋतु  उसपर वर्षा बरस रही थी ॥ 

जल कन कंचन चरनन चिन्हे । साथ बात बहु सीतल किन्हें ॥
आलबाल कर माल तरंगे । बाँधत सकल अंग प्रत्यंगे ॥
जल के स्वर्ण स्वरूप कण चरणों को चिन्हांकित करने लगे | साथ ही उन्होंनेहवा को भी शीतल कर दिया | मेघ ने शीत तरंग मालाओं को अपने हाथों में ले लिया | और समस्त अंग प्रत्यंगों को बाँध लिया //

उदरन जिउ चित मह पीर, बधु मुख प्रभु के नाम । 
बहनु धीर पिया अधीर, असने औषधि धाम ॥   
वधू के उदर में जीव, अंतस मन में पीड़ा और मुख पर ईश्वर का नाम था वाहन धीरे धीरे चल रहा था किन्तु प्रियतम की मति सरणी की गति तीव्रता लिए हुवे औषधालय पहुँच गई || 

सोमवार, १ ७ जून, २ ० १ ३                                                                                         

देखि दसा बैदक प्रसविन्ही । प्रसूति गृह भित करि पट दिन्ही ।। 
गवनत जनी गृह मुँह अँधेरे । देवन उदंग पिय पग फेरे ॥ 
बैद्यगण ने जब प्रसूता की दशा देखी, तो उसे गर्भ मोचन गृह में भरती कर द्वार बंद कर दिया // जननी के गर्भ मोचन गृह जाते ही मुंह अँधेरे ही प्रियतम (गृह जनों को) ततसम्बंधित समाचार देने हेतु उलटे पाँव हो लिए //

बित जामिनि सित प्रभा प्रभासी । निरखे सरुबर पाख प्रवासी ॥ 
सरसे सर सर सरसिक सरूजे ।  कुर्कुट कलबल कुलकत कूजे ॥ 
रात्रि व्यतीत हुई शुक्ल पक्ष की की दीप्ती, देदीप्यमान हुई /  सरोवर में प्रवासी पक्षी दर्शन देने लगे / जलसारस  अति शीघ्रता पूर्वक गति करने लगे और कमल तेजी से पनपने लगे / मुर्गे कोलाहल करते हुवे हरिषित होते हुवे बांग का स्वर देने लगे //

सीस ससी सुख रयनि सुहाही । हरिएँ गवनी प्रात  की बाहीं ॥ 
नदी दीन नद नदन निनादे । नंदिनी नंद नन्दिन नादे ॥ 
शीर्षोपर शशि धारण किये हुवे  वह शांत, आनंद दायक एवं सुहावनी रात्रि धीरे से प्रभात की बाहु में समा गई / ( छोटी)  नदी विकलता से भरी हुई और बड़ी नदी गंभीर गर्जना करते हुवे निनाद करने लगी, और  शब्दायमान होते हुवे प्रसन्नता पूर्वक प्रीतम से पूछने लगी पुत्र या पुत्री ? 

श्रवनत नमनत पिय सुहसाए । कहे नंद कहु का कही जाए ॥ 
पैठत बाहनि जननि दुआरे । छ्न मह पद पँवरी पइसारे ॥ 
ऐसा सुन कर प्रियतम नत मस्तक होते हुवे मुस्कराते हुवे हर्षयुक्त वचनों से कहने लगे कहो तो क्या कह सकते हैं इस प्रकार वाहनी जननी द्वार पर पहुँच गई  छंभर में उनके चरणों ने ड्योडी पार  की 

सुत भुर मगन गेह प्रियजन, रसमस अलस बिहान । 
पिय अवनत किए जागरन,  दसा सकल लिए कान ॥    
घर के सभी प्रियजन जो भरी भोर के समय श्रांत क्लांत अवस्था में  निद्रामग्न थे / प्रियतम के आते ही वो जागृत हो उठे और  स्थिति का पूर्ण संज्ञान लिया //

मंगलवार, १ ८ जून, २०१ ३                                                                                            

जोग संजोग किये प्रबंधे । सुरत पितर सब भगवन वंदे ।। 
लिए प्रियतम एक बहनु बैठाए । औषधी सदन जननी पठाए ॥ 
यथा उपयुक्त सामग्री का प्रबंध करते हुवे सबने पितृजनों के सह ईश्वर का स्मरण किया  तत पश्चात प्रियतम ने एक वाहन में बैठा कर माता को औषधालय भेजा //

गवनत प्रिय बधु पीहर देसे । तात भ्रात दिए सब संदेसे ॥ 
जलपान गहत  दुइ छन होरे । तत्पर औषधि भवन बहोरे ॥ 
जाते हुवे प्रियतम वधु के पीहर घर में भी पिता-भ्राता सहित सभी को प्रसव सम्बंधित साड़ी सूचनाएं दी / दो छानों के लिए ठहरते हुवे  थोडा जलपान  किया, फिर तत्परता से औषधालय के लिए प्रस्थान किये //

प्रसूति गृह सूलोपर सूले । गर्भिनी सहत गहनत बहुले ॥ 
भई गर्भ ते मंडप मोचे । चें चें करि जन जातक चोंचे ॥ 
प्रसूति गृह में पीड़ा के ऊपर गहरी पीड़ा को  गर्भवती वधु सहन करती रही / और गर्भगृह में गर्भस्थ शिशु का जन्म हुवा, जन्मते ही बच्चे के मुख ने चाऊं-चाऊं की ध्वनी उच्चारित की //

बैदिका बहुरि देइ उदंते । जनम भयउ तुम्हरे कुलवंते ॥ 
पूछे पिया नंदकि नंदिनी । कर अंक कहि लौ तव करिषनी॥ 
फिर चिकित्सिका ने शुभ समाचार दिया तुम्हारे कुलवंत का जन्म हो गया है // जब प्रियतम ने पूछा कि पुत्र ने जन्म लिया अथवा पुत्री ने तो चिकित्सिका ने शिशु को गोद देते हुवे खा लो तुम्हारी लक्ष्मी //

मुलकत मुख मंजुल घोषि , मेरुक मेलत मौलि । 
मानहु मनिमत कर कोष, देवत गिरिबर धौलि ॥  
अप्सराओं के जैसा मंद मंद मुस्कराता हुवा मुखड़ा धूप से मिलता हुवा माथा मानो सूर्य अपनी किरणनिधियों को गिरी शेर्ष्ठ हिमालय को सौंप रहा हो //

बुधवार १ ९ जून, २ ० १ ३                                                                          

लाल ललामिक लहत बालिका । चन्द्र वदनि लौ लखित लालिका ।। 
रूप लावन अंग रंग रुपिका । लवकत लखि इव लवंग कलिका ॥ 
माणिक्य रत्न जैसी सौन्दर्यता ग्रहण किये हुवे बालिका का प्यारा सा मुख चन्द्रमा के समान ज्योतिर्मय दिखाई दे रहा था // उसके अंगो के रंगरुप का सौंदर्य मदार के पुष्प के सदृश्य था // और उसके रूप के चमक शोभा ऐसी प्रतीत होती मानो वह कोई लौंग की कालिका हो //

जोग पल कोमल नैन नलिने । कलस कलित किये कोउ कलि ने ।।
तिलकावलि लखि ललित अलीके । अलकावलि बल बलय लली के ॥ 
कोमल पलकों से युग्मिल्ट नलिन के सदृश्य नयन मानो किन्ही कलियों को कलश में विभूषित किया गया हो // लावण्यित ललाट  तिलक चिन्हों से  लक्षित हो रहा था //

दौ पद धार अधरारविंदे । वृत धृत अमृतभृत अंसु अलिंदे ॥ 
कोमल कल कपोल पर रागे । आलोकित अलि बल्लभ फागे ।   
अरविन्द पत्र रूपित अधरों के दो पद, गोलाई लिए हुवे सुधा के आधार स्वरूप पूर्ण चन्द्रमा का द्वारालिंद ( द्वार का चबूतरा)  थे  // सुन्दर कोमल कपोलों पर पाटल वर्ण सुशोभित हो रहा था //

लघु कर उँगरी ताल कस कासे । पट दल पाद पदुम संकासे ॥ 
काम बान के कर्नक काना । सीस सकल दृड़ मूल समाना ॥ 
छोटे छोटे उँगलियाँ  हथेली में कसी हुई थीं / और चरण की उँगलियाँ पदम् पत्र के सदृश्य अति कोमल थे //उसके कान, आम के पत्र एवं उसकी शाखाओं के सदृश्य और पूरा सिर असित फल अर्थात नारियल के समान था //

सिर दृड़ मूल समान, काम बाण पत्र कान  । 
देही कलसी दान, रुप सरूप तनु भवा के ॥ 
इस प्रकार नारियल जैसा सिर और आमके पत्रों के सदृश्य कर्ण,  कुल मिलाकर पुत्रिका के शरीर का स्वरूप एक कलश दान के जैसा था //

शनिवार, २ २ जून, २ ० १ ३                                                                                

नंदिनी नलिन रूप अभिरामा । नयन पलक पल देइ बिश्रामा ।। 
प्रेम पूरित गृहजन लिए गोदे । भयउ सकल मन मोदु प्रमोदे ॥ 
किन्तु उस नंदिनी का रूप नलिन के सदृश्य नेत्रों को प्रिय लगाने वाला और पलकों को शांति प्रदान करने वाला था/ प्रेम से परिपूर्ण होकर उसे गोद में लेते हुवे सभी गृहजनों का मन बहुंत ही हर्षित हते हुवे आह्लादित हो उठा //

भरे ह्रदय धिय पिय कर कोरे । सुमिरन सुत जल नयनन जोरे ।। 
मूर्द्धन बदन मेल मिलाएँ । नीक अधिक कह तनु भव ताएँ ॥ 
भरे हुवे ह्रदय से दिवंगत पुत्र का स्मरण करते हुवे नयनों में जल संग्रह कर प्रियतम ने पुत्रिका को बाहु में लिया // उअसके माथे और उसके मुख को मेल करते हुवे कहने लगे यह तो अपने पुत्र से भी अधिक सुन्दर है //

आरोग भवन तिनु दिवस होरे । भए मोदित बहुरत निज ठोरे ॥ 
गृह बन लग लस सुमनस साखे । ललनि लवन मुख ललकत लाखे ॥ 
 तीन दिवस तक चिकित्सालय के शरणागत हो फिर हर्षित होते हुवे अपने निवास को लौटे // गृह वाटिका में शाखों पर प्रस्फुटित पुष्प आकर्षित होकर ललनि के मुख छवि के दर्शनाभिलाषित हुवे //

बाल ससी वधु बदन दिखाईं । सुरति ललन नयनन भरि लाईं ॥ 
रल मल सकल सुमन समुझाईं । जीउ जाति जन जनम सिराईं ॥ 
वधु ने जब उस बाल चन्द्रमा के दर्शन करवाए तो उसके लोचन पुत्र का ध्यान करते हुवे छलक गए // सभी पुष्पों ने मिलकर फिर वधु को समझाया कि जीवों की उत्पत्ति जन्म और जीवनांत हेतु ही हुई है //

फूरी फूरी खिले मुख सोहती सकल साख । 
एक पात एक अंक भरे, दौनो लावन लाख ॥

फूल-फूल और उंके प्रफुलित मुख सभी शाखों पर अत्यधिक शोभायमान हो रहे थे एक को पत्रों ने  तो दूसरी को गोद ने तो एक को गोद ने भरी हुई थी दोनों ही सुन्दरता से अतिरेक थे //

रविवार, २ ३ जून, २ ० १ ३                                                                         

पंच दिवस बय तनुजा पाई । छठ दिन छठी बरही मनाई ॥ 
लतर लरी लग छड़ी छटाँका । पहनि झगुलि रुम केसर टाँका ॥ 
पांच दिवस की आयु अवस्था को प्राप्त बाल तनुजा की छठवे दिवस, छठी उत्सव मनाया गया बेल की पंक्तियों से और झालर की बनावट से सुसज्जित किया हुवे उस अनोखे झबले को बाल तनुजा ने पहना 

सिरु चौतन बर चरनन राखे । लखत ललनि जस पदमिन पाखे ॥  
सिसिर अंसु मुख अंजन नैना । लखि अलखित दिवस अरु रैना ॥ 
शीश पर चौकोर पगड़ी और सुन्दर चरणत्राण धारण कर ललानी ऐसी दर्शित हो रही थी जैसे वह कोई पद्म पंखुड़ी हो // चन्द्रमा जैसा मुख और आँखों में काजल ऐसा प्रतीत होता था मानो लक्षित और अलक्षित दिवस -रयनि ही हों //

कंठन अभूषन कनिक कलिते । हिरन प्रभा नभ मंडल वलिते ॥ 
काल कलापक कलित कलाई  । चारू चरन निभ पाइल पाई ॥ 
बाल कन्या के कंठ में विभूषित आभूषण मानो स्वर्ण प्रभा लिये हुवे सम्पूर्ण आकाश मंडल ही गूँथा हुवा हो // काले मोतोयों की लड़ियों से विभूषित कलाई और सुन्दर चरण चमकती हुई पायल से युक्त थे //

मात पिता मह लै कर झौरें । बाल कली बन इत  उत डोरै ॥ 
कबहु पाल कर पाल उछंगे ॥ कबहु पालिका कर भरि अंगे ॥ 
मातामह और पितामह फिर उस बाल-कली को हाथों के झूले में लेकर गृह वन में इधर-उधर घुमने लगे // कभी तो बाल-कन्या के पालक के हाथों के पालने में उछालते कभी पालिका उसे गोद ले लेतीं //

अलि बल्लभी बसन वरे, भर बर भूषन भेस । 
लवकत लौ लागत मनहु कुल के अंजनि केस ॥  
लाल कमलिन पुष्प के सदृश्य वस्त्रों को वरण किये और सुन्दर आभूषणों का वेश धरे चमकती हुई वह कुछ ऐसी दिखाई दे रही थी मानो वह कुल की दीपिका हो //

सोमवार, २ ४ जून, २ ० १ ३                                                                                       

दिब्य बसन धर दिन उल्लासे । रत रयनिहि चर रतियन कासे ॥ 
बिरत सिसिर रितु अति सुखदाई   । अंत परस बासंतिक छाईं ॥ 
सूर्य का प्रकाश धारण कर दिवस आह्लादित हो उठे और चन्द्रमा में अनुरक्त होकर रात्रि चमकने लगी / शीत ऋतु बहुंत ही सुख पूर्वक व्यतीत हुई, जिसके अंत होने के पश्चात वसंत उत्सव छा गया // 

पीठ उदर पद करक कलाई । दोइ बखत सिसु मर्दनि माई ।। 
मास चतुर बय अँगजा धारी । भाउ भंगिमन करि मनुहारी ॥ 
पीठ, पेट पाँव, हाथ और कलाइयों को माता दोनों समय मल्हारती // जब बाल कन्या ने चार मास की आयु प्राप्त कर ली । तो उसकी अंग चेष्टाएँ बहुंत ही मनोहारी प्रतीत होती //

कार करन कर पूरन कामा । बखतै बहोरि पिय निज धामा ॥ 
बर भ्रात के बर बेलि बौने । बाल कलिक  कर केलि किलौने ॥ 
कार्यालय कार्य पूर्ण कर प्रियतम समय पर लौट आते / बड़े भ्राता के सुन्दर साथी निकल कर बाहर आ गए थे जो बाल -कन्या के हाथों के खिलौने बन कर विनोद पूरित क्रीडाएं करते ॥ 

गुड्डा गुड्डी ठुमकत ढारे  । गढ़ गढ़ कारे ढोल नगारे ॥ 
झूलन ऊपर चँवर बँधाई । डोर कलस कर झोर झुराई ॥
गुड्डा एवं गुड्डी खड़े होकर ठुमके लगाते, गढ़ गढ़ करते हुवे ढोल नगाढे // झूलों के ऊपर फूँदे बंधे हुवे थे // डोरियों को हाथ हाथों में लेकर (मात-पिता ) झौंके देते हुवे झुलाते ॥ 


धिदा सुधाधर पर छाए, मंद मंद मुसुकानि । 
हुँकारी भरि हुँ करि गाए मानहु मधुरित गान ॥  
बाल-कन्या के सुधा युक्त अधरों पर मंद-मंद मुस्कान छाई हुई थी और हुंकार भर हूँ हूँ करती हुई मानो वह कोई मधुरित गान गा रही हो ॥ 

मंगलवार, २ ५ जून, २ ० १ ३                                                                                                

धिय जनमत बय चातुर मासे । को जाने जा को करि बासे ।। 
प्रात साँझ मन भर अनुरागे । सकल समउ बधु धिय महि लागे ॥ 
बिटिया के जन्म लिए चार मास हो गए / जो किस प्रकार व्यतीत हुवे इसका भानही नहीं हुवा // मन में अनुराग भरे सवेरे से लेकर सांझ तक वधु का सारा समय बाल-कन्या में ही व्तातित हो जाता ॥ 

बितत रहहि दिन बहु सुख दाई । तबहु अवधि  एक संकट लाईं ॥ 
जे पद कर राउ सेवकाई । ते पद पर पिय रहहि अथाई ॥ 
इस प्रकार दिन बहुंत ही सुख पूर्वक व्यतीत हो  कि  तभी समय, एक संकट लेकर आया // प्रियतम जिस पद पर राउ की सेवा कर रहे थे वह पद पर वह अस्थाई थे । 

पिय दिन एक आयसु पत लाईं । जामें रहि ए सँदेस लिखाईं ॥
सकल अथाइहिं राउ निकासे ॥ तामें पिय नामहु  उत्कासे //
एक दिन प्रियतम एक आज्ञा पत्र लेकर आए जिसमें यह संदेस लिखा था कि समस्त अस्थाई कर्म चारियों को राजा ने निकाल दिया है  उअस्मेन प्रियतम का नाम भी आदेशित था ॥ 
पा आयसु मुख भरे बिषादे । दोनउ दरसै दीन अगाधे ॥
चितबत चितब गृह चित्त बंदे । अजहुँत गृह कस होहिं प्रबंधे ॥
इस प्रकार के आदेश को प्राप्त कर दोनों कका मुख विषाद को भरे अत्यधिक दीनता दर्शाने लगे ॥ स्तब्ध होकर घर के स्वामी ने ऐसे वचन कहे कि अब घर संचालन हेतु धन की  व्यवस्था किस प्रकार से  होगी //

सुनि अस बधु पिय कह समुझाई । कह अस चिंतन अगन बुझाई ॥ 
राजन के बिधि राजन के गाने । आपन बिधि जे रचित बिधाने ॥ 
ऐसा सुनकर वधु ने प्रियतम को समझाया और ऐसे वचन कहते हुवे चिंता की अग्नी को बुझाया । राजा के विधि-विधान राजा ही का बखान है / अपनी विधि-विधान वही है जो सृष्टि के रचेता ने रचा है ॥ 

कन तन सीस आछादन, दाता के सब देन । 
ते मद मूर्खा जे कहि सब हमारे ही लेन ॥ 
यह तन,अन्न और सिर पर की छाया सभी दाता का ही  दिया हुवा है /वे जन अहंकारी और निपट मुर्ख हैं जो यह कहते हैं कि सब हमारा ही दिया हुवा है ॥ 
   
बुधवार, २ ६ जून, २ ० १ ३                                                                                           

तन परिपोषत मन के सारे । मन कौ पोषत परम बिचारे ॥ 
बैभव भूतिहि कर परिवारे । माया कर कुल कज्जल कारे ॥ 
तन का परिपोषण मन का सत्य करता है मन के सत्य का पोषण उत्तम विचार करते हैं । परिवार का पोषण, वैभवएवं श्री के हाथों में है । और माया  वंश के अपमान  कारण बनती है //

बिन करम बिनु कर्मना राखे । बिते बरस के चारि छह पाखे ॥ 
कार करन पिय पूछत लेखे । मोर करम चिन कहुँ कर देखे ॥ 
कार्य हीन एवं पारिश्रमिक रहित होकर डेढ़ माह व्यतीत हो गया // कार्यालय में प्रियतम लिखापढ़ी कर पूछते रहे मेरे भाग्य को कहीं देखा है? 

लिख लिख पाति पथ मसि बुहाई । पर कोउ न प्रतिउत्तर पाईं ॥ 
पुरजन के गृह बास्तु कारे । अस जस तस गृहस सँवारे ॥ 
लिख लिख कर पत्रों के पृष्ठ काले कर दिए किन्तु उन्हें कोई प्रति उत्तर नहीं मिला॥ तब नगर जनों के घरों का वास्तुकार्य करना प्राम्भ कर दिया / इस प्रकार से जैसे तैसे घर संचालन हेतु धन की व्यवस्था की ॥ 

पुनि चिंतन रहि बन कुटि ताईं । कर्म बिनु कभू छूट न जाई ॥ 
एहि बिचारत तनि जोड़ जुगाए । एक निज सदनन मोल मुलाए ॥ 
फिर उस वाटिका गृह की चिंता हो गई कर्म बिना कहीं उसे राऊ वापस न ले ले // ऐसा विचार कर थोड़ी योग-युक्ति कर स्वयं के स्वामित्व का एक सुन्दर सदन क्रय किया //

समाचार पत्र ज्ञापन दिन्ही । राज सासन तेहिं चित चिन्ही ॥ 
भवन रहि भाटक क्रय अधारे । भयउ स्वामी दै अध सारे ॥ 
इस सदन के परिपेक्ष समाचार पत्रों में ज्ञापन दिया हवा था कि राज्य शासन इन भवनों का निर्माता होगा । भवन भाडा क्रय पर आधारित था । जो इस प्रकार था "मूलधन का आधा अंश दो-गृह स्वामी बनो"( इस मूल धन के आधे धन को भी अंशों में चुकाना था )
  पत्रोपचारिक करि दिये, मुद्रा कुल सहस साठ । 
प्रथम अंस दै कर लिये, तीन कछ कूल बाट ॥ 
पत्र औपचारिकताए पूर्ण कर कुल षष्टिसहस्त्र पत्र मुद्राएँ जो की प्रथम अंश स्वरूप थीं चुकाईं और मार्ग के कगार पर तीन कक्ष क्रय किये ॥ 

गुरूवार, २ ७ जून, २ ० १ ३                                                                             

जोग मुद्रा कुल सहस चालिसा । एक भू खन मोले कूल दिसा ॥ 
जे रहि निकटइँ रहन दुआरि । अरु भए एक लघु भूम धिकारी ॥ 
जोड़ी हुई मुद्राएं जो कुल सहस्त्र चालीसा थीं ।जिससे नदी किनारे पर एक भूमि खंड मोल लिया ॥  जो वर्तमान निवास के निकट ही था । और इस प्रकार वर-वधु एक छोटे से भूमि के स्वामी भी हो गए ॥ 

पा समउ पिय सुभ करम किन्हीं । जे कुँअरी लघु रहहि बहिन्ही ॥ 
डगरी नगरी बहु कर पेखे । निरख परख एक जुग बर देखे ॥  
समय मिला तो प्रियतम ने एक शुभ कार्य किया / जो कुँआरी लघु भगिनी थी उसके योग्य नगर-नगर अतिशय निल्रिक्षण-परीक्षण करते हुवे एक वर देखा॥ 

दक्ष बहिनिहि बर रहि अभियंता । भावइ मात पिता के मंता ॥ 
समदित समदिहि सगन मिलाईं । गवनु  समधियन दानत दाईं ॥ 
सर्व गुण संपन्न बहन हेतु वर भी अभियंता था जो माता-पिता के मन को भी प्रियकर था ॥ और पुत्री की ससुराल में जाकर बड़े ही प्रसन्नता पूर्वक दान दक्षिणा स्वरूप शगुन मिलाई, भेंट की ॥ 

समउ पहर दिनु मास दिखाईं । सुभ दिन लगनहि तिथि ठहराईं ॥ 
देखन बर तन ते श्रम कारे । पर पिय उपर रहि न धन भारे ॥ 
समय पहर दिन मास दिखलाते हुवे शुभ दिवस में लगन की तिथि निर्धारित कर दी ॥ यद्यपि वर के ढूँडने में प्रियतम ने शारीरिक परिश्रम किया किन्तु उनके ऊपर दान-धन का भार नहीं था ॥ 

भोजन छादन दान धन , भूषन बसन सँजोग  । 
मात पिता कर तल पाहि,रहहि बियाहन जोग ॥  
विवाह के योग्य भोजन-आच्छादन, वस्त्र-आभूषण आदि दान सामग्री हेतु धन माता-पिता के पास पर्याप्त था  ॥ 

शुक्रवार, २ ८ जून, २ ० १ ३                                                                                       

पुनि पिय जीउति चित सुरताही । चिंतन भए गृह चारन ताही ॥ 
जोड़ जुगत भू भवन निवेसे । अब कँह हुँत घर  जुग कन  भेसे ॥ 
(यह सब कार्य संपन करने के पश्चात ) फिर प्रियतम के चित में आजीविका का ध्यान आया । और गृह संचालन की चिंता हो आई॥ युक्तियुक्त धन भूमि और भवन में निवेश किया अब कहीं से घर हेतु भोजन-वस्त्र का जुगाड़ हो ॥ 

त्रसत गयउ न्याय धीस पाहिं । न्यायलय कहि त्राहि मम त्राहि ॥ 
कहत भर के न्याय दुआरे । नाम बर करे  न्याय न धारे ॥ 
और फिर राजा के शासन व्यवस्था से त्रस्त  होकर न्यायाधीश के सन्मुख दैन्यपूर्वक रक्षा की गुहार लगाई । वह न्याय आलय केवल कहने भर का था जिसका नाम बड़ा था उसके पास न्याय नहीं था ॥ 

बहु सह पत्र आवेदन किन्हें । कोउ कर्मथरि करम न दिन्हें ॥ 
अंतत: सब थरि पिय थकि हारे । सुरती पुरातन करम दुआरे ॥ 
बहुंत से पत्र आवेदन लिखे किन्तु किसी भी कार्यालय किसी भी कारखाने ने काम नहीं दिया ॥ अंत में सभी स्थान से निराश होकर पुराने कार्यालय ही ध्यान में आया ॥ 

बार बार गत कारज धामा । कार पाल के प्रनत प्रनामा ॥ 
कहत दया कर को पद दाईं । चाहे लघु ते लघुतम नाईं ॥ 
कार्यालय में बार बार जाने और कार्य पालक के सम्मुख निवेदन करके कहा की दया कर के कोई योग्य पद प्रदान करें चाहे वह पद छोटा से छोटा ही क्यूँ न हो ॥ 

जोग परख बहु बिनति पर, कार पालन अधिकारि । 
जोजनै समनवयक के अथाइ पद कर धारि ॥ 
बहुंत ही विनती करने के पश्चात योग्यता की परीक्षा करते हुवे कार्य पालन अधिकारी ने फिर वर को योजना समन्वयक के अस्थाई पद पर नियोजित किया ॥


    











Saturday, June 1, 2013

----- ॥ सूक्ति के मणि 9॥ -----

हवि मंत्र श्रवन गगन हरषाए । बहनु धूम गह बूँद बरखाए ॥ 
तपित तोए पा भू गंधाई । तृषा तोख क्षय सौंधि सुहाई ॥ 
हवन के मंत्र सुन कर गगन भी हरिषित हो गया । और हवनाग्नि के धूम्र प्रसाद को ग्रहण करते हुवे बूंदों की वर्षा की ॥ तपती 
हुई भूमि जल प्राप्त कर भूमि  सुगन्धित हो उठी । और अपनी तृष्णा का अंत कर सौंधती हुई भली लगी ॥ 

पूजित कर लिए भगवन नामा । भू भवन भए परम सुख धामा ॥ 
गावत गुन बन एहि गृह माहीं। बासन देवन के मन चाहीं ॥ 
पूज्यनीय होकर एवं भगवान् के नाम से गुंजित होते भवन और उसकी भूमि परम सुख का धाम हो गए ॥ उपवन उसका गुणगान 
करते हुवे कहने लगा कि इस भवन में निवास करने हेतु तो स्वयं देवगन भी लालायित होंगे ॥ 

 बिटप लतिक तृन पर्न प्रसंगे । नीड़ नीक नौ बिरचि बिहंगे ॥ 
यत तत  फरवत झूरत डारी । जुगल संग भए अचर सुखारी ॥ 
वृक्ष, लताएँ, तृण एवं पर्ण इत्यादि के साथ पक्षी नए नीड़ की रचना कर रहे हैं ॥ यत्र-तत्र सर्वत्र फलयुक्त होकर डालियाँ झूल रही है । 
युगल दम्पती के साथ समस्त अचर ( नदी पर्वत वन कंदर आदि ) सुख  पूर्वक वासित हैं ॥  
  

तेहि बखत बधु गर्भन धारी । प्रिय सह सुर बन करत सँभारी ॥ 
गंध बल्लरी बहुंत सुहाई । सागर ताप घन गगन चढ़ाई ॥ 
उस समय वधु गर्भ धारण किए हुई थी । प्रीतम के साथ देव स्वरूप उपवन भी वधु की देखरेख कर रहे थे ॥ गंध वाहिनी वायु अत्यंत
 ही सुहावनी प्रतीत होती । सागर भी तपकर गगन पर मेघ को आवृत  कर रहे थे ॥ 

सिबेष्ट रही बहुत फर भृते । सारे गर्भ सब को रहि न रिते ॥ 
भाग खंड लै रसिक बनाई । प्रिय परिजन निज मुख रुचि पाई ॥ 
( शिवेष्ट= बेलफल ) बेल वृक्ष फलों से पूरित था । सभी फल सार ग्रहण किये हुवे थे कोई भी सारहीन न था ॥ उसके मीठे भाग को 
लेकर वधु ने उसका रस बनाया और प्रियतम एवं स्वयं सहित प्रिय परिजनों के मुख में स्वाद भर दिया ॥ 

प्रियतमा अरु पिया परस , सोहत कुञ्ज निकेत । 
धूरिहि कन कंचन भये, जलसुत कलकल रेत ॥  
प्रियतमा और प्रिया स्पर्श से, निकुंज निकेत अत्यधिक सुशोभित हो रहा था । धूल स्वर्ण कण हो उठी कल कल जल मोती स्वरूप 
हो गए ।। 

रवि/सोम, २/३ जून, २ ० १ ३                                                                                  

एक दिवस बहुरि पीहर ताईं । आगमनु सन बाल भोजाईं ॥ 
बर बधु अगुवन आए दुआरे । कर जोरत सादर बैठारे ॥ 
पुन: एक दिवस  के पीहर से बालकों सहित उसकी भोजाइयों का आगमन हुवा ।। वर-वधू उनके स्वागत हेतु द्वार पर आए 
और सम्मान देते हुवे आदर सहित उनको बैठाया ॥ 

एक बालक कहि दूजन काना । कहु तौ एहि भू कौन समाना ॥ 
एक कही करे नैनन तिरछन । ए तौ चित्रकूट के तीरथ बन ॥   
तब एक बालक ने दुसरे बालक के कान में कहा । कहो तो तुम्हें यह भूमि कैसी प्रतीत होती है ॥ तो उअनमेन से एक बालक 
ने आँखों से संकेत करते हुवे कहा: - मुझे तो ये भूमि चित्रकूट तीर्थ के उपवन के समान प्रतीत होती है ॥ 

जे रही पहिले अवध निवासी । इहँ बसत भए तपो बन बासी  ॥
फ़ूरत फरत बहु कानन सोहा । नीक धरा निभ नभ उपरोहा ॥ 
जो पहले अवध देश के निवासी थे, यहाँ बसने के पश्चात वे तपोवन के वासी हो गए ॥ फलता फूलता यह चित्रकूट का उद्यान 
कितना सुन्दर लग रहा है नीचे सुन्दर धरा और ऊपर प्रखर  प्रकाशित्त गगन अवस्थित है ॥ 

देखु त उत गिरि कंदर खोही । वाल्मीकि इ थरि दिठाए होहीं ॥  
सैल कटक मृग पख बहु रंगे । सुदूर बहत जात मह गंगे ।। 
देखो तो दूर महा गंगा (महानदी ) बही जा रही है । और ये पहाड़ों की ढलान पर के मृग, बहुत से रंग लिए हुवे पक्षी चित्रकूट की सी शोभा
लिए हुवे हैं ॥ और उधर देखो तो पर्वत दीमक के टीले की कंदर और गुफाएँ । महर्षि वाल्मीकि ने ही यह स्थान निर्दिष्ट किया 
होगा ॥ 

नदी धार नौ  प्रीत पुरानी । सोए समोए संत के बानी  ॥ 
चुम्बत मंद समीरन साँसे । हर अलह  तरंग उद कासे ॥ 
नदी की धाराएं नवीन थीं किन्तु उसकी प्रीत अर्थात अस्तित्व प्राचीन था । जिसमें संतों की परम वाणी का समावेश था ॥ मंद 
सुखद वायु उस नदी को चुम्बित कर रही थी । और हिलकोरे लेती अलहड़ तरंगे उत्तोलित होती हुई आकर्षित हो रही थीं ॥ 

एक कहि कस पवित बाताबरन । लागत मोहे एहि दंडक बन ॥ 
नियराइ तट गोदावरी के । बहत पवन पै परस सरी के ॥ 
एक बालक ने कहा कैसा पवित्र वातावरण है । मुझे तो यह दंडक अरण्य प्रतीत होता है ॥ देखो वरवधू गोदावरी के निकट वासित हैं । 
और वायु उस सरिता का जल स्पर्श कर सुख पूर्वक प्रवाहित हो रही है ॥ 

जदपि भवनु ढारी पे टीके । लाहत छाईं परन कुटी के ॥ 
देखू तौ कस धाए गिलहरी । मनहु भई गृह उपबन पहरी ॥ 
यद्यपि वरवधू का भवन ढलाई पर स्थापित है । किन्तु यह पर्ण कुटी की प्रतिच्छाया का आभास दे रहा है ॥ देखो तो गिलहरी कैसे 
दौड़ रही है । मानो यह इस घर एवं उसके उद्यान की पहरी हो ॥  

मधुकर मंद्र मध तान सुनाए । बिटप बलित बर बेलि बौराए ॥     
तब एक गत देखत छत छत्रिके ।  कहि नहि एहि आश्रम मुनि अत्रि के ॥ 
भँवरे स्वर्सप्तकों जैसे मंद्र, मध्य,और तान सूना रहे हैं । वृक्षों पर वलयित सुन्दर बेल कैसे बौराई हुई हैं ॥ । तब उनमें से एक 
बालक ने भवन के छत छाते का अवलोकन कर कहा । कहीं यह मुनीश्वर श्री अत्रि का आश्रम तो नहीं है ॥ 

सोहत धर घट अवघट घाटे । बर बधु  निज गह बाटिक बाटे ॥ 
थान  बान धर चार पद चिन्हे । मगन गगन घन छाया किन्हें ॥ 
भूमि घाट, दुर्गम घाटियाँ आदि धारण करके सुशोभित हो रही हैं । वर वधू सुन्दर पगडण्डी युक्त गृह वाटिका में सुशोभित हैं ॥ यह 
स्थान किसी धनुर्धर के पद चिन्ह से युक्त है । और गगन मगन होकर मेघ की छाया कर रहे हैं (  इस प्रकार बालक ने मुनि अत्रि के 
आश्रम के चिन्ह बतलाये ) ॥  

बाल बहिन कहि सुनि तौ भइया । पर इहाँ नही को अनुसुइया ॥ 
रिसि पतनी ना ही परखाई । नारि धर्म बधु  को समुझाई ॥ 
फिर लघु वयस बहन ने कहा किन्तु सुनो तो भैया! यहाँ तो कोई माता अनुसुइया नहीं है । उस ऋषि पत्नी के एवं किसी पारखी के न
 होने से अब वधु को नारी का धर्म कौन समझाएगा ? 

पतिब्रता के अचार बिधि, ज्ञान के चारि बात । 
बेद पुरान  संतन के, बधु गुन गहि को साथ ॥  
पतिव्रता की आचरण विधि, ज्ञान के चार बातें संत सज्जनों तथा वेद पुराणों के ज्ञान गुण वधु किससे प्राप्त करेगी ॥ 

पंचवटी के बन भूमि, भये अलि अली अलिंद । 
निरखत कंदर सैल गिरि निरख न मुनि बर बृंद  ॥ 
(यद्यपि) यह पंचवटी की वन भूमि के सरिस है यहाँ के भवन अटारी में तो भँवरों की भरमार है ॥ शैल पर्वत और कंदराएं तो लक्षित 
हैं किन्तु मुनिवर का समूह लक्षित नहीं हो रहा ॥ 

मंगलवार, ० ४ जून, २ ० १ ३                                                                                                  

सो का भइ कहत भाए छोटे । देखु तनिक उत गृह परकोटे ॥ 
निर्जन थर जाने को रेखे । हरिन नयनि हरि हरनन लेखे ॥ 
तो क्या हुवा ऐसा कहते हुवे छोटे भाई ने कहा । थोड़ा देखो तो उधर उस चारो और की भित्ति को । ऐसे निर्जन स्थल पर इसे जाने 
किसने रेखांकित किया है ।  कोमल हृदया से  हरण करने वाले को  दूर करने  हेतु मानो इसे चिन्हांकित किया हो  ॥ 

एक बालक मुख मधुकर भासे । तनि मेटहु तौ मोर जिगासे ॥ 
तुम कहु एहि रामायन के बन । नाम धरे बर संकट मोचन ॥ 
फिर एक बालक का मुख भ्रमर के जैसे मुखरित हुवा और कहने लगा किंचित मेरी जिज्ञासा को भी शांत करो तो ॥ तुम सब कह 
रहे हो की यह रामायण का वन है किन्तु वर ने तो संकट मोचन का नाम धारण किया हुवा है ( अत: ये कैसी रामायण हुई ) 

अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे । दसा धर बधुन्ह भौं टेरे ॥ 
श्री कर लघु एक लकुट उठाई । सकल बाल के पाछिन  धाई ॥ 
प्रिय जनों के प्रिय लगने वाले ऐसे वचनों को श्रवण कर वधु के मुख पर विहास छा गया और उसने भृकुटी कुटिल कर हाथ में एक 
लघु छड़ी  उठाई और सारे बालकों के पीछे भागने लगी ॥ 

गृह बाटिक इत उत छिटकारे । नादत बालक कलरव कारे ॥ 
धरत बधू कानन कस खैंचे । कहि पुनि लड़ाहु बातन पैंचे ॥  
सारे बालक कोलाहल युक्त मधुर ध्वनि उत्पन्न करते गृह वाटिका में इधर उधर बिखर गए ॥ जिनके कान वधु ने पकड़ कर खींचे 
और कहा कहो तो पुन: ऐसे बात के पेंच लडाओगे ॥ 

पुनि बाल मनोहर, सरि बन सुन्दर, धवनि मोद गूँज करे । 
बधु चीढ़ लगावत, हा हा कारत, धाए नीक कुञ्ज घरे  ।।
कर लकुटी कास कै, तिरछन लखि के, धाए बाल धरी लिए । 
पुनि भ्रकुटी कस कै, अधरन दसि कै, दोउ साँट धरी दिये ॥     
मनोहर बालक पुन: सुन्दर वन के सरिस उस वन में मन मुदित करने वाली ध्वनि गुंजारित करते । और वधु को चीड लगाते । हां हां 
कर हंसते हुवे उस भवन के सुन्दर वन में भागे ।। फिर वधु ने हाथ में छड़ी कसते तिरछा देखते हुवे दौड़ते बालको को पकड़ लिया 
और फिर से क्रोदित किन्तु बनावटी मुद्रा धारित कर, अधरों पर विहास लिए उनको दो सौंटी लगा ही दी ॥  

एक दुजे के करनन मैं, करतहि कलबल नाद । 
कहत कबि बिनोद पूरित दुर्लभ एहि संवाद ॥ 
एक दूसरे के कानों में फुसफुसाते हुवे बालकों को देखकर कविगण कहते हैं कि बालकों का यह विनोद पुर्नित संवाद अति दुर्लभ है।।

बुध/गुरु, ० ५/६ जून, २ ० १ ३                                                                                                 

अरस परस कर पंगत पारे । एक पलछिनु कर दूसर धारे ॥ 
सनै सनै कर चर दिनमाना । धरत पहर पद पथ सोपाना ॥ 
परस्पर आलिंगित होकर पंक्ति युक्त होकर एक पल ने क्षण में ही दुसरे पल का हाथ पकड़ लिया । और धीरे धीरे पहरों के सोपान 
पथ पर चरण विराजित करते हुवे दिवस के मापक संचारित होने लगे ॥ 

दुःख सुख के एहि बिधि लिए घेरे । नियति नटी नत नित नउ केरे ॥ 
पावत दम्पत के कर छाही  । चहल पहल कर सकल सिहाहीं ॥ 
इस प्रकार दुःख और सुख से घेरते हुवे नियति, नत मस्तक होकर नित नए क्रिया कलाप करती ॥ उन दम्पति का हाथ का आशीर्वाद 
प्राप्त कर उस गृह वन के चर-अचर सभी आनंदित होकर प्रसन्न चित रहते ॥ 

रहे ना बसति बसिक अवासे । बासित नियरे लसित सँकासे ॥ 
मेल मिलावन आएँ निवासे । बैस  भवन भित मधुरित भासें ॥ 
यह आवास बसाहट से रहित नहीं था । पास में ही पड़ोसीयों का आवास भी था जो आँखों से दिखाई देता था ॥ उस बसति के निवासी 
मेल जोल करने आते और भवन के भीतर विराज कर मीठी वाणी में वार्तालाप करते ॥ 

दोउ संग मह रहत सुखारी । सुरतत प्रियजन होहिं दुखारी ॥ 
प्रेम प्रीति जब गहनहि बाढ़े । बर लोचन तर बादर गाढ़े ॥ 
वर-वधु दोनों वहां साथ-साथ सुख पूर्वक निवास करने लगे । किन्तु प्रियजनों का स्मरण होते ही दुखी हो जाते जब यह प्रेम-प्यार 
अधिक बढता  तो वर के लोचन से अश्रु रूपी बादल गहरे होकर उतरने लगते ॥ 

सर सुन्दर बर नदि नद धूरे ।  तात -मात भगिनी पर दूरे ॥ 
जदपि भए निकट कारज धामा । श्रम साध्य करि तनिक बिश्रामा ॥ 
सुन्दर सरोवर, श्रेष्ठ नद नदीयाँ निकट थीं किन्तु मात-पिता भगिनी दूर थीं ॥ यद्यपि कार्यालय( नए आवास के )  निकट था सो श्रम
 साधना करके थोड़ा विश्राम प्राप्त हो जाता था ॥  

बासन बसे जुग दम्पति, इते इरा एवम एव । 
बसत रँह जस पंचवटी, सिया राम स्वमेव ॥ 
युगल दम्पति का यहाँ की भूमि के आवास में  इस प्रकार से  वासित थे जैसे की पंचवटी में स्वयं भगवान श्री राम चन्द्र एवं माता 
सीता स्वयम आवासित हों ॥ 

वपु अंतर जस ह्रदय अवासे । वधुबर स्याम छबि अस बासे ॥
प्रान समा प्रिय जोगे कैसे । अंतस रुधिरु ह्रदय गति जैसे ॥
शरीर के अंतस जिस प्रकार हृदय का आवास है । वधु के शरीर रूपी ह्रदय में वर की सांवली छवि ह्रदय बनकर उसी प्रकार वासित 
थी ॥ प्रियतमा की प्रियतम देखभाल कैसे करते जैसे देह अंतस का रुधिर ह्रदय गति की देखरेख करता है ॥ 

सुख बन छाई धूप दुखारी । करत  कारज जग हितकारी ॥
अंत रुदन हँस रदन दुआरे । बसहिं भवन बहु सोच बिचारे ॥    
सुख छाया बनी और दुःख धूप बने । सुख-दुःख, धूप-छाया दोनों ही जगत का हीत कारी हुवे ॥ अंतर में रोदन ऊपर अधरोंपर सुहास
 धारण किए । बहुंत ही सोच समझ कर युगल दम्पति उस वन भवन मे रह रहे थे ॥ 

पालक सन तनु भव बिलगाईं । भेस भूसा ए घर घर छाईं ।। 
बानी होवत बान  अचूके । समरथ  भए  कुटुंब कर टूके ॥
मात-पिता से पुत्र दूर हो रहे हैं, और यह चलन घर घर व्याप्त हो रहा है ॥ वाणी एक ऐसा अचूक वाण है, जो कुटुम्ब के तुकडे  करने में समर्थ है ॥ 
जे कभु परिजन सुरति सताईं । दोनौ जा करि जोग मिताईं ॥
एहि जग मह को होवत काके । बालक सुख दुःख मात-पिता  के ॥ 
वर-वधु को जब कभी परिजनों का स्मरण हो आता,तो दोनों जाकर उनसे मेल-मिलाप कर आते ॥ इस संसार में कौन किसका होता है । बच्चों  के सुख-दुःख को माता और पिता  ही जतनते हैं ॥ 

बिरतित बालक सुधि जब करहीं । नभो गज गति नयन नभ चरहीं ॥
ते बारिहि  थिर को न उपाई । लिये परस्पर धीर बँधाई ॥ 
वर-वधु को जब दिवंगत बालक का स्मरण होता तब नयनों के आकाश में मेघ विचरने लगते ॥ परस्पर धीरज बंधाते हुवे फिर उस वर्षा को थामने का कोई उपाय नहीं रहता ॥

अस दुःख के ताप जुहार, सुखद छाए अधिकाए । 
पल पहर काल खन हार गहि बहति बहि सुहाए ॥  
इस प्रकार दुखों के सूर्यों को संगृहीत करते और सुख की छाया पर अधिकार धरते हुवे, पल; पहर और काल खंड की मालिकाएं धारण किये हवाएँ अपनी गति से प्रवाहित होती रही ॥

चैत्र तरे चाँद चढ़ाए, जरत जेठ बैसाख  । 
आषाढ़ अवनु जल पाए, धरनी सीतल लाख ॥  
चैत्र आया शुक्ल पक्ष में वधु गर्भ वती हुई । जेठ और बैशाख बहुंत जले । आषाढ़ महीने के आते ही जल प्राप्त कर धरती शीतल स्वरूपा दिखाई देने लगी ॥ 
शुक्रवार, ० ७ जून, २ ० १ ३                                                                              

गर्भ दिवस चढ़ लिये अकारे । अंक अंकुरत अंग सहारे ॥ 
बिरतत पाखे आए असाढ़े । घन स्याम सर घर भर गाढ़े ॥ 
दिवस बीते और गर्भ ने आकृति लेते हुवे भ्रूण स्वरूप देह  का अंकुरण आरम्भ हो गया और अंग विकसित  होने लगे । पक्ष व्यतीत हुवे और आषाढ़ मास  का पदार्पण हुवा । जल से भरे काले बाल आकाश में गहराने लगे ॥ 

गह गह गहरर गढ़ गढ़ गाजे । ढोल नगाढे घढ़ घढ़ बाजे ॥ 
फूर प्रफुर भुरहरु रुर राँचे । पत पत पथ पद अवली बाँचे ॥ 
वे हर्ष-उत्साह के साथ बड़ी धूमधाम से गढ़गढ़ाते हुवे गर्जने लगे। जैसे ढोल नगाढ़े घढ़घढ़ाते हुवे निनादित हो रहे हों  ॥ भोर में पुष्प प्रफुल्लित होकर सुन्दर रंगों में रंग गए और उनके पत्रिकाएँ पथ पर किसी पदावली का पाठ करने लगीं ॥ 

नीर नूपुर नटत  नटवर के । अवनत बवनत भू पर ढर के ।। 
सतसुर सागर सरि सर पर के । जिमि कंठ कूनिके कल हर के ।। 
नृत्य करते हुवे  घनश्याम के जल स्वरूप घुंघरू नत मस्तक होकर बिखरते हुवे भूमि पर ढुलक गए ॥ सागर, सरिता, सरोवरों के सप्तसुर मानो वीणा के स्वर हरण कर लिए ॥  

धूलि कनिक  सन रागन रंगे । कोकिल कंठ कूजएँ बिहंगे ॥  
मोर पँख बर मूर्धन खाँचे  । चरन अरन नूपुर धर नाचे ॥ 
धूल-कणिकाओं ने  साथ में  रागिनी छेड़ दीं , और कोयलों के साथ पक्षियों के कंठ भी मधुर ध्वनि करने लगे ॥ मोर, माथे पर सुन्दर पंखों को वरण  किये  इन जल घुंघरुओं को चरणों में बाँध कर नृत्य करने लगे ॥ 

नभ घन मंद्र निसान धरातरि माध  निनादे,  । 
छेड़े मलिहर तान  बूँद बूँद  लय लीन भइ   ॥  
धरातल  मध्यम स्वरों  में निनाद करने लगा । नभ में गंभीर  गर्जना करते हुवे घन मृदंग निनाद करते हुवे मल्हार गाने लगे और बुँदे उस लय मग्न हो गई ॥ 


सारनी सार गहन कर, संगति कार मृदंग  । 
स्वर ग्राम नादिन अधर, बांधे जोग तरंग ॥ 
क्षुद्र नदियों के अधरों ने उस बरसते अमृत को ग्रहण किया और वे घन स्वरूप मृदंग की संगती करते हुवे, स्वर तरंगों के साथ बंध कर सप्त स्वरों में गान करने लगी  ॥ 

धरा तरि मंद्र निनादे, नभोपर मध निसान । 
अविरल वारि लय राधे, छेड़े मलिहर तान ॥  

शनिवार, ० ८ जून, २ ० १ ३                                                                                            

चंदु बरस भए पंचक मासे । आवन श्रावन सस रस बासे ॥ 
जलकन गृहबन छन छन बरसे । श्री कीर्ति कर तरु पत हरसे॥ 
एक चंद्र वर्ष के बारह महीने में से पाँचवे महीने का पदार्पण हुवा, सावन के आने से अन्न कानों में रसमयी हो गए ॥ जल कण घरों एवं उपवनों में छन छन की ध्वनी कारित करते बरसनेलगे जिससे सम्पद,संपत्ति,शोभा,सौंदर्य,विभूति,साधन,आदि का श्लोक करते हुवे वृक्षों की पत्र हरिषित हो उठे ॥ 

बदरि बदरि लइ मेचकताई । गहन गान  करि जोत जराई ॥ 
मेघ जोनि कर पर फुर धारी  । नीराजन करि नीरज बारी ॥ 
बदली कृष्ण वर्ण में परिवर्तित हो गई और समूह स्वरूप घने स्वरूप में गान करते हुवे ज्योतिका रूप में बिजली चमकने लगी ॥ मेघ समूह के हाथों में जल स्वरूप पुष्प वर्षा दे कर स्वयं आरती करती हुई मोती वारने लगी ॥ 

धरा तर धरनि धरि सुख तोई । झर जर सुत बर माल पिरोई॥ 
हिम गिरि तर सुर नदी नादे । श्रुत धर निर्झर निगदत साधे ॥ 
झरते हुवे मोतियों को धारण कर फिर उनकी माला पिरोकर धरातल पर उतरते इस सुख-सरिल को धारण  करते हुवे फिर इन झरते हुवे मोतियों की एक सुन्दर माला बनाई ॥ 

हरिद प्रभा जे बिबरन लेईं । आछद पत धन हरि बर देईं ॥  
हर्ष उत्फुर फुर फुर फरियाए । हरि दीठ द्रव धर फर हरियाए ॥ 
कान्तिहीन होकर रंग हीन हुवे आच्छादित पत्रों को यह धन देते हुवे उन्हें हरियाई का वरदान दिया ॥ वे पत्र प्रसन्नता से खिलते हुवे फूलों से भर गए । और हरीतिमा से सार ग्रहण कर उनमें ढेरों फल उत्पन्न हो गए ॥ 

अन्न धन ध्वज प्रहरन ताने । धनकर कन धर भए धनवाने ॥ 
हल जुती हरिस धर खलिहाने। धन्य धनब निज धनमन माने ॥ 
अन्न का धन वायु में झंडे के जैसे तन्यता लिए खडा था । वह भूमि जिसमें यह धन बोया गया था, अन्न का धन धारण कर स्वयं को भाग्यशाली मानने लगी ॥ 

सोषि धरा सस सार , देवन हिरन सकल केर । 
खेतिहार कर धार  , भर भंडारन कर  कुबेर ।। 
 फिर धरती अन्न कणों  में सार रस भरने लगी जिससे ये कण स्वर्ण स्वरूप होकर किसानों के हाथ में दायन योग्य हों, जिससे किसानों के अन्न कोष भर जाएँ और वह कुबेर के सदृश्य धनी हो जावें  ॥ 


रविवार, ० ९ जून, २ ० १ ३                                                                                  

भव भादू पद नभ लै आपा । तरे हरे गिरि कर धर चापा ॥ 
केलि केर कुँआर कर हारे । तहँ कातिक पद कीर्ति कारे ॥  
भाद्र पद का आगमन हुवा, नभ भी घमंड से भरा था । तभी इंद्र अपना धनुष लेकर उतरे । और क्रीड़ा करते  आश्विन के हाथों हार गए , । यह देखकर कार्तिक मास आश्विन की विजय का यश गान करते हुवे अवतरित हुवा ॥ 

चौदह बरस बसन  बन बासे । तपस चरन चर प्रभु परवासे ॥ 
सिया हरत पर रावन हाँसे । प्रभु पद तर लंका पत धाँसे ॥ 
तपस्वी आचरण वरण करते हुवे, चौदह वर्ष वन आवास में निवास हेतु प्रभु श्री राम चन्द्र का प्रवास हुवा ॥ 
माता सीता के हरण के प्रसंग में दुष्ट रावण अट्टाहस करने लगा । तो प्रभु के चरण लंका में अवतरे और उअसके पति एवं उसकी प्रतिष्टा को धूमिल कर दिया ॥ 

मौलि माल दस तीस नराचे । बिजया दसमी मह महि नाचे ॥ 
ध्वज कलस कर सकल निनादे । जयति जय दस कंठारि वादे ॥ 
दस मुखी माला और तीस तीर विजया दसमी के दिन धरती पर नाच रहे थे । हथेली में विजयी ध्वज धारण कर सभी दुष्ट दशानन का वध करने वाले श्री राम चन्द्र जी का जय घोष कर रहे थे ॥ 

अरन्य बास पर प्रभु सिधारे । पदुम चरन पुर अवध पधारे ॥ 
धुरियत धानी भै धुरी धुरी । दमकी दुल्हन जस नउ नउरी ॥ 
अरण्य आवास में के पश्चात प्रभु के पद्म स्वरूप चरण अवध पुरी में चिन्हांकित हुवे ।  धूल से लथ पथ अयोध्या धानी की धूल जैसे धूल सी गई और वह नई नवेली दुलहन सी शोभा देनी लगी ॥ 

बिरतित पद पावस दिवस अमावस कार्तिक मास पाख चढ़े । 
अजोधा नगरि जन पथ कन कंचन प्रभु के पद पदुम पड़े ॥ 
भारत महि भूते तिस दिवस हुँते  दीप अलि दुआरि धरे । 
सरबस दम्पति गण  कल कंज भवन तेहि तयौहार करे ॥  
इस प्रकार वर्षा ऋतु के व्यतीत होने पर कार्तिक के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को अयोध्या नगरी के पथ पुरुष प्रभु श्री राम चन्द्र के पद्म चरण को धूलि कंचन ने सहर्ष स्पर्श किया ॥ और भारत भूमि के मानस जन उस उपलक्ष्य में इस दिन दीपकों की पंक्तियाँ द्वार पर अंकित करते हुवे सभी दम्पति गण, सुन्दर कमल भवनों में इस उत्सव को दीपावली स्वरूप में मनाते हैं ॥ 

दीपक ज्योति जगमगे, श्रीकर श्रीबर श्रीस । 
जुग दम्पति नीराजनै , जय जनि जय जगदीस ॥ 
दीपक ज्योतिर्मय हो उठे, कल्याण करने वाले श्री वल्लभ भगवान विष्णु विराजित हैं । और युगल दम्पती जगद जननी, जगदीशकी आरती करने लगे ॥ 

रंग रयन पट आवरन, नवलै साज समाज । 
तिन सुभ दिन दंपति भवन, दमकित देहरि धाज ॥ 
नव वर्ण में अनुरक्त, नविन पट आवरण लिए नवल शोभा सामग्री से सुसज्जित होकर उस शुभ दिवस (जिसको उल्लेखित किया गया है)में उन दंपति का भवन एवं भवन की देहरी सजकर दमकने लगी ॥ 

सोमवार, १ ० जून, २ ० १ ३                                                                                     

पूजन पर कर दीपक धारे । पद अंतर अलि धरे दुआरे ॥ 
नील पील लौ लोहित केसर। रंग रंग बर स्याम मनि सर ॥ 
पूजन कार्य पूर्ण होने के पश्चात हाथ में दीपक लिए पद पद पर अंतर करते हुवे द्वार पर रखे गए ॥ नीली,पीली और लाल केसरी ज्योति मानो हीरे नीलम और विभिन्न रत्नों के रंगों की सुन्दर आभा दे रही हों ॥

चौक चारि पद चाँवरि झूरे । रच रच काँचे खच खच कूरे ॥ 
मानहु मानस कुमुदनि फूरे । रयत रयनि अस रमनिक रूरे ॥  
आँगन में चार लड़ियों वाली झालरी झूल रही थीं, जो कांच से सुरुचि पूर्वक रची एवं खची ऐसी परतीत होती मानो उस आँगन रूपी मान सरोवर में कुमुद पुष्प उत्फुलित हों ॥ जिसकी आभा में अनुरक्त होकर यामिनी  भी अति सुन्दर एवं मनोहारी लग रही थीं ॥ 

वसति वास पर पूज प्रनामा । दोनौ जुग असने जनि धामा ॥
पद पद पथ गह गंधित बारी । भेष बसन नउ भरे पुरारी ॥
निवासित आवास में वंदन-पूजन के पश्चात दोनों युगल अपनी जननी के निवास पर पहुंचे ॥ मार्ग में चरण- चरण पर( नगर वासियों द्वारा) सुगन्धित वर्षा की गई थी । और सभी नागरिक नवल वेश भूषा धारण किये हुवे थे ॥ 

ढांप ससी भए गगन सियामा । निन्दबत भूमि नगर सुधामा ॥
चुम्बत नभ सब सदन धवलाए । संग बहु रंग रुरी रचियाए ॥
चंद्रमा विलोपित था और व्योम पर गहराये हुवे श्याम वर्ण को, भूमि की शशि स्वरूपा वह नगरी मानो आकाश को लज्जित कर रही हो ॥अनेक रंगों का प्रसंग लिए सुन्दर स्वरूप में रंगाए सभी भवन आकाश को लगभग स्पर्श करते हुवे, धुले धुले से प्रतीत हो रहे थे ॥ 

द्वार द्वार दीपक अलि धारे । वर्धन  मनिमय बंदन बारे ॥
नलिन नाभ श्री नलिनइ  निकाएँ। जन जन मुख श्रुति आरती गाएँ ।।
और द्वारि द्वारि पर दीपों की अवलियाँ सुशोभित हो रही थी । और मणिमय वन्दनवार उनकी शोभा में वृद्धि कर रहे थे ॥ श्री लक्ष्मी एवं विष्णु कमल के सदृश भवनों में विराजित थे । और नगर वासी के श्री मुख से वेद एवं आरती गा रहे थे ॥ 

पूजन कर्म करतन पर, सकल कुटुम जनि धाम । 
आपस मिल उपहारते, पद बर करत प्रनाम ॥  
पूजन कार्य पूर्ण होने के पश्चात घर के सभी कुटुंब जनों का उपहारों का आदान-प्रदान करते हुवे सौहार्दिक मिलन हुवा और युगल दम्पति ने बढे वृद्धों के चरण स्पर्श किये ॥ 

मंगलवार, १ १ जून, २ ० १ ३                                                                                          

बहुरत सह बर  लहत  सुखारी । गवने बधु जनि जनक दुआरी ॥ 
चरन परसत  सुख दुःख बतियाए । लिए तँह भाउ भीनीहि बिदाए ॥ 
इस सुख अनुभूति से अत्यधिक प्रफुल्लित होकर लौटते समय वर के साथ वधु अपने मात-पिता के द्वार भी गईं । चरण स्पर्श करने के पश्चात सुख दुःख की बातें होने लगीं ॥ तत  पश्चात वहां से भाव भीनी विदाई ली ॥ 

आजु भयउ सब जग उजियारे । ज्योति हस्त  रयनि तम हारे ॥ 
बल बल बर्तिक सकल सुहाईं । रूरी बसति बसंत के नाईं ॥ 
आज समस्त जगत उज्जवल हो गया, ज्योति के हाथों रात्रि का अन्धेरा हार गया । दीपक की बातीयाँ जल जल कर सुशोभित होती हुई  सरसों के फूलों के जैसी पीले स्वरूप में पुष्प का गुच्छ प्रतीत हो रहीं थीं ॥ 

कातिक मावस चढ़ते मासे । विभावरि भूति भूषित  भासे ॥ 
दीपावली सौंह  आधारे । दीपित बरन बर बर्ति कारे  ॥ 
कार्तिक के कृष्ण पक्ष की अमावस्या थी, और तारों से सुशोभित रात्रि का एवं श्री विभूषित होकर देदीप्यमान थीं॥दीपक की पंक्तियाँ सुन्दर आधारण लिए हुई थीं । जलती हुई  बातियाँ  तपाए हुवे स्वर्ण के आभा  सी सुन्दर ज्योत्स्ना बिखेर रहीं थीं ॥ 

धनिक बनिक पत रुप स्वधामा । को मन पूरित को मन कामा ॥ 
कृषक खलि धन कटी करि सारे । जतन कनक कन किए भंडारे ॥ 
धनाड्य गण एवं व्यापारी जन अपने ही घरों के स्वामी स्वरूप थे । किसी की मन की पूर्ति हो गई थी, किसी के मन में आकाक्षाएँ थीं ।  कृषकों ने खलिहानों से उपज काट कर उठा ली थीं और यत्न पूर्वक उन स्वर्ण कानों का भंडारण कर लिया था ॥ 

पूजित श्री सुभ मंगल माई । लाभत मंदिर सकल सुहाई  ॥ 
जे चितवन बहु लिपसा लाई । ते चित को कहु का कहि जाई ॥ 
सुख एवं कल्याणकारी श्री संपदा, माता स्वरूप में पूज्यनीय होकर  भवनों को उपकृत करते हुवे सभी को सुहावनी प्रतीत हो रही थीं ॥ जिन के अंतस में अतिशय लाभ लिप्सा थी उनके विषय वर्णनातीत हैं ॥ 

भव भूति भूमि भवन के, दूर करत अँधकार । 
धन धान भरत बिती भइ, दीप अवली तिहार ॥ 
संसार की की वैभव स्वरूपा श्री लक्ष्मी के द्वारा भवनों के अन्धकार को दूर करते हुवे  तथा उनको धन संपदा से परिपूर्ण करते हुवे दीपावली त्यौहार व्यतीत हुवा ॥ 

बुधवार, १ २ जून, २ ० १ ३                                                                                              

एहि बिधि सुखकर बासर बीते । को मनुहारे को मन जीते ॥ 
बधुटि गर्भ जे जीउ निवासे । तेहि बखत भए बय सतमासे ॥ 
इस प्रकार दिन सुख पूर्वक व्यतीत होने लगे, कोई दिवस मन को हर ले जाते तो किन्ही को मन जीत लाता ॥वधु के गर्भ में जिस जिव का अंकुर प्रस्फुटित हो रहा था । उस समय उस जीव की अवस्था सात मास की हो चुकी थी ॥ 

निरखन गर्भ बैद के पाहीं । जब बुलाइ दोनौ जन जाहीं ।। 
असन के बर प्रबंध प्रभारे । बधू के करत सुघड़ सँभारे ॥ 
गर्भ की स्थिति का निरिक्षण करने हेतु जब वैद्यिका बुलाती, युगल दम्पती जाते, वर ने वधु के खान-पान सुन्दर प्रबंध किया हुवा था, वह वधु की देख-रेख  भली प्रकार करता ॥ 

मूल फूल फल सकल सुवादे । लवन रमन रल रसन प्रसादे ॥ 
जो वधु रुचिकर कारक वादे । सो प्रीतम वधु रूचिधर ला दे  ॥ 
सभी रुचिकर मूल फूल फलादि, लावण्या प्रिय, रसना युक्त सभी प्रकार भोजन प्रसाद  जो वधु को स्वादिष्ट एवं प्रिय लगते थे वधु की रुचिनुसार वर वही प्रसाद ला कर दे देते ॥ 

औषधी मंत बैद बताईं । तेहि नियमतस बधुटि खवाईं ॥ 
अस गर्भस सिसु  पावत पोषे । गर्भासय पद अष्टक सोषे ।। 
प्रतिदिवस की औषधियाँ, जिन्हें भिषक ने परामर्श करते हुवे दी थीं । उन्हें वधु नियमातास ग्रहण करती ॥ इस प्रकार गर्भस्थ शिशु पोषण प्राप्त करते हुवे गर्भ धानी में आठ मास की अवस्था का हो गया ॥ 

देखत वधु फुर फर कंद, नउ पल्लव उदगाए । 
हर्षे मन भर आनंद करत सरयु सुखदाए ॥ 
वधू के देखते ही देखते जड़े फलीभूत हुई और नई कोपलें के सह पुष्प फल प्रस्फुटित  हुवे । हवाए सुख सुहावनी हो कर मन को  हर्षित कर और आनंद विभोर करने लगी ॥ 

गुरूवार, १ ३ जून, २ ० १ ३                                                                                                     

कल कोमल कार्तिक पूरिते । पूरन काल सस दिवस बीते ॥ 
उयउ सूर अगहनु अगवाने । देखत दोनौ पाखि पवाने ॥ 
कार्तिक का सुहावना महीना पूर्ण हुवा पूर्ण कालिक चन्द्र दिवस अर्थात पूर्णिमा व्यतीत हुई ।  मार्ग शीर्ष का पद, उदित हुवे सूर्य का स्वागत कर रहा था । देखते ही देखते मार्ग शीर्ष के कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षों ने भी प्रस्थान किया ॥ 
  पत पत पथ पादंतर प्रस्तारे । बैस पुष्प रथ पौष पधारे ॥ 
भेष अभूषन भरी बाटिका । सारे सुमनइ  नवल साटिका ॥ 
पत्र समूह पथ के ऊपर चरण-चरण पर बिछे हुवे थे । पुष्प रथ पर विराजित होकर पुष्य के पद अवतरित हुवे । वाटिकाएं वेश आभूषण से आभरित हो गईं और कुसुम कलित नए वस्त्र नई शाटिकाएं एवं जैसे पञ्च परिधानों में सुसज्जित हुईं ॥ 

ललित कलित कल कंठन हारे । कनक कन सम खनके निहारे ॥ 
सीत काल कर माल तरंगे । कंठ घाल अगुअइ किए संगे  ॥ 
कंठ को सुन्दर हार से विभूषित कर स्वर्ण कण के सदृश्य निहार बिंदु खनकने लगे । शरद काल के हाथों में तरंगों की शीतल मालाएं थी । जिन्हें  कंठ में अर्पण करते हुवे उसने भी वाटिका के साथ पुष्यपद की आगवानी की  ॥ 

यामि रमन सन रल रलियाई  । दपित धूप दिन दीप जराईं  ॥ 
साथ पाथ पत फर फुर वंदन । नीराजन कर किए अभिनंदन ॥ 
रात्रि अपने प्रिय प्रभात के सह स्वागतार्थ सभी के साथ घुल मिल गई । और दिवस ने दीप्त होकर धुप का दीपक जलाया । जल, अक्षत, पत्र,फल,पुष्प ने भी सम्मिलित होकर आरती-वंदना  करते हुवे पुष्य का अभिनन्दन किया ॥   

आवपन पत चरन-चरन, किये द्वार प्रबेस । 
आवभगत पर आसिते,पौस अपनपो देस ॥ 
चरण-चरण पर (पुष्प) पत्र बिखरते चले गए, आवभगत के पश्चात द्वार प्रवेश कर पौष अपनत्व के आसनदेस पर विराजमान हुवा ॥ 

कुमुद कलित कर थाल सर, धारे दुर्बा केस ।
पखारत पद पंकज धर, रैनि संग राकेस ॥  
थाल स्वरूप सरोवर में कैरव कुसुम एवं किरणों की दुर्वा सजाए, रजनी  के संग  राकेश ने पुष्य वर्ष कोष के पंकज के सदृश्य चरणों को नमन कर उनका प्रक्षालन किया ॥ 

शुक्रवार, १ ४ जून, २ ० १ ३                                                                                              

नवम चैल दिन ऊपर घाले । नियरै अगवनु प्रसवन काले ॥ 
एक दिन वधु बर कहति अधीरे । अजहुँ न गवनहु गेहु बाहिरे ॥ 
नौ महीना पूर्ण हुवे गर्भ ने कुछ दिवस और लिए । प्रसव काल निकट आ गया ॥ एक दिन वधू ने वर से अधीरता पूर्वक कहा अब तुम कहीं बाहर देस मत जाना ( क्योंकि प्रसव काल निकट आ गया है ) ॥ 

तेहि काल  तौ बर दिए काना । समऊ परतस दिए न ध्याना ॥ 
कार पाल के करमन कारे । चारि दिन  पर गवने बहारे ॥ 
उस समय वधु की बातें वर बड़े ध्यान से सुनी । समय व्यतीत होने पर फिर ध्यान नहीं दिया  ॥ कार्य पालक के कार्य कर्तव्य पूर्ण करने हेतु फिर वधु के प्रियतम  चार दिवस हेतु कहीं बाहर चले गए ॥ 

बहुरत बर बधू बहुत रिसाई । सौंतुख दु तीत बोल सुनाई ॥ 
भूर गहत बर कहे समुझाए । ऐसन कथन कर जोर मनाए ॥ 
लौटने पर वधु वर से बहुंत ही रुष्ट हुई । सन्मुख पड़ते ही दो तीखी बातें कह दीं ॥ भूल हो गई ऐसा कह कर वर ने वधु को समझाते हुवे याचना करते हुवे मनाया ॥ 

मैं धूप और तुम घन छाया । में सरूप तुम रूप सुकाया ॥ 
तुम अगनी में अगनि पतंगा । दोनौ के मन एक सर रंगा । 
और इस प्रकार स्तुति करने लगे कि में धूप हूँ, तुम छाया हो और धूप घर में अच्छी नहीं लगती । तुम सुन्दर काया का एक भेद हो, तो मैं काय कलेवर हूँ । तुम अग्नि हो तो में अग्नि का पतंग हूँ किन्तु दोनों के ह्रदय एक ही रंग में रंगे हुवे हैं ॥ 

बोली मह करुबर पर्क, बोलहि मह मधु धूर । 
बोलहि फर कंटक प्रिये, बोल मह झरे फूर ॥ 
बोलों में ही करेले का रस घुला होता है और बोलों में ही शक्कर घुली रहती है । हे प्रिये बोली में ही कांटे उगते हैं, और बोली में ही फूल
झड़ते हैं ॥ 

शनिवार,१ ५, जून, २ ० १ ३                                                                                             

श्रुत अस श्रवन बधु मंद हाँसी । रमित बचन बहु मधुरित भासी ॥ 
प्यारे पिया सुनहु मोरी । मोर कह्बती मानहु थोरी ।। 
ऐसा सुनकर वधु  धीमे से हँसी । लुभावने शब्द  समूह के साथ मधुरता पूर्वक बोली  । मेरे प्यारे पियातम हमारी  बात सुनो और थोड़ा सा हमारा कहना मानो ॥ 

हँसे प्रिय ऊँगरी धर ठोरी । हाँ हाँ कहिं मुख कृति कर भोरी ॥ 
छिमा दान करू भूरन मोरी । अजहुँते करहुँ भगतिहि तोरी ॥ 
तब प्रियतम ठुड्डी पर उंगलियाँ रख कर हंसने लगे । और मुख की आकृति अबोध स्वरूप में करते हुवे हाँ हाँ करने लगे ॥ और बोले मेरी भूल को क्षमा  करो अब से में तुम्हारी ही भक्ति करूंगा ॥ 

कहि बधु जो मम गर्भन जागे । सो जग अवनु कुलबुलन लागे ॥ 
कुल धर धारिनी जोउ होई । तव भाव भगति चहहीं सोई ॥ 
वधु ने कथन किया हमारे गर्भ में जो जीव अंकुरित हुवा था, वह संसार में जन्म लेने हेतु कुलबुलाने लगा है ॥ वह चाहे कुल का दीपक हो या दीपिका जो भी हो तुम्हारी भक्ति अनुराग उसे चाहिए हमें नहीं चाहिए ॥ 

श्रुत ऐसन प्रिय भए गंभीरे । बाहु पास लिए कहिं बहु धीरे ॥ 
सुनौ प्रिये मम प्रान समाही । तुम हो तौ को संकट नाही ॥ 
ऐसा सुन कर प्रियतम गंभीर हो गए और प्रियतमा को बाहु पाश में बांधते हुवे धीरे से कहने लगे ॥ सुनो मेरी प्रिया मेरी रान समा जब तुम हो तो फिर संकट कैसा ॥ 

दुइ दिवस गत भइ एक निसि, सन प्रसवन के पीर । 
हहरर  बहियर होवती, गहबर अकुल अधीर ॥ 
दो दिवस के व्यतीत होने के पश्चात प्रसव पीड़ा के सह फिर एक यामिनी का आगमन हुवा ॥ गहन व्याकुलता और अधीरता लिए वधु आक्लांत होने लगी ॥