Sunday, February 17, 2013

----- ।। सुक्ति के मनि 2।। -----


शनिवार, १६  फरवरी, २०१३                                                                                            

ज्ञान पिपासक जोग निधाने । कोस गमन कर दै दा दाने ।।
नयन बर्द्धन साधी समाधि । लै उपहरन उपाधित उपाधि ।।
ज्ञानाभिलाषिणी  वधू को, प्राप्ति योग्य शुद्ध एवं व्यवस्थित ज्ञान के ज्ञातव्य विषयों को जान समझ कर श्री सरस्वती ने यह उपहरण दान किया कि (उस दान को ग्रहण कर ) दिक् द्रष्टा होकर ज्ञान की वृद्धि करते हुवे चिंतन मनन द्वारा ध्यान केद्रित कर उपहार स्वरूप उपाधि पर उपाधि धारण करे ।। 

ज्ञानवान भइ पड़ पड़ पोथा । भाल भान भइ भालन भोथा ।।
तात थाति कुल दीपन दाने ।  दाम चकस किए तमस अज्ञाने ।।
(इस प्रकार) ग्रंथों का अध्ययन कर वह विद्यावती हुई ।  और ध्यान-तमस से ज्ञान-तेजस बनी ।।पिता ने अपनी धरोहर को वर के कुल को प्रज्जवलित करने के लिए उसे  उदारता पूर्वक वर के हाथों में दान दे दिया  । किन्तु अज्ञानता के अन्धकार ने ज्ञान के इस दीपक के प्रकाश की  तीव्रता को शांत किए रखा ॥ 


पठन सील पिय पाठक पाटी । अस पठ पाठ कि पार त्रिपाठी ।।
ग्रन्थ कीट कर आखर काले । नभ  केतन  चर  नगर निराले ।।
सघन अध्यायी प्रियतम गणक-विद्या के उपाध्यायी ही हैं । विषयाध्ययन इस प्रकार करते थे कि तीन  वेदों  के  ज्ञाता  को  भी पार लगा दें ।। उन्होंने ग्रंथ कृमि स्वरूप अक्षरों से पत्रों को काला ही कर दिया  और सूर्य के सदृश्य तेजोमय हो नगर में विलक्षण प्रतिभा के धनी सिद्ध हुवे ।।

भानु मंत भू भयऊ भोरे । भाल हर भास भर अंजोरे ।।
सब कार जस काल कर धर्मे । भान अभान तस क्रमस कर्मे ।।
सूर्य उदयित होकर भूमि पर प्रकाश विकिरित कर भोर करते हुवे अधकार का हरण करता है  समस्त कार्य जैसे समय के हाथों में विहित होते हुवे समय पर ही होते हैं ( जैसे रात्रि और दिवस ) । वैसे ही ज्ञान और अज्ञान भी क्रमानुसार ही कारित होते हैं ।।

बदली रितु नियति क्रम धर बदले दिन अरु रैन ।
पर बदले नहि घरी भर गृह्जनु के कटु बैन ।। 
 प्रकृति के इसी नियम के अंतर्गत  धरा पर ऋतु भी परिवर्तित हुई । दिवस रजनी में रजनी दिवस में परिवर्तित हुवे  । 
किन्तु गृहजनों की कटु वचन क्षण भर के लिए भी परिवर्तित नहीं हुवे  ।।

रविवार, १७  फरवरी, २०१३                                                                                  


सीत तरंग तिर सिसिर अंता । पीत बसन बर अवनु बसंता ।।
काल दूत कल द्रुम दल फूले । सरस सरस सरि मंजरि मूले ।।
शीत-लहर को समेटते हुवे शिशिर ऋतु का अंत हुवा । पीले वस्त्र को वरण कर वसंत का आगमन हुवा ॥ 
कोयल की मधुर कुहुक के साथ आम के तरुवर पर बौर प्रस्फुटित हुवे  हरी-भरी सरसों के सीकों में लगे 
छोटे घने पुष्प मालाओं के सदृश्य उद्भिद हुवे ॥ 

बानि बानि बन बिरच बिरंचे । पुर पुर फुर फर मंडप मंचे  ।।
कूल कुलीनस कल कल केरें । जनु कल कंठ कूनिका छेरे ।
उदभेदव नव पल्लव पूले । लाख तरु तूल तिलकित फूले ।
फूल मुकुल महि महुवा बहुले । साख सिखर फर सैसिर सूले ।।

 विधाता ने उपवन को बहुंत प्रकार से सँवार कर नगर को फूलों एवं फलों का कोई मंडप युक्त मंच बनाया हो ॥ नदी के किनारे का जल कल कल कर रहा है मानो वीणा की मधुर स्वर गूंज रहे हों ॥ नव पत्र समूह प्रस्फूटित हुवे, पलाश के वृक्ष लाल तिलक के सदृश्य पुष्प प्रफुल्लित हुवे । वसुंधरा महुवे के पुष्प कलिकाओं से सज गई । शाखों के 

कुसुम केतन रथ प्रपथ चापे । राग बेल रति बाहु बियापे ।।
यवन मगन मह रहसन रागे । कन केसर भर पुहुप परागे ।।

फुल चाप सुदर्सन कमल नयन तन पीताम्बर धरे ।
लाखन लोचन पद कल कंजन प्रमाद कानन भरे ।।
रति रागिन रंजन हरिन नयन लख पत रख ह्रदय हरे ।
पथ पंख प्रसारित बनी बिहारित पंथ निरखत खड़े ।।

रूप लावन लख रति मयन रागत रंजत रंत ।
सीत सुरभित मंद पवन बासित बास बसंत ।।

कहुँ भल ताल तैल पर्निक कहुँ तर तीर तुषार ।
धार करतल तूलि तउलिक तुल तेल चित्र उतार ।।

सोमवार, १८ फरवरी, २०१३                                                                                     

अजहुँ काल कल दिन घल राते । सीत समउ गत बातहि बाते ।।
भू पुर पौर बेर लै फेरे । बधु गह गर्भ मास सत घेरे ।।
वर्तमान समय भूतकाल हुवा दिवस रातो से मिले । बातो ही बातों में  शीत ऋतु  व्यतीत हुई ।
भूमि भवन और द्वार पर से समय फिरा । और वधु द्वारा गृहीत गर्भ  सप्तमास की अवस्था को 
प्राप्त हुवा ।।

गर्भ भ्रून उयंग प्रत्यंगे । अंग भंगिमन उदकन अंगे ।।
बरनातीत अनुभावन भूती । बहित अवनु बल बलउ बहूँती ।।
गर्भित भ्रूण  के अंग प्रत्यंग  (शरीर के विभिन्न  अवयव  जैसे  हाथ, पैर, नासिका, कर्ण, मुख 
इत्यादि ) प्रकट हुवे ।। गर्भस्थ शिशु के शारीरिक अगों की मनोहारी चेष्टाओं का अनुभव वर्णन 
नहीं किया जा सकता ।। जो बाहर आने हेतु गर्भ घेरे पर बहुंत ही बल का प्रयोग कर रहा था ।।

देखौ बिधि के अद्भुद माया । एकाकार दुहिय हर्हराया  ।।
एक कपाल कर दोउ कपाला । एक भीतर एक बाहिर भाला ।।
नियति की यह अद्भुत मोह्कारिणी शक्ति देखिये । एक ही शारीरिक आकार में दो ह्रदय  स्पंदित 
हैं । एक कटोरे में एक शीश धारी दो शीश धारण  किये  है  एक शीश गर्भस्थ है तो  एक बाहर है ।।  

एक प्रान परे एक अरु प्राना । एक नियति निधि दुज निधि निधाना ।।
एक नाभि धरे दूसर नाभि । एक गिन्नी दूज अनगन गाभी ।।
एक प्राण में एक और प्राण समाया है । एक सृष्टि की धरोहर है दूसरा इस धरोहर का धारक है ।।
एक नाभि ने दूसरी नाभि को धारण किया है । एक चक्रकारी है दूसरी अष्ट मासिक है ।।

 एक नाभि एक नाभि माल भित बलयित एक बाल ।
एक खरभर एक कर साल बाहर भीतर भाल ।।
एक नाभि में एक नाभि की माला जिसके घेरे में एक शिशु । एक हलचल कारे दूसरा पीड़ा धारे ।।
एक अंतस अँधेरे  एक बाहर तेज-प्रकाश के घेरे में है ।।

मंगलवार, १९ फरवरी, २०१३                                                                                         

सूय अगन तप जल बन भापे । भाप सघन घन धन्बन थापे । 
बूँद बूँद झर खल भर दाने । अनगिन अगनी ताप न जाने ॥ 
सूर्य की अग्नि के ताप से ही जल भाप में परिवर्तित होता है । सघन  भाप  को  गगन घन स्वरूप 
स्थापित करता है ॥ घन बूँद बूँद झर कर धरा को अन्न पुर्णित करता  है । अनग्नि  अर्थात  जिस 
अग्नि  की  आवश्यकता  नहीं  है  उसे  अग्नि के   ताप या मोल  का  भान  नहीं  होता  अर्थात  जो 
अविवाहित है उसे स्त्री के अनुराग का अनुमान नहीं होता ॥ 

एक नर कारी अरु एक नारी । पाँख पसु तरु सब जी धारी ॥ 
दोउ जन जूर जी धन राखे । चलत नियति के तब ही चाके ॥ 
पशु-पक्षी पेड़-पौधे आदि सभी जीव धारी एक नर एवं एक मादा  स्वरूप  में  होते ।। नर  एवं  मादा    
दोनों की जोड़ी सर्वस्वरूप धारण करती हैं तब ही सृष्टि का चक्र चलता है ॥ 

गर्भ धान कर जीवन जोरे । जनमत जननी पीर न थोरे ॥ 
पाहिं देस धर सव के ढाँपे । जब जन जातक उदरन उद्यापे ॥ 
(मनुज) गर्भ धारयिष्णु से गर्भ धारयित्री जीवन को आधार स्वरूप देती है । और जन्म देते समय 
जननी को अतुलनीय पीड़ा होती है ।। कहते है कि जननी  अपने सिराहाने शावाच्छादन रखती है 
तब उदर से उद्गम होकर शिशु जन्म लेता है ॥ 
   
जनक जनी जनु अवधि अगोरें । पर बिपदा पीछौर न छोरे ॥ 
सोचु करहु कछु आनै होई । भेद बिधा बिधि जान न कोई ॥  
( इधर) जनक एवं जननी जन्म की अवधि को जोह रहे थे । किन्तु विपदा थी कि पीछा ही नहीं छोड़ 
रही थी । मानव सोचता कुछ है होता कुछ और  है । सृष्टि की कार्यप्रणाली का भेद कॊई नहीं जानता ॥ 

 कहहिं बिदित भिन भिन भनित बेर बहुँत बलवान । 
दुःख तीत कभु दुखातीत न सब दिन एक समान ॥  
विद्वानों ने विभन्न प्रकार से कहा भी है कि समय  बहुत  बलवान  है । असह्य दुःख तो कभी कष्ट मुक्त 
जीवन होता है सारे दिन एक जैसे नहीं होते ॥ 

बुधवार, २० फरवरी, २०१३                                                                                                     

पुनि एक दिबस तेज कर अम्बर । तम हर तूलबर उयउ दिनकर ॥ 
चरन उनति क्रम जों जों चाढ़े । दिन अंतर पर तौं तौं बाढ़े ॥ 
पुन: एक दिवस आकाश की कांति में वृद्धि करते हुवे अँधकार का हरण कर रक्ताग्नी से युक्त होकर दिनमणि उदयित हुवे ॥ दिवस के सोपान पथ पर उनके चरण ज्यों ज्यो आरोहित हुवे  । त्यों  त्यों  दिवस मध्याह्न  की ओर अग्रसर हुवा  ॥ 

ढल ढर डगभर डगर डहाँके । भँवर नगर दुइ पहर नहाके ॥ 
नभ केतन चष चिलचिल लाखे । कन पर करकस किलकिल काखे ॥ 
ढलान पथ पर ढलते हुवे चरण लांघे । मध्याह्न पार करते हुवे नगर का भ्रमण करने लगे ॥ 
अब सूर्य आँखों में चमचमाते हुवे दर्शित होने लगे और कानों में कटाक्षो की कर्कस ध्वनी पड़ने लगी ॥ 

उत संतापित साँझ दुआरे । सहस नयन के पद पैठारे ॥ 
इत नउ मंचन कर घरवारे । नउ कारज क्रम नउ नट कारे ॥ 
उधर प्रज्वलित सूर्य के चरण संध्या के द्वार प्रवेश किये । तो इधर नए नए कार्यक्रम एवं नई नौटंकी 
के साथ गृहजन एक नया मंचन लेकर बैठे थे ॥ 
  
छज रज सूरज अगनी अंगे । लाखन लाखन लाखन रंगे ॥ 
भीतर घर भर द्वंदर द्वंदें । लागन लागन लागन संगे ॥ 
छज्जे  पर  सूर्य  अग्नि के सह राजित होकर अत्यधिक गहरे लाल रंग में रंगे दर्शित हो रहे थे ॥ तो 
गृह के भीतर परस्पर विरोधी भाव से युक्त लड़ाकुओ से भरा था । जो परस्पर वैर धर कर आपस में 
उलझे हुवे थे ॥ 

कुल की दुष्कीरति कर हठ के साधन साध । 
दुर्बुद्धि भाव भवन भर सब जन  दुर्नइ राध ॥ 
कुल का अपयश करते हुवे हाथ धर्मिता के समस्त साधन सिद्ध कर हट बुद्धि से युक्त होकर एवं तुच्छ 
विचार को घर में भारत हुवे सब जन बुरी नीति के प्राप्ति थे ॥ 

जनु जलबल जल जलधि जर सकल दीप लइ घेर । 
रोष तरंग बिपति भँवर बाढ़े बाढ़े भेर ॥    
मानो क्रोध से उबलते हुवे समुद्र के जलते हुवे जल ने द्वीप को पूरी तरह से घेर लिया हो । विपदा भँवर 
लिए हुवे रोष की तरंगें ऊँची उठ कर द्वीप की ओर बढ़ रही हों ॥ 

गुरूवार, २१ फरवरी, २०१३                                                                                       

दूसर दूषक दूषन प्रेरे । दरसे गृह्जन मत मति फेरे ॥ 
उग्र बचन भरे करें लराई । समुख जेठ की प्रान समाई ॥ 
पराए दूषित व्यक्ति के दोषों से प्रेरित प्रियजनों की विचार-बुद्धि मानो फिर सी गई थी ॥ वे उग्र  वचनों 
से परिपूर्ण होकर लड़ाई छेड़े हुवे थे । सामइ वधु के जेठ की पत्नी थीं ॥ 

घेर लइ तेहिं चारिहुँ पासे । तेज भरी मुख बैनी निकासें ॥ 
देख दिरिस एहिं छुट बधु धाई । बर बधु कर धरहरिआई ॥ 
उन्हें चारों ओर से घेर कर  मुख से तेजपूर्ण वाणी निकाल रहे थे । ऐसा दृश्य देखकर छोटी वधु  भागी । 
और बड़ी वधु का बीच-बचाव करे लगी ॥ 

थोर न थंभें लड़ रर रंते । जे बर आदि त छुट अंते ॥ 
करन कलह कल प्रतिपल परसे । बारहि बार धरसत बरसें ॥ 
किंचित भी शान्ति न रखते हुवे बारम्बार लड़ाई में ही अनुलग्न रहे  । जो लड़ाई बड़ी वधु से प्रारम्भ हुई  
वह छोटी वधु पर समाप्त हुई ॥  कलह कोलाहल कानों को प्रतिक्षण स्पर्श कर रहा था । (घरवाले) बार 
बार डांट डपट कर बरस पड़ते ॥ 
    
सब गहजन की भइ लड़ बुद्धी । गर्भ बयस बधु कछु नहिं सूझी ॥ 
तब पीहर घर दै संदेसे । लइ जाउ मोहि अस ही भेसे ॥ 
सभी गृहजनों की लड़ाई बुद्धि रही । गर्भावस्था को प्राप्त वधु को कुछ अहि सूझ रहा था ॥ तब उअसने पीहर 
घर में सन्देश भिजवाया कि मुझे में जिस वेश में हूँ वैसे ही ले जाओ ॥ 

नयन भर रुदन कर अंधु लाखी बखतै भोर । 
अवनु लवनु बधु के बंधु ले भगीनि के सोर ॥    
नयन रो रो कर आसुओ से भर अंधे हो गए और भोर को जोहने लगे । ( भोर पड़े) वधु के भ्राता बहा की सुधि 
लेते हुवे बहन को लेने ससुराल पहुँचे ॥ 
  
शुक्रवार, २२ फरवरी २०१३                                                                                    

एहि बिधि बधु दुःख धर चित ऊपर । संताप कर चली पितु के घर ॥ 
लागन लाग न लाग लपेटे ॥ गवनु बखत तिय पिय नहिं भेंटे ॥ 
इस  प्रकार  वधु  मन में दुःख धारण कर पीड़ा युक्त होकर पिटा के घर चली ।। न वैर न प्रीति न ही कॊइ 
औपचारिकता जाते समय पीया प्रिया से मिले भी नहीं ॥ 

दिवस राति रत रितु रथ बदरी । बसंत भरी सोहित डगरी ॥ 
सर सर सरसिरु पेड़ पलासे । त्रिबिध बिरह बह बही अगासे ॥ 
दिवस और रातो के प्रेम पाश में आबद्ध ऋतू ने अपना रथ( चक्र) बदला । वसत भरी डगर सुदर प्रतीत
होती सरोवरों में  कमल  और  पदों  पर  पलास  शोभायमान  हुवे  विरह युक्त त्रिविध बयार आकाश में 
प्रवाहित होए लगी ॥ 

लागि भरी ना  पुर पुरवाई । हाट न बाट न बीथि लुभाई ॥ 
फूर बहु फुर बहु बरन बोरे । नयन नीर पर धुंधरे धोरे ॥ 
नगर की यह पुरवाई भली नहीं लग रही थी । न हाट न न मार्ग और अहि गलियाँ लुभा रहीं थी ॥  फूल 
बहुंत से वर्णों में वर्णित होकर प्रस्फुटित थे  किन्तु  वधु  के  नयन  जल  में  धुंधला कर धवलित जान 
पड़ते ॥ 

तरु मंडित मर हर हरियारे । हरिन नयन भर हरिदा धारे ॥ 
पाँव पाँव नव पल्लव छाहीं । पाल उर पार पारक गाहीं ॥ 
धरती हरे भरे वृक्षों से  हरियाली बिखेर रही थी । कितु उस मृगनयनी के नयो में हरिद्रा छाई थी ॥ पग-
पग पर नव पल्लव छाये हुवे थे किन्तु ह्रदय की परत-परत पर प्रिय गहराए हुवे थे ॥ 

चली दूर दूर उरी धूर धूर पर उर न धीर धरे । 
देखि मूर मूर तरे झूर झूर पट नयन नीर भरे ॥ 
भरी कर कूरी हरीयर चूरी सुर सँवर गईं भूर । 
दुःख धरी बिंदिया पीर भरि बिछिया चुप करि सिस सिंदूर ॥  
वधु ऊर  चली  जा रही है पीछे शिविका का चक्र धुरी से धुल उड़ रही है किन्तु वधु के ह्रदय में धैर्य नहीं है 
वह मुड़ मुड़ कर  देखती  है  और अश्रुकण नयनों में में भर कर झुलते हुवे नीचे उतर  रहे हैं ।।  हरी-भरी 
चूड़ियां हाथो में ढेर लगाए  हुवे  हैं जो पिया के (प्रेम) सुरों को भी भूल गई हैं बिंदिया  दुःख धारण किये है 
बिछिया को भी विरह जनित पीड़ा है और सिर का सिन्धुर चुप्पी धारे हुवे है ॥ 

   
रंगे रहें आँगन बन सोभहिं सहि श्रीरंग । 
कह सुमन भर राग बिरहन  सह न रंग श्री संग ॥ 
श्री के साथ श्रीकर की शोभा जिस आँगन के उपवन को सुशोभित कर रहे थे । वहाँ के पुष्प विरह राग में कह 
रहे है कि अब श्री एवं श्रीकर साथ नहीं हैं तो उपवन सुशोभित नहीं है ॥ 

शनिवार, २३ फरवरी, २०१३                                                                                    

दोष भरे चाहु कैहि छोभें । पिय प्रियजनु के पख ही सोभें ॥ 
ए जग लरकिनि जोनि जे लाईं । न पिय न पितु के पाख लिखाईं ॥ 
दोषों से परिपूर होकर चाहे किता भी क्रोध करें पीया तो प्रियजनों के पक्ष में ही शोभा देते हैं । । इस जगत में जो 
स्त्री योनि में आईं हैं उनके भाग्य न तो पति का पक्ष लिखा है और न ही पिता  का ॥ 

प्रेम पुरित जहँ पिय छबि मोही । बिहुर बहुर तहँ बनी बिद्रोही ॥  
तात देहरी पग धरी  दो ही । सोची जे हो भली न होही ॥ 
प्रेम में अनुरक्त हो जहा पीया की छवि लुभा रही थी वहां से बिछुड़ बैर कर लौटी ॥  पिता की देहली  पर दो  ही पग 
रख थे कि वधु के मन में विचार आया कि जो भी हुवा अच्छा नहीं हुवा ॥ 

चरन भीतें न रहे बहारे  । अजहुँ न भाए तात दुआरे ॥ 
जनु कोउ महजन लाग चढ़ाए । तेहि न बहुरे दुज मँगन आए ॥ 
चरण अन्दर प्रवेश नहीं करते वह बाहर ही रहते हैं । आज पिता का द्वार नहीं भा रहा । मानो कोई महाजन का ऋण 
चढ़ा हो सो वो तो लौटाया नहीं दूसरा ऋण मांगने आ गए हों ॥ 

  कोउ दोष न कोउ अपराधे । एतक दोष कि नारि तनु राधें ॥ 
नयन नवन भए लाजन भारे । आपहि घर कर आप उजारे ॥ 
न तो कोई दोष ना ही कोई अपराध  केवल इतना ही दोष कि वधु नारी शरीर को प्राप्त हुई ॥ नया इस लज्जा से भारी
हो झुक गए कि अपना घर अपने ही हाथों उजाड़ने चले हैं ॥ 

एहि भू जन्में मम जनु जूरे । अस मत बुड़ बधु चौखट बूड़े ॥ 
इसी भूमि में जन्म लेकर मेरे प्राण यहीं बंधे । वधु ने ऐसे विचार मग्न होकर पिता की चौखट के भीतर प्रवेश किया 

लखत लखत बखत बिबाहु काल गाँठी धर एक । 
देखु भाल बधु बिधि बाहु अरु का लाखे लेख ॥ 
देखते ही देखते विवाह का एक काल ग्रंथि अर्थात विवाह हुवे एक वर्ष हो गया । देखो अब वधु के माथे पर विधाता ने 
और क्या लेख लिखा है ॥ 

रविवार, २४ फरवरी, २०१३                                                                                        

बिगति बसंत रितु बिरह लाई । होनइ सकल बिधात रचाई ।।   
काल लेखन नहि कोउ हाथे । न त लेखहिं भल सब निज माथे ॥ 
बितती हुई वसंत ऋतु विरह ले कर आई सारी होनी विधाता के द्वारा रचाई गई है ॥ समय लिखना किसी 
के वश का नहीं है । अन्यथा सब अपने माथे पर अच्छा-अच्छा ही लिखते  ॥ 

दूनउ घर नर नागर जाने । नाम कीरति कर सब सनमाने ॥ 
बधु के पितु कार निज समुदाए  । जथा जोगु जूर  सेवा सहाएँ ॥ 
वधु का पीहर और ससुराल दोनों घरों को नगर के रहवासी जानते थे । जिनके नाम की कीर्ति करते हुवे सभी 
नागारिक जन सम्मान करते थे ॥ वधु के पिता निज समुदाए के कार्य में जूड़कर यथा  योग्य सेवा सहायता 
करते थे ॥ 

जे कहु के निज होए बिबादे । जथा मति गत समुझ सुरझा दें ॥ 
जी रहँ दुःख सुख ररैन  बिहाने । अस दसा के दस दिसा जाने ॥ 
यदि कहीं किसी का कोई निजी विवाद हो जाता तो उसे यथा बुद्धि के अनुसार समझ कर सुलझा देते ॥ जीवन 
में दुःख रात्रि के सदृश्य और सुख दिवस के सदृश्य रहे । ऐसी दशा की दस ठो दिशाएँ जानते थे ॥ 
  
जदपि सील पर सैली लाखें । भान मान कर सब भय भाखें ॥ 
कह न उलट कभु आयसु कारे । आठ गाँठ गह गृहस सँभारे ॥ 
यद्यपि व्यवहार कुशल थे किन्तु शैल के सदृश्य कठोर दिखते । उनकी प्रतिष्ठा का सम्मान कर सब गृह जन 
उनसे भय खाते ॥ सभी उनकि आज्ञा का पालन क़र कभी उलटा नहीं कहते आठ प्रकार की गहरी गाँठ लगा 
कर गृहस्थी को संभाले थे ॥ 
  
जे रहि धिय के कहुँ दोसु ते बहु रोस जताएं । 
जान पितु तेहि निर्दोसु लैवन बंधु पठाए ॥  
यदि कहीं पुत्री का दोष रहता तो उस पर क्रोध जताते । यहायाह जानते हुवे की पुत्री निर्दोष है तभी भ्राता को 
उसे लेने उसके ससुराल भेजा ॥   

सोम/मंगल, २५/२६ फरवरी, २०१३                                                                                          

भइ सयान बधु बर भौजाई । रूप असन जनु माइ के छाई ॥ 
सनेहु जस निज बाल सनेहीं । तेहि बिहा पर बधु जनु  लेहीं ॥ 
वधु की बड़ी भौजी समझदार थी रूप उअका ऐसा की जैसे माता ही की परछाई हों । वह ऐसे स्नेह करती जैसे 
कोई अपने  ही बालक को सनेह करता है । कारण  कि उनके विवाह के पश्चात ही वधु का जन्म हुवा था ॥ 

अस ते पिहरू भए मातु हीना । पर भउजइँ बहु ममता दीना ॥ 
कहैं सुने समुझाइ बुझाई । समउ पर सब नीक हो जाहीं ॥ 
ऐसे तो पीहर माता ही हो गया किन्तु भावजों ने बहुंत स्नेह किया ॥ काहा हवा सुआ और समझाया-बुझाया कि
 समय आए पर सब ठीक हो जाएगा ॥ 

दिन भर बत कर दुःख सुख रागी । सनै सनै सँझ गहरनु लागी ॥ 
उत अम्बर बर राजत रजनी ॥ इत साजन बिनु साज न सजनी ॥ 
दिनभर बातेंकर दुःख सुख बोलते बतलाते साँझ गहराने लगी ॥ उधर अम्बर का वरण कर रजनी विराजित हुई 
इधर साज बिना सजनी शोभित न हुई ॥ 

अस बिरहन भर एक भइ दु राति । पिया बिथुरन न सुख कहुँ भांति ॥ 
बसंत दूत संदेसु न  आजु । नींद परे ना कोउ ब्याजु ॥ 
इस प्रकार विरह भरी एक रात दूसरी में परिवर्तित हुई । पीया के बिछुड़े से सुख भी किसी भाँति नहीं था ॥ 
अब की बार पूर्व के जैसे वसंत्त दूत ने कोई सन्देश भी नहीं दिया नींद थी की किसी बहाए भी नहीं आ रही थी ॥ 

होइ वही जे सोचु न जोही । बिचारि बधु आगिल का होही ॥ 
दीन दसा अस  कर दुःख दूना । दिवस  दुसह बधु दरस कभू ना ॥ 
वह हो गया जो विचारों ने भी नहीं जोहा । वधु ने विचार किया कि अब आगे क्या होगा ॥ गर्भ धरी ऐसी विकलता 
से भरी दशा में दुःख दुगुना प्रतीत होता । ऐसे कठीन दिन वधु इ कभी नहीं देखे थे ॥ 

एकहिं  उरस दस चिंतन सारे । अजहुँ गर्भ गह नव जी धारे ॥ 
जनम लेहि जग नयन उघारे । तब कस कर तर सर संसारे ॥ 
एक ही ह्रदय और दस प्रकार की चिता घिरी हुई थीं अभी तो नव जीवन धारी गर्भ  में है । जन्म  लेकर  जब  शिशु 
इस जगत में अपनी आँख खोलेगा तो वह इस संसार रूप सरोवर में किस प्रकार तैरेगा ॥ 

हिय हरु पिया हिरन नयन गर्भ दोउ के अंस । 
चित चेतन करे चिंतन का जग जी जिय हंस ॥  
ह्रदय हरने वाले पीया मृग नयनों में हैं गर्भ में वधु-वर का अंस है । चित विचार  कर  यह  चिंतन  करने  लगा कि 
इस जगत में देहस्थ चैतन्य की जीवित दशा क्या है ॥ 


गर्भ गार गह घिर तम घोरे । नौ मास भीत रह कर जोरे ॥ 
नलिनइ रूह अस बँध नभ नारे । करत बिनति प्रभु बहिर निकारें ॥ 
गर्भ गृह में घने अँधेरे से घिर कर  नौ माह तक हाथ जोड़ कर रहते हुवे जैसे कमल नाल कीचड़ में धंसी रहती है 
वैसे ही नाभि नाल से बंधे प्रभु से बाहर इकाले की विनती करता है  -- 

सार सार सिर जननी पीरे । तरइ धरा सिसु धीरहि धीरे ॥ 
रवन रुदन धरि धीर न राखे  जस आवनु तस भॊजनु  भाखे ॥  
और जननी को पीड़ा देते हुवे सिर को साधते सारते हुवे धीरे-धीरे शिशु धरती पर आता है । रुदन शब्द धरे वह धैर्य 
न रखते हुवे भोजन का भूखा अर्थात विषय भोगो के अधीन हो जाता है ॥ 

जनम जन जोनि गह जगत अतिथि । लिखि लवनु ललाटन मरनिहि तिथि ॥ 
पी पिऊष पर रहें पिपासे । काम क्रोध मद मोहौ कासे ॥ 
वह मनुष्य योनि ग्रहण कर  इस जगत आश्रम में अतिथि स्वरूप में उत्पन्न होता है । अपने माथे पर मरण तिथि को 
लिखवा कर लाता है ॥ अमृत पीकर भी सदैव प्यासा रहता है अर्थात विषय भोगो में लिप्त होकर भी उनकी कामना 
करता रहता है वह काम, क्रोध, मद एवं लोभ के पाश में बंधा रहता है ॥ 

जियतइ जी तक जनमन जेई । जीवन के सिख दिन दिन लेई ॥ 
आस भरि साँस सिरावत जाए । कहु गवाएँ ते कहूँ छिनु पाएँ ॥ 
मनुष्य जब जन्म लेता है तो वह जीवन पर्यन्त तक दिनोदिन जीवन की सीख लता है । आशाओं से भरी सांस 
समाप्त होती जाती है । कुछ क्षण खो जाते है तो कुछ क्षण पा भी जाते है ॥ 

कहु जीवन साप समरूप कहुँ जीवन वरदान । 
ताप सीत कर छाइँ धुप सकल सुख दुःख अपान ॥ 
कहीं पर जीवन श्राप की अनुभूति देता है, कहीं यह वरदान सिद्ध होता है ॥ कहीं दुःख रूपी तिप्त् धूप है, कही छाँया रूपी सुख शीतलमयी है, यह समस्त सुख दुःख मनुष्य के स्व हस्तोत्पादक हैं ॥ 

मनु कहुँ जलधि खार भरे नादे नदी निर्मल । 
उरस पीर पहार धरे कहूँ धीर धरा तल ॥ 
मानो कहीं पर खारा समुद्र है, कहीं नदी के निर्मल जल का निनाद है, कहीं ह्रदय की पीड़ा धरे पहाड़ है, कही शांत धरा-
तल है ॥ 

बुधवार, २७ फरवरी, २०१३                                                                                            

पुनि तरि एक रतियाँ रति कारी । गगन नगन नग निभ नख घारी ॥ 
माथ मुख बिंदुक चाँद पिरोए  । पाद पदुम दल पेयूख धोए ॥ 
फिर आकाश में रत्नों के समान अनगिनत तारों से युक्त एक श्यामल सुंदरी रात्रि उतरी । जिसके माथे ने बिंदु स्वरूप में चाँद पिरोया था । पद्म दल के सदृश्य चरणों को सुधा बिंदु धो रहे थे ॥   

पिया पपीहा बिकल भे एकै । तिस पर  कबि बर कँह बहु लेखै । । 
पेम परस पी पयसन तरसे । पेम तरस पी तरसन परसे ।
पिया और पपीहे की विकलता एक ही समान है, इस पर श्रेष्ठ कवियों ने लिख लिख कर बहुंत हूँ कहा है ॥ प्रेम का स्पर्श पाकर ही पपीहा और पिया उसकी सुधा बिंदु को तरसते हैं प्रेम करुणा में कभी स्पर्श हेतु तरसते हैं ॥ 

दोउ प्यास मै दोउ पिया से । परस तरस तै दोनौ कासे ॥ 
कोउ रूपक कोउ रूप की रासि  । दोनौ कासत प्रीति के कासि ॥ 
दोनो ही प्यासे हैं दोनों ही प्रेमी हैं दोनों ही स्पर्श को तरसते दोनों सुन्दर प्रतीत होते हैं ॥ कोई ( प्रेमी)  मूर्ति स्वरुप है कोई( प्रेमिका)  रूप की राशि है,  दोनों प्रेम की मुष्टिका में बंधे हैं ॥ 

मंद कांतिक दिवस मलिना । कलंक कलुषित बिधु मुख दीना ॥ 
प्यास तरस पी बहुंत बियाजे । कुंच कमल कर भाल बिराजे ॥ 

मुर मुकुर मलिले मेल मसि ले । कबि कांति मुख मेलें मनि ले ॥ 
जस रयनै चर रात अधारे । तस सजनी सज साजन सारे ॥ 

रसै रसै राति रासे बिरहन कहूँ न रास । 
रज रज रतन मनि कासे सजन सजनी न कास ॥ 

गुरूवार, २८ फरवरी, २०१३                                                                               

ससी दिवाकर अपर अगासे । धरा जल किरन गिरी बन कासें ।। 
कहुँ उयऊ कहुँ छबि छित छाई । तसहि प्रबुद्ध बुध कबि प्रभुताई ॥ 

बिरच बिरंचि कह बहुताईं । बितत बितत रत पिय बिरहाई ॥ 
प्रिया जस चंदु पिया बियोगे । चौंक चौंक चष प्रियतम जोगे ॥ 

लाख लेखि लिख लख लंकारे । रूर मधुर सुर सिंजन डारे ॥ 
सत बर्निक कर धनुधर धारे । टंकन खंकन टन टंकारें॥ 

सर सर आखर माल नियासे । मुख जोजन पत पातक धाँसे ॥ 
सूर नयन बीर केसरि कूरे ॥ पुर पूर जौवन  रन बाँकुरे ॥ 

सूतधार कृत करमन काठे  । कोशकार पत ग्रन्थन गाँठे ॥ 
छंद प्रबंध भेद रस नाना । कह नौ रस मस भानिती भाना ॥ 

धूम अगर जर रुर सुरभि गंधे । नहि ते खाँस आँखि दै अंधे ॥ 
कला कमल कल कृति के संगे । कर बर बर्निक बरनन रंगे ॥ 

बन बानी आखर बान पानी आखर पान ॥ 
बानि बानि  के भरू भान दै सक आखर ज्ञान ॥ 
बाण का विस्तार युद्ध की भाषा है व्यापार का विस्तार व्यापारी की भाषा ॥  वर्ण-वर्ण की  वेश भूषा में 
वर्ण-वर्ण के पति  जैसे उद्योगपति, वाचस्पति, करोडपति, भूमिपति,राष्ट्रपति आदि आदि पति है,
कवि उन्हें, उन्ही की भाषा में अक्षर ज्ञान दे सकते हैं ॥ 




  






























 

















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