Sunday, June 1, 2014

----- ॥ सोपान पथ १५॥ -----

छहहि मास भए बसत निबासा । चारत सुत भए कुल दुइ मासा ॥ 
तनिक दिवस लग चले सुपासा । पाछिन मुख पर छाइ हतासा ॥  
पराई नगरी में नवासित होकर बसते हुवे कुल छ: माह हो गए ।  विमोचित चरण पट्टिका के सह पुत्र को चलते दो मास हो गए थे । कुछ दिनों तक तो वह बहुंत ही सुख पूर्वक चला । बाद में उसके मुख पर विचित्र प्रकार की हताशा छाई रहती ॥ 
  
गिरे भूमि पर रोदत टसके । चरन न अजहूँ वाके बस के ॥ 
बिचरत होवै पीर घनेरी ॥ दम्पति मन नउ चिंतन घेरी ॥ 
जब कभी वह भूमि पर गिर जाता तो टसकते हुवे क्रंदन करता ॥  चलना उसके वश  में नहीं रहा कारण की विचरण से गहन पीड़ा होती । अब दम्पति के मनो-मस्तिष्क एक नई चिंता से घिर गया ॥ 

बहुरि एकु  जोग जीवद दिखाए । तेहि निरखत उपचर्जा बताए ॥ 
चारि दिवस ता पीरा छाँड़े । तनिक काल मह अस्थिहि गाढ़े ॥ 
उन्होंने   उसे एक योग्य अस्थि के विशेषज्ञ चिकित्सक को दिखाया । उसने पुत्र का भली प्रकार से निरक्षण कर कुछ उपचार निर्दिष्ट किया । चार दिवस लगे  तन से पीड़ा मिट गई, कुछ समय पश्चात उसकी अस्थियां दृढ़ हो गई ॥  

 धीरहि पद संचारन लागे । सुत के सुपुत भाग जस जागे ॥ 
मात पिता लिए सुख उछबासा । आयब तनिक  साँस महु साँसा ॥ 
धीरे धीरे उसके चरण संचालित हो गए जैसे उसके सोए हुवे भाग्य जागृत हो गए हों ॥ माता- पिता ने  एक सुख की उच्छवास ली उनके थोड़ा ही सही किन्तु जी में जी आया ॥ 

कटे पुत के एकु संकट बिरते सुखमय राति । 
जोगित अस्थि संग परे, उर अंतर महु साँति ॥ 
इस प्रकार पुत्र का एक संकट तो कटा  उसकी रात्रि सुख पूर्वक व्यतीत होने लगी । संयोजित अस्थि के सह उसके अशांत हृदय में शांति छा गई ॥ 

सोमवार, ०२ जून २०१४                                                                                                       

अपस्मार जब चिक्कर घारी । पीर जनत  उर तड़पत भारी ॥ 
सतत रूप जब गहनै घेरे । निदान गृह महु जाइ निबेरे ॥ 
अपस्मार का जब चक्कर घेरता ।   पीड़ा जन्य तड़प  से ह्रदय भारी होती ॥  और चक्कर  सतत स्वरूप में सघन स्वरूप में घेर लेते । तब वह निदान गृह में ही विमुक्त होते  ॥ 

जग एक पथ जीवन एक गारी । कबहु हरिएँ कभु  द्रुत संचारी ॥ 
पथिक अनेक मिलहि मग जाता ।  घरी पलक प्रति छिनु दिनु राता ॥ 
यह भव सागर एक पथ है जीवन एक  यान  है । यह कभी तीव्र गति से कभी गतिअवरोधक के कारण मंद गति से संचारित  होता है ॥ मार्ग में जाते हुवे पल प्रतिपल  दिन हो कि चाहे रात में अनेक पथिक से मेल होता है । 

को मन उजरे देहि स्यामहि । को रावन रूपी को रामहि ॥ 
को वितथवदन को सत वादी । को सुखचर को अवसादी ॥ 
कोई मन से उज्जवल एवं तन से स्यामल  है । को रावण रूप में है कोई राम का ही स्वरूप है ॥ को मिथ्यावादी तो कोई कोई सत्यवादी है ॥ कोई सुखपूर्वक गतिवान है  तो कोई अवसाद ग्रहण किए है ॥ 

को धनी मनि  को बहु दीना । को असुरि माया के अधीना  ॥ 
को अति कोमल सुमधुर भासी । को सौ हरिदए सुख की रासी ॥ 
कोई धनवंत है कोई बहुंत दीन है कोई आसुरी माया के आधीन है ॥ कोई अत्यधिक कोमल प्रयंवद /वदा  है । कोई सौहृदय है जो सुख की राशि स्वरूप है ॥ 

कहूँ नख नेमा दरसे सपेमा कहूँ उर दिनकर तरे । 
कहूँ भय भरि राति कहूँ कल गाति प्रत्युष के हस्त बरे ॥ 
कभु दिवस रुआंसे पिय प्रत्यासे लवण लोचन जल झरे । 
कहूं जन गवाईं, बहोरि जाई घर सुघर भुइ हरि करे ॥ 
 कहीं सनेह दर्शता चन्द्रमा कहीं ह्रदय में उतरता हुवा तपन कहीं भयधन रात्रि कहीं  प्रत्युष का पाणि-ग्रहण किए निह्नादित निशा ॥कहीं दिवस रुदनशील  और प्रियतम  की आस किए  लावण्यमयी लोचन से झरता  अश्रुजल ॥ कहीं जन्म दे कर संतति खोई पुनश्च जन्माया और गृह भूमि को सुन्दर एवं भरापूरा किया ॥ 

देह धूपित चरन ताप, कहुँ तरुबर के छानि । 
जब मन पूर्ण काम रहे, लगे सुपासी धानि ॥ 
धूपित देह है चरण संतप्त है कही तरुवर की छाँव है । जब मन पूर्ण कामी होता है वसिधानी अत्यधिक सुखदायी प्रतीत होती है ॥  

मंगलवार, ०३ जून, २० १ ४                                                                                                   

जेइ कहाउत अगजग जाने । कर्म सोंह सब भाग बँधाने ॥ 
भागाधीन भाग पथ जोई । तिन कर्महिन कहत सब कोई ॥ 
यह  कहावत  संसार भर के संज्ञान में है कि कर्म के सह भाग्य का अभ्युदय होता है ॥ जो भाग्य के अधीन हैं और  भाग्य की प्रतीक्षा रत हैं संसार उन्हें अकर्मण्य कहता है ॥ 

बसे बसित  पिय नगर पराई । गह करतल दुनहु सेउकाई ॥ 

एक पद थापिन जहाँ निबासे । दूज निबास नगर के पासे ॥ 
इस प्रकार दोनों वृत्ति करतल में ग्रहण किए दम्पति पराई नगरी के पराए वसथ के वासी  हो गए । एक पद की स्थापना वासित नगरी में ही हो गई । दूसरे की पार्श्व देश के गाँव में ॥ 

कारभवन दुहु गवन निरंतर । दिए  प्रतिदिन मुख कृत हस्ता खर ॥ 
रहहि तहहि के कहनी सोई । करन जोग को कार न होई ॥ 
प्रियतम दोनों ही कार्यालय में निअंतर उपस्थित होते एवं केवल हस्त अक्षर अंकित कर लौट आते । यहां की भी वही कहानी थी करने योग्य कोई कार्य ही नहीं दिया गया ॥ 

कृत क्वचित कर्मिन अधिकाई । पाए दिए जोइ मुँहू भराई ॥ 
कर्मकर जाचक लिख चीन्हे । ठीकाहर अजाचक कीन्हे ॥ 
कदाचित कार्य किंचित थे एवं कर्मी अधिक हो गए थे । अत: 'जो देता वही पाता ' । दुसरा कारण यह कि कर्मकार भिक्षुक के जैसे चिन्हांकित किए गए । ठेकेदार को संपद वान कर दिया गया था ॥ 

दुरमाया बस मतिमंद, भए सब मिथ्यावादि । 
भोग बिषय जय कार किए, करत बिरथा प्रमादि ॥ 
ऐसी दुर्व्यवस्था हो गई है कि  आसुरी माया के वश होकर सभी मंद बुद्धि एवं मिथ्यावादी हो गए  हैं । और भोग विषयों की जय जय कार करते हुवे व्यर्थ का अभिमान करने लगे हैं चार कुकृत्य करके स्वयं को दनुपति समझने लगे हैं ॥ 

 बुधवार, ०४ जून, २ ० १ ४                                                                                                        

सीस छादन बसन अनुप्रासन । जनिमन जनमद जीउ जमोगन ॥  
जुगता बर्धन ज्ञान अधाने । योजन को कर्मन बर थाने ॥ 
शीर्षाच्छादन आवरण अनुप्राशन  आदि जीवन भूत साधन, जन्मदाता के जीवन संरक्षण, योग्यता वर्द्धन , ज्ञान ग्रहण, अन्य किसी श्रेष्ठ स्थान पर कार्य नियोजन

पठत पदोनत जिबिका जोई । पिया के अवर हेतु न होई ॥ 
ए कर पढ़े बिनु होत गभीरे । बिषय सिंधु सो तीरहि तीरें ॥ 
पदोन्नति कर जीविकार्जनादि हेतु के अतिरिक्त  प्रियतम की अध्ययनशीलता का और कोई हेतु न था ॥ यही कारण था कि वह अध्ययन के प्रति गंभीर नहीं थे । उनका विषय सिंधु के सदृश्य और वे तट ही  के तैराक थे ॥ 

गहे घर गहस चारिन भारा । बाही हरुबर बोह अपारा ॥
गवन पीठ पर बहुत उछाही । उपाधि पर एक उपाधि चाही ॥ 
गृह संचालन का भार भी  तो उन्होंने ही ग्रहण किया हुवा था  भार वाही तो दो तोले का और भार एक सेर का ॥  वह भारवाही  विद्या भवन अतिशय उत्साह से जाता, पता नहीं क्यों जाते कदाचित मा सा बनने के लिए ॥ हाँ एक उपाधि पर एक और उपाधि की चाह थी इसीलिए ॥ 

परीछा के समउ जब अवने   । पढ़े बिषय  प्रीतम बहु गहने ॥ 
एकु पुनि दुइ छह  माही दाई । दोनहु मैं पिय कृतफल  पाईं ॥ 
 परीक्षा का समय जब आता  तभी विषयों का गहन अध्ययन किया जाता  ॥ पहले एक तत्पश्चात उन्होंने दूसरी छ मासिक परीक्षा दी । दोनों में ही वह सफल हुवे ॥ 

सनातकोतरु ब्रत गहन, अस बासित पर धाम । 
दुइ कार भवन कर्म जुग, तापर रहि निहकाम ॥  
इस प्रकार  स्नातकोत्तर शिक्षा  ग्रहण करने हेतु  दम्पति पराए धाम के निवासी हो गए । और दो कार्यालयों का कार्य हस्तगत होते हुवे भी अकर्मण्य् ही रहे ॥ 

बृहस्पतिवार, ०५ जून,२०१४                                                                                                 

समउ आपुने पाँख बिताने । उरिन कवन  नभ होहि न भाने ॥ 
बधु जब तब पिय सों हँसि कारें । प्राण तेहि प्रिय नाथ हमारै ॥ 
यह समय अपने पंख विस्तारित किए किस गगन में उड़ा इसका  भान ही नहीं  हुवा ॥   प्रियतम से परिहास कर कहती हे हमारे नाथ प्राणों से प्रिय हैं ॥ 

अधुनातिन्हि राउ के नाई । जोगए सिद्धिहि बैठ बिठाई ॥ 
बधु त कहिब पूरित अनुरागे । पिया उरसिज तीर सम लागे ॥ 
अब तो वह आाजकल के राजाओं जैसे हो गए हैं बस भूति झोके और घर में बैठ गए ॥ वधु ने तो यह अनुराग से पूरित हो कर कहा किन्तु प्रियतम के हृदय में वह शब्द दो तीर के सदृश्य लगे एक ने पार हो गया एक ने प्यार किया ॥ 

कहत  सुहासित रे मम भामा । जनित सिद्धि लहि का बिनु कामा ॥ 
बात बनाउन बहुस कुसलाइ । अवरहि लहत हमरे अभिप्राइ ॥ 
वह सुहासित मुख से बोले हे री मेरी प्यारी भामा । ये लइकिंनिहि के भूति क्या बिना काम के प्राप्य हुई हैं ॥ बात बनाने में तो बहुत कुशल हैं । हमारे अभिप्राय  को अन्यथा ही लेते हैं ( वधु ने उत्तर दिया ) ॥ 

बलित पानि  प्रिय कण्ठन हेरी । तमकि थपकि  दय धुकित निबेरी ॥ 
कर अंतर पुनि पिय लिए घेरी । नयन जुड़ावत बोले हे री ॥ 
और प्रियतम के कंठ से प्रिया ने दोनों हाथों को  लगभग ढूंढते हुव छद्म आवेशपूर्वक थपकी देते हुवे और धकियाती हुई बाहु को  बंधन से विमुक्त की ।  प्रियतम ने पुनश्च अँकवार मुद्रा धारण कर सौम्य लोचन होते हुवे कहा  हे री ॥ 

श्रीमन पतिनी हे गह भ्राजा । सेबक प्रतिमुख  दौ कछु काजा ॥ 
लगन धरावत पिया सुहासै । छेड़ लगा कर मह कर  कासै ॥ 
हे गृह देव की देवी घर की शोभा स्वरूप ,सेवक तुम्हारे सम्मुख है कुछ काम दो ना ॥ । इस प्रकार प्रिया के प्रति परम आसक्त होते हुवे  प्रियतम ने जब परिहास किया और  करतल में करतल कसते हुवे नोंक-झोंक हों लगी ॥ 

कहत बधु ए महनिआ मुख, लगे न मतिवति कोइ । 
दोइ ज्ञान के बात कहत, सब कहि बिरथा होइ ॥ 
तब वधु ने कहा इस महनीय के मुह कौन मतिवती लगे । दो ज्ञान की बातें कहो सो सब व्यर्थ है ॥ 

शुक्रवार, ०६ जून, २०१४                                                                                                                

 कासि करक जब करष कलाईं । कसमसत फूरि गालु फुलाई ॥ 
बोली सुमधुर निलज कहीं के । जो कछु अहै सो आप ही के ॥ 
ऐसा कहते ही प्रियतम ने  जब कोमल कलाइयों को अपनी मुष्टिका में कसी तब वधु झूठ मुठ के गाल फुलाते हुवे कुलबुलाने लगी ॥ और सुमधुर स्वर में कहने लगी निर्ल्लज.....कहीं के......तब प्रियतम ने उत्तर दिया जो भी हैं सो आपके ही हैं ॥ 

अस सुनि  बधु अस दीठी मोड़ी । ह्रदय भवन पिय पीठी जोड़ी ॥ 
बाहु सिखर धरि हनु जब रागे । रूप लुभावन  अति प्रिय लागे ॥ 
ऐसा सुन कर वधु ने अपनी दृष्टि फेर ली  तो  प्रियतम ने पृष्ठक को  अपने ह्रदय भवन से संलग्न कर लिया ॥ और वधु के बाहु शिखर पर अपनी हनु रखकर अनुराग से परिपूरित हो उठे । प्रियतम  का ऐसा लुभावना रूप वधु के अतिशय मन भावन लगा  ॥ 

जो को कारज कर ना दाही । सोइ  दास कहू त  कहँ जाही ॥ 
पढ़े पोथि जो पलक न पंथा । रागन बिनु नर होहि न संता ॥ 
यदि कोई कार्य हस्तगत नहीं करेगा । कहो तो वह दास फिर  कहाँ जाएगा , क्या करेगा ॥ और यदि वह पलक पंथ की पोथी भी नहीं पढ़ेगा । तो विरक्त होकर वह नर साधू न बन जाएगा ? ऐसा प्रियतम का कहना था ॥ 

प्रीति काज जो करतल गाही । जस तुम लेखि सरल तस नाही ॥ 
सो बय केहि बिधि बात सँवारे । प्रिया बचन पर मन मह घारे ॥ 
प्रीति का कार्य ? उसका क्या ? जो करतल ने पहले से ही ग्रहण किया हुवा है ?  जैसा तुमने इसे सरल समझा है यह उतना सरल नहीं है ॥ उस समय तो प्रियतम ने  किसी प्रकार बात संवार ली । किन्तु प्रिया के वचन उनके चित्त में कहीं गहरे अवस्थित हो गए ॥ 

बहुरि कर्मन हेर लगे, चिंत ब्याकुल होइ  । 
निसदिन ज्ञापित पत्र  लखे, कभु कोइ कबहु कोइ ॥ 
तत्पश्चात प्रियतम उद्धिग्न स्वरूप में कार्य ढूंढने लगे  । वह नित्य प्रति दिवस विभिन्न प्रकार के ज्ञापन पत्र का पर दृष्टि रखते ॥ 

शनिवार, ०७ जून, २ ० १ ४                                                                                                       

एकु निजि बिद्या गह दिए ज्ञापन । चहहि कछुक जन हुँत अध्यापन ॥ 
पढ़त करे याचन अरु जोगे । अस पुनि पाठन करम निजोगे ॥ 
एक निजी विद्या निकेतन ने ज्ञापन दिया । अध्यापन कार्य हेतु कुछ अधयापकों की आवश्यकता है ॥ उसे पढ़कर उस पद हेतु अभ्यर्थना की इस प्रकार वह पुनश्च अध्यापन कार्य इन नियोजित हो गए ॥ 

दुइ पुरनई चयने एकु भृते । वाके श्रम भूति हस्त न कृते ॥ 
सोइ पदक पूरन परिहारे । पिया मुख धुनी  कहि अनुसारे ॥ 
दोनों पुरानी वृत्ति में से एक वृति का चयन किया । उस चयनित वृत्ति का प्राश्रयक फिर उन्होंने फिर हस्तगत नहीं किया । प्रियतम के कहे हुवे शब्दों के अनुसार उस पद को उन्होंने पूर्णत: त्याग दिया ॥ 

जेतक परिहरु पद भृति लहहीँ । नवल नियोजन  तेतहि गहही ।। 
कहुँ  पुतिका कहुँ पिता पढ़ाई । कहुँ जनित्र भवन लागन दाईं ॥ 
जितनी हस्त सिद्ध त्यागित पद से प्राप्त होती थी । नए नियोजन में भी लगभग उतनी ही सिद्धि धार्य होती थी ॥ कहीं  पुत्रिका की पढ़ाई कहीं उसके पिता की पढ़ाई । कहीं जन्मस्थान में क्रय किये हुवे भवन के ऋण शोधन अंश का व्यय । 

पेट लपेट गह भाटक हुँते । नहि नहि कृत रहि ब्ययहु बहुँते ॥ 
जनमन सन पूरन परिबारा । धन सोंह तोष तहँ दुःख हारा ॥ 
 पेट के लपेट के लिए कहीं गृह-भाटक के लिए, नहीं नहीं करते भी धन अधिक व्यय हो  रहा था ॥ संतान धन के संग जहां परिवार पूर्ण हो ऐहिक सुखों के साधन भूत द्रव्यों के प्रति संतोष के भाव हों वहाँ दुःख  पराजित हो जाता है ॥ 

तथापि कबहु बधु के मति, पथ यह अभिमत आए । 
को सत्कृत को हेतु बिनु, जिउन बिरथा सिराए ॥  
तथापि वधु का मनो-मस्तिष्क की सरणी में इस मत विचरण करता कि किसी सत्कृत एवं हेतु से रहित, उत्तम देह साधन के सह यह जीवन व्यर्थ में समाप्त हो रहा है ॥ 

रविवार, ०८ जून, २०१४                                                                                                              

प्रियतम लेखि मृषा सम पुंजी  । रसना कोष अधर  कर कुंजी ॥ 
प्रिया कहति बनु लाह निकाई । बरतौ तिन  करत कृपनाई ॥ 
प्राण कान्त के लिए मृषा  पूंजी के सरिस थी । अधर को कुंजी किए जिह्वा ही उस पूंजी की कोष थी ॥ प्राण प्रिया  कहती यह बिना लाभ का आगार है । इसे कृपणता पूर्वक व्यय करना चाहिए ॥ 

अधुनातन जे भू संसारा । जेतक  अवगहु तेत अपारा ॥ 
पहिले जग जन सिरु धरि ज्ञाने । सद कृत गुन गन किए सनमाने ॥ 
अद्यावधि में इस भूलोक में जितना बुढो यह उतनी ही अपार है अर्थात ससे पार नहीं पाया जा सकता । पूर्वकाल के सांसारिक लोग ज्ञान को सिरोधार्य कर सदकृत एवं सद्गुणों के समूह का सम्मान करते थे ॥ 

अजहुँ कुचालि चलन मह आहिहि  । सत दुत्कारत झूठ सराहहिं ॥ 
जहां जुगत जुगता कूप झाँखे  । फलाराम भाखन फल लाखे ॥ 
तुम किस धरती पर हो, इस समय तो दुराचरण का चलन है । यहां सत्य दुत्कारा जाता है असत्य प्रशंसित होता है । यहां  सद्युक्तियां  एवं योग्यता द्वार द्वार भटकती हैं । फलों का उत्पादक किसान फल को ही  तरसता है ॥ ॥ 

कपट बेस बयसनी कुपंथा । कुबिचारी लेखे  मह ग्रन्था ॥ 
दुरा चरन के बहि जहँ नाला । चीन्ह नहि तहँ कौन ब्याला ॥ 
कपट वेशी (अर्थात जिनकी कथनी में राम और करनी में छुरी है ),व्यसनी, दूषित विचारी दुष्ट यहां नियम-निबंधित करते हैं, रावण मर्यादा निर्धारित करता है ॥ जहां दुराचरण का परनाला बहता हो । वहां  शठ दुष्ट एवं हिंसक जंतुओं में भेद करना कठिन है ॥ 

 मतिबत  सठ सठ कह कह मतिबंता । तहँ सबहि नाउ सौधौ संता ॥ 
जीव जग सबहि जन अपराधी । जोइ गहे गए सो भए आधी ॥ 

जहां मतिवन्त  डकैत एवं डकैत मतिवन्त कहलाते हों वहां सभी साधू-संत कहलाते हैं अत: तुम किसी को दुराचारी मत कहो ॥ इस जीव-जगत में सभी अपराधी हैं काल सभी को दंडित करता है । जो जीते जी पकड़ा गया वह बंधक है ॥ 

जाके कोष अधिकाधिक, गाहे मृषा के जोग । 
ते हुँत सबहि  बिषय सुलभ, सब साधन संजोग ॥    
जिसके जिह्वा कोष ने जितना  अधिक असत्य -धन संजोया हुवा  है । उस हेतु सुख के सभी साधनों का संयोग होते हुवे भोग के सभी विषय सुलभ हैं ॥ 

सोमवार, ०९ जून, २०१४                                                                                                 

छुधा तीस छादन ओहारे । इहिं लग ग्यान सीउँ तुहारे ।। 
कस काम लहे कस धन जोगेँ । कस छत छादन असन सँजोगें ॥ 
क्षुधा, तृष्णा, छादनाच्छादन तुम्हारे ज्ञान की परिधि यहीं तक है । कार्य किस प्रकार प्राप्त  किया जाता है जीवन धन किस प्रकार अर्जित किया जाता है भोेजनाच्छादन किस प्रकार एकत्र किया जाता है ॥  

दुअरि बहिर् कहुँ चरन  न दानै । सो तिय जग प्रपंच का जानै ॥ 
सदा चरन चर जो सत भाखे । होत भेखारि कन कन लाखे ॥ 
जिसके चरण द्वार स बाहिर कहीं पड़े नहीं वह स्त्री जग किए प्रपंच को क्या जाने ॥ संचरण का व्रत करकके जो सत्यभाषी होता है वह भिक्षुक होकर कण कण को जोगता है ॥ 

मानहि जग धन वंत  कुलीना । भोग बादि हिन  कह जग दीना ॥ 
सो घर सोई सुघर समाजे । जहँ सुख के सब साधन  भ्राजे ॥ 
यह जीव-जगत  धनवंत को ही कुलीन कहता है ॥ भोग वादिता का तिरस्कार   करने वाले यहाँ अकिंचन कहलाते हैं ॥ वह घर वह समाज ही सुरूप है जहाँ आमोद के सभी साधन सुशोभित हों ॥ 

भोग बिषय जिन भवन बिलासे । तहँ आदर सन्मान निबासे ॥ 
जे धन सम्पद कहँ सो आही । केहि सोंह जे को बूझत नाहीं ॥ 
उपभोग के सभी विषय जिन भवनों मन क्रीड़ा करते हों वहां आदर एवं सन्मान निवास करता है ॥ श्रम तो सभी करते हैं ये सिद्धियां प्राप्त करने हेतु  धन कहाँ से आया (पेड़ से पेड़ से ) कहीं गोले फोड़े ? या देश बेच दिया ? अथवा उसकी धरती बेच दी या पूरी रेल जला के आया ।यह किसी से पूछा नहीं जाता । 

पाखन वाद बिनसि सत पंथा । तिन्हते लुपुत होहि सद ग्रंथा ॥ 
सत भाखिनि जे सत्कृत प्रबचन । कान करज दिए कह तिन भाषन ॥ 
इन पाखंडी विचारों के प्रसार ने सत्य के पंथ का नाश कर दियाहै इसने ही सद्ग्रन्थ विलुप्त कर दिए हैं अत: पथ रहित पथिक कैसा ॥  सत्य विभाषण और यह सत्कृत का प्रवचनों को लोग कान में उंगली देकर कोरा भाषण कहते हैं ॥ 

जे अधुनातम जुग  इहाँ , बिनै जोग अपमान । 
ब्याल काल कलुष संग, पूजत इहँ अभिमान ।। 
यह अधुनातन युग है यहां विनयी अपमान का अधकारी होता है । दुष्ट, हिंसक, धृष्ट, पापाचारी के संग यहां अहंकार की पूजा होती है ॥ 

मंगलवार, १० जून, २०१४                                                                                         

ते समउ पिय रूप लखि कैसे । बिकल हीन मनि फनिधर जैसे ।। 
बहियर हाँ में हाँ मेलाई । अबर रहेहि न कोउ उपाई ॥ 
उस समय प्रियतम कैसे दर्श रहे थे । जस मणि के वियोग में सर्प विचलित होता है ॥ वधु हाँ में हाँ ही मिलाती गई और कोई चारा भी नहीं था ॥ 

कारन कि अस जुगता  न जोगी । कोउ कार कृत बन सहजोगी ॥ 
घर दसा न रहि ऐसिउ तापर ।  रुगनित पुत हस्त धरे आँचर ॥ 
कारण कि उसकी ऐसे योग्यता नहीं जुटाई थी जिसके सह वह कुछ कार्य कर श्रमधन से गृह संचालन में प्रियतम  सहयोगी बने ॥ इर उसपर घर की ऐसी नहीं थी पुत्र अपस्मार रोग से ग्रस्त था उसे प्रतिक्षण ममता की  आवश्यकता थी ॥ 

अहइ दोष आपुनि मन माही । नित निस दिवस बिषय नउ चाही ॥ 
बासन अभरन रसवर भोजन । सुठि सुठि छादन सुठि सुठि साधन ॥ 
दूजे अपने ही चित्त में जब दोष है उसे णतीय प्रतिदिन नए नए विषयों की अभिलाषा रहती है ॥ वस्त्रोभूषण के संग रवार भोजन सुन्दर सुन्दर गृह छाया और बाहर बढ़िया -बढ़िया -साधन-वाहन-कानन- चाहिए ॥ 

धनिमन स्वजन धनी समाजे । भोग बिषय जहँ घर घर साजे ॥ 
तिनके सोंह दुर अनख जगाएँ । पूरनित लाहन लाग लगाएँ ॥ 
जब स्वजन धनवंत हों और समाज भी धनी हो झा भोग विषय घर घर में शोभा प्राप्त कर रहे हों ॥ तब उनके संग एक  दुर्स्पर्धा होने लगती है । तब अभिलाषाओं को पूर्ण करने हेतु घर घर में जुझाऊ बाजे बजने लगते हैं ॥ 

अतिसय जीवन धन संग, भोग बिषय की चाह । 
मृषा भाष बिनु कपट के, पूरन होहिहि नाह ॥ 
जीवन की आधार भूत आवश्यकताओं को अधिकाधिक करते हुवे फिर भोग विषयों की चाह । यह सब मृषा वाद एवं छल-कपट एवं अपराध किए बिना पूर्ण नहीं हो सकती ॥ 

बुधवार, ११ जून, २०१४                                                                                                          

सबते प्रथमक आपन पेखे  । पुनि पिय संग दुजन उर देखे ॥ 
तापुनि आपुनि आप सुधारौ । तदनन्तर दुज  दोष निकारौ ॥ 
प्रथमतस स्वयं को देखना चाहिए  फिर प्रियतम के सह दूसरों के भीतर झांकना चाहिए ॥ तत्पश्चात स्वयं का   सुधारीकरण करन कर फिर दूसरों के दोष निकलना चाहिए ॥ 

रोचिस रोचन रूप सलौना । चह सिंगारी साज सजौना । 
कहुँ भूषन बर भेस लुभावै  । सौरन सँवरन नारि सुभावै ॥ 
यह प्रकट होती हुई शोभा,प्रिय लगने वाला सलोना रूप,श्रृंगार प्रसाधनों युक्त होकर श्रृंगारित होने की चाह करता है ॥ कहीं उत्तम आभूषण कही बढ़िया बढ़िया वेशभूषा लुभाती हैं । सारांश यह है कि सजना-सँवरना नारी का स्वभाव ही है ॥ 

हस्त रस्मि गाहे रथ नीके ।  लिखे आप जो आपनि लीके ॥ 
चारु चरण सन सनलग बाही । तेहिं रसमइ असनहु त चाही ॥ 
जब हस्त  सुसुन्दर रथ की रश्मियाँ ग्रहण किये हो । जो अपना पंथ अपनी मर्यादा स्वयं लिख रहा हो ॥ जिसके कुमकुम से युक्त चरण हों जिसमें उत्तम अश्व बंधे हों । तब ऐसे रथवाही को रसमयी भोजन भी तो चाहिए ॥ 

छतर चँवर धर तिलकित भाला । चहही बासन सुठि सुख साला ॥ 
नारि संग गहि एहि कठिनाई । बिषय बिरति एहि जाति न भाई ॥ 
और जब वह छत्र एवं चँवर तिलकित भाल जैसे उत्तम चिन्हों से युक्त हो   तो उसे एक उत्तम रथ शाला भी चाहिए, वो खोली में थोड़े खड़े होएगा ॥ नारी  के संग यही समस्या है, यह ऐसी जाति है जिसे विषयों की विरक्ति नहीं भाती ॥ 

का गहे अरु का परित्यागें ।सबहि बिषय मनभावन लागे ॥ 
भेस भरन जग बहुस बढ़ाई । गह परिबारु सदन सुखदाई ॥ 
वह क्या तो स्वीकारे क्या त्यागे । उसे तो सभी विषय मनभावन लगते हैं ॥ मायावयी वेशभूषा से सज्जित कुल का , परिवार का, सुखदाई सदन से युक्त जीवन का जगत में बड़ा सम्मान है ॥ 

जगज जगज जननी सिया चरित्र  जो नर सिरुधारि । 
कहि गए बुध होहिहि सोहि अवसहि प्रत्याहारि ॥ 
फिर क्या करें ?  विद्वान कह गए हैं जो नारी जगजजननी माता सीता के सद्चरित्र को सिरोधार्य करती है । ऐसी नारी  अवश्य ही विषयों के बंधन से विमुक्त रहेगी ॥ 


बृहस्पतिवार, १२ जून, २०१४                                                                                               

बिषय भोग तैं नर नागर के । नेम बंध को निगदै वाके ॥ 
राम चरन चित किए भाव रमाई। जथा जोग बिषअन परिहाई ॥ 
पुरुषों में  विषय भोग की प्रवृत्ती का क्या ? उसके नियम बंधनों की कौन कहे ? ईश्वर के चरणों में चित्त लगाके उसकी भक्ती में नियग्न होकर पुरुषों को विषयों का यथा-योग्य परित्याग करना चाहिए ॥ 

जद्यपि मैं  अनभल अपराधी । भै  मम  कारन सकल उपाधी ॥ 
जे बिपलौ पिय कृतकर जोही  । गेह गृहस  के हुतेहि होही  ॥ 
यद्यपि मैं भलमानस नहीं हूँ अपराधी हूँ । पिछले जितने उपद्रव हुवे हैं वह मेरे ही कारण  हुवे हैं ॥ जो प्रियतम के द्वारा विप्लव हुवा है वह घर-गृहस्थी  संचालन हेतु हुवा है ॥ 

ब्ययई के त बहुत उपाया । ब्यसनी को पार न  पाया ॥ 
जेइ खल मल संकुल समाजा । बिलासिता के जान बिराजा  । 
अति व्ययी के तो बहुंत उपाय हैं किन्तु व्यसनी को सुधाना टेडी खीर है ॥ और अब यह दूषित कार्यों में  प्रवृत्त समुदाय एवं समाज जो विलासिता के विमान में विराज कर : -- 

चरनहार बन बिहगेसा । न जान गत को बिदिस बिदेसा ॥ 
छाए जगत बिपलव चहु ओरा । काल धर्म निज देस न थोरा ॥ 
पैरवाला है किन्तु बिहगेस बना फिरता है । जाने किस दुरदिशा में किस विदेश में विचरता है ॥ अब विधाता जीव-जगत इन यदि कोई नव निरूपण करेंगे तो पंख वाले मनुष्य ही निरूपित करेंगे ॥ । अधुनातन जगत में चारों िशाओं में विप्लव छाया हुवा है । दूषित प्रवृत्ति अपने देश में किंचित नहीं है ॥ 

भव सागर गन अवगुन सोधै । जो अबयब बाहिर जग बोधे ॥ 
भयउ गगन मन मेघ बिचारे । बरखन को भू जोग निहारे ॥   
इस संसार रूपी सागर ने गुण एवं अवगुण दोनों ग्रहण किये हैं । जिन अवयवों से बाह्य-जगत का बोध होता है । वे इसका शोधन करते हैं ॥ इस चिद घन गगन में विचार मेघ बने हुवे हैं और वर्षं हेतु किसी सुदेश की प्रतीक्षा में हैं ॥ 

मानस चरन नदी नग धारे । पलक पाँखि रत  गगन बिहारे ॥ 
ऐसेउ चिंतन ब्ययगाढ़े । ज्ञान कोष सम्पद नित बाढ़े ॥  
मनो-मस्तिष्क के चरण आदि एव पर्वतों पर धरकर पलक के पंक्षी गगन विहारने मन रत रहते ॥  इस प्रकार चिंतन में निमग्न हुई वधु के ज्ञान कोष की संपदा नित्य बढ़ती गई  ॥ 

 जिग्यास अधीना, अस बन मीना ज्ञान सिंधु अवगाहे । 
मनसौकस मन जग सब साधन तापर थाह न लाहै ॥ 
कहुँ सुख आधारा, सुधित सुखारा, मानस जग बिरचे । 
जहाँ धर्माचारी, चिंतन हारी, जीवन प्रपाथ प्रपचे ॥  

आपुनि दुआरि धाम  राज किए कछू काज किए,। 
॥ 
प्रतिछन मननसील रहे 
शुकवार, १३ जून, २०१४                                                                                                       

का असाँच अहहीं का साँचे । को काल मलिन को छल राँचे ॥ 
को खल बादए को कल बाँचे । को कोटि कोटि को पै पाँचे ॥ 

परखनबैया हंस सुभावा । अजहुँ चित गहि नहीं सो भावा ॥ 
रतन  काच  दुहु एकरस कासे । को हरिनय अरु को संकासे ॥ 

जे दृढ मत अंतर दुहु राखे । गाहे गूहन नयन न लाखे ॥ 
काहे के को उतरु न  देई । अस बहुस पूछ  संचेई ॥ 

निज भीतर जब कलेस कलुखा । यह बाहिर जग भयंकर सुखा ॥ 
भोग प्रबन रत बिषय प्रलोभा । चहे भव भाव सकल जग सोभा ॥ 

अस बधु मन मानस बिहग, तिरत गगन चहुँ ओर । 
भँवरत आ फिरैं तहहिं, पावहि ना को छोर ॥  

शनिवार, १४ जून, २०१४                                                                                                          

बसे  नौ नगर नवल निवासा । सुखद जिउ न  के कृत प्रत्यासा ॥ 
काल माल एक गांठी गूँथे । घरी पुहुप पल पंख बरूथे ॥ 

अर्थ दसा रहि सब बिधि दाहिन । गहे गेह अभाव को नाहिन ॥ 
छिमा दया दम सौच सुभावा । हरी पद रति पर तोष अभावा ॥ 

जिनकी मति भव भोगन माही । जीवन धन जोरत जाहीं ॥ 
तिन हुँत दंपति गह अवनाई । अतिथि गहन होहहि कठिनाई ॥ 

जोग अभोग रोग जब देखे । सकुचित भौ  नक लक बल रेखे ॥ 
आगत पूजत पति कहि देबा । अनागत जुहारत कृत सेबा ॥ 

एक सुठि तनुभव एक भवा, एक सुठि प्रानाधार । 
एक लघु गृह कानन रूप, एक लघुबर संसार ॥ 

 रविवार, १५ जून, २०१४                                                                                                     

बाल लसित सस रथ अवरोही । तनु भवा दस बरिस बय जोही ॥ 
पैह पोषन देह भर बाढ़े । लह लावन रूप धन गाढ़े ॥ 

चाप चरण जस बाजि पखावज । बधे नुपूर रुर खनकै सों रज ॥ 
अधर धुनी हर जब कछु बोले । सुर सपतक लिख नदि पद दोले ॥ 

नौ बरिस बरग मैं अधिरोही ।जोग बुद्धि सह संजुग होही  ।। 
रहे मनस अति बाल प्रबोधन । बे संधि हेतु गहत प्रबोधन ॥ 

सत बरसि तनय  बे कृत कारी । बोध गम बुद्धि कुंठ अधारी ॥ 
बाहि भँवरन पाछिन भागे । उदार धरत कन खेलन लागे ॥ 

दोइ भाँति  के रसायन, अरु इत उत के उपचार । 
अपसमार के रुज माहि , होहिहि अलप सुधार ॥ 





















  

   
   

Monday, May 19, 2014

----- ॥ सोपान पथ १४ ॥ -----

जब निरनय दृढ़चेतस भयऊ । मात पिता पहि प्रीतम गयऊ ।। 
बात करत गत बात बताई । कछु कारन बस हेतु गुँठाई ॥ 
जब प्रवास का निर्णय दृढ़ हो गया । तब प्रियतम माता-पिता के पास गए । बातो बातों में ही उन्हें प्रवास की बात बता दी  । कुछ कारणों से प्रवास के उद्देश्य को छुपाए रखा ॥ 

सुनत गत बचन नयन भर आए । मात उर अंतर कहि नहि जाए ॥ 
कथन करुक पर मन की भोली । एक पलक लग कछु नाहि बोली ॥ 
उन्होंने जैसे ही यह बात सुनी उनके नेत्र जल से भर गए माता के अंतरतम के भाव वर्णनातीत हैं  ।  कथनों से कड़वी किन्तु मन से अबोध माता एक पल को अवाक रह गई ॥ 

 ब्याकुलित पुनि होत अधीर । सोक जनत उर कहि बहु धीरे ॥ 
जाकी सींउँ  आपनी धामा । जान न सो जग दाहिन बामा ॥ 
फिर व्याकुल होते हुवे अधीर स्वरूप में शोक जनित ह्रदय से बहुंत ही धीरे से बोली । जिसकी सीमा अपने घर तक ही सिमित हो वह संसार के दाएं-बाएं को  क्या जाने ॥ 

होए बिधि जो तुहरे नयाऊ । करिए समझ सुत सोइ उपाऊ ॥ 
हमारी काया बिरधा जोही । बे हानि कृत बयोगत् होही ॥ 
जो विधायन तुम्हारे लिए हितकर हों हे पुत्र समझते बुझते हुवे तुम वही उपाय करना । हमारी काया तो वृद्ध अवस्था को प्राप्त हो गई है । आगे और आयु की हानि होगी और यह वयोवृद्ध होती जाएगी ॥ 

चोट चपेट कि को रुज धरहीं । बिना ठोट को जोहन करहीं ॥
लोचन तव दरसन तरसाहीं । सुबारथ  मन सेउ सब चाहीं ॥  
कोई चोट के चपेट में आने  अथवा रोग ग्रस्त हो  बिना तुम्हारे हमारी  देखरेख कौन करेगा ॥ ये नेत्र  पुत्र के दर्शन को भी तरस जाएंगे । यह मन बहुंत ही स्वार्थी है जो अपने सभी पुत्रों की सेवा चाहता है ।। 

-अकुलाइ  मात प्रिय जात, होरत सबहीँ भाँति । 
जात सोंह अवनत सीस, बर मुख मलिनै काँति ॥  
 व्याकुल माता अपने प्रिय पुत्र को सभी भांति से रोकती हैं । किन्तु पुत्र शीश अवनत किए है उसकी मुख की कांटी मलिन स्वरूप हो गई हैं ॥ 

मंगलवार, २० मई, २ ० १ ४                                                                                                             

प्रिय  मात केहि बिधि समुझाई । सिथिर चरन सह पिय बहुराई ॥ 
निज सम्मति सबहि तुलन तोले ।  पहुंचत गेह बधु सोंह बोले ॥ 
प्रिय माता को किसी भांति समझाकर प्रियतम शिथिल चरणों के सह लौटे । अपने प्रवास के विचार को  भली भांति परखते  घर पहुंचे और वधु से बोले ॥ 

जुगाउन सबइ साज समाजू । गवन परन पुर लागहु काजू ॥ 
बरे मुख परम गम्भिरि बानी । सह सम्मत  बधु आयसु मानी ॥ 
कार्य में लग जाओ, पराए नगरी में प्रवास हेतु सभी साज सामग्री एकत्र करो । प्रियतम के मुख ने गंभीर वाणी वरण की हुई थी उनके सम्मति से सहमत होकर वाणी को आज्ञा स्वरूप मानकर : -- 

बहुरि निसदिन भोर मह जागए  । गेहस जोग जमोगन लागए ॥ 
चिन्हत  एक एक सँजुग सँजोवए ।  होइ जोग जो सो सो जोगए ॥ 
प्रतिदिवस भोर ममें ही जागृत हो गृहस्थी की सभी आवश्यक साज-सामग्री एकत्र करती ॥ चिन्हित करते हुवे एक  सामग्री संजोती जो उपयोग के योग्य होता उसे संकलित कर लेती ॥ 

 गमन उदंग पाए संकासू । करत नेह भए बहुस निरासू ।। 
कहत बाल सों रे बड़ भागी । तुहरे गत हम भयउ एकागी ॥ 
प्रतिवेशी को जब प्रस्थान का सन्देश प्राप्त हुवा तब वह बहुंत ही निराश हुवे  एवं  स्नेह करते बालकों से कहने लगे हे रे सौभाग्यशील तुम्हारे जाते ही हम तो एकाकी हो जाएंगे ॥ 

संग करे सुठि हेरत हेली । जे अँगना को करिही केली ।। 
बाटिक बिटप बेलि कुम्लाहीं । जे जावन तो देखि न जाहीं ॥ 
 अपने सुन्दर साथियों का संग किए इस आँगन में अब कौन खेल करेगा । वाटिका के विटप एवं वल्ल्लरियां कुम्हला सी जाएंगी तुम्हारा जाना किसी से देखा नहीं जाएगा ॥ 

कहत पिया सों सब भाँति, सोचत निरनै कारु । 
जामे तुहारे हो भलइ, सोई बात बिचारू ॥   
फिर प्रियतम के सम्मुख होकर कहने लगे सभी भाँती से सोच कर प्रवास का निर्णय कर जो तुम्हारे हित में हो उसी बात पर विचार करो ॥ 

बुधवार, २१ मई, २०१४                                                                                                   

ऐसिहु सम्मति रहि प्रियजन की । सुनि सब की किए आपन मन की ॥ 
गवन पिया पुनि लय प्रभु नामा । देखि अबर पुर एक सुठि धामा ॥ 
प्रियजनों के भी ऐसे ही विचार थे । किन्तु प्रियतम ने सब के विचार सुने और अपने विचार का अनुशरण किया फिर प्रियतम  ईश्वर का नाम स्मरण करते हुवे पराए नगर गए  वहां निवास एक सुन्दर आवास देखा ॥ 

बनत भरैत भवन भरतारे । अगहन भाटक दे दृढ कारे ॥ 
बहुरि सुकुँअरी  सोई देसे । बिद्या निकेतन किए प्रबेसे ॥ 
भाटक वासी बनकर भवन -स्वामी को अग्रिम भाट प्रदाय कर भवन निवास हेतु सुनिश्चित किया ॥ फिर सुकुमारी को उसी देश के विद्या निकेतन में प्रवेश सुनिश्चित किया ॥ 

निबास नगर फिरैं तत्काला । लेइ अधिकोष मह एक आला ।। 
आभूषन सोन सकल धराऊ । आला महही धरे ढकाऊ ॥ 
फिर तत्काल ही निवास नगर लौट कर अधिकोष में एक लघु कोषागार लिया ॥ आभूषण सहित भूमि के पंजीयन पत्र आदि सभी आवश्यक समस्त संचयित धन को उस कोषागार में ही सुरक्षित रख दिया ॥ 

अधिकोष के प्रबंधन करता । धरे धराउन के भए धरता ॥ 
बहुरि एक धूरबाहिनी हेरे  । गेह संजुग  सब जोग सकेरे ।  ॥ 
अधिकोष के प्रबंधन कर्त्ता ही उस धरोहर के  धर्त्ता बने ॥ फिर एक भारवाहक वाहन ढूँडे । गृहस्थी का एकत्रित की गई सभी सामग्री को : -- 

जोगत सारथि भली भाँति  ,  सोइ बाहनी माहि । 
चरत वाके चरन चाँड़ आन नगर पथ लाहि ॥ 
 सारथी ने  साज-सामग्री को भली प्रकार से जोड़कर उस वाहिनी के चरणों को तीव्र गति से संचारित कर पराई नगरी के पथ पर ले गया ॥ 

बृहस्पतिवार, २२ मई, २०१४                                                                                           

बैठ प्रीतम सँग मह गवने । छाँड़त गह संजुग फिरि अवने ॥ 
मात-पिता के प्रनमत पावा । आसिर सिरु जल नयन लहावा ॥ 
प्रियतम साथ में ही बैठ कर गए । और भाटभवन में गृहस्थी साधन को छोड़ लौट आए । फिर माता-पिता के चरणों में प्रणाम किये और शीश पर आशीष एवं नयन में जल प्राप्तकर : - 
  
जोहत पुनि संजोइन सेसा । दे प्रतिबेसी गवन सँदेसा ॥ 

बालकिन्ह सँग चढ़ि रथ माही । अब भवन उठि बिदित कछु नाही ॥ 
पून: शेष सामग्री को संकलित किये  प्रतिवेशी को प्रस्थान का सन्देश देते हुवे बालकों के संग रथारूढ़ हुवे और कब जन्म भूमि से चना-चबेना उठ गया, विदित ही नहीं हुवा ॥ 

चरि प्रजवन रथ चरन प्रपाथा । बिकल धूरि पग लागए साथा ॥ 

नगज नदी तट देउ दुआरू । धरनि धाम धन पुर परिबारू ॥  
रथ वाहिनी के चरण द्रुत गति से लक्ष्य वीथी पर बढे जा रहे थे । धूल कनिका व्याकुल हो चरणों को पकड़े साथ हो ली थीं । पर्वत नदी देवल-द्वार निवास, भूमि, सम्पद, नगरी, परिवार : - 

जहँ जनम जहँ प्रारब्ध जूरे । हरिअरि होइ नयन सोन दूरे ॥ 

बास सोइ जहँ गहसी बासें । न त भए सव मंदिर संकासे ॥ 
जहां जन्म जुड़े था जहां  भाग्य जुड़ा था वह स्थान धीरे धीरे दृष्टि से ओझल हो रहा था । गृह वही हैं जहां गृहाथी बसी हो । अन्यथा वह मंदिर शव मंदिर के सदृश्य है  ॥  

जननी जनित्र  छाँड़ चले, निन्दत आपन आप । 
सोचत जेइ बत दम्पति , उरस भरे परिताप ॥  
जननी को जन्मभूमि को छोड़ जा रहे हैं  स्वयं की निंदा करते हुवे दम्पति का ह्रदय संताप से भरकर इसी विचार में निमग्न था  ॥ 

शुक्रवार, २३ मई, २०१४                                                                                                     

खेह खेड़ बन बाटिक छाँड़त । जूँ जूँ बाहिनि आगिन बाढ़त ॥ 
लागसि जस कहुँ हिय हेराहीं । सुरति बहु पाछि छुटत जाहीं ॥ 
ग्राम, क्षेत्र, वन एवं वाटिकाएं छोड़ते हुवे ज्यों ज्यों रथ वाहिनी आगे बढ़ती ॥ ऐसा गता जैसे कहीं ह्रदय छोड़ आए हैं । उसके सह बहुंत सी स्मृतियाँ भी पीछे छूट गई हैं ॥ 

जुगल उरस अस होहि दुखारे । जस पात कोउ तरु परिहारे ॥ 
छाँड़त पुर बिरहा दव ढाड़े । ताप धरत लोचन घन बाड़े ॥ 
युगल का ह्रदय इस भाँती दुखित था जैसे कोई पत्र अपने वृक्ष को त्याग कर दुखित  होता है ॥ 

पथिक चरन नव नगरी जोगे । करम प्रधान सत्य कहि लोगे ॥ 
सारथी चाँढ़ चरन  संचाए । दिवावसान पूरब पहुँचाए । 

जोरत कर हिचकत लउ लेसे । करें बहुरि नव भवन प्रबेसे ॥ 
बिबिध बसन उपधान तुराईं । कहुँ आसन कहुँ  पलन डसाई ॥ 

 मंदिर देवा मूरत धारी । मंजुल मनि दीपक उजियारी ॥ 
सुभोगमय भोजन भंडारे । बाँध मोच सब साज सँवारे ॥ 

बास  भवन जब नैन उघारी । रैन घिरि छाए अँधियारी ॥ 
अँध्यारिनु बिभावरी घेरे । विभासिनी मुख कांति हेरे ॥ 

दरसे ना कोउ परिचित दूर गगन परिवार । 
देवतीदेव धाम रचित न कहूँ नदी कठार ॥ 

शनिवार, २४ मई, २ ० १ ४                                                                                                       

तिरत कहुँ दरसत न नौका ।  उद्हारिनि न उरत नभौका ।। 
चौपथ पथि  निर्झर गिरिगन । पाए न लोचन को सुख दरसन ॥ 

गहन सांस ले पलक प्रनाई । गहन रैन भइ नयन लगाई ॥ 
जोइ जिउन माह प्रियतम संगे । सोइ निलयन भए सबहि रंगे ॥ 

प्रिया संग प्रिय रहत सुखारी ।  प्रियजन्हि सुरति गइ न बिसारी ॥ 
जब कभू पिय मन करत बिचारी । भ्रात बहिन सह पितु महतारी ॥ 

बालकिन्हि सोन सम्मुख प्रीता । लगन कहत कछु कथा पुनीता ॥ 
जब मन आवइ पर्सन चरने । मात-पिता प्रियजन पहि गवने ॥ 

अस मणिकाम मनोरथ हिना । गाढि परस्पर प्रीत निस दिना ॥ 
एही बिधि दाम्पत्य आन निबासे । पराइ नगरि पराए अबासे ॥ 

आन भए बस चारि दिवस, अरु मन भयउ उचाट । 
सुरताहि निज नगरी के कुञ्ज गली बट हाट॥ 

रविवार, २५ मई, २ ० १ ४                                                                                                         

निकटहि रहै निबास भवन सन । पिआ धीआ के बिदिआ केतन ॥ 
पोथि पंथ धिअ धार एक झोरे । भरे गनबेस गवनइ भोरे ॥ 

पठनसील  निज पितु के नाईं । दोइ पहर पाछिन बहुराई । 
पितु जो दुइ सेउकाए कीन्हि । दोनहु हुँत याचं पत्र दीन्हि ॥ 

लिखे कछुक बिबसता हमारू । ते कर हमहि थानांतर कारू ॥  
सेबक जब मुख भराइ धारे । चरन चाक कृत काज सँवारे ।। 

बिदया गाहन  अस मनि दाने । चन सदमन मन बिपनी जाने ॥ 
श्रमित पिया कहि मोरे भाऊ । अस कुबयबस्था अगन धराऊ ॥  
विद्या ग्रहण करने हेतु जो विद्याधन दिया उसे विद्व्ता हेतु प्रख्यात सदन को व्यापारी मान कर दिया ॥ 


अस नगर परबासँ माहि, लगे बहुतक लागि । 
लागए जैसे हबिर भुक,  गेह धूम धर आगि ॥ 

सोमवार, २६ मई, २०१४                                                                                                      

बहनिहि जोइ धरोहरू राखे । जोग धरत भै अठारि लाखे ॥ 
चारि लाख कंधन कर भारा । देइ पिया बधु कहत उधारा ॥ 

तप ब्रत नेम नीति सब डोलहि । माया पद जब खन खन बोलहि ॥ 
धरम चरन  बेसम अस्थूना । बिपरीत हरिए देवै धूना ॥ 

धरम गर्भ अन्याई लागे । रहे सदा न्याय के सागे ॥ 
सहज जीवन सरलै सुभावा । सनेहिल नयन मन प्रीत भावा ॥ 

काम क्रोध मद लोभ परायन । निर्दय कपटी कुटिल मलायन ॥ 
बयरु अकारन सब काहु सों । जोइ करि हित अनहित ताहु सों ॥ 

बेन चबेन लेन देन, जाके झूठइ झूठ । 
वाके हस्त मुकुल धरे, धाराधर बिनु मूठ ॥  

शनिवार, ३१ मई, २०१४                                                                                                   

एक तौ अपस्मार रुज तापर । भंजित पद पुत परे पलन पर ॥ 
पटिक जनित वके अकुलाई । मात-पिता सों देखि न जाई ॥ 

अधम बुद्धि मुख बानिहि हीना । धरत धुनी उर पीर कही ना ॥ 
राम राम कर जे दिन बीते । एक सुभ दिवा पटिका मोचिते  ॥ 

बदन के बचन धीर बँधाई । कछुक काल पर भल जुग जाही ॥ 
बारहि बार करत अभ्यासा । हरियर कर पद चले सुपासा ॥ 











Friday, May 2, 2014

----- ॥ सोपान पथ १३॥ -----

शुक्रवार, ०२ मई, २ ० १ ४                                                                                         

साँझ बहुरि कर पौन पलौनी  । पाँतिहि  अवतर रैन सलौनी ॥ 
हरि करि केहरि हिरन बिलौनी । बाल बहुरि लय केलि खिलौनी ।। 
अरुण की सेवा-टहल कर साँझ लौट गई । स्वजन वर्ग श्याम सलौनी रैनी के अवतरित होने पर लौटे । बालक वर्ग बन्दर, हाथी, सिंह, हिरन बिलौटने के खेल खिलाङी लेकर लौटे ॥ 

बहुरि भुजा दुहु तनय गहाई । धरि करज धिए पलन पौड़ाई ॥ 
भँवर दिनभर सिथिर भए सोई । छन भर सपन नगर मह खोई ॥ 
भुजांतर में पुत्र को औऱ धीया की उन्गली पकड़ें माता ने उन्हें पालने पर सुलाया । दिनभर से भ्रमणरत वह  फ़िर थक हार कर सो गए । और क्षण भर में ही स्वपनों की नगरी में खो गए ॥ 

बासक बासक बास सजावै । बास बास जुग  सेज रचावै ॥ 
पाँति पिया दे अर्पन लेखी । पयस मयूख मुख दर्पन देखी ॥ 
पटावरण ने शयनागार को सुसज्जित कर रहे हैं । वस्त्र और गंध परस्पर मेल कर सेज रचा रहे हैं ॥  पत्रपर्ण में समर्पण लिख कर प्रियवर को अर्पित कर वधु  चन्द्रमा को ही दर्पंण किये अपना मुख देखने लगी ।। 

 अपलक तक अरु अलक झुकाई । बास सजित पथ पलक बिछाई ॥ 
 देइ पिया पद चाप सुनाई । कंठ हार बन बाहु समाई ॥ 
अपलक निहारते हुवे  नयन पटल पर अलकावली अवनत हो गई । श्रृंगार कर  प्रतिक्षा में  प्रेयषी ने पथ पर पलक पांवड़े बिछा दिए ॥ कि तभी प्रियतम के पद चाप सुनाई दिए, प्रेयषी जिनके कंठ का हार बनकर बाहु मेँ समा गई ॥ 

भरे हरिदै जोइ अनुरागे । आन कुसुम कपोल मह लागे    
प्रात पिया बिन रयन अधूरी । सजनी साँवर के रँग घूरी ॥ 
हृदय में जो अनुराग भरा हुवाँ था वह कसुम-कपोलों में उतर आया ॥  प्रियकांत प्रभात के बिना रैन अधूरी रही । किन्तु  वधु अपने सांवरे के रंग में घुलती चली गई ॥ 

सेज सागर प्रस्तर जर, लिखे तरंग तरंग । 
गाहि गहनई बधु अरु बर, रंगे एक ही रंग ॥   
सेज सागर हो गई, जल आच्छादन हो गया, उसपर तरंग ही तरग उल्लेखित होती गई ॥ जिसमें वधु-वर एक रंग होकर गहरे अवगाहित होते चले ॥   

शनिवार, ०३ मई, २०१४                                                                                                                

 पलक के बाहु नयन समाही ।  निदिरा चली सपन के बाही ॥ 
प्रात संजोगित कर रयन चली । सुम गंध मेल मिल पवन चलीं ॥ 
 पलकों की भुजाओं में नयन का बसेरा हो गया ,सपनो की भुजाओँ में निद्रा समाहित हो गई ॥ प्रभात से अनुरक्त होने रयन प्रभात मेन अनुरक्त होने को रयन चली । कुसुम की कल सुगंध पवन से मेल करने चली ॥ 

 सप्तास्व के रथ पर रोही । प्रभा पल्लबित लावन होहीं ॥ 
 नदी ऊपर चरन धर उतरी ।  तरनिहि सङ्ग तैर तरन चली ॥ 
सप्ताश्व के रथ पर आरोहित हो प्रभा कांत युक्त होकर आउर अधिक लावण्यित हो गई ॥ वह  नदियों के ऊपर चरण रखकर उतरी एवम अपने सूर्यकांत के साथ तैरती हुई उद्धरण हेतु चली ॥ 

रागारुन लिए  रंजन जागे । मंदिर मंजरी रवन लागे ॥ 
लावनई श्री उठि सुधियाई । जगावन सयनई रमन चली ॥ 
राग की अरुणाई लेकर सँगीत जागृत हो गया । मंदिरों में मंजरियाँ रवन करने लगी । इस प्रकार लावण्या श्री भरी भोर मेँ  ही जागृत हो गई । और अपने निद्रामग्न प्रियवर को जगाने की तैयारी करने लगी॥ 

 प्रात पिया पुनि पूजन किन्हे । कि तबहि दूर भास् रवनिन्हे ॥ 
करि सौं मुख पिय हां हाँ कारी । पियाजी के कहनि सुनन चली ॥ 
प्रात: काल में नित्य क्रिया सम्पन्न कर प्रीतम पूजन क्रिया से निवृत्त हुवे ही थे कि तभी चलित  दूरभास रवनमयी हो गया ॥ जिसे अपने सम्मुख किए प्रीयतां हाँ हाँ करते गे । फिर वधु पिया जी की कथनी सुनने में व्यस्त हो गई ॥ 

प्राबिधि के बिदया पीठ , देइ जेहि सनदेस । 
स्नातक उतरु क्रम पाठ, होहिहि पिया प्रबेस ॥   
प्राविधिक के विद्या पीठ  ने उन्हें यह सन्देश दिया कि स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में प्रियतम  का प्रवेश हो गया ॥ 

रविवार, ०४ मई, २० १ ४                                                                                                              

तासु पहिले बधु सोइ तांईं ।  पिया सोंह कछु पूछ बुझाईं ॥ 
कहे पिय अजहुँ मौनइ धरहू । सो संजुग बत बहुरत  कहहू ॥ 
इससे पहले वधु इस सम्बन्ध में प्रियवर से कुछ पूछ परख करती । प्रियतम ने कहा अभी तो मौन ही साधो ।  लौटने पर ही इस सम्बन्ध में हम वार्तालाप करेंगे॥ 

सरन थरी महुँ कर जर पाना । निकसे भँवरन चढ़त बिहाना ॥ 

जान जीबिक जल तल उतारे । नभस नभौकस कलरव कारे ॥ 
शरण स्थली मेन ही जलपान ग्रहण कर, दिन चढ़े सभी पुन: भ्रमण पर निकले । जलयान के आजीविक, यान को जल में  उतार रहे थे  मेन नभस्चर कोलाहल कर रहे थे ॥ 

रबि संगिनि मुख जोबनु जोई । सघित्रित छबि जो पयोनिधि होई ॥ 

 दूरए धुनी जर दिए सुनाई । नियरि तरंग चरन गहि आई ।। 
रवि की संगिनी प्रभा के अपने मुख पर यौवन संजोए 

धरनि आपनी गति सन भौरे।  मीर मुदित मन ले हिलौरे ॥ 
किरनाकर्षन दाण्डिक दानी । जैसे कोउ बिलौरत पानी ॥ 
पृथ्वी अपनी गति से भ्रमणरत थीं । सागर का मन प्रमुदित स्वरुप में हिलोरे ले रहा था । आकर्षण रूप दन्ड समाहित किए किरणो से जेसे कोई उसके जल का मंथन कर रहा था ।।  

अम्बर धरि दिग अन्त की सौहा जोग निहार । 
दरसनार्थी भरि कर, दरसन के सुख सार ॥ 
(उस समय) क्षितिज द्वारा वरण की हुई वेशभूषा की शोभा दर्शन योग्य थी । वह इस शोभा से युक्त होकर दर्शानार्थियों के कर में दर्शन के सुख का सार धर रही थी ॥ 

सोमवार, ०५ मई,  २ ० १ ४                                                                                               

संवत्सर देसाबर आया। मानक मानत जगत मनाया ॥
जोइ दिए जिन्ह रूप उछाई । नउ बछर परे देउ बधाई ॥
यह संवत भारत देश का नहीं था यह परदेश से आया था । जिसे अखिल विश्व, मानक संवत्सर मान कर इसे उत्सव स्वरुप  मनाता है । इसे उसी ने एक उत्साह दिवस का रूप देते हुवे यह कहा कि नव वर्ष के आगमन दिवस पर सभी परस्पर बधाई देवें ॥  

तीज तौहारु सोइ बनावा । जोइ रहे आनंद अभावा ॥
उत्सउ कि रहि हमरिहि बानी । बरस मास हो पग पग आनी ॥
और इसे एक त्यौहार का रूप दिया । जो आनद उत्सवों के वंचित रहा होगा ॥  क्योंकि हमारे देश को तो ऐसे त्याहारों की बानि रही है । वर्ष हो की कोई मास हो यहां पग पग  त्यौहार आते हैं ॥ 

भारत खन की जेइ पाहूमि । उत्सउ महुत्सउ की यह भूमि ॥
कोउ तौहारु जोंग निहारै । इहाँ जोगे आप तौहारे ॥
भारत खंड की यह भूमि उत्सव-महोत्सवों की भूमि है । कोई तो त्योहारों की प्रतीक्षा करता है कि वह कब आए। यहाँ त्यौहार प्रतीक्षाकर  पूछते हैं मैँ कब आऊँ ॥ 

सोइ बछर सब साज सँजोई ।  आगंतुक सरनी  पथ जोई ॥
मनोहारि मनि मञ्जरि  झुरई । अरुनोपल अरुनाए अँगनई ॥
 उसी नव वर्ष के उत्सव हेतु शरणस्थली सभी साज-सजाओं से युक्त होकर अपने अतिथि गन की प्रतिक्षा कर रही थी ॥ मन को हरण करने वाली  मणि कि वल्लरियाँ झूल रही थी जिसके अरुण उपल से सारा प्रांगण  अरुणित हो उठा था ॥ 

बनउनहरु रचइ जेउनारे । आउ भगत कर किएसत्कारे  ॥ 
रचइत रही जो रंगरेला । हमहि बानि सों मेल न मेला ॥     
रसोइये ने रसोई तैयार कर रखी थी । संयोजक सभी की आवभगत करते हुवे स्वागत सत्कार कर रहे थे ॥ जिस प्रकार की रंगरीला रची गई थीं । वह हमारी रंग लीला से मेल नहीं खा रही थी ॥ 

चरत पवन जहँ सींत तरंगे । सीतर रितु हहरत मन रंगे ॥
एक पुर अभरित अगनित बासे । देइ तपन सुख बरत निबासे ॥
वायु शीतल तरंगों को ग्रहण कर प्रवाहित हो रही थी शीत-ऋतु कंपकपाते हुवे मन के रंजन को वर्द्धित कर रही थी ॥ एक और अग्नि अपने संपूर्ण वेश में विराजित थी । जो प्रज्वलित होकर उस शीतल वातावरण मेँ  इस भाँती की तापमयी अनुभुति दे रही थीं ॥ 

हबिर धूम धर हबि रसन, जेसे हबित्र इ होए । 
हित कारी भाव लिए पर, होम करे ना कोए ।। 
जैसे कोई हवित्र मे हविर् धूम्रवरन किये अग्नि प्रज्वलित हो रही हो । किन्तु वह हविरकुंड  कल्याण के भाव से रहित था और वहाँ कोई हवन कर्त्ता भी नहीं  थे  ॥ 

मंगलवार, ०६ मई, २ ० १ ४                                                                                                       

नवल बछर कर मह कर धारे । लाए रैन जग धरा दुआरे ॥ 
 अगुआन आन किए अगुवाई । वादित राग सुभागम गाईं ॥ 
रयन नवल वत्सर के हस्त को हस्त गत किए जगत के द्वार पर ले आई । अगुवानी करने वाले आगे आ कर नव वर्ष की अगुवानी की । वाद्य यन्त्र राग शुभागम् गाने लगे ॥ 

मंगल कारिन भीं सुभावा  देइ परस्पर लोग बधावा॥ 
गगन दुनहु कर नख बलिहारे । कहुँ को करतल  चाँद उतारे ॥  
सब की मंगल- हुवे एक स्वभाव होकर लोग परस्पर बधाई देने लगे । गगन दोनों हाथों से तारे न्यौछवार कर रहा था कहीं किसी हथेली पर चाँद को ही उतार रहा था ॥

अगज-जगज निंदिया कर हारे । नवल केतु लिए भए भिनसारे ॥
नंदन प्रभवत नव नव  नलिने । बरे नव जोबन कमन कलि ने ॥ 
सारा संसार जब नींद से हार गया । तब नई किरणों का संग किए नया सवेरा हुवा ॥ नलिनी नंदन में नए नए  उत्पन्न हो रहे हैं । सुन्दर कलियों ने भी नव युवा हो गई हैं ॥  

फुरित नयन बन बारि सुगंधै । करत कबिबर कबिता प्रबन्धे ॥ 
नील बरन नौ लोहित रंगी । सौम सिंधु गह नवल तरंगी ॥ 
वन वाटिकाएं प्रसन्नचित होकरसुगन्धित हो गई । कविवर कविताओं की रचना करने में व्यस्त हैं ॥ नाइल वर्ण से वर्णित हो नौ लोहित अनुभूति को प्राप्त होकर सौम्य सिंधु नवल तरंगों को ग्रहण किये था ॥ 

नव नव जल चल नव नव नउका । नवल बीथि गत नवल नभउका ।।
नवल नवल नभ नौ अवरेखे । दिब्य दिरिस अर्थी दृग् देखे ॥ 
नव नव जल के तल पर नई नई नौकाएं विहार कर रही थीं नव नव विहंग  नवल वीथी पर गमन कर रहे थे ॥ 
 नवन नभ नव चित्रकारी से युक्त था और दर्शानार्थी के दृग इस दिव्या दृश्य का दर्शन पान कर रहे थे ॥ 

रजस कनिका के कर पर, अरनौ लिखै आलेख । 
रे तटिनी तुँहर पथ यह ह्रदय रहा है देख ॥  
रजस कणिकाओं के हस्त पत्र पर अर्णव ने एक आलेख लिखा हे री नदिया यह व्याकुल ह्रदय तुम्हारी प्रतीक्षा में है ॥ 

 बुधवार, ०७ मई, २ ० १ ४                                                                                                       

जोगनिहार उर प्रीति राखें । जलधि के भाखा जलहि भाखे ॥ 
 उठि स्वजन चरन तट चीन्हि । लावनारनौ निमज्जन कीन्हि ॥ 
 हृदय में प्रीत संजोए हुवे प्रतीक्षारत जलधि की भाषा जल ही जानता है । उस दिन स्वजन समूह के चरण पास के त -रेणु को चिन्हित किए । और उस लावण्यमय जलधि में स्नानं किये ॥ 

करत जल संग कौतुक  केली । बालक गन हेरत निज बेली ॥ 
सोंह रजस तन चरं गहि आए । बाल जल कुण्ड मह धूरियाए ॥ 
बालकसमूह अपने साथियां को हेला दे दे कर जल के संग बहुंत सी लीलाएं करते ॥  उनके इस हेले को सुनकर देह के संग कुछ धूली  कणिकाएं  भी संग चली आई  । बालकों ने  जिसे आश्रय स्थली के निर्मल जल के कुण्ड में दूर किया ॥ 
  ऐसेउ भै दुदिनु के बासा । बहोरि गंतुक आप निबासा ॥ 
फिरैं समउ आनए भूनेसर । दरसत नगरी भँवरे दिनभर ॥ 
इस प्रकार यह दो दिन की यात्रा पूर्ण हुई और सभ गन्तुक अपने-अपने निवास को लौट चले ॥ लौटते समय भुवनेश्वर  नगरी में आकर दुवासभर उस नगरी का भ्रमण करते हुवे उसके दिव्य दर्शन का सुख पाया ॥ 

बसिजहन समदिन दुघरी हौरे । करे भोजन रयनए बहोरे ॥ 
सस केतु गगन उडुगन पिरोए । बधु चितबन् बहु सुमिरन सँजोए ।। 
जहां निवासित समधी के यहां दो गहरी के लिए विश्राम किया । भोजआदि से निवृत होकर रात्रिकाल में ही गंतव्य स्थान को चल पड़े ॥ 

निरव रयन उद्घोष करत, बहिअर के कर कास। 
 देहर बाहिर गिर मिले, जो चलित दूरभास ॥ 
उस शांत रात्रि में वधु के हस्त मुकुल में कसा हुवा चलित दूरभास उद्घोषित हो उठा जो उसे जगन्नाथ -मंदिर के बाहर गिरा हुवा मिला था ॥ 

बृहस्पतिवार, ०८ मई, २ ० १ ४                                                                                             

पाए जहँ सों बाजए निरन्तर । लघुबर खंकन जस घन घन कर ॥ 
कूजै घरि घरि देइ न कानए। पथ गिरि सम्पद आपनि मानए ॥ 

देख धाम हरि सागर सुन्दर । दरसत माया के कौतूहर ॥ 
बास  पुरी मध्यान्हि पैठे  ।  श्रमित भए पथी बैसहि बैसे ॥ 

दोइ दीठ बर बरनन  नाना । पुनीत धाम के करत बखाना ॥ 
सास ससुर जोहारिहि कीन्हि । जथा जोग दायन कर दीन्हि ॥ 

जीवन रथ के रस्मी धारत । अस दम्पत् जग पथ संचारत ॥ 
नाथ दुआरी दुइ छन हौरे । गह आसन दुहु चले बहोरी ॥ 

जगजमोहन नाथ भजन, गाहिहि जोइ सुजान । 
ज्ञान बिज्ञान के बिभूति, तिन्हहि देहि भगवान ॥  

शुक्रवार, ०९ मई, २०१४                                                                                                          

रहि  पिया के रुचि अध्ययन में । स्नातक उतरु उपाधि जोगन मेँ ॥ 
थाइहि सेउकाइ नहि साधा । आन प्रबास अस भइ बाधा ॥ 
 उपाधि के योगवर्द्धन का हेतु किए प्रियतम की रुचि यद्यपि अध्ययन में रही किन्तु उनकी अस्थायी सेवा-नियोजन एवम अन्यत्र प्रवास मार्ग की बाधा बनी हुई थी ॥ ( अब वह बाधा नहीं रही  ) 

ज्ञान पीठ के धानी  जोई । बॉस नगर सन दूरहि होई ।। 
जहाँ लोह पथ गामिनि । भोर चले पैठए दुइ जामिनि ॥ 
( स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम हेतु ) प्राविधिक ज्ञान पीठ जिस धानी में स्थित थी वह निवास नगरी से दूर ही थी । जहां लौह पथ वाहिनी से यदि भोर मेन चले तब वह दुसरे पहर को ही पहुँच सकते थे ॥ 

जब सों  प्रीतम पाए सँदेसा । प्राबिधिक पीठ होइ प्रबेसा ॥ 
कहै बधू पुनि लेय बिचारी । पिय प्रबास के चिन्तन धारी ॥ 
जब से प्रियतम ने प्राविधिक पीठ में प्रवेश का सन्देश प्राप्त हुवा था । तब से वधु  अनुत्तरा प्रवास कि चिन्ता धरे वधु कहती रही इस पर एक बार पुन: विचार कर लो ।  

बिचार बिनु सँजोउन लम्भे । अचरम सिखनई बरस अरंभे ॥ 
कबहु जाए कभु जाइ न जाई । कबहु पयाई तुरत अवाई ॥ 
फिर बिना कोई विचार किए पाठन सामग्री प्राप्त की शीघ्र हि शैक्षणिक वर्ष आरम्भ हो गया ॥ जहां प्रियतम कभी जाते कभी जाते न जाते  वाली नीति अपनाते कभी जाते तो तत्काल ही लौट आते ॥ 

एक कोत जीउति  चिन्तन,  दूजी अध्ययन घारि । 
लागे देहि दोए चरन, करम जोंग चक बारि॥
एक और आजीविका की चिन्ता दुसरी अध्ययन की घर कर ली । देह तो दो ही पैरों वाली थी, उनका  कार्य चक्के वाली देहि के योग्य था ॥ 

शनिवार, १० मई, २ ० १ ४                                                                                                 

उत बधु  परिनेता के प्रेरी । पोथी पुरान के कर ढेरी ॥

जतन पूर्वक जोंग निपुनाइ  । एक अनखौही परीछा दाइ  ॥
उधर वधु परिणेता की प्रेरित करने पर पोथी-पुराण की ढेरी किए थी । जिससे चेष्टापूर्वक निपुणता धारण कर एक प्रतियोगी परीक्षा दायी ॥ 


खेह खेड़ जोगन हारी के । भरन पद राउ पटबारी के ॥ 
राज पात मह ज्ञापन दीन्हि । बहु अभ्यर्थी याचन कीन्हि ॥
गाँव-खेड़े की भूमि का रक्षा करने वाले लेखापाल के पद पूर्ति हेतु राजा  राजपत्र में सूचनाऍ प्रकाशित की  । जिसे देखकर बहुंत से अभ्यर्थियों ने याचना की । 

पढ़इ लिखइ जौ पहलहि जोई । निर्धारित बिषय रही सोई ॥
पूरब पाठत भइ तनि ज्ञानी । पड़त पड़त परिपाटी जानी ॥
जो पढ़ाई पहले से ही पढ़ी हुई थी उसका पाठ्यकम वही था । पूर्व में पाठाभ्यास कर वधु विषय की किंचित विशारद हो गई थी और पढ़ते-पढ़ते पढ़ाई कि परिपाटी का भी ज्ञान हो चला था ॥ 

 करत भयउ परिनाम उजागर । सकल सुफल के नाम उजागर ॥ 
देखे पिया जब बधु के नामा । पाए काम कह रे बिनु कामा ॥
चयनित अभ्यर्थियों के साथ जब परिणाम उजागर हुवा ।  प्रीतम न उन नामों में वधु का नाम देखा तब वह कह उठे हे रे अकर्मण्य् को कर्म मिल गया ॥ 

हर्षातिरेक कहे हे लवनई श्री सरूप । 
दरसाए पत बहु नाम पर, तुहारे एकै अनूप ॥   
और हर्षातिरेक में  कहते चले गए हे लावण्य श्री का स्वरुप । इस परिणाम पुस्तिका में बहुंत से नाम प्रकाशित  हैँ किन्तु तुम्हारा यह एक नाम अभिनव है ॥ 

रविवार, ११ मई, २०१४                                                                                                      

आखर जननी पत बिय बोई । ज्ञानोदक से सींचत सोई ॥ 
प्रफुरत् फूर सुफल फल देखे । होहि पिया हिय हरख बिसेखे ॥  

चैनित किए पतर ब्यौहारी  । साछात करन हूँत हँकारी ॥ 
 सकल उपाधि पाँति कर जोगे । तहवाँ पधारि चयनित लोगे ॥ 

पद हुँत जो जुगता रहि चाही । सोइ बहोरि पूरन न लाही ॥ 
गहे पढ़ सबहि उपाधि साँची । एकै सनगनक के नहि बाँची ॥ 

कठिनइ ते जे अवसर पाई । रे हत भागिन सोइ गवाईं ॥ 
कहत पिया अस  भएउ निरासे । भए बिरथा पाठन अभ्यासे ॥ 

नहि जोगे एकइ उपाधि, कहत बधुरि सकुचाइ ।  
मुँहू भराई रीत सौं, होहि सकल पुरताइ ॥ 

सोमवार, १२ मई, २ ० १ ४                                                                                                    

श्रुत जे बचन क्षोभ मुख छावा । कहे मोहि छल कुसल दिखावा ॥ 
जुगता जग जो मोल बिसाहू ।  रहिहु जग माहि जोग न काहू ॥ 

कोप करत पुनि करक निहारै । धूत धूत कह बहु दुत्कारे ॥ 
दुइ सौ प्रतिभागी मह ऍका । भयउ तुअँ अति प्रबीन प्रबेका ॥ 

तिन मह होहि सनदेह न काहू । श्रम कारत अरु ज्ञान लहाहू ॥ 
आगिन पुनि पुनि परिखा दाहू । लोक सेवा पार कर जाहू ॥ 

जब को नयन ज्ञान छबि छावै । सफलोदर्क अर्क दरसावै ॥ 
 तव लोचन दर्पन मैं देखउ । दृढ़ पाठ हुँत समर्पन देखउँ ॥ 

बहु भाँति के बचन सोंह पिय बरधाए उछाह । 
पर वधु के मनो चितबन्, परि प्रभाउ को नाह ॥    


मंगलवार, १३ मई, २ ० १ ४                                                                                               

जे सेउकाई फेउकाई । साँची कहे हमहि न सुहाई ॥ 
हमरे करम तव गेह जोहे । बालक जनि के अचरा टोहे ॥ 

अबुध तनय अधबुद्धि अहाहीं । जोग रखें जो आपनु नाही ॥ 
देहिहि बास बसाउन  जोगे । खवाए बिनु तो भूखन भोगै ॥ 

भयउ तृषालु ताल जल चाहे । देइ कुलीनस कंठ लहाहे ॥ 
तन बिनु बसन रसन बिनु बानी । अजहुँ त माता बोल न जानी ॥ 

करि जेतक जतन  महतारी । तेतक तात सकै ना कारी ॥ 
अपस्मार के रोग कठोरा । माँगे जननी गोद हिंडोरा ॥ 

मृगनयनी नेह दरस पिय, भयऊ भाउ बिभोर । 
अश्रु कन उतरन चाह किए, सोंह नयन के कोर ॥     

बुधवार, १४ मई, २ ० १ ४                                                                                                    

प्रिया प्रेम मूर्ति उर माही । कहत नयन पिय मुख कहि नाही ।। 
मुखरिते पुनि कंठ कर भारी । पूजन जोग रूप जे नारी ॥ 

भरे बधु हुँत भाव मन जेता । कही न जात लिख्या सों तेता ॥ 
निलयन नंदन नैन प्रफूरे । सोंह नलिन दुइ जल कन झूरे ॥ 

बिपल सम दिनु पलक सम राती । कछुक मास बिरते एहि भाँती ॥ 
पढ़न अबर पुर आवन जाई । समउ नसए अरु बिघनि पढ़ाई ॥ 

एक दिन पाठक बोल पठावा । कहाँ निबास तव पूछ बुझावा ।। 
बासी निलय भेद जब खोले । पीठ नगरि निबासँन बोले ॥ 

गाहे एक कूट सँकेत , गिरा गहन गंभीर । 
प्रियतम सों अवनत नयन, जी जी कहई धीर ॥    

बृहस्पतिवार, १५ मई, २ ० १ ४                                                                                                 

गेह बाहर बहु सोचि बिचारी । सूझे नहि अजहुँ त का कारीं ॥ 
बसथ जसस् सथ बसे बसेरा । पालक छाईं  अपने डेरा ॥ 

गेह उठौनी सहज न होई  आन बसति बसि जान न कोई ॥ 
पुरंतर पुनि दूजे बसेरे । कहँ दरसैं  कहँ गवनत हेरे  ॥ 

रुजित तनय के मुख जब ताके । प्रियं बचन पुनि मात पिता के ॥ 
सिरु कर धार जस धीर धराईं । सुख फुर प्रफुरै दुःख भूराईं ॥ 

जे जग बिदित कह गए बिदुरबर । जननि जनि भुइँ सुरग सों गरिबर ॥ 
बिनहि बोलाइ संकट आई । समाधान सुझई कछु नाई ।। 

एहि जनम निबासा बहस सुपासा  जहां  परिचित आपने । 
 जहँ बरबधु दोई जनमन होई जननि सबहि जात जने ॥ 
जहां सबहि सम्पद बसती सुखप्रद भाइ बंधु सौं हरिदै । 
जहँ खेलन कीन्हि सुरता चीन्हि पथ पथ बालक पन के  ॥ 

जाए न जाए पूछ बुझत, सुबुध स्यान सुजान । 
सबहि अभिप्राइ सँजोवत, आपनि मति मत मान ॥ 

मंगलवार, २७ मई, २०१४                                                                                                 

एकु दिवा बधु जब भरी भोरी । हेतु उषा दुआर पट खोरी ॥ 
देखि देहरी बिपदा ठाढ़ी । धचकत पट घर भीतर बाढ़ी ॥ 

इत उत जित तित फिर तनि बेरी । पास गहन को कण्ठं हेरी ॥ 
बिगलित केस कपट कुट भेसी । धीरहि बैसक चयन प्रबेसी ॥ 

सबहि कोत झाँकत अनुरेखी । तबहि सोंह रुगनित सुत देखी ।। 
बिना अर्थ के बाधा बाधन । चौकि धरि दूरदर्सन साधन ॥ 

कुंठक सुत तिन जस का धारे । परम क्रोध बस पग दे मारे ॥ 
आप काज कर बिपदा भागी । सुत के अंतर पीरा जागी ॥ 

चोट जनित पीर जनमित, रोदन सुन जब मात । 
धाइ आइ धरि भुजंतर, चोटिल सुत के गात ॥ 

बुधवार, २८ मई, २ ० १ ४                                                                                                           

चोटिल सुत मुख रोदन रागी । उलट पग बधु जिउद पहि भागी ।। 
धाइ जब करे घोर चिकारा । पैठी रोग निदान दुआरा ॥ 

टीस धरत बहु तड़फत कलपे । घरी पलक भए भारि बिपल पे ॥ 
चलत बेगि बधु सुनत जे धुनी । चोट चपेट अह गहन अधुनी ॥ 

निरख बैद अंतर चित्ररेखे । जंघास्थि भै दुइ टुक लेखे ॥ 
संधि बंध पटि जोग संहिते । दिए परामर्स बायस क्रृत हिते ।। 

कछु त्रुटि बस जौ होहि न आढी । जस जस बाढ़ी होही गाढ़ी ॥ 
कहत बचन यहु साँतव बँधाए । अजहुँ त सून के बालताए ॥ 

तदपि गहनइ पीर भरी, चोट भए गंभीर । 
बिनु हिडोल राखत होहि सुखकर धीरहि धीर ॥ 

बृहस्पतिवार, २९ मई, २०१४                                                                                                 

भरे नयन जब सुत मुख लाखी । पीर भाव उर आपहि भाखी ॥ 
मंद कंत अस रहि मलिनाई । काल घटा जस निभ नभ छाई ॥ 
भरे नयन से वधु ने जब पुत्र का मुख देखा । तब उसके मुख के भाव ह्रदय की पीड़ा को स्वमेव उद्भाषित कर रहे थे ॥ वह  मंद कान्त हो कर ऐसा मलिन हो गया था जैसे उज्जवलित आकाश में काली घटा छा गई हो ॥ 

बाँध करक दुहु पद पटि जोगे । रुदन कहत हा कोउ बिजोगे ॥ 
बोलति मृदुलित हाँ रे हाँ ललना । झोलावत पलकन के पलना ॥ 
जीवद  ने दोनों पदों को संधि बंध पटिका से कड़कता पूर्वक बाँध दिया था उसका रोदन कह रहा था हां कोई इसे विमुक्त करे ॥ वधु मृदुल स्वरूप में हाँ रे हाँ रे ललना कहे जा रही थी । और पलकों के पालने में उसे झूला कर भुला रही थी ॥ 

तपत उर सिंधु घटा उठावै । नयन धनब करुना  बरखावै ॥ 
देख दसा पीड़ित सुत गाता । होत दुखित भै बिचलित माता ॥ 
दुःख से सन्तापित हृदय रूपी सिंधु से उठती घटा  नयनों के अम्बर से करुणा बरस रही थी । पुत्र की पीड़ित शरीर एवं उसकी दुर्दशा देखकर वधु दुखित होकर व्यथित हो गई ॥ 

बिपद काल यह रे दुर्भागी । किमि कारन बस पिय सों लागी ॥ 
तेहि समउ पितु रहे न संगा । गवाने जाने को नभ गंगा ॥ 
विपदा काल और यह दुर्भाग्य की वह किसी कारण वश प्रीतम से शत्रुता बाँध बैठी ॥ उस समय पुत्र के संग पिता नहीं थे वे इतने बड़े हो गए थे कि किस आकाश गंगा की यात्रा पर थे वधु को ज्ञात ही न था॥ 

दुर्दसा गहि कातर बधु , चरण अघात प्रसंग । 
दौर ठिया जान बिनु पिय देइ सके न उदंग ॥ 
दुर्दशा से ग्रसित निरीह वधु प्रीतम की स्थिति जाने बिना पुत्र के चरण आघात की घटना का समाचार पहुचाने में असमर्थ रही॥ 

शुक्रवार, ३० मई, २ ० १ ४                                                                                                       

अघात उदंत दिए ससुराई । पिय कहँ गवने पूछ बुझाई । 
सास ससुर जे सुचना दयऊ । कछु कारण बस धानी गयऊ ॥ 

संपर्क के साधन न साधे । आन परे जे बिरथा बाधे ॥ 
करत जुगत बहुतहि कठिनाई । पिय पहि सँदेसु पैठाईं ॥ 

पैह सँदेस पुनि सिरुनत अवने । सुत निबासित भवन लिए गवने ॥ 
चारि दिवस हुँत राखेहि भृते । बहुरि जीवद उन्मोचित कृते ॥ 

सोक सन्तापत तेहि समऊ । कोमल चित पिय बिकलित भयऊ ॥ 
कठिनइ बिरतइ सोइ काला । तनय  भाग सुख भयउ अकाला ॥

बधे पटिक पद परे न चैना । न दिवस सुपास नींद न रैना ॥
   
मन माहि प्रबास चिंतन, उत पुत के पद पीर । 
घिरे संकट सों दम्पति, सोच करे धरि धीर ॥