Thursday, June 26, 2025

----- || राग-रंग 48 || -----,

 ---- || राग -मेघमल्हार || -----

आई रे बरखा पवन हिंडोरे,
छनिक छटा दै घट लग घूँघट स्याम घना पट खोरे |
छुद्र घंटिका कटि तट सोहे लाल ललामि हिलोरे ||
सजि नव सपत चाँद सी चमकत, लियो पियहि चितचोरे |
भयो अपलक पलक छबि दरसै लेइ हरिदै हिलोरे |
परसि जूँ पिय त छम छम बोले पाँव परे रमझोरे |
दए भुज हारे रूप निहारे नैन सों नैनन जोरे ||
बूँद बूँद बन तन पै बरसे अधर सुधा रस घोरे |
नेह सनेह की झरी लगाए भिँज्यो रे मन मोरे ||
चरन धरे मन मानस उतरे राजत अधर कपोरे |
गगन सदन सुख सय्या साजी जलज झालरी झौंरे ||
सुहाग भरीं विभाबरि सोभा जो कछु कहौं सो थोरे |
नीझरि सी निसि रिस रिस रीते भयउ रे रतिगर थोरे ||

----- || राग-रंग 47 || -----,

 ----- || राग-भैरवी || -----

बाबूजी मोहे नैहर लीजो बुलाए,

नैन घटा घन बरसन लागै घिर घिर ज्यों सावन आए,
पेम बिबस ठयऊ सनेहु रस जबु दोइ पलक जुड़ाए..,

भेजि दियो करि ह्रदय कठोरे काहु रे देस पराए,
बैनन की ए बूंदि बिदौरि छन छन पग धुनि सुनाए..,

मैं तोरि बगियन केरि कलियन फुरि चुनि पुनि दए बिहाए,
ए री पवन ये मोरि चिठिया बाबुल कर दियो जाए..,

पिय नगरी महुँ सब कहुँ मंगल चारिहुँ पुर भए कुसलाए,
सुक सारिका अहइँ सबु कैसे पिंजर जिन रखिअ पढ़ाए.....

----- || राग-रंग 46 || -----,

 -----|| भाषा एवं बोली | -----

अन्तर भाव केर परकासन | भाषा एकु केवल संसाधन ||

जासहुं अंतर भाव प्रकासा | सो साधन कहिलावहि भाषा ||

लिपि सोंहि संपन्न को साधन | करत भाष परिभाषा पूरन ||

अवधि लिपिहि नहि गई बँधाई | एहि हुँत सो बोली कहलाई ||

ब्याकरन धन कोष समाना | सम्पन होत गहे अधिकाना ||

साहित्य लिपिहि बधे बिचारू | गह भास् साहितिक गरुवारू ||

कोउ भाषा कि बोली कोई | ऊंच पदासन आसित होई ||

एहि आसंदि करत बिख्याता | होतब प्रगति केर प्रदाता ||

सनै सनै भाषा सोंहि बोली दिए निपजाए |

अरु साहित्य रचाए पुनि प्रगति पंथ कहुँ पाए ||

भावार्थ : - भाषा भावाभिव्यक्ति हेतु साधन मात्र है | भाषा वह साधन है जिससे अंतर भाव की अभिव्यक्ति सम्भव हुई | भावाभिव्यक्ति का कोई साधन लिपि से संपन्न होकर ही भाषा की परिभाषा को पूर्ण करता है | अवधि की लिपि नहीं है इस हेतु यह एक बोली है | व्याकरण भाषाओं की सम्पदा है यह सम्पदा कोष जिस भाषा में जितना अधिक होता है वह उतनी समृद्ध होती है | लिपिबद्ध विचार ही साहित्य है, साहित्यिक गौरव को प्राप्त होकर कोई भाषा अथवा बोली उच्च पद पर अभिषिक्त होती है यह अभिषिक्तता उसे जगत में प्रसद्धि व् उन्नति प्रदान करती है | भाषाओँ से ही शनै:शनै: बोलियों की व्युत्पत्ति हुई और साहित्य रचना से यह उन्नति को प्राप्त हुई…..

----- || राग-रंग 45 || -----,

 ----- || राग-बहार || -----

एक बार कछुक निबासिहि, बसे रहे एक गाँव |

बहति रहि नदिआ कलकल जहँ तरुवर की छाँव || १ ||

एक बार एक गाँव में कुछ निवास करते थे वहां पेड़ों की गहनों छाँव तले कलकल करती नदिया बहती थी |

लाल पील हरि नारंगी नान्हि नान्हि चीड़ |

चहक चहक सुठि धुनि करति बसबासत निज नीड़ | २ ||

लाल पिली हरी नारंगी रंग की छोटी छोटी चिढ़िया भी अपने नीड़ में निवासित रहते हुवे चहक चहक कर सुन्दर ध्वनि किया करती थी |

एक निबासिहि तिन्ह माहि निर्मम गहे सुभाए |

हिंस रूचि होत एक दिबस मारन तिन्हनि धाए | ३ |

उनमें से एक निवासी का स्वभाव नितांत निर्मम था हिंसा में उद्यत हुवा एक दिन वह उनकी ह्त्या करने के लिए दौड़ा |

पाहि पाहि कहि बिलोकति कातर नयन निहारि |

सुनि अबरु निबासिहि जबहि चिरियन केरि पुकारि || ४ ||

कातर दृष्टि से उसे निहार कर वह चिड़िया बचाओ बचाओ की पुकार करने लगी | एक दूसरे निवासी ने उसकी करुण पुकार सुनी |

करुनामय संत हरिदै गै तुर ता संकास |

छाँड़ि छाँड़ि पुकारि करत तुरत छड़ाइसि पास || ५ ||

तो वह करुणामयी संत हृदय तत्काल उसके पास गए और छोडो छोडो की पुकार कर उस चिड़ियाँ को निर्दयी के पाश से विमुक्त करा लिया |

दोइ दिवस पाछे दुनहु दरसिहि तरुबर तीर |

राखिहि को को मार चढ़ि परिचिहि अस तहँ भीर || ६ ||

दो दिवस व्यतीत होने के पश्चात दोनों ही एक वृक्ष के नीचे दिखाई दिए | रक्षा किसने की और कौन उसकी हत्या करने हेतु कौन उद्यत हुवा यह जनमानस की भीड़ ने उसे इस प्रकार पहचाना |

देखु देखु चिडि राखिया ब्रह्मन कहँ पुकारि |

देखु रे चिडिमारु ओहि ए कह नाउ सहुँ धारि || ७ ||

देखो देखो वो रहा चिढ़िपाल, उस चिढ़ियाओं के रक्षक ब्राह्मण कहकर कहकर पुकारा | देखो उस चिड़ीमार को ऐसा कहते हुवे हत्या को आतुर हुवे निवासी के नाम संगत चिड़ीमार या बहेलिया संलग्न कर पुकारने लगे |

रखिया कहत पुकारेसि रखे जोइ सो नीड़ |

कन उपजाए तिन्ह गई बनिज कहत सो भीड़ || ८ ||

अब एक और दयालु उस नीड़ की रक्षा करने लगा उसे छत्रधारी रक्षक कहकर पुकारा जाने लगा | जिसने उस चिड़िया को कण देकर उसके भोजन का प्रबंध किया उसे वाणिज्यिक कहकर पुकारने लगे |

तासोंहि कछु दूरदेस रहिअब अरु एक गाँउ |

दरस चिढि तहँ सबहि कहैं धरु धरु मारु रु खाउ || ९ ||

से कुछ दूरी पर एक दूसरे देस का गाँव था वहां देखकर सभी ने कहा पकड़ो ! पकड़ो ! मारो और खा जाओ |

तिन्ह माहि रहिअब कोइ रखिता न राखनहारु |

नहि को कन निपजावना सबहि भयउ चिढि मारु || १० ||

भावार्थ : - उस गाँव में न तो किसी न चिड़िया को बचाया न उसके नीड़ की ही रक्षा की और न किसी ने कण उपजाया | वहां सभी लोग चिड़ियाओं को मारकर खाने वाले कहलाए |

करत करत अस गाँव भित जाति पाति निपजाइ |

सबहि मारनहार जहाँ रहे तासु बिहुनाइ || ११ ||

इस प्रकार धर्मतस जन ग्रामों के अंतस से कर्म पके आधार पर जातियों का प्रादुर्भाव हुवा जहाँ सभी मारने वाले स्वभाव के हुवे वह मानव वर्ग की इस जातिगत विशेषता से वंचित रहे |

----- || राग-रंग 44 || -----,

 ----- || राग-दरबार ||-----

ऐ घटाओं तुम्हेँ और निखरना होगा,

बनके काजल मेरी आँखों में सँवरना होगा,

ऐ समंदर मेरे हृदय की धरती से उठो.,

बूँद बनकर तुम्हेँ पलकों से उतरना होगा..,

जिसके होठों की सरगम हूँ शहनाई हूँ..,

कहे रो रो के वो बाबुल अब मैं पराई हूँ.....

Wednesday, June 18, 2025

----- || राग-रंग 42 || -----,

युद्ध की विभीषिका में आयुधो की चिंघाड़ l 

धृष्टता का द्वंद्ध दृश्य धमाकों की दहाड़ ॥

 

चट्टानों के चीथड़े उड़ उड़के गिर पड़े ll 

गिरा कहीं धड़ धड़ा के धड़ाके से पहाड़ ll 


क्रूरता की ज्वाल छन छटक सामने अड़े । 

थर थर्रा के झाँकते झाड़ो के झंझाड़ ॥ 


विध्वंशिका के ध्वस्तिचर्य धड़े लिए खड़े । 

हृदय विदीर्ण धड़कनें धड़कती धाड़ धाड़ ॥ 


तड़फड़ाते ध्वजी पर क्रुद्ध दंष्ट्रि आ गड़े । 

चीखती घृणा का घोष धड़े से दो उखाड़ ॥ 


देही देही दग्ध व्रण मनुजता रक्तसार । 

नाड़ियों से लिपटे हुए जीर्ण शीर्ण हाड़ ॥ 


भग्न होके यत्र तत्र भाग उठी भगदड़े | 

भड़काके भड़ भड़ाके खड़ा चिता का भाड़ ॥ 


खड़ खड़ाती खड्ग धार से चिंगारियां झड़े । 

तुंड दंड व्यूह बढ़े , मंडलकों को फाड़ ॥ 


हृदय का एक प्रांत था सौम्य शील शांत । 

लगा कंठ फड़फड़ाते नीड़ का एक निवाड़ ॥


Monday, June 16, 2025

----- || राग-रंग 41 || -----,

 तोरी कुंज गली बिनसाए रे, सम्हारो रे साँवरिआ..... 

सम्हारो रे साँवरिआ रखधारो रे साँवरिआ.....


गोरखपुर ते आया जोगी गोरख वैकें धँधे,

रँग भवन करे रँगरलिआ, पड़ माया के फँदे....


पीले पँजे से डर दिखलाए रे सम्हारो रे साँवरिआ... ..

राग रंग मे डुबकी लगाए,तन बैरागी चैला । 
मल मल साबुन तन उजियारा मन मटियारा मैला....

हढ धर्मि का जोग लगाए वो सम्हारो रे साँवरिआ .....


कपट भेष भर रे नगर फिरे वह ढोंगी पाखंडी,
लाज वाज सिर धरे टोकरी,बैठा बेचे मंडी.....

मानत ना वो कोई उपाए रे मनवारो रे साँवरिआ.....

गली गली जोगी फिरे चाहे जो रख लेय | 
ये सेवक ताहि के जो मोल कहे सो देय ||