Monday, September 16, 2013

----- ॥ सूक्ति के मणि 16 || -----

भए काल दुरघटना घटीते । जे कोइ चतुर दस पख बीते ॥ 
एक बार जननी सदन सिधाए । दिन बिहाए पिय बहुरि ना आए ॥ 

 लाल लवन लोचन जलरासी । पात पलक पट पटल पलासी ॥ 
चकचौहन लइ भइ अबला सी । पिय मयंक मुख दरस पियासी ॥ 

पहिले लागी पुनि अनुरागी । प्रेम पात्र पत पेयुख पागी ॥ 
आपन पत आपन कर कारू । जस कारज तस पदक पधारू ॥ 

करत करत भै दिन दुइ चारे । एकै अंक दिसि दसम दिहारे ॥ 
बुद्धि घटिते घटि सेउकाई । लाग लगावत किए अलगाई ॥ 

फिर फिरी चौंक चौबारी । प्रति नउ नबल निनादे दुआरी ॥
परिखन प्रति चरन पट उघारी । बार बार रयनै बन बारी ॥  

बनउ ना हार बन उनहारे । बनउना हार ? बन उन हाँ रे ॥ 
बनाबनहार बनाब न हारे । बना बनहार बना बन हारे ॥ 

जोहत रैनी जर जर रोवत दीप मुरझाए पिया नहि आए ।  
रीतइ रबि रथ गह बन पथ सँदेस सुनाए पिया नहि आए ॥ 
कुंज बलय बेली मंडित पत कलिक मुसुकाए पिया नहि आए । 
अगोरत नैन हिय लोन लगत दिबस बहुराए पिया नहि आए ॥ 

लागे चाहे बिलगाए, लगे रहे पर भाउ । 
कभु लगाए कभु अलगाए, भाउ के एहि सुभाउ ॥ 

मंगलवार, १७ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                             

परगसे परब बार तिहारे । आन ढाड़ि सोंइ गह दुआरे ॥ 
बयस गह गृहस जान न जाने । पयनइ जस पायस पनियाने ॥ 

बिगरी बनाउ जस सुभ लाहा । सोचै बधू अस करुँ मैं काहा ॥ 
पुनि गृह बन पथ गवन गुहारे  । ना रे कहत कातर निहारे ॥ 

मानस मति मत हंस बिहारे । आपन आहिं कहत हा हाँ रे ॥ 
अहंकार कर करत अहमिके । हितहुत न हुँते अह एव मति के ॥ 

आप निद्रा दोउ बत पर आइ । एक मन महा महि एक मनुसाए ॥ 
आपनपो बधु हार बिहाई । मनुहारनइ नीति अपनाई ॥ 

अपनय आपा छाँड़ के, ले गवनइ ससुराइ । 
दुचंद निमेष ढाड़ि के, प्रियतम लेइ अवाइ ॥ 

बुधवार, १८ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                              

प्रियंवदा वादन बल देईं । भार गृहस के कर धरि लेईं ॥  
तिरछ नैन के सैन सहारे । सजन सलौने के सिरु धारे ॥ 

घर घन बर मंदर मुनि मौने । ररिहत रहि तनि द्रव दै द्रौने ॥ 
पंगुल पद लै पिय असहाई । दीन दसा तिन देख दुखाईं ॥ 

गवनै तब पितु पालक पाहीं । कहतएँ बूझे गृह कठिनाई ॥ 
तिन कर रहि कारज बहुतेरे ।  पानि करम फल लाह घनेरे ॥ 

लहि बार बिदया भए सेउकाए । परिहरु सब रहु मोरे सहाए ॥ 
बियाह पर रहि पितु के एहि ररना । बहुरि बहुरि पियबर मुख रहि ना ॥ 

दिवस श्राम रत निद्रा बियोगे । बहु श्रम पर बिदया कर जोगें ॥ 
तव पन पनपे तव गह पानी । बेषम पथ करमन कँह बानी ॥ 

पर जे पुत पातेबहुल, ते पितु के किन काम । 
ऐसेउ पिय मति मत लिए, बहुरे बसिते धाम ॥  

गुरूवार, १९ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                              

लोही लल जस लाहत लाहे । कामिन मन जस कामिनि चाहे ॥ 
क्रोधि चाह जस कलह कलेषा । पिय मोहित तस धन लउ लेषा ॥ 
जैसे लोभी  लाभ हेतु लालायित रहता है; कामी, कामिनी की कामना करता है । जैसे क्रोधी कलह और क्लेष की जुगत में रहता है, वैसे ही प्रियतम मोह स्वरूप में किंचित धन की चाह लिए हुवे थे ॥ 

बिदिया उपाधि धरि गुरुबर कर । पीठ भाज मंडलक ब्यवहर ॥ 
बहु श्रम पर तेइ मनि लाहे । दोउ जुगल ते अधार बिहाहे ॥ 
श्रेष्ठ विद्यालयों में,श्रेष्ठ पुस्तकालयों के सहयोग से, विद्वान गुरुजनों से शिक्षित होकर, व्यवसायिक विद्या की उपाधि ग्रहण की । यह विद्याधन बहुंत ही श्रम पूर्वक अर्जित किया गया था । जो वर वधु के विवाह का आधार बना ॥ 
  
इत गह बित्त बिजोगन जोगे । जोग रहत रहि जुगल बिजोगे ॥ 
रही बैदक भै बिदिया रोगी । राउ राज के कुकरम भोगी ॥ 
इधर गृह धन व्यवस्था की प्रतीक्षा में था, उधर योग्यता रहते हुवे भी दोनों युगल अयोग्य घोषित थे ॥ जो विद्या भिषक थी, वह रोग बन गई थी, और शासक के शासन की अराजकता को भुगत रही थी ॥ 

अंजन रंज न नयन न रंगे ?। अंज न रंज न नयन निरंगे ?॥ 
मोद मुदित जब रहि मन अंगे । दिवस रयनि रय रयन प्रसंगे ॥ 
यदि काजल न हो तो क्या नयन नहीं रंगेंगे । कमल या अमृत में रंग नहीं है  तो क्या वह फीके कहलाएंगे । उसी प्रकार यदि हर्ष और प्रसन्नता मन के अवयव हों तो, दिवस एवं रयन में अनुरक्ति सदैव व्याप्त होगी ॥ 

कंचन कन धाम धन के, लाह करे न तिहार । 
जे मुद मुदित चितबन के, रहि नित पंथ निहार ॥  
पर्व त्यौहार, न तो स्वर्ण कणों की , न ही धन संपत्ति की लालसा करते हैं । वे तो सदैव प्रसन्नचित ह्रदय दृष्टि की प्रतीक्षा में रहते हैं ॥ 

शुक्रवार, २ ० सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                    

पहिल परब बर बधु अगवाईं । नउ नकत नौ कनिका जिवाईं ॥ 
अपर दिवस दसहेरा भेरी । हेर हेर घर घर दिए हेरी ॥ 

गाँउ नगरि गढ़ देस दुआरी । लोकित करत आइ देवारी ॥ 
दीप कली बल बरत अधारी । दीपत अलकत अलि उजियारी ॥ 

नौ घर भित उत थंब सहारे । बेषम करमन धरि ढलियारे ॥ 
अंस रासि कर पावन चाहीं । बार बधूटी पर धरि नाहीं ॥ 

बधु बर बहनइ माँग निहारी । दिए सपेम दुइ अंस उबारी ॥ 
इत जुग दम्पत कर रिन गाहीं । एक तरि एक चढ़ि भए उन्हाहीं ॥ 

उत बर चित्र कर तनि कन जोरे । लाइ धरे बधु के कर कोरे ॥ 
जे रहि सिरु संकट तत्काला । परिहरि दोनौ तेइ बियाला ॥ 

सद्गुन सरूप राम कर दुर्गुन रावन मारि  । 
तमोध्न हर सकल घर ज्ञान दीप उजयारि ॥ 

शनिवार,२१ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                                    

रचित दिवस सन रैन रचेता । जड़त जगत सन जीव सचेता ॥ 
तापन सन सुख कंद रचाईं । धीर धरन सन रचि अधिराईं ॥ 

कंत केत ससि मुख मसि मलिने । सागर सेत सूर वलि वलिने ॥ 
पुनित करम सन कारज कारे । बिष दायत दै अमरित धारे ॥ 

ऊँच नीच सन भाव अभावा । जीउ जात सन जनम बिहावा ॥ 
जल भूषन जल जलत ज्वाला । धरा गगन सन रचि भवजाला ॥ 

सकल कोष कल कर परितोषे । जीउ उद्धरन गुन सह दोषे ॥ 
मानाख मति दे ज्ञान बिबेके । तिन सह गुन गह ले एकइ एकै ॥ 

जब लाह चेतस चेते न, तब लग मति भरमाएँ । 
गुन धरमन दोष दूषन, जग जन परख न पाएँ ॥ 

रविवार, २२ सितम्बर, २०१३                                                                                                  

जुगलहु रहि जन जगत समाना । बाहिर मनु मन भित भगवाना ॥ 
जिउ पथ संचारल कल काई । धरे रहि न को लकुटी माई ॥ 

रहहि न को साधन सोते । नाहि खलिहान जा जिन जोतें ॥ 
रहि न कोउ मुदरा बनबारी । लेइ तोर धन झोरिहि घारी ॥ 

मितहारिन ब्रत संजम नेमा । ते साधन कर धरे सपेमा ॥ 
दंभ मान मद करम निषेधा । लोभ लोलुप किए न मतभेदा ॥ 

जिन के सह को अहित न कारे । जिन संतति मन मोह बिकारे ॥ 
दुइ सन ब्यसन रहि न एकहू । रहि मति तेइ ज्ञान बिबेकहू ॥ 

मानख मटिया मूरती, बिधि खात रूप कार । 
चारि दिवस के खेलना, मति कुंजी आधार ॥ 

जग जारत जोत सरूप, अरु मनु देह पतंग । 
जनमत भँवरत जर मरे, अंत काल तिन संग ॥   

सोमवार, २ ३ सितम्बर २०१३                                                                                                

पिया रहहि तिन बिषय प्रबीने । प्राबिधिक जे बिदिया लीने ॥ 
बहुरि एकु बिदिया महा पीठे । पाठन हुँत दिए याचन चीठे ॥ 

जोख जोगता गुरुबर लोगे । अंस कालिन निजोजित जोगे ॥
जेतक काल खंड करि कारें । तेतक कर्मन धन कर धारें ॥ 

कार करन ते भए कुसलाईं । कारत रहि जब रहि न बिहाईं ॥ 
पाठिन नउ पर पीठ पुरातन । पाठइ अलि क्रम आठ न आठन ॥  

पनाधार जे कर्मना बँधे । गह चारन ते केरि प्रबँधे ॥ 
उत नव निर्मित नवल निवासे । चौपत ऊपर बहुस बिलासे ॥ 

लगे नयन पत पंथ निहारे । इत करतल पत कुंजी धारे ॥ 
गवन भवन देहरि सिरु नाईं । दरसत खन खन अति सुख पाईं ॥ 

दरसत नयन कछ दुआर, धारत हरिदे हेत । 
कहूँ परस कहुँ धरत कर, पुलकैं दम्पत सेत ॥   

मंगलवार, २४ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                          

भवनानी एक भवन अनन्ता । भए दम्पत तिन अर्धन कंता ॥ 
अजहुँते अर्धन भाव चुकाईं । ते कारन दुइ अध् पद पाईं ॥ 

सेष रासि रस लहि दस भागे । एक एकंक दस बरस बिभागे ॥ 
भाज भीरे सहस कुल तीसा । भाउ गाँठ करि हरुबन सीसा ॥ 

भाऊ पर जे बँधे बियाजे । भार भूत बर तेइ बिराजे ॥ 
कहत पिया बधु निज मति मंते । जे भवन मूल लह श्री वंते ॥ 

भाविन दिन जे नगरि हमारी । भाव भवन भू बर्धन धारीं ॥ 
धारे धन ब्यय करहु थोरे । भूमि भवन मह लागत जोरें ॥  


तेइ बेर बोले न मुख, बॉलत रहि पिय ज्ञान ।  
भावानुभाव संचरत, मति गति भासत भान ॥  

बुध /गुरु  ,२५/२६ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                       

अचर जात मुख बोल न धारें । बाल कुसल तइ धुनी निकारें ॥ 
चित चेतस रा राज रस रोधें । बाल मानस सब बोध प्रबोधें ॥ 

बुध प्रबुद्ध कबि बर बिद्वाने । पसु पाखिं के भाख न जाने ॥ 
बालक भए बहु भाव प्रधाने । तिनके चित सब भाखन भाने ॥ 

पात फूर फर तरुबर बेरी । पाथर मिले त धर कर खेरी ॥ 
करत बात कछु झूरन लोले । जल खन खन पौ पवनहू बोले ॥ 

चारु चरन चर बाल कुँवारी । नवल भवन भू चौसहूँ धारी ॥ 
कलि मन कोमल अमल अबोधे । असन बसन बर भवन न बोधे ॥ 

बास्तु पौरूख कल्पन कारे । घर जस मानख अंग दुवारे । 
करत बात भित इत उत डोले । जब धर भवन नयन पट खोले ॥ 

दूर दिसा दस दिरिस दरसाए । दमके धूप कहूँ छाया छाए ॥ 
नभो चाष कहूँ चमक चमकाए । चरत बिहंगे पाख फैराए ॥ 

छादन धारे छत छतनारे बिटप मंडप मंडिते । 
दरसन कारे नयन उघारे भूबन भवन बन भिते ॥ 
कूलिनि कूला मंत्र उचारे मंदिर भीत पण्डिते । 
मसजिद मुल्ला कहूँ गुर द्वारे कहूँ घंटा घर घंटिते ॥  

नन्दिन नादी नन्द निनादी नदी नदी न दीन नदने । 
धिन धिन धवनित धीदा तरि थित इत तित तरिता तरने ॥ 
दोउ कूल दल केलत कल कल सुर सप्तक कंप करे । 
कल भूषन जल बेली बल बल राग रंग रवन बरे ॥ 

दूज कगारे राज अगारे  करपानि कीर्ति करे । 
निभ नभ परसत दृग दिसि दरसत सिखा चिन्ह चाक धरे ॥ 
ताल हटी ठिया कर्पर कुटिया सन सन भुइं भवन भरे । 
धूमित द्वार घर धुर ऊपर धूम ध्वजा पथ बरे ॥ 

धूरे दिसि धर चौहट सुन्दर सुबट रुचि रचना रचे । 
नगरी नागर चारु चरन चर रथ बरुथिन्ह चरिते ॥ 
तिर तरु बृंदे लखित अलिंदे, मनु को तपस्वी खरे । 
सिख सिख साखा ज्ञान बिसाखा जनु पत फर फूर फरे ॥ 

भूयस भूषित भेष, भीत भीत कृत कल केस ।  
चंचल नवल निमेष, सकल सदन निभ नयन नए ॥  

  शुक्रवार, २७, सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                        

हाट बाट बनि बाँधत जोरे । भूति भुगत दिन कर दिन बोरे ॥ 
दिब्य बसन मनि लाल लपेटे । अम्बर डम्बर सैल समेटे  ॥ 

दरस भवन इत जुगल बहोरी । साँझ धरे कर काजर घोरी ।। 
गृह पुरान जब चरनन धारी । घार नयन रुप रयनी धारी ॥ 

नभ गामिन जे दरसन दीना । बहुरि मगन तिन भयउ बिहीना ॥  गवन सदन मुख भोग निवासे । धावन पर प्रिय भूषन बासे ॥ 

भोजन पर निसि सायन निबासे । कहत पिया बदनन निस्बासे ॥ 
दुचंद दिनमल औरु बिहावइ । त हमरे लगन पञ्च बरस लइ ॥ 

जीवन न जान कितै छन, अहोरी अरु बहोरि । 
कोउ हरिदे लवन देइ, को सुख औषध जोरि ॥ 

शनिवार,२८ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                               

कहत पिया उपरांत बिहाइ । घटित घटना बधु सुध सुरताए ॥ 
नयन फलक फिर फेर बंधाईं । छाया गह एक एक छबि छाई ॥ 

आइ लगन पर जब ससुराई । बहु प्रियकर सुन्दर बर पाई ॥ 
प्रीत करम धन रीतिहि राखे । दिए बर्द्धन प्रिया हरि लाखे ॥ 

बिहा पर छह दिनमल बिहाई । जनम जनयिता सुराग सिधाई ॥ 
जननी जात गर्भ गहियाई । पाछिं एक सुन्दर सुत जन्माई ॥ 

जनमे सुत हत भागन लिन्हें । रोग गहन दुःख दारुन दिन्हें ॥ 
रोग लखन को बैद न चिन्हे । गवने बहिर सुत अंक लिन्हे ॥ 

सकल रोग हूँत जगत लग, रहि औषध उपचार । 
आह पर लाल संजूत, भई न कौनो ढार ॥ 

रविवार,२९ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                               

एक दिन दिनकर गगन निकासे । त्ते उत्कासन किरण चकासे ॥ 
बधु मुख लिए बहु रुदन रुआँसे । उत्किरत कहि आज न कासे ॥ 

तिस रायनी ले अंतिम साँसे । रुसत मात पुत पितु बन बासे ॥ 
बहियर बहुरइ चाँद चढ़ाई । गर्भ धान लखि रुप धिय आई ॥ 

गात सममति जननी निवासे । जोउ सँजोवत दुसर घर बासे ॥ 
तँह पुरत भए गर्भन काला । जन्मी ससि मुख मंजुल बाला ॥ 

बारह मास भए धिय जनियाए । ऊरु फलक ले तात भंजाए ॥ 
सब सेवा पास पदक गवाईं । बय करत भवन पट पद पाईं ॥ 

बिते जीवन फेरि फेर, दरसे दृग दौ रूप । 
नन्द सोक घन नीर लिए, सुख छाईं दुःख धूप ॥  

सोमवार, ३० सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                                

अब आगिन का होवनहारी । अग्वान्हि सुख कौन दुखारी ॥ 
दुखित रयन सुख दीपक बारें । कहत सजन सुख दुःख न बिसारें ॥ 

बसित बास भू भाटक भारहिं  । सिरु दम्पत अति अल्पत धारहिं॥  
रहि एक पुर पितु घर ससुराई । लगी न लागत आवन जाई ॥

ज्ञान भवन के पठन पड़ाही । अजहूँत सिरु नहि धिया धराही ॥ 
रहहि गृहस ते बिषय ब्यय कर । तनिक हूँत असन बसन पलक भर ।। 

लगे रोग न लगे औषधाए । असं बसन धरि सरल सुभाए ॥ 
रहि न गज को रथ हय कारी । पर देइ दिब्य दरस दुआरी ।।  

दुइ पद रथ एक कुटुम बिहीना । चारु चरत जब भोजन दीना ॥ 
तिन बिबरन सह जे धन राधे । सकल आय ब्ययन रहि आधे ॥ 

कह कहबत बधु प्रान पत, चरण चरत चतुराइ । 
एसु जीवन चरत रहत त,सकल भाग चुक जाइ ॥   


  

   



Sunday, September 1, 2013

----- ॥ सूक्ति के मणि 15।। -----

रवि/सोम ०१/०२ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                       

मति सरनइ गवनइ अंतरिका । भइ तनमइ ले तरंग तरिका ॥ 
चरि घरि कोमलि चरन धरिते । प्रियबर के मुख बचन मुखरिते ॥ 

निज मति किए पुनि पुरुख बढ़ाई । धन सम्पद बिनु सुत न सुहाई ॥ 
सुत लालस लख लोचन लाहे  । होहहि भाल जातक जन्माहे ॥ 

सोहनि सुतिका एक घर आहीं । भए ग्लानि मोरे सुत नाहीं ॥ 
दुःख सुख निज पिय कहत सुनाईं । सुनत बधू मुख मौन धराईं ॥ 

कछु प्रियतम कहि कछु बहिनाई । कछु पुर प्रिय जन कछु ससुराईं ॥ 
जाए समुदाए सबहि समिझाएँ । ते मत बधु  के मति गति चराए ॥ 

तरस बरस दस घर बर भाई । ते पर जात जनी भोजाईं ॥ 
पुनि लघु मन जनिमन तरसे । लाग लगन बे भए दस बरसे ॥ 

भइ बधु गर्भन परिखन  राजी । कनिआ भ्रुन भै  पतन समाजी ॥ 
ते उदंत जब करनन पाईं । आए धाए बधु  के लघु भाईं ॥ 

कहत बचन करि कंठन भारी। गर्भ धरि तो पत काहु कारीं ॥ 
बोल बरन बार याचन घारे । सुनौ कठिन कर बचन हमारे ॥ 

गर्भ धरें तौ पालें पोषें । मास पूरतन पंथ जोखें ॥ 
जात जने रहि तुहरे ठौरे । जाता धारहु मोरएँ झोरे ॥ 

श्रुत बधु बर अरु बोलएँ भाईं । तेइ  बखत कछु कही न पाईं ॥ 
भयउ बात कह भाए बहोरे। बहुरि बारात पर बखतएँ थोरे ॥ 

दिए जे सुभ संदेस सुनाई । गर्भ धान किए लघु भौजाईं ॥ 
तरनि सरनि पथ पाछिन छोरे । जब पिय धर कंधन झकझोरे ॥ 

निर्झरि नीर झर झलके , हृदय उपल नग भीर । 
हरिएँ हर हलके हलके , ढलके धीरहि धीर ॥ 

तेइ बखत जुगल दम्पति, दरसै नागन नाग । 
जेइ कर कुकरम कारन, भयउ जगत हत भाग ॥   

मंगलवार, ०३ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                               

नगर बीथि बट हाट बिहारत । गवनु चरनु बहि बेगिन चारत ॥ 
ऐंठत पैठत बैदु निकाई । सकल अंग भए बैठ बिठाईं ॥  

संधि दोष भल कुसल संधाए । ऊरु पटल नउ पाट बंधाए ॥ 
इस बैदक प्रियबर पद निरखें । उत एक बधु के गर्भन परखें ॥ 

परखन पर कह तनि सकुचाईं । दै सूचन बधु भै कनियाई ॥ 
अयन  नयन पर पलक बिनीते । बहुरि चरन पथ रीतैं रीते ॥ 

पैठ पिय पाहिं दी संदेसे । पिय मुख चिंतन धरि लउ लेसे ॥ 
वधु के मति एहि सोच धराईं । जे भ्रुन हट मम हाथ लिखाईं ॥ 

मोह तमोगुन पिय धरे, नयन तनय अभिलाख । 
रह चितबत बहियार बरे, उर बादर जर पाख ॥ 

बुधवार, ०४ सितम्बर, २ ० १३                                                                                          

ते बैदक पुर दु दिवस होरे। धरे पटिक नउ चरन बहोरे ॥ 
संग ली अरु एक संदेसे । को बिधि जे भल रहहि न लउ लेसे ॥ 

जेहि भयउ भाव बंधन फाँसे । सुरत  तरप जब निकसै साँसे ॥ 
करे दोष जे दूषन कारी । रहे जिउति लग उर पर भारी ॥ 

दोष भाज धरि जेतक भावा । कारित तेतक कार प्रभावा ॥ 
होत जितै दूजन अपकारी । उतै दंड कर करता धारी ॥ 

कहे लेख लिख मनु भगवाना । भ्रून हतन दोष महाना ॥ 
भ्रून हतक के दरसन कारी । अन कन भोजन भए अनहारी ॥

दोष सार गुण जगत समेटे । बयस कोस दुइ चारत भेंटे ॥ 
गुण दोष जेइ चितबन जाने । तेइ जन जगत हंस समाने ॥ 

कहत आखर जननी इत, करत मंतु मत मंथ । 
बोहत बाहि बाहनि उत भँवरत भाँवर पंथ ।। 

गुरूवार, ०५ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                          

धरा बिंदु बिध फेरी फेरे । दिनकर दिन दुइ चंदु सकेरे ॥ 
गर्भ बयस भै दिन सत कोरी । करत पतन तिन बधु कर जोरी ॥ 

पुरुख हृदय भए काठ कठोरे । दोष करत पर हिले न थोरे ॥ 
वासे जनिमन जनन अभावा । रहित माइ के ममत अभावा ॥ 

जनि जनिमन धर पीर बिहाई । जनम जगत जग जननि कहाई ॥ 
नारि ह्रदय भए सिन्धु अगाधे । वाके गाहन कोउ न राधे ॥ 

पाए पीर जन दोनौ माहीं । कारि पतन चह जनमन चाही ॥ 
गर्भ पतन जब भवन प्रबेसे । ते ममता गवने को देसे ॥ 

जग मैं जनक रखक जगत, पाल कहत परिभाख । 
जब निपतितात्मन , जगत भखक अवलाख ॥ 

शुक्रवार,०६ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                                

कार पतन बधू बहोरि धामा । दुइ चारि दिवस केरि बिश्रामा ॥ 
धुत कारत मन देइ दुहाई । लगे जिअत जी बहु कठनाई ॥ 

जिते जी जेइ भाव सकेरे । कार कलेवरात्मन केरे ॥ 
आए काल जब जन्म बिहाई । भाव नुरूप जिउ जोनि पाई ॥ 

सुभ असुभ जेइ कारज करिते । कारनी कारि जग हित अहिते ॥ 
को जग पतिते को उद्धारे । चह निज चह पर रूचित कारे ॥  

कारत जस कारज कर जोरे । बोए बीज जस तस फल तोरे ॥ 
पर जेइ चरन सदपथ चारिहिं । भलइ करत जग करम सुधारिहि ॥ 

काल कलुख कृत करन सँवारत । अगत जगत श्री बर्धन कारत ॥ 
तिन जन के किए कारि न निंदा । कहि गए बुध महा रिसि मुनिदा ॥ 

काम क्रोध मद अरु लोभ, भान ज्ञान के ढाँक । 
चारि ओहार अवतरे, दैं दौनौ मुख हाँक ॥   

शनिवार,०७  सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                           

पाटन पातक उर पर घारे । जोगत पिय बधु लघु धिय धारे ॥ 
नाज साज  लै मूल उधारी । जस तस कर घर गृहस सँभारी ॥ 

दिवस किरन रयनिहि ताम कोरे । बय सन श्रमधन केरि अँकोरे ॥ 
इत कर धन उत बय परिहाई । भरे मूठि मह रज के नाईं ॥ 

चरइ गृहस अब लग निर्बाधे । जोग जोख गिन साधन साधे ॥ 
बिषय राग भै बहस उपाधी । समरथ भंजन साध समाधी ॥ 

होए बुद्धि जब निज सनमाना । दुआरि अखि हिन् भवन समाना ॥ 
काम क्रोध मद लोभ लुभाईं । लहत भवन ते रहत दुराईं ॥ 

ससुर भसुर पितु बहिनै भाईं । तन मन धन ते रहहि सहाईं ॥ 
दुजन देइ घटे न धन घाटे । आपण धन ते पूरत पाटे ॥ 

कभु गति अधिक कभु अनधिक, साँस जस हृदय जोरि । 
अस रहि चरत गृहस रथ, बधु  कर कासित डोरि ॥ 

रविवार, ०८ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                        

बहोरि बैदक के मति मंते । कारत शयन श्राम पर्यंते ॥ 
संधि बंध पटि केरि मोचिते । किए प्रियतम श्रम चरन चारिते ॥ 

धरावतर जब चरनन चिन्हे । चाप चरन चर अंतर किन्हें ।
धरा तरी पल थीर न पाईं । भयउ दुबल ठारन कठिनाई ॥ 

उरस भवन भित भरत उसाँसे । पलक नवान मुख धरत निरासे ॥ 
मौलि मूर्धन जल कन कासे । अबल अचल किए सयन निवासे ॥ 

बहियार बरबस लेइ उठाई । धारत कर तर अधर ठराई ॥ 
भय कर धरकी तुर गत छाँती । ठार बने ना कहु को भाँती ॥ 

ते अवसर कोमलि कारि, बधु मुख बोल उचारि । 
कारत उर भय हिन कारि, चरु तनि धीरजु धारि ॥ 

सोमवार,०९ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                             

ऐसेउ सिरत दिन दुइ चारी । हरियर पिय पादंतर धारी ॥ 
पुनि बधु लिए पिय घर के बारी । चराइ चरनन करत सँभारी ॥ 

चरन प्रदेसन देय बिधाना । देइ उपकरन बैदक नाना ॥ 
ते साधन रहि बहुस सहाई । धरातर धुर चरन के नाईं ॥ 

बार बधूटी करतल कासे । बारम्बाररे किए अभ्यासे ॥ 
लागे चारन थोरहि थोरे । घर भीतर के उपबन ठौरे ॥ 

तेहि पर पद घर बहिर सिधाए । बहियर हरिअर कर धर चराए ॥ 
गवनु चरन जब पार दुआरे । तन के सह मन चरत बिहारे ॥ 


संधि बंध सह चरनन, चितबहु मुकुती पाए ॥ 
घर आँगन पंथ उपबन, सरयु सरन सुख दाए । 

मंगलवार,१० सितम्बर,२०१३                                                                                               

सनै सनै उपकरन परिहाए । आपन आप चरत लैंगराए ॥ 
आहि बार एक मन संदेहे । भंग पद कभु लघुत न लहेहे ॥ 

बहोरि छिनु बिनु एकहु बिआही । गवने डरपत भिषकन पाहीं ॥ 
भिषक दोउ पद मापत जोगे । कहत अस्थि भाल भाँति सँजोगे ॥ 

दोनौ पद एक रुप सम अंके । रहु एक चेतस  परिहरु संके ॥ 
तब प्रियतम के नयन झरोखे । तिलछ करत दम दरसे तोखे ॥ 

लै पुनि पिय उछ बास बिरामा । होरत दुछ्न फिरे जनि धामा ॥ 
पावएँ जब चारन संदेसे । पुर प्रिय जन गृह चरन प्रबेसे ॥ 

बैस अवाईं दरसत पिय,बूझे पद के पीर । 
चरत होत हरवा हरकै, कहि पिय जी के हीर ॥ 

बुधवार, ११ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                             

भली भाँति पद चरत बिहारे । रहहि बिषय ते अचरज कारे ॥ 
करक जुगे पद भंजन कारे । बाहि रुधिरु बिनु चीरत फारे ॥ 

सुधी भिषक भाल जे रहि थाई । जेइ परन पुर बैदु बुझाईं ॥ 
तेइ कोउ बिधि थाह न पाईं । पिय के भाल उपचारन  ताईं ॥ 

भिषक बदन ते पहिलै कथने । जे पद भंजन थंभन जतनै ॥ 
चीर फाड़ कर दंडक जोटें । नहि त रह जहि दुज चरन ते छोटे ॥ 

लेइ सकल पत चित्तर अंतर । पाठ पठन हुँत दूजन हितकर ॥ 
कहत ज्ञानि गुन बैदु निसंके । तव बिराम पर बर एक अंके ॥ 

तत छन बधु बोली मधुर, गवनत रहति पिरान । 
जे न छाड़िते मुख धनुर,कराकस बानी के बान ।।  

गुरूवार, १२ सितम्बर,२०१३                                                                                                

छुटत प्रीतम जवल कन छोरे । तिन तनु अगमनु अगनु अगौरें ॥ 
तुहरे कारन अरु अँधियाईं । बन एकहि एक न देइ दिखाईं ॥ 

गोल मोल भै बोल अगोही । मुहूरत मूँढ़ मारन टोही ॥ 
अगाउनी अगियन बैताला । अगोचर करक सूलक भाला ॥ 

भाव अगूढ़ अगुसर गूठे । तनिक साँच तौ भै तनि झूठे ॥ 
पर प्रिय आगति खरे अगारीं । निपुनत बधु के किए रखबारी ॥ 

आगति दरस पिय भृकुटि काछे । आउ भाउ भै आगिन पाछे  ॥ 
श्रवनत दंपत मुख मधु भासे । बैसे पाहुन लागन हाँसे ॥ 

हंस नाद हँसि धुनी जगाई । पावस पहिलै पय पद नाईं ॥ 
हँस पुहुप दाम पख पद धारे । रचियन भंजन भए प्रस्तारे ॥ 

भंजित शेखर हस्त मुकुलिते । प्रिया पिय चरनन कारित रिते ॥ 

सिरु धरत चरन रमन धूरि कन, फूरि फ़ूरि रसनत रसनाईं । 
रयन कनक कन कर आभूषन, रल्ल मल्ल रवकन रवनाईं॥ 
रह रह सन रहसन सन कन कन, कर रंजन कंगन खनकाईं ॥ 
रहि रहरूढ़भाव ते अभरन, रर रर करि रर्रत ररिहाईं ॥ 

धनवन देव नाथ धनुर, सकल रंग जुग बास । 
दम्पतहु सन करुर मधुर,धरे अनी अनुप्रास ॥   

शुक्रवार, १ ३ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                           

एक तौ चारत पीर धराईं  । बिनु सक बल पिय चरि लँगराईं ॥ 
ता  पर चिंतन धरें पराईं । को औरन को औरन नाईं ॥ 

पहलै चिंतन पेट लपेटे । दूजन भइ लपेट के पेटे ॥ 
तिजन रही कर्पर के छाईं । पुनि पटिया के झगर लराई ॥ 

गेहनी करतब गह सँभारे । धन जुगबन सिरु रहहि न भारे ।। 
जेइ भार गेही सिरु धारे । गह जिन्ह के जोह जुहारे ॥ 

सुधी बुधी लिख लिख उच्छारे । पोषत जग जन पालन हारे ॥ 
नयन पाल जस निमित निहारे । लिखित कबित सन कहित हुँकारे ॥ 

रज रज रचइत बहुस प्रकारे । दाता दिए जग बहु उदगारे ।। 
प्रानि प्रनिधानि करम अधारे । हेरत निज जीवन उद्धारें ।। 

उद्कार्थी हुँत जस उदगारे । कार कठिन कर हेर निकारे ॥ 
कनार्थी तस कर्म दुआरे । हेर हेर कर हेरन हारे ॥ 

नारी चिंतन कछु और, पौरूख चिंतन और । 
बासे दोउ एक निबास, जन्मने एकै ठौर ॥ 

शनिवार, १४ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                               

एक दिन प्रीतम मन का आई । गवनै जनि घर सन बर भाई ॥ 
चरत तुरतइ  ऐसेउ सिधाएँ । चरे बिहंग जस पंख निकसाएँ ॥ 

भाव बिहल बच्छल बिसराईं । जनिजा भुर मन जनि सुरताईं ॥ 
गेह गृहस अस गे छुटकारे । फाँस कोउ जस कंठन घारे ॥ 

चौपत पथ खन बिरहन घेरे । बहियर भइ घर अकै अकेरे ॥ 
बोले मन बोली न घनेरे । बढ़ एक तै एक भूरि बड़ेरे ॥ 

देइ उतरु भर भाव रुआँसे । तुम्हरे उपर रोएँ कि हाँसे ॥ 
प्रियाबर मुख छबि मंकुर राखे । करहु घात गहनए तिन पाखे ॥ 

कह बचन पुनि मन मानी होए । नयनाकर अब कितौ जल जोएँ ॥ 
कमल कुसुम कल कुमुद प्रफूरे । रयन भाव रति दिवस न फ़ूरे ॥ 

श्रवन मन मुख मधुर वचन, दे रद छादन दान । 
पेयुख मयूख वधु वदन, भयउ कान्त मलान ॥ 

रविवार, १५ सितम्बर, २ ० १ ३                                                                                        

लाग लगइ के लगन लगाई । राग जगइ जर नीर बहाई ॥ 
सदरी रैनी जग जग बिताइ । सेज सजन बिनु अंग न सुहाइ ॥ 
बैर करते हुवे झगड़ा लगा दिया फिर अनुराग जागृत कर पश्चाताप करते हुवे आँसू बह रहे हैं ॥ पूरी रात जाग जाग कर बीत रही है और प्रियतम के विरह में सय्या सुहावनी प्रतीत नहीं होती ॥ 
  दिरिस द्वीप करपूर घारे । द्रवीभूत द्रव रतनागारे ॥ 
रतन जोती रे रय रतनाइ। ज्वाल किरन जग लग उजियाइ॥ 

पलक पदुम पिय पंथ निहारे । नीर नुपूर रुर रूसत हारे ॥ 
सैन सदन सन केर सकलाइ  । सेष रहि तिन्ह रैन हेराइ ॥ 

रमनै रवनत रल रमझोरे । बधु बिरहन दुख जान न भोरे ॥ 
भविते बधु भइ भूर गहनाइ । ऐसेउ वचन काहू निकसाइ ॥ 

सुमिरत पिय लै बालक कोरे । बिह्बल उर भरि भाउ विभोरे ॥ 
जर जर काजर नैन बहाई । हाय ढरत सन रैनि सिराई ॥ 

बधु चितबन सुरत ना बन, फिरत फेरी प्रभात । 
तरुबर तूर फूर भरे, बिटप पंथ नउ पात ॥  



 










Friday, August 16, 2013

----- ॥ सूक्ति के मणि 14।। -----

बितत दुइ चारि दिवस बहोरे । लेइ उबकाए बधु एक भोरे ॥ 
बधु समुझत छिनु लागहि नाहीं । कहि मन माह मैं गर्भ धराहीं ॥ 

पलभर हुँत बधुटी बिझुकाई । रहि चितबत सुधि बुध बिसराई ॥ 
होहहिं साँस नीचकिन नीचे / तँह पुनि गहनै अंतर खींचे ॥ 

मलिन बदन बधु दरसत पियाए / बूझत कहि भए सकल कुसलाए ॥ 
पलक नयन असमंजस बासे । बिचित्र रंग मुख रंजन रासे ।। 

बिखरित आखर अधर जुहाने / भाव अर्थ लै जुग मुसुकाने ॥ 
पंच शब्द सूकुति संधाने / मृदुलित कहि हम गर्भा धाने ॥ 

ऐसेउ शब्द श्रवन कै,प्रियतम रहहि अवाक । 
सुस्मित मुख बिस्मै नयन अपलक बधु रहि लाख ॥ 

शनिवार, १७ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                            


भाव प्रबनत बधू भइ रुआँसी । एहि  कहत लेइ मुठिका कासी ।। 

ए कह मुख दुइ  धमुका धारे । जे सब भए किए कार तिहारे ।। 

पुनि रद पद हँसि हंसक घारे । मुख मानस पिय हंस बिहारे ॥ 

कहिं माने हम कारन बारे । थोरइ न तवहु रचना कारे ॥ 

तब बधु के बार बदन अगासे । गहन मलिन चिंतन घन बासे ॥ 

बोली एक संकट तव ताईं । ता पर एक अरु सीस धराईं ॥ 

अब कारें तुहरे सेवकाए । कि धार गर्भ नउ जीउ जनाएँ ॥ 

कभु  को तौ कभु कोउ प्रपंचे । माम जीवन का रचित बिरंचे ॥ 

भयऊ का आपन हाथ, कहत बधु के नाह । 

जैसे मानख आचरन, तैसे समउ के चाह ॥ 

रविवार, १८ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                                 


इहाँ लिखन आखर जुग टेरे । जुगल पीठ भू अवगत केरे ॥ 

दोउ जुगल रहि जेइ समाजे । रीत चरित तँह तेइ बिराजे ।। 

पुर प्रियजन रहि पुत लोभाईं। पुतरी तुल पुत जनम सुहाईं ॥ 

जब जब ते दोनउ अनुहारी । तब तब परि पुत जातक भारी ॥ 

पुतरी गत बत संग पिया के । पुत रहहि सदा मात-पिता के ॥ 

पुत कर अन धन कर्म कमाई। पुतरी जातक भई पराई ॥ 

नारी पौरूख तिर्यक लाखें । ते कर तिनके राखन राखे ॥ 

एहि देसज भए पुरुख प्रधाने । नारि जात कँह भए सनमाने ॥ 

बिटवा के रजस सारत, आपन बंसज रेल । 

बिटिया के गर्भ घारत, दूजन के कुल बेल ॥ 

सोमवार, १ ९ अगस्त, २०१३                                                                                                    


एहि मति सम्मति गहि समुदाई । पियहु तेइ मत जोग मिलाईं ॥ 

बधुटी के तौ मतिहि  भरमाए । पुत जनाए कि पुतिका जन्माए ॥ 

घेरत गहन ज्ञान उजियारे । मति भरमत घन किए अँधियारे ॥ 

जेइ बखत कछु सूझ न पाईं । ते सूझै जौ जग बूझाईं ॥ 

जब लग जीवक जगत जिउताए । तब लग अंतस बहु झुर झुराए ॥ 

पावन जीवन प्रीत प्रतीती । परत निभावन जग के रीती ॥ 

का भए अघ अरु का पुन होहहि । मति भरमै तो कछु नहिं तोहहि ॥ 

तेइ करम कर कारन चाहे । जेइ जीउ धर सुख चर लाहे ॥ 

जीउ बुझौबल बूझत केरे । अवने गवने जन बहुतेरे ॥ 

आवत जो जग दरसन देखे । को निज को पर कुकरम लेखे ॥ 

सोइ लेखनी जगत सुहाई । जोइ लेखनी आप कहाई ॥ 

कुकर्म बहुस होत सरल, बरनन बर्नन आप । 
पर होवत बहुसहि कठिन, कथनत किए निज पाप ॥

मंगलवार, २० अगस्त, २ ० १ ३                                                                                      

एहि बिधि बधु बर जुगत बिबेका । रही सौतुख तीख प्रस्न अनेका ॥ 
सुरसा मुख सों छेक दुआरे । पावन उत्तर पंथ निहारे ॥ 

करत परस्पर संधित साथी । ऊरु फलक जुग जहि भलि भाँती ॥ 
जुगत चरण का लघु बर होहीं । बिकट प्रस्न मति  पूछत जोहीं ॥ 

दूजत बूझत भये अधीरे । का प्रियतम भू चरिहि सुधीरे ॥ 
जे चरिहि तौ कर्म का किन्ही । गृह संचारन कण को दिन्ही॥ 

भए घर ते बिनु घर गोसाईं । कौन ठाँव कँह गृहस बसाईं ॥ 
बहुस  कठिन भै बखतएँ भावइ । होहहि दुखकर बहुस भयावइ ॥ 

जों जों मन सुमिरत आगिन के । तों तों तन हहरत हारिन के ॥ 
पिय संकट अरु गर्भ गहीं कै । बयस भइ जस फंस नागिन के ॥ 

जस सुरसा बाढ़े बदन, करि अतिसय बढ़ खोर । 
तसहि ठहरे जीउ सदन, दुआरि  प्रस्न कठोर ॥ 

बुधवार, २१ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                      

एक चिंता रहि मोले घर के । बूझत मति तिन हरुबर धरके ॥ 
रोचमन नयन कहत कहानी । दिए ऊतरु तर पख के पानी ॥ 

संकट मुख कारत प्रस्नाई । पिया चरन बधु पंथ रचाई ॥ 
जुग धरि जे निधि कर्मन ताईं । ते करि चिंतन तनि लघुताई ॥ 

मित ब्यय करत गृह संचारे । मोले घर दुज अंस उतारे ।।
दंपति चातक गृह भए चंदू । सो संपद बहु देइ अनंदु ।।  

गेहहु उसरत रहि बहु धीरे । बार बधुटीहु रहि न अधीरे ॥ 
एकै बस्तु जे भै सुख दाहीं । नहि त संकट रहि थोर नाहीं ॥ 

कठिन बिषय बय जे बड़ नाईं । लघुतम के तौ का कहि जाई ॥ 

जुगल दंपति जीवन  उत, बिलोकित जल तरंग ॥ 
लेखनी बरन गहत इत, गत रत कहत प्रसंग ॥ 

गुरूवार, २ २ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                         

इत बर के लघु बहिनइ ताई  । लगन धरे दिन लगे अवाई ॥ 
लिखि  बरनत करि लगन पतरिका । नाम धरे बर अरु बहिनहि का ॥ 

मात-पिता सह कँह जन्माईं । दोनौ कुल जन किए बरनाई ॥ 
बार सुन्दर अच्छर किए हेला । पानि गहन करि मंगल बेला ॥ 

अरु बरनत  कहि भँवर लगाईं   । समदन पुर थरि लगन बिठाईं ॥ 
पात पटल बल बरत बलीते । ता पर सुन्दर कलस कलीते ॥ 

प्रथम हुति जन गन अधिनाई ।  पुनि पुरप्रिय जन लिखि हूताईं ॥ 
कृपा करत कहि चरनन चिन्हें । नउ दम्पति निज असीस दिन्हें ॥ 

सकल जोइ कर पाए सुअवसर गुरुजन अयसु सिरु धरे । 
गवने पुर देहरि ससुर भसुर हरि, चरन लगन पत्र उहरे ॥ 
देव निमंत्रण गत भवन भवन, गवन प्रिय परि जन पुरे । 
बोधित श्री मन अवाई लगन बहु याचन करत कर जुरे ॥

लगन लग दिवस उत पिया, धरि बहु उरस उराउ । 
असक कसक परे खटिया, करि हठ गवनु बिहाउ ॥  

शुक्रवार, २ ३ अगस्त,२ ० १ ३                                                                              

हठ पद लगि जब चढ़न पहारी । बढ़ बहियर कर धरत ठहारी ॥  
पपीया कलस करु परिहरु चाहीं । रिरिनत रत कहि नाहीं नाहीं ॥ 

रिर धरि भरक घरि भै रिसहाए । रिरत बधुटी एहि कहत बुझाए ॥ 
चरत बहनु लइ चरन हिलोरे । भयउ बिलग लग जोजित जोरे ॥ 

रलन लगन पिय गवनै ठाने । बधू के कही एकै न माने ॥ 
बहुरि पिहरु जन अरु ससुराई । चित चेतस बर बहु समुझाई ॥ 

कहइ गवनु अरु हठ ना धराहू । बेदउ मन्त्रन  केर मनाहू ॥ 
जे मह रहि जी के  कल्याना । मान भली तेइ बिधि बिधाना ॥ 

पहिलै हठ के परिहरै, लिए मन दूजन माँड़ । 
कह बधु तईं तुम गवनौ, मम सेवापन छाँड़ ॥ 


शनिवार, २ ४ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                    

एहि श्रवनत  बधु सोच जराही । अजहुँ परे पिय सयनइ माही ॥ 
बॉस बसन नित करमन कारें । भोजन जोजन साँझ सकारे ॥ 

जे मैं लगन गवन मेलाहूँ । ते पिया किमि खा अन्हवाहू ॥ 
कहत अंगारि भरके ऐसे । असहै रिसहै मनाउँ कैसे ॥ 

धरि साहस पुनि कहि सिरु नाई । पिय तुम महिम की लग्नाई ॥ 
श्रवनत एहि पिय कहिं रिसिहावत । करकत कह एक दूइ कहावत ॥ 

एकन्ह एक सन धुनी कहेही । रयन सयन माह परे परे ही ॥ 
अरु कहि एही मम आयसु होही । प्रिय लगन बधु नयन जल जोही ॥ 

पुनि कातर बधू नयन निहारे । कहत मृदुल पिय बचन सुखारे ॥ 
बधु होंत कुल बंस सोभाई । मिलन समदन लगन सोहाईं ॥ 

रे प्रान समा मोरि प्रियतमा तनि पिय के कहि लहनौ । 
मरजादा घर लावन श्री कर लगन के लाहन बनौ ॥ 
लगन घरी दिन, कुल बधु के बिन समुदाए जन का कही । 
मानु मम कहिन पुनि दैनंदिन जेइ सुअवसरु न लही ॥

भयउ बिधि बाम बखत एहि, किए मोहे असहाए । 
नहि त रिरत रह न तव सों, गवनै रहहि बिहाए ॥ 

 रविवार, २५ अगस्त, २ ० १ ३                                                                             

तिन अवसरु धरि बदन बिषादू । डरपत पिय परिहरत बिबादू ॥ 
कार सकल प्रियतम के काजू । जथा जोग करि साज समाजू ॥ 

श्रुत भँवरन हुँत नंदनि नादी । अँकबर पितु कर करबर बादी ॥ 
ललित कलित करि कंठ मालिका । अंगुरि धर चरि संग बालिका ॥ 

दोनउ एक संबंधिन संगे । चले मिलन सुभ लगन प्रसंगे ॥ 
चरत दोपहरि साँझ ढराई ॥ चंद्रोदय पूरब पैसाई ॥ 

जा गृह जन सन मेल मिलाई । जे पुर पैसएँ पहिलै ताईं ॥ 
भेस भरे बर लोग लुगाईं । अलिन्दन अँगन भवन बियाईं ॥ 

मंगल कालारंभ अचारहिं । चारत अष्टक बिप्र गुंजारहिं ॥ 
काम धुनी कर कोमल बानी । दै मंगल प्रद मौलिहि पानी ॥ 

भावी जुगल बर दंपति, बरे पंच परिधान ॥ 
तिलक रीति प्रीति पूरत, समदै गह सयान ॥ 

सोमवार, २६ अगस्त , २ ० १ ३                                                                                              

दोउ जामिनी लागि लुभावन । कोउ रागिनी रागि सुरागन ॥ 
बिरति तिलक कारत रतजागे । दूज दिवस किए सगुन सुहागे ॥ 

सोन सुरंगन साजि सिंहासन । एक पुर धुर ऊपर आसन ॥ 
बलि अलि अंबर बर अंबारी । दरस बिपद धर नग नख घारी ॥ 

फूल हार लरि झालरि साजी । भवन बसन बसि भा बर काजी ॥ 
भेरि दुंदुभी ढोल मृदंगे । घन घरजन कर नादित संगे ॥ 

सुर कम्पन कर ग्राम सुहाई । बिरधिन्ह कंठ मंगल गाईं ॥ 
सँवर समधि बार जनेत चढ़ाए । भाइ-बंधु सह जामा जमाए ॥ 

चढ़े रथ बाजि दुंदुभी गाजि रजबर राजि बाहिनी ।  
भेस भरि भ्राजि साजत समाजि पथचर लाजि भामिनी ॥  
जूँ साजि धाजि दामिनी दाजि रूप धर लाजि गामिनी । 
अगुवन बिराजि तारि तर ताजि छितकर छाजि जामिनी ॥ 

दरसत जनेत पख बधू, किए कल नंदत नाद । 
समधी समदनै अस जस, तज दौ दधि मरजाद ॥ 

मंगलवार, २७ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                             

जनेत जन दिव दरसन दिन्हें । नभ मंडल प्रभ मलनइ किन्हें ॥ 
मौली मुकुट कटि कटारि साजे। लोकित बर जस को महराजे ॥ 

बार पख रहि बड़ हरिदै धारे। खान पान कर आप सँभारे ॥ 
बाज गाज सब साज समाजू । करि निज बिधि पर किए बर काजू ॥ 

सुधा सरिस नाना पकवाने । रचित सुरूचित बहुस बिधाने ॥ 
छरस भोग जन केरि बढ़ाई । कहुँ अपरम कहुँ बिधि उपराई ॥ 

मंडल मंडित मंडप देसे । पानि ग्रहन बधु बर उपबेसे ॥ 
भँवरे पुनि कर मह कर राखे । भरे बचन बनि अगनी साखे ॥ 

बरखे सुमन कुँअर कुँअरि , भररि भाँवरि जब सात । 
भए पुलक पाहुन प्रियजन, गहि सों साँवरि रात ॥ 

बुधवार, २८ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                           

दुलहिन बर घर बहियर पाईं ।रितत रयन जन लेइ बिदाई ।। 
बिलगत धिय रोदन करि कैसे । ह्रदय लगत घरि गिरिजा जैसे ॥ 

दान-मान दै बर उपहारे । धिया पिया दुल्हा कर धारे ॥ 
मात-पिता लै दुइ कर जोरीं । रहहि हमरि अजहुँत पत तोरीं ॥ 

नउ मास लगे उदरन घारी । जननि जिन्ह जा जनम जुहारी ॥ 
बिहउत बिहबल सजल निहारी । देइ दान करि झोरिन खारी ॥ 

उत बहुरत रत केत जनेता । इत बहुरन निज नगर निकेता ॥ 
दैं पर दुलहिन पख पहुनाई । जोए सँजोए गवनु हरुवाईं ॥ 

पाछिन परिहरु प्रियतम हेते । बधु चितबन धरि चिंतन चेते ॥ 
निंद मगन  नंदिनी जगाई । जगे प्रात सन जामि बिहाई ॥ 

मान अधि सकल नेगि कर, बियाहु रीति निबेर॥
दान धी  बेगि आप घर, निकसे मुँहू अँधेर ॥ 

गुरूवार, २९ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                           

बिहनै चारत बधु थकि हारी । आवत प्रियबर जोखि सँभारी ॥ 
पूछत कार निज कवन किन्हें । जस तस कहत  पिय उतरु दिन्हें ॥ 

सुरतत बहिनि नयन जल गाढ़े । करत काल घन पलकन बाढ़े ॥ 
बरख परे तब ली उसाँसे । ललकिन रत केसउ पत कासे ॥ 

बूझे उर भर धर तनि सांती । बिदा भइ बहिनइ भली भाँती ॥ 
थकित चिरित बधु कहि किए देहू । जे हमरे कहि पर संदेहू ॥ 

बोलसि कुटिल कटि भृकुटि ऐंचे। कहु त देखाएँ जे चित्र खैंचे ॥ 
तुम तौ बिय बन बरनन पेरू । कहि पिय लड़वन नित हुँत हेरू ॥ 

तुम चह आरती दिवस राती । देइ उतरु बधु बल खाती ॥ 

भाँवरि सात बचन भरे, कहि पिय भए तव नाथ ।
आरती करें चह लरें,  बाँधे बंधन साथ ॥ 

शुक्रवार, ३० अगस्त,  २ ० १ ३                                                                                      

करम सिराई बहिन बिहाई । भयउ मास एक परे सैनाइ॥ 
सीध सयन सइ पीठ लिलाई । बँधे बाहु किए दाहि न बाईं ॥ 

सुहाउ सुभाउ जे रहि अति चारू । रहत घरे बिगरे ब्यबहारू ॥ 
श्रम कर प्रिय अरु कारज हीना । यूँ तरपत जूँ जल बिनु मीना ॥  

नित किरिया तँह तँहहि अन्हाएँ। असन बसन तँह देहिहि धराएँ ॥ 
दरसन गोचर न जग बहिराए । अंग प्रत्यंग सका अठियाएँ ॥ 

हत आहत हरि काल भली करि। आह करत पिय अह अह घरि घरि ॥ 
आहित स्वन बचन बिनयाने । आह्वयन भगवन अह्वाने ॥ 

गिरत परत बिनुधर चरत, ताप धरत दिनु रात । 
राम राम प्रतिपल करत पिय रहिं बखत बितात ॥  

शनिवार, ३१ अगस्त २ ० १ ३                                                                                               

घरे घाउ भरि सका सुधीरे । संधिहि बंधन पर भए ढीरे ।। 
बैदु अहोरन दै तिथि आई । दोइ चारि दिन अवर धराईं ॥ 

तेइ डगर चरि तेइ नगरिया । तेइ चरन पुनि तेइ चरइया॥ 
तेइ बाह पर दूसर बाही । चरे सकल तिन बैदक पाहीं ॥ 

लगे हरन मन दरसन डाहिर । बहुस दिवस पिय निकसे बाहिर ॥ 
चारि चरनि बहि सरनि सुधीरे । भावइ अति मन त्रिबिध समीरे ॥ 

कहुँ नग कहुँ नदि नन्द निनादे । कहुँ बन थरि फर फूरत राधे ॥ 
पिय श्री मुख जे लोकित सांति । बरनन बरन न सक कहुँ भांति॥ 

धरत दृष्टि पिय सुख बृष्टि, परत उरस संतोख । 
पर बधु चित पिछु बहि आगु, चरत रहहि बर चोख॥ 


       
   








Thursday, August 1, 2013

----- ॥ सूक्ति के मणि 13॥ -----

देह पतित पद भू पथ पाथर / बेदन बिध करि तन मन थरथर //
तापर हलहर सीतरताई / अस जस करुबर नीम चढ़ाईं //

तबहि दूर एक बाहन देखे / धावत आवत रहि पद रेखे //
ज्यूँ ज्यूँ नियरे हमरे तेई / त्यूँ त्यूँ कासित कर टेई //

जसहीं हम हत दरसन दिन्हें / ढारत बहि एक कूलक किन्हें //
पूछे तुम्ह कौन हो भाई / आह बयस अस रैन बिहाई //

तब सब घटना बिबरन देईं /  कारत आपन परखन तेईं //
रहहि निकट जे तव बहनोई / तेहि जन तासु परिचित होईं //

अरु सब सदजन पर पहिचाने / उठइ हमहि तुर जनपद लानै //

तहवाँ लेइ दूरभास, बहनुइ देइ उदंत /
हमहि कृतार्थ करत ते आए तुर तुरंत //

शुक्रवार, ०२ अगस्त , २ ० १ ३                                                                                         

भावक अरोग गृह ले गवनै / जहँ मो प्रथम उपचार दवनै //
पाहिले पद अंतर छबि तारे / तब एक काचन पतिका सारे //

भंग अंग मग चारन हारउँ / बार बार मैं जननि गुहारउँ//
अकुल बियाकुल भै मन भारी / भगिनी भावक मोहि सँभारी //

आपन  भाँति कहत समुझाईं / अस छतवत तन रहत लहाईं //
सरीर सेल कलेवर कारौ / बिषादु तज तनि धीरज धारौ //

ते बखत तासु बचन सुहाईं / पीर परत मन धीर धराईं //
लावन पुनि जनि नगरि हरुआए / जोगत परखत बाहिन बिसाए //

ले बाहिता बाहनु के, पद मद्धम गति कार /
जामिनी जाम पइसाए, तुर जनि नगरि दुआर //


शनिवार, ०३ अगस्त , २ ० १ ३                                                                                                  

अस प्रियतम उत्तर पुर भौंरे / बरतमान जग अवतर पौरे //
तत पर भए मुखरित मुख मौने / जस पग फेरत बधुटी लौने //

पिय दुर्गत के सकल बखाना / सुनत रहि बधु देवत धियाना //
घटन ऐसेउ बोल बताईं / घटिका जस पिय सों दरसाईं //

ले बहु बरन बचन भर बानी / ते कारन  भए कंठ गिलानी //
कहत पर पिय अधर तिसनाई / तुरत बधु अधर तोइ धराईं //

धुरि पुर पट्टन कारत पारे / पथ पुल कुंजन कूल कठारे //
नहकत घन बन भँवरत थौरे / पहुँचाइ बहि चमक पुर पौरे //

जिन के चिन्ह बैद दाए, जे रहहि जननि बास /
हतक पथिक आए तहँ जहँ, तिनके निरुज निवास //

रविवार, ०४ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                                 

तहँवाँ बैसत भए तनि बेरे / रहहि नाड़िया रोगिन घेरे //
देखत निरखत दु चंदु चारी / आगत प्रिय के परखन पारी //

काँपत  नारी धरकत छाँती / हट प्रद पिय जोगत भल भाँती //
प्रथम पुरातन पद चित्र पेखे / पुनि एक नउ अंतर छबि रेखे //

रोगिहि हुँते सयनइ पौढ़ाए / सइत सजन एक सदन पैठाए //
हतपद उँगरि तिर धर टेरे / ऊरु फलक जे भंजन केरे //

कौसल तस ते सिध संधाने / संधि बांध रत पटिक बँधाने //
बहुरि सकल जन भीत बुलाईं / सँधित बँधित पिय चरन दिखाईं //

भंग अंग हर कारत बरनन / अरु बोले अस बचन सुहावन //
चीरन करतन लागहिं नाहीं / ऐसेउ भाल भाँति जग जाहीं //

पर मोरे एक बचन दानहू / भयउ कुसल लग कहहि मानहू //

भसुर भाइहि सहित बधू, लाहत उर उत्कर्ष /
प्रतीत सँदेह भाउ जुग, हर्षित बैद सँदर्ष //

सोमवार, ० ५ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                                    

बहोरि बैद कहि एहिहि ठौरे / पंच दस दिवस लग परि होरे //
हमरे निरखन मह भलसाई / जोग परख पद करक जुराईं //

असक कसक अस पटिका कासें  / मानहु पद दैं कारा बासे //
अट्टक पट्टक अस लपटाईं / दंडक जस दंडिका बंधाईं //

कर अंतर पद फेरत केरे / धौली मटिका गृह भित घेरे //
तपत श्रमकन अंतर रिसाईं / कलपन कीट जिमि कुलबुलाईं //

कहि  दंडक जे लै हिंडोले / कोर्ट रोरत इत उत डोले //
तब तव दोनउ चरन बँधाहूँ / दंड अवधि अरु दै बैसाहूँ //

कारत अंजनु भाउ बियंजनु पीर भंगित पाद की /
सार सुरंगन बरनत बरननधीर बदन बिषाद की //
पिय हतभागी रयनइ लागी करत अँधियार नयन /
मध पथ सरसर भल्लक भय कर दै धन बर्जिता सरन //

आह भंगन पाउँ धरे, भन भन करत पियाए /
बैदक अस पट्टक करे, कोउ भाँति न सुहाए //

मंगलवार, ०६ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                                         

बितत दिवस भै रतियन कारी / पटिक चरन तन आरत भारी //
बिहान भयउ न रयनी बिहाए/ असन रसाए न देही सुहाए //

जागत पहलइ रैन  बिताई / बर तरपन लिख कही न जाई //
प्रात काल सयनिन्ह सयनाए / नित्य करम पिय तहहि निपटाए //

कहहिं बंधुगन भा बार काजा / नहि त रहिहि हम सल्य समाजा //
पर अजहुँत मन संसइ कारीं  / का ए भाँति पद संधि सहारीं //

पंथ जोग कर बखत लहाहीं / गवने दोनौ बैदक पाहीं //
बैसत सन्मुख तिनके आसन / बोले बरतत बहु अनुसासन //

जे तुम कहु पूछे तनि बाते  / मत अनुरूप निज हित के नाते //
हमरे मति एक संसै लाही / सल्य रहित पद जुग  तौ जाही //

रोगिन संजुग के बचन, संविदित चित साध /
संका संवारत बैद, वादिन अस संवाद //

बुधवार, ०७ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                                     

मानख बपुधर बिटप सरूपा/ बाल रूप अँखुआ अनुरूपा //
पोषत तिन सत सार अहारे / बिटप साख जस अस्थि सहारे //

सीध साध कहुँ आँठन गाँठी / अस्थि ऐसेउ जस को लाठी //
ऊरु फलक धरि अस आकारे / घुटरुहु कटि पद संधित सारे //

भंग लकुटि जस तिर्यक ताईं / तव प्रिय पद एहि बिधि भंगाई //
भय दोइ खंड धर दुइ खाँचे / दरसत अस जस को दुइ साँचे //

दोउ खगन कर खचत खचीते / खाँच खचावट जोगि सुधीते //
असहि परस्पर पाए प्रसंगे / जुग जहि रहि जे अस्थिहि भंगे //

पर बखत तनि लागि अधिक, कारत बहुस बिश्राम /
मेटत दुःख सकल दिन के, अरु  लहहु मोरि नाम //

गुरूवार, ०८ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                               

मन संसै सो पूछ निवारे । दुनौ बंधु पुनि सदन पधारे ॥
हड्डी पसली गाछि लकूटी । कहत समुझाए बार बधूटी ॥ 

बधु मन मज्जन चिंतन रंगे । दरसे दुखि मुख तीर तरंगे ॥ 
धनवन धनुर धर धारिहि धाए । एक दरसन पर दूज दरसाए ॥ 

गेह प्रधान पदक पिय पाएँ । जे काम कर कारीषिन्हि लाएँ ॥ 
ते बिपद संग परे खटियाए । भाग अठियाए त  को न उपाए ॥ 

सकल दसा दिस भा प्रतिकूला । सोचत बधु बैसत मति कूला ॥ 
अस चिंतत लोकत घन गाढ़े । लोचन तर घन्बर घाँ बाढ़े ॥ 


हृदय हाय घनकात घन, घनरस कन बरखाए । 
आह बन बाह बहा बहत, अधर समुंद समाए ॥  


शुक्रवार,०९अगस्त, २ ० १ ३                                                                                                       

बहुरि एहि सोच चित समुझाई / अनभल अहोइ भली हुआई //
काम कर्मधन आवन जावन / भै सोहन जौ सों मन भावन //

धार अधर सागर मन तोषे / कलकल नैन सकल जल सोषे //
इत पिय रहि रत पटिक पिराई / कुंचन लुंचन सहि नहि जाई //

अजहुँत असह दिन दोइ बीते / अगहुड़ न जानै कितौ कीते ॥ 
कवन पीरक अगन सितलाही / ऊरु फलक का करहि मिताई ॥ 

कर्मन कर्मठ रहहुँ उछंगू । भयउँ न मैं कहुँ परबस पंगू ॥ 
होउँ कुसलत जाउँ बलिहारी । रहहि प्रभु दया दीठ तिहारी॥ 

अस पिय जगद जननि नाथ, बिनयत निज कर जोर । 
कहत प्रभु धरौ सिस हाथ, पाँ परऊँ में तोर ॥  

शनिवार, १० अगस्त, २ ० १ ३                                                                                    

बहुरि अग दिवस रहि एहि नाईं । उतन भसुर बहुरन हरवाईं ॥ 
बधू के भाइहि कहत अगोरे । करत बिनति अरु किछु दिन होरें ॥ 

तब भसुर निज विवखा बखाने । कहि तानी मोरि बिबसता जाने ॥ 
बहुस कठिन कर कह मृदु बानी । होहहिं बहुसह कर्मन हानी ॥ 

ता पर बहिनै लागि बिहाहा । आगवनु लग लगे लग्नाहा ॥ 
अजहुँ बाँचे करम बहुतेरे । कारक मैं अह एकै अकेरे ॥ 

लघु भ्रात कहु कर्म के नाही । सो सोइ करि जोइ मन माही ॥ 
रहि कर्मठ मँझ भ्राता मोरे । एहिहु तोर पद परे खटोरे ॥ 

कारन अस श्रुत बिनत हमारी । कवन्हु कर बधु लेइँ सँभारी ॥ 

अस बिबसइ बचन भाषन, दिए अधर मुख भींच । 
अरु मलिन प्रभा किए भसुर, नयन पलक करि नीच ॥   

रविवार, ११ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                          

प्रियतम भाइहि पुर पख धारे । बधु होरन बहु अर्चन कारे ॥ 
कहि दिन होरउ दु चंदु चारी । रहहि भल दया दीठ तिहारी ॥ 

बधु भाषन पर एकहु न माने । बास नगर पुनि भसुर पयाने ॥ 
तब बधु भ्रात कहि चिंत न कारु । मैं ठारत सबै लेइ सँभारु ॥ 

नहि नहि कहि बर तुमहु पयानौ । बेर बहुरि भलि लेवन आनौ ॥ 
पुनि नहि कह अस बोलइँ भाई । बिकट बरी अरु नगरि पराई ॥ 

ता पर लघु बालक बस भगिनी । तुहरे कारज बहुसह रहिनी ॥ 
पंच दस दिवस कछु न बिगोई । एकइ अकेरे भल दुइ होई ॥ 

एहि बिधि भाए बधुटि बचन,  एकहू दिये न कान । 
सकल ससुरारी सन्मुख, राखे कुल के आन ॥ 

सोमवार, १ २ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                               

अस बधु बर लगि निरखत जोगे । सहि औषधि घर सेवक लोगे ।। 
औषधि घर जे नगर निबासी  । बधु बर बहिनै रहि तँह के बासी ॥ 

असन के अस रहि न कठिनाई । जोइ रसोई बहनै लाई ॥ 
इत पिय पट्टिक ऐसन बँधेइ । परे खाट बट करवट न लेइ ॥ 

जस जस दिन जामिन बिरताईं । तस तस पिय मुख छबि कुम्लाईं ॥ 
आरत बिनु मुख दरसत कैसे । नाथ बिनु कुचित कुमुदिन जैसे ॥ 

बिनु तन नंदन बिनु मन मोदू । बाहिर अंतर रहित बिनोदू ॥ 
सयन राध बिनु असन सुवादे । बारहि बार धरी अवसादें ॥ 

कसकत टसकत कहि पिया, धारें दंड कठोर । 
न जान को अघ किये जो, डारे प्रभु अस ठोर ॥  


मंगलवार, १ ३ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                             

धरे गोद मह लघु लरिकाई । करत रहहि बधु  पिय सेवकाई ॥ 
चरत रहि कनी घुटुरुन माही । तेहि बखत पद धारति नाही ॥ 

एक दुपहर बहु अचरज कारी । नीक कनी कर केलिक धारी ॥ 
ललकित मुखरित लेइ हुँकारी । मोदु मगन हिलगन महतारी ॥ 

हिय बाँधत तनि चरनन चिन्हीं । पग पग पाइल छम छम किन्ही ॥ 
एक छिनु ठारत  भँमरि पुहुमिहि । परसत पद पावन भइ भूमिहि ॥ 

निरत करत जस धरनिहि दोली । हिरत डुरत अस ललनी लोली॥ 
अरसत परसत जस पौ पौने । पुहुप पटल तस भाँवर भौने ॥ 

लखि लवन बदन बाल नयन मूर्धन तेज पुंज लही । 
रखि कमन करन राग कपोलन अधरोपर कंज गही ॥ 
झाबर कंकनि दिए मधुर धुनी चमकत चारू चँवरी । 
लै हिलकोरत हिलगत लोलत दोलत जस लघु  भँमरी ।। 

लख अपलक बाल लरिकी, अनुरागित पितु मात । 
पुलकित मोदु मुदित मन की, भावन कहि नहि जात ॥ 

बुधवार, १४ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                                       

बहुस दिवस पर पिय सुहसाई । लगे सुहावन मुख पर छाई ॥ 
बाल कनी पितु लोकित कैसे । बाल ससी मुख चातक जैसे ॥ 

भए दुइ मयंक एकै अगासे । एक बालिका एक पिय मुख भासे ॥ 
एक भुर भँमरत चितबत ठारे । एक भाँवर पथ दोलत चारे ॥ 

आखर देइ अपूरब दर्सन । अलोकित बरन बिस्मय लोचन ॥ 
पीर कमल मुख मल प्रभ छाई । मुदरित मुद कौमुद प्रफुराईं ॥ 

मानस मुख बिहरत हँसि हंसे  । कलित मुकुति रद अलि अवतंसे ॥ 
बिषाद बकूल इत उत दौरे । दिसि दरसत अरु ठौरत ठौरे ।। 

कबहु मात कबहुक पिता, बाँध कंठ भुज सीस । 
लल रसन दीपित लोचन, के कारत बर रीस ॥ 

गुरूवार, १ ५ अगस्त, २ ० १ ३                                                                                             

अस औषधि गृह दिवस पूराए । बैद चरन नउ पटिका चढ़ाए ॥ 
पुनि करक पिय निर्देसन दाए । सुतत रहिहु पद बिनु हिलराए ॥ 

बहुरि चौपद एक बाहि जुगाए । डगर अहोरे तहहि बहुराए ॥ 
असन गेह पिय निद्रा बियोगे । अनाकनी कर भोजन  भोगे ॥ 

काल रयन गिर भए अस पंगू । छिनु मह भए छत परे पलंगू ॥ 
चरन पटिक अस भै दुखदाई । बाम बिधि कछु कर सक न जाई ॥ 

जे कुरोग औषधि एहि माही । बहुस मास तन सयन बसाही ॥ 

दीन दसा देह दारिद, दुःख दुसही दिन दून । 
तिनकित तिलछित तिजहरी, पात रात चौगून ॥