Saturday, June 1, 2013

----- ॥ सूक्ति के मणि 9॥ -----

हवि मंत्र श्रवन गगन हरषाए । बहनु धूम गह बूँद बरखाए ॥ 
तपित तोए पा भू गंधाई । तृषा तोख क्षय सौंधि सुहाई ॥ 
हवन के मंत्र सुन कर गगन भी हरिषित हो गया । और हवनाग्नि के धूम्र प्रसाद को ग्रहण करते हुवे बूंदों की वर्षा की ॥ तपती 
हुई भूमि जल प्राप्त कर भूमि  सुगन्धित हो उठी । और अपनी तृष्णा का अंत कर सौंधती हुई भली लगी ॥ 

पूजित कर लिए भगवन नामा । भू भवन भए परम सुख धामा ॥ 
गावत गुन बन एहि गृह माहीं। बासन देवन के मन चाहीं ॥ 
पूज्यनीय होकर एवं भगवान् के नाम से गुंजित होते भवन और उसकी भूमि परम सुख का धाम हो गए ॥ उपवन उसका गुणगान 
करते हुवे कहने लगा कि इस भवन में निवास करने हेतु तो स्वयं देवगन भी लालायित होंगे ॥ 

 बिटप लतिक तृन पर्न प्रसंगे । नीड़ नीक नौ बिरचि बिहंगे ॥ 
यत तत  फरवत झूरत डारी । जुगल संग भए अचर सुखारी ॥ 
वृक्ष, लताएँ, तृण एवं पर्ण इत्यादि के साथ पक्षी नए नीड़ की रचना कर रहे हैं ॥ यत्र-तत्र सर्वत्र फलयुक्त होकर डालियाँ झूल रही है । 
युगल दम्पती के साथ समस्त अचर ( नदी पर्वत वन कंदर आदि ) सुख  पूर्वक वासित हैं ॥  
  

तेहि बखत बधु गर्भन धारी । प्रिय सह सुर बन करत सँभारी ॥ 
गंध बल्लरी बहुंत सुहाई । सागर ताप घन गगन चढ़ाई ॥ 
उस समय वधु गर्भ धारण किए हुई थी । प्रीतम के साथ देव स्वरूप उपवन भी वधु की देखरेख कर रहे थे ॥ गंध वाहिनी वायु अत्यंत
 ही सुहावनी प्रतीत होती । सागर भी तपकर गगन पर मेघ को आवृत  कर रहे थे ॥ 

सिबेष्ट रही बहुत फर भृते । सारे गर्भ सब को रहि न रिते ॥ 
भाग खंड लै रसिक बनाई । प्रिय परिजन निज मुख रुचि पाई ॥ 
( शिवेष्ट= बेलफल ) बेल वृक्ष फलों से पूरित था । सभी फल सार ग्रहण किये हुवे थे कोई भी सारहीन न था ॥ उसके मीठे भाग को 
लेकर वधु ने उसका रस बनाया और प्रियतम एवं स्वयं सहित प्रिय परिजनों के मुख में स्वाद भर दिया ॥ 

प्रियतमा अरु पिया परस , सोहत कुञ्ज निकेत । 
धूरिहि कन कंचन भये, जलसुत कलकल रेत ॥  
प्रियतमा और प्रिया स्पर्श से, निकुंज निकेत अत्यधिक सुशोभित हो रहा था । धूल स्वर्ण कण हो उठी कल कल जल मोती स्वरूप 
हो गए ।। 

रवि/सोम, २/३ जून, २ ० १ ३                                                                                  

एक दिवस बहुरि पीहर ताईं । आगमनु सन बाल भोजाईं ॥ 
बर बधु अगुवन आए दुआरे । कर जोरत सादर बैठारे ॥ 
पुन: एक दिवस  के पीहर से बालकों सहित उसकी भोजाइयों का आगमन हुवा ।। वर-वधू उनके स्वागत हेतु द्वार पर आए 
और सम्मान देते हुवे आदर सहित उनको बैठाया ॥ 

एक बालक कहि दूजन काना । कहु तौ एहि भू कौन समाना ॥ 
एक कही करे नैनन तिरछन । ए तौ चित्रकूट के तीरथ बन ॥   
तब एक बालक ने दुसरे बालक के कान में कहा । कहो तो तुम्हें यह भूमि कैसी प्रतीत होती है ॥ तो उअनमेन से एक बालक 
ने आँखों से संकेत करते हुवे कहा: - मुझे तो ये भूमि चित्रकूट तीर्थ के उपवन के समान प्रतीत होती है ॥ 

जे रही पहिले अवध निवासी । इहँ बसत भए तपो बन बासी  ॥
फ़ूरत फरत बहु कानन सोहा । नीक धरा निभ नभ उपरोहा ॥ 
जो पहले अवध देश के निवासी थे, यहाँ बसने के पश्चात वे तपोवन के वासी हो गए ॥ फलता फूलता यह चित्रकूट का उद्यान 
कितना सुन्दर लग रहा है नीचे सुन्दर धरा और ऊपर प्रखर  प्रकाशित्त गगन अवस्थित है ॥ 

देखु त उत गिरि कंदर खोही । वाल्मीकि इ थरि दिठाए होहीं ॥  
सैल कटक मृग पख बहु रंगे । सुदूर बहत जात मह गंगे ।। 
देखो तो दूर महा गंगा (महानदी ) बही जा रही है । और ये पहाड़ों की ढलान पर के मृग, बहुत से रंग लिए हुवे पक्षी चित्रकूट की सी शोभा
लिए हुवे हैं ॥ और उधर देखो तो पर्वत दीमक के टीले की कंदर और गुफाएँ । महर्षि वाल्मीकि ने ही यह स्थान निर्दिष्ट किया 
होगा ॥ 

नदी धार नौ  प्रीत पुरानी । सोए समोए संत के बानी  ॥ 
चुम्बत मंद समीरन साँसे । हर अलहर  तरंग उद कासे ॥ 
नदी की धाराएं नवीन थीं किन्तु उसकी प्रीत अर्थात अस्तित्व प्राचीन था । जिसमें संतों की परम वाणी का समावेश था ॥ मंद 
सुखद वायु उस नदी को चुम्बित कर रही थी । और हिलकोरे लेती अलहड़ तरंगे उत्तोलित होती हुई आकर्षित हो रही थीं ॥ 

एक कहि कस पवित बाताबरन । लागत मोहे एहि दंडक बन ॥ 
नियराइ तट गोदावरी के । बहत पवन पै परस सरी के ॥ 
एक बालक ने कहा कैसा पवित्र वातावरण है । मुझे तो यह दंडक अरण्य प्रतीत होता है ॥ देखो वरवधू गोदावरी के निकट वासित हैं । 
और वायु उस सरिता का जल स्पर्श कर सुख पूर्वक प्रवाहित हो रही है ॥ 

जदपि भवनु ढारी पे टीके । लाहत छाईं परन कुटी के ॥ 
देखू तौ कस धाए गिलहरी । मनहु भई गृह उपबन पहरी ॥ 
यद्यपि वरवधू का भवन ढलाई पर स्थापित है । किन्तु यह पर्ण कुटी की प्रतिच्छाया का आभास दे रहा है ॥ देखो तो गिलहरी कैसे 
दौड़ रही है । मानो यह इस घर एवं उसके उद्यान की पहरी हो ॥  

मधुकर मंद्र मध तान सुनाए । बिटप बलित बर बेलि बौराए ॥     
तब एक गत देखत छत छत्रिके ।  कहि नहि एहि आश्रम मुनि अत्रि के ॥ 
भँवरे स्वर्सप्तकों जैसे मंद्र, मध्य,और तान सूना रहे हैं । वृक्षों पर वलयित सुन्दर बेल कैसे बौराई हुई हैं ॥ । तब उनमें से एक 
बालक ने भवन के छत छाते का अवलोकन कर कहा । कहीं यह मुनीश्वर श्री अत्रि का आश्रम तो नहीं है ॥ 

सोहत धर घट अवघट घाटे । बर बधु  निज गह बाटिक बाटे ॥ 
थान  बान धर चार पद चिन्हे । मगन गगन घन छाया किन्हें ॥ 
भूमि घाट, दुर्गम घाटियाँ आदि धारण करके सुशोभित हो रही हैं । वर वधू सुन्दर पगडण्डी युक्त गृह वाटिका में सुशोभित हैं ॥ यह 
स्थान किसी धनुर्धर के पद चिन्ह से युक्त है । और गगन मगन होकर मेघ की छाया कर रहे हैं (  इस प्रकार बालक ने मुनि अत्रि के 
आश्रम के चिन्ह बतलाये ) ॥  

बाल बहिन कहि सुनि तौ भइया । पर इहाँ नही को अनुसुइया ॥ 
रिसि पतनी ना ही परखाई । नारि धर्म बधु  को समुझाई ॥ 
फिर लघु वयस बहन ने कहा किन्तु सुनो तो भैया! यहाँ तो कोई माता अनुसुइया नहीं है । उस ऋषि पत्नी के एवं किसी पारखी के न
 होने से अब वधु को नारी का धर्म कौन समझाएगा ? 

पतिब्रता के अचार बिधि, ज्ञान के चारि बात । 
बेद पुरान  संतन के, बधु गुन गहि को साथ ॥  
पतिव्रता की आचरण विधि, ज्ञान के चार बातें संत सज्जनों तथा वेद पुराणों के ज्ञान गुण वधु किससे प्राप्त करेगी ॥ 

पंचवटी के बन भूमि, भये अलि अली अलिंद । 
निरखत कंदर सैल गिरि निरख न मुनि बर बृंद  ॥ 
(यद्यपि) यह पंचवटी की वन भूमि के सरिस है यहाँ के भवन अटारी में तो भँवरों की भरमार है ॥ शैल पर्वत और कंदराएं तो लक्षित 
हैं किन्तु मुनिवर का समूह लक्षित नहीं हो रहा ॥ 

मंगलवार, ० ४ जून, २ ० १ ३                                                                                                  

सो का भइ कहत भाए छोटे । देखु तनिक उत गृह परकोटे ॥ 
निर्जन थर जाने को रेखे । हरिन नयनि हरि हरनन लेखे ॥ 
तो क्या हुवा ऐसा कहते हुवे छोटे भाई ने कहा । थोड़ा देखो तो उधर उस चारो और की भित्ति को । ऐसे निर्जन स्थल पर इसे जाने 
किसने रेखांकित किया है ।  कोमल हृदया से  हरण करने वाले को  दूर करने  हेतु मानो इसे चिन्हांकित किया हो  ॥ 

एक बालक मुख मधुकर भासे । तनि मेटहु तौ मोर जिगासे ॥ 
तुम कहु एहि रामायन के बन । नाम धरे बर संकट मोचन ॥ 
फिर एक बालक का मुख भ्रमर के जैसे मुखरित हुवा और कहने लगा किंचित मेरी जिज्ञासा को भी शांत करो तो ॥ तुम सब कह 
रहे हो की यह रामायण का वन है किन्तु वर ने तो संकट मोचन का नाम धारण किया हुवा है ( अत: ये कैसी रामायण हुई ) 

अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे । दसा धर बधुन्ह भौं टेरे ॥ 
श्री कर लघु एक लकुट उठाई । सकल बाल के पाछिन  धाई ॥ 
प्रिय जनों के प्रिय लगने वाले ऐसे वचनों को श्रवण कर वधु के मुख पर विहास छा गया और उसने भृकुटी कुटिल कर हाथ में एक 
लघु छड़ी  उठाई और सारे बालकों के पीछे भागने लगी ॥ 

गृह बाटिक इत उत छिटकारे । नादत बालक कलरव कारे ॥ 
धरत बधू कानन कस खैंचे । कहि पुनि लड़ाहु बातन पैंचे ॥  
सारे बालक कोलाहल युक्त मधुर ध्वनि उत्पन्न करते गृह वाटिका में इधर उधर बिखर गए ॥ जिनके कान वधु ने पकड़ कर खींचे 
और कहा कहो तो पुन: ऐसे बात के पेंच लडाओगे ॥ 

पुनि बाल मनोहर, सरि बन सुन्दर, धवनि मोद गूँज करे । 
बधु चीढ़ लगावत, हा हा कारत, धाए नीक कुञ्ज घरे  ।।
कर लकुटी कास कै, तिरछन लखि के, धाए बाल धरी लिए । 
पुनि भ्रकुटी कस कै, अधरन दसि कै, दोउ साँट धरी दिये ॥     
मनोहर बालक पुन: सुन्दर वन के सरिस उस वन में मन मुदित करने वाली ध्वनि गुंजारित करते । और वधु को चीड लगाते । हां हां 
कर हंसते हुवे उस भवन के सुन्दर वन में भागे ।। फिर वधु ने हाथ में छड़ी कसते तिरछा देखते हुवे दौड़ते बालको को पकड़ लिया 
और फिर से क्रोदित किन्तु बनावटी मुद्रा धारित कर, अधरों पर विहास लिए उनको दो सौंटी लगा ही दी ॥  

एक दुजे के करनन मैं, करतहि कलबल नाद । 
कहत कबि बिनोद पूरित दुर्लभ एहि संवाद ॥ 
एक दूसरे के कानों में फुसफुसाते हुवे बालकों को देखकर कविगण कहते हैं कि बालकों का यह विनोद पुर्नित संवाद अति दुर्लभ है।।

बुध/गुरु, ० ५/६ जून, २ ० १ ३                                                                                                 

अरस परस कर पंगत पारे । एक पलछिनु कर दूसर धारे ॥ 
सनै सनै कर चर दिनमाना । धरत पहर पद पथ सोपाना ॥ 
परस्पर आलिंगित होकर पंक्ति युक्त होकर एक पल ने क्षण में ही दुसरे पल का हाथ पकड़ लिया । और धीरे धीरे पहरों के सोपान 
पथ पर चरण विराजित करते हुवे दिवस के मापक संचारित होने लगे ॥ 

दुःख सुख के एहि बिधि लिए घेरे । नियति नटी नत नित नउ केरे ॥ 
पावत दम्पत के कर छाही  । चहल पहल कर सकल सिहाहीं ॥ 
इस प्रकार दुःख और सुख से घेरते हुवे नियति, नत मस्तक होकर नित नए क्रिया कलाप करती ॥ उन दम्पति का हाथ का आशीर्वाद 
प्राप्त कर उस गृह वन के चर-अचर सभी आनंदित होकर प्रसन्न चित रहते ॥ 

रहे ना बसति बसिक अवासे । बासित नियरे लसित सँकासे ॥ 
मेल मिलावन आएँ निवासे । बैस  भवन भित मधुरित भासें ॥ 
यह आवास बसाहट से रहित नहीं था । पास में ही पड़ोसीयों का आवास भी था जो आँखों से दिखाई देता था ॥ उस बसति के निवासी 
मेल जोल करने आते और भवन के भीतर विराज कर मीठी वाणी में वार्तालाप करते ॥ 

दोउ संग मह रहत सुखारी । सुरतत प्रियजन होहिं दुखारी ॥ 
प्रेम प्रीति जब गहनहि बाढ़े । बर लोचन तर बादर गाढ़े ॥ 
वर-वधु दोनों वहां साथ-साथ सुख पूर्वक निवास करने लगे । किन्तु प्रियजनों का स्मरण होते ही दुखी हो जाते जब यह प्रेम-प्यार 
अधिक बढता  तो वर के लोचन से अश्रु रूपी बादल गहरे होकर उतरने लगते ॥ 

सर सुन्दर बर नदि नद धूरे ।  तात -मात भगिनी पर दूरे ॥ 
जदपि भए निकट कारज धामा । श्रम साध्य करि तनिक बिश्रामा ॥ 
सुन्दर सरोवर, श्रेष्ठ नद नदीयाँ निकट थीं किन्तु मात-पिता भगिनी दूर थीं ॥ यद्यपि कार्यालय( नए आवास के )  निकट था सो श्रम
 साधना करके थोड़ा विश्राम प्राप्त हो जाता था ॥  

बासन बसे जुग दम्पति, इते इरा एवम एव । 
बसत रँह जस पंचवटी, सिया राम स्वमेव ॥ 
युगल दम्पति का यहाँ की भूमि के आवास में  इस प्रकार से  वासित थे जैसे की पंचवटी में स्वयं भगवान श्री राम चन्द्र एवं माता 
सीता स्वयम आवासित हों ॥ 

वपु अंतर जस ह्रदय अवासे । वधुबर स्याम छबि अस बासे ॥
प्रान समा प्रिय जोगे कैसे । अंतस रुधिरु ह्रदय गति जैसे ॥
शरीर के अंतस जिस प्रकार हृदय का आवास है । वधु के शरीर रूपी ह्रदय में वर की सांवली छवि ह्रदय बनकर उसी प्रकार वासित 
थी ॥ प्रियतमा की प्रियतम देखभाल कैसे करते जैसे देह अंतस का रुधिर ह्रदय गति की देखरेख करता है ॥ 

सुख बन छाई धूप दुखारी । करत  कारज जग हितकारी ॥
अंत रुदन हँस रदन दुआरे । बसहिं भवन बहु सोच बिचारे ॥    
सुख छाया बनी और दुःख धूप बने । सुख-दुःख, धूप-छाया दोनों ही जगत का हीत कारी हुवे ॥ अंतर में रोदन ऊपर अधरोंपर सुहास
 धारण किए । बहुंत ही सोच समझ कर युगल दम्पति उस वन भवन मे रह रहे थे ॥ 

पालक सन तनु भव बिलगाईं । भेस भूसा ए घर घर छाईं ।। 
बानी होवत बान  अचूके । समरथ  भए  कुटुंब कर टूके ॥
मात-पिता से पुत्र दूर हो रहे हैं, और यह चलन घर घर व्याप्त हो रहा है ॥ वाणी एक ऐसा अचूक वाण है, जो कुटुम्ब के तुकडे  करने में समर्थ है ॥ 
जे कभु परिजन सुरति सताईं । दोनौ जा करि जोग मिताईं ॥
एहि जग मह को होवत काके । बालक सुख दुःख मात-पिता  के ॥ 
वर-वधु को जब कभी परिजनों का स्मरण हो आता,तो दोनों जाकर उनसे मेल-मिलाप कर आते ॥ इस संसार में कौन किसका होता है । बच्चों  के सुख-दुःख को माता और पिता  ही जतनते हैं ॥ 

बिरतित बालक सुधि जब करहीं । नभो गज गति नयन नभ चरहीं ॥
ते बारिहि  थिर को न उपाई । लिये परस्पर धीर बँधाई ॥ 
वर-वधु को जब दिवंगत बालक का स्मरण होता तब नयनों के आकाश में मेघ विचरने लगते ॥ परस्पर धीरज बंधाते हुवे फिर उस वर्षा को थामने का कोई उपाय नहीं रहता ॥

अस दुःख के ताप जुहार, सुखद छाए अधिकाए । 
पल पहर काल खन हार गहि बहति बहि सुहाए ॥  
इस प्रकार दुखों के सूर्यों को संगृहीत करते और सुख की छाया पर अधिकार धरते हुवे, पल; पहर और काल खंड की मालिकाएं धारण किये हवाएँ अपनी गति से प्रवाहित होती रही ॥

चैत्र तरे चाँद चढ़ाए, जरत जेठ बैसाख  । 
आषाढ़ अवनु जल पाए, धरनी सीतल लाख ॥  
चैत्र आया शुक्ल पक्ष में वधु गर्भ वती हुई । जेठ और बैशाख बहुंत जले । आषाढ़ महीने के आते ही जल प्राप्त कर धरती शीतल स्वरूपा दिखाई देने लगी ॥ 
शुक्रवार, ० ७ जून, २ ० १ ३                                                                              

गर्भ दिवस चढ़ लिये अकारे । अंक अंकुरत अंग सहारे ॥ 
बिरतत पाखे आए असाढ़े । घन स्याम सर घर भर गाढ़े ॥ 
दिवस बीते और गर्भ ने आकृति लेते हुवे भ्रूण स्वरूप देह  का अंकुरण आरम्भ हो गया और अंग विकसित  होने लगे । पक्ष व्यतीत हुवे और आषाढ़ मास  का पदार्पण हुवा । जल से भरे काले बाल आकाश में गहराने लगे ॥ 

गह गह गहरर गढ़ गढ़ गाजे । ढोल नगाढे घढ़ घढ़ बाजे ॥ 
फूर प्रफुर भुरहरु रुर राँचे । पत पत पथ पद अवली बाँचे ॥ 
वे हर्ष-उत्साह के साथ बड़ी धूमधाम से गढ़गढ़ाते हुवे गर्जने लगे। जैसे ढोल नगाढ़े घढ़घढ़ाते हुवे निनादित हो रहे हों  ॥ भोर में पुष्प प्रफुल्लित होकर सुन्दर रंगों में रंग गए और उनके पत्रिकाएँ पथ पर किसी पदावली का पाठ करने लगीं ॥ 

नीर नूपुर नटत  नटवर के । अवनत बवनत भू पर ढर के ।। 
सतसुर सागर सरि सर पर के । जिमि कंठ कूनिके कल हर के ।। 
नृत्य करते हुवे  घनश्याम के जल स्वरूप घुंघरू नत मस्तक होकर बिखरते हुवे भूमि पर ढुलक गए ॥ सागर, सरिता, सरोवरों के सप्तसुर मानो वीणा के स्वर हरण कर लिए ॥  

धूलि कनिक  सन रागन रंगे । कोकिल कंठ कूजएँ बिहंगे ॥  
मोर पँख बर मूर्धन खाँचे  । चरन अरन नूपुर धर नाचे ॥ 
धूल-कणिकाओं ने  साथ में  रागिनी छेड़ दीं , और कोयलों के साथ पक्षियों के कंठ भी मधुर ध्वनि करने लगे ॥ मोर, माथे पर सुन्दर पंखों को वरण  किये  इन जल घुंघरुओं को चरणों में बाँध कर नृत्य करने लगे ॥ 

नभ घन मंद्र निसान धरातरि माध  निनादे,  । 
छेड़े मलिहर तान  बूँद बूँद  लय लीन भइ   ॥  
धरातल  मध्यम स्वरों  में निनाद करने लगा । नभ में गंभीर  गर्जना करते हुवे घन मृदंग निनाद करते हुवे मल्हार गाने लगे और बुँदे उस लय मग्न हो गई ॥ 


सारनी सार गहन कर, संगति कार मृदंग  । 
स्वर ग्राम नादिन अधर, बांधे जोग तरंग ॥ 
क्षुद्र नदियों के अधरों ने उस बरसते अमृत को ग्रहण किया और वे घन स्वरूप मृदंग की संगती करते हुवे, स्वर तरंगों के साथ बंध कर सप्त स्वरों में गान करने लगी  ॥ 

धरा तरि मंद्र निनादे, नभोपर मध निसान । 
अविरल वारि लय राधे, छेड़े मलिहर तान ॥  

शनिवार, ० ८ जून, २ ० १ ३                                                                                            

चंदु बरस भए पंचक मासे । आवन श्रावन सस रस बासे ॥ 
जलकन गृहबन छन छन बरसे । श्री कीर्ति कर तरु पत हरसे॥ 
एक चंद्र वर्ष के बारह महीने में से पाँचवे महीने का पदार्पण हुवा, सावन के आने से अन्न कानों में रसमयी हो गए ॥ जल कण घरों एवं उपवनों में छन छन की ध्वनी कारित करते बरसनेलगे जिससे सम्पद,संपत्ति,शोभा,सौंदर्य,विभूति,साधन,आदि का श्लोक करते हुवे वृक्षों की पत्र हरिषित हो उठे ॥ 

बदरि बदरि लइ मेचकताई । गहन गान  करि जोत जराई ॥ 
मेघ जोनि कर पर फुर धारी  । नीराजन करि नीरज बारी ॥ 
बदली कृष्ण वर्ण में परिवर्तित हो गई और समूह स्वरूप घने स्वरूप में गान करते हुवे ज्योतिका रूप में बिजली चमकने लगी ॥ मेघ समूह के हाथों में जल स्वरूप पुष्प वर्षा दे कर स्वयं आरती करती हुई मोती वारने लगी ॥ 

धरा तर धरनि धरि सुख तोई । झर जर सुत बर माल पिरोई॥ 
हिम गिरि तर सुर नदी नादे । श्रुत धर निर्झर निगदत साधे ॥ 
झरते हुवे मोतियों को धारण कर फिर उनकी माला पिरोकर धरातल पर उतरते इस सुख-सरिल को धारण  करते हुवे फिर इन झरते हुवे मोतियों की एक सुन्दर माला बनाई ॥ 

हरिद प्रभा जे बिबरन लेईं । आछद पत धन हरि बर देईं ॥  
हर्ष उत्फुर फुर फुर फरियाए । हरि दीठ द्रव धर फर हरियाए ॥ 
कान्तिहीन होकर रंग हीन हुवे आच्छादित पत्रों को यह धन देते हुवे उन्हें हरियाई का वरदान दिया ॥ वे पत्र प्रसन्नता से खिलते हुवे फूलों से भर गए । और हरीतिमा से सार ग्रहण कर उनमें ढेरों फल उत्पन्न हो गए ॥ 

अन्न धन ध्वज प्रहरन ताने । धनकर कन धर भए धनवाने ॥ 
हल जुती हरिस धर खलिहाने। धन्य धनब निज धनमन माने ॥ 
अन्न का धन वायु में झंडे के जैसे तन्यता लिए खडा था । वह भूमि जिसमें यह धन बोया गया था, अन्न का धन धारण कर स्वयं को भाग्यशाली मानने लगी ॥ 

सोषि धरा सस सार , देवन हिरन सकल केर । 
खेतिहार कर धार  , भर भंडारन कर  कुबेर ।। 
 फिर धरती अन्न कणों  में सार रस भरने लगी जिससे ये कण स्वर्ण स्वरूप होकर किसानों के हाथ में दायन योग्य हों, जिससे किसानों के अन्न कोष भर जाएँ और वह कुबेर के सदृश्य धनी हो जावें  ॥ 


रविवार, ० ९ जून, २ ० १ ३                                                                                  

भव भादू पद नभ लै आपा । तरे हरे गिरि कर धर चापा ॥ 
केलि केर कुँआर कर हारे । तहँ कातिक पद कीर्ति कारे ॥  
भाद्र पद का आगमन हुवा, नभ भी घमंड से भरा था । तभी इंद्र अपना धनुष लेकर उतरे । और क्रीड़ा करते  आश्विन के हाथों हार गए , । यह देखकर कार्तिक मास आश्विन की विजय का यश गान करते हुवे अवतरित हुवा ॥ 

चौदह बरस बसन  बन बासे । तपस चरन चर प्रभु परवासे ॥ 
सिया हरत पर रावन हाँसे । प्रभु पद तर लंका पत धाँसे ॥ 
तपस्वी आचरण वरण करते हुवे, चौदह वर्ष वन आवास में निवास हेतु प्रभु श्री राम चन्द्र का प्रवास हुवा ॥ 
माता सीता के हरण के प्रसंग में दुष्ट रावण अट्टाहस करने लगा । तो प्रभु के चरण लंका में अवतरे और उअसके पति एवं उसकी प्रतिष्टा को धूमिल कर दिया ॥ 

मौलि माल दस तीस नराचे । बिजया दसमी मह महि नाचे ॥ 
ध्वज कलस कर सकल निनादे । जयति जय दस कंठारि वादे ॥ 
दस मुखी माला और तीस तीर विजया दसमी के दिन धरती पर नाच रहे थे । हथेली में विजयी ध्वज धारण कर सभी दुष्ट दशानन का वध करने वाले श्री राम चन्द्र जी का जय घोष कर रहे थे ॥ 

अरन्य बास पर प्रभु सिधारे । पदुम चरन पुर अवध पधारे ॥ 
धुरियत धानी भै धुरी धुरी । दमकी दुल्हन जस नउ नउरी ॥ 
अरण्य आवास में के पश्चात प्रभु के पद्म स्वरूप चरण अवध पुरी में चिन्हांकित हुवे ।  धूल से लथ पथ अयोध्या धानी की धूल जैसे धूल सी गई और वह नई नवेली दुलहन सी शोभा देनी लगी ॥ 

बिरतित पद पावस दिवस अमावस कार्तिक मास पाख चढ़े । 
अजोधा नगरि जन पथ कन कंचन प्रभु के पद पदुम पड़े ॥ 
भारत महि भूते तिस दिवस हुँते  दीप अलि दुआरि धरे । 
सरबस दम्पति गण  कल कंज भवन तेहि तयौहार करे ॥  
इस प्रकार वर्षा ऋतु के व्यतीत होने पर कार्तिक के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को अयोध्या नगरी के पथ पुरुष प्रभु श्री राम चन्द्र के पद्म चरण को धूलि कंचन ने सहर्ष स्पर्श किया ॥ और भारत भूमि के मानस जन उस उपलक्ष्य में इस दिन दीपकों की पंक्तियाँ द्वार पर अंकित करते हुवे सभी दम्पति गण, सुन्दर कमल भवनों में इस उत्सव को दीपावली स्वरूप में मनाते हैं ॥ 

दीपक ज्योति जगमगे, श्रीकर श्रीबर श्रीस । 
जुग दम्पति नीराजनै , जय जनि जय जगदीस ॥ 
दीपक ज्योतिर्मय हो उठे, कल्याण करने वाले श्री वल्लभ भगवान विष्णु विराजित हैं । और युगल दम्पती जगद जननी, जगदीशकी आरती करने लगे ॥ 

रंग रयन पट आवरन, नवलै साज समाज । 
तिन सुभ दिन दंपति भवन, दमकित देहरि धाज ॥ 
नव वर्ण में अनुरक्त, नविन पट आवरण लिए नवल शोभा सामग्री से सुसज्जित होकर उस शुभ दिवस (जिसको उल्लेखित किया गया है)में उन दंपति का भवन एवं भवन की देहरी सजकर दमकने लगी ॥ 

सोमवार, १ ० जून, २ ० १ ३                                                                                     

पूजन पर कर दीपक धारे । पद अंतर अलि धरे दुआरे ॥ 
नील पील लौ लोहित केसर। रंग रंग बर स्याम मनि सर ॥ 
पूजन कार्य पूर्ण होने के पश्चात हाथ में दीपक लिए पद पद पर अंतर करते हुवे द्वार पर रखे गए ॥ नीली,पीली और लाल केसरी ज्योति मानो हीरे नीलम और विभिन्न रत्नों के रंगों की सुन्दर आभा दे रही हों ॥

चौक चारि पद चाँवरि झूरे । रच रच काँचे खच खच कूरे ॥ 
मानहु मानस कुमुदनि फूरे । रयत रयनि अस रमनिक रूरे ॥  
आँगन में चार लड़ियों वाली झालरी झूल रही थीं, जो कांच से सुरुचि पूर्वक रची एवं खची ऐसी परतीत होती मानो उस आँगन रूपी मान सरोवर में कुमुद पुष्प उत्फुलित हों ॥ जिसकी आभा में अनुरक्त होकर यामिनी  भी अति सुन्दर एवं मनोहारी लग रही थीं ॥ 

वसति वास पर पूज प्रनामा । दोनौ जुग असने जनि धामा ॥
पद पद पथ गह गंधित बारी । भेष बसन नउ भरे पुरारी ॥
निवासित आवास में वंदन-पूजन के पश्चात दोनों युगल अपनी जननी के निवास पर पहुंचे ॥ मार्ग में चरण- चरण पर( नगर वासियों द्वारा) सुगन्धित वर्षा की गई थी । और सभी नागरिक नवल वेश भूषा धारण किये हुवे थे ॥ 

ढांप ससी भए गगन सियामा । निन्दबत भूमि नगर सुधामा ॥
चुम्बत नभ सब सदन धवलाए । संग बहु रंग रुरी रचियाए ॥
चंद्रमा विलोपित था और व्योम पर गहराये हुवे श्याम वर्ण को, भूमि की शशि स्वरूपा वह नगरी मानो आकाश को लज्जित कर रही हो ॥अनेक रंगों का प्रसंग लिए सुन्दर स्वरूप में रंगाए सभी भवन आकाश को लगभग स्पर्श करते हुवे, धुले धुले से प्रतीत हो रहे थे ॥ 

द्वार द्वार दीपक अलि धारे । वर्धन  मनिमय बंदन बारे ॥
नलिन नाभ श्री नलिनइ  निकाएँ। जन जन मुख श्रुति आरती गाएँ ।।
और द्वारि द्वारि पर दीपों की अवलियाँ सुशोभित हो रही थी । और मणिमय वन्दनवार उनकी शोभा में वृद्धि कर रहे थे ॥ श्री लक्ष्मी एवं विष्णु कमल के सदृश भवनों में विराजित थे । और नगर वासी के श्री मुख से वेद एवं आरती गा रहे थे ॥ 

पूजन कर्म करतन पर, सकल कुटुम जनि धाम । 
आपस मिल उपहारते, पद बर करत प्रनाम ॥  
पूजन कार्य पूर्ण होने के पश्चात घर के सभी कुटुंब जनों का उपहारों का आदान-प्रदान करते हुवे सौहार्दिक मिलन हुवा और युगल दम्पति ने बढे वृद्धों के चरण स्पर्श किये ॥ 

मंगलवार, १ १ जून, २ ० १ ३                                                                                          

बहुरत सह बर  लहत  सुखारी । गवने बधु जनि जनक दुआरी ॥ 
चरन परसत  सुख दुःख बतियाए । लिए तँह भाउ भीनीहि बिदाए ॥ 
इस सुख अनुभूति से अत्यधिक प्रफुल्लित होकर लौटते समय वर के साथ वधु अपने मात-पिता के द्वार भी गईं । चरण स्पर्श करने के पश्चात सुख दुःख की बातें होने लगीं ॥ तत  पश्चात वहां से भाव भीनी विदाई ली ॥ 

आजु भयउ सब जग उजियारे । ज्योति हस्त  रयनि तम हारे ॥ 
बल बल बर्तिक सकल सुहाईं । रूरी बसति बसंत के नाईं ॥ 
आज समस्त जगत उज्जवल हो गया, ज्योति के हाथों रात्रि का अन्धेरा हार गया । दीपक की बातीयाँ जल जल कर सुशोभित होती हुई  सरसों के फूलों के जैसी पीले स्वरूप में पुष्प का गुच्छ प्रतीत हो रहीं थीं ॥ 

कातिक मावस चढ़ते मासे । विभावरि भूति भूषित  भासे ॥ 
दीपावली सौंह  आधारे । दीपित बरन बर बर्ति कारे  ॥ 
कार्तिक के कृष्ण पक्ष की अमावस्या थी, और तारों से सुशोभित रात्रि का एवं श्री विभूषित होकर देदीप्यमान थीं॥दीपक की पंक्तियाँ सुन्दर आधारण लिए हुई थीं । जलती हुई  बातियाँ  तपाए हुवे स्वर्ण के आभा  सी सुन्दर ज्योत्स्ना बिखेर रहीं थीं ॥ 

धनिक बनिक पत रुप स्वधामा । को मन पूरित को मन कामा ॥ 
कृषक खलि धन कटी करि सारे । जतन कनक कन किए भंडारे ॥ 
धनाड्य गण एवं व्यापारी जन अपने ही घरों के स्वामी स्वरूप थे । किसी की मन की पूर्ति हो गई थी, किसी के मन में आकाक्षाएँ थीं ।  कृषकों ने खलिहानों से उपज काट कर उठा ली थीं और यत्न पूर्वक उन स्वर्ण कानों का भंडारण कर लिया था ॥ 

पूजित श्री सुभ मंगल माई । लाभत मंदिर सकल सुहाई  ॥ 
जे चितवन बहु लिपसा लाई । ते चित को कहु का कहि जाई ॥ 
सुख एवं कल्याणकारी श्री संपदा, माता स्वरूप में पूज्यनीय होकर  भवनों को उपकृत करते हुवे सभी को सुहावनी प्रतीत हो रही थीं ॥ जिन के अंतस में अतिशय लाभ लिप्सा थी उनके विषय वर्णनातीत हैं ॥ 

भव भूति भूमि भवन के, दूर करत अँधकार । 
धन धान भरत बिती भइ, दीप अवली तिहार ॥ 
संसार की की वैभव स्वरूपा श्री लक्ष्मी के द्वारा भवनों के अन्धकार को दूर करते हुवे  तथा उनको धन संपदा से परिपूर्ण करते हुवे दीपावली त्यौहार व्यतीत हुवा ॥ 

बुधवार, १ २ जून, २ ० १ ३                                                                                              

एहि बिधि सुखकर बासर बीते । को मनुहारे को मन जीते ॥ 
बधुटि गर्भ जे जीउ निवासे । तेहि बखत भए बय सतमासे ॥ 
इस प्रकार दिन सुख पूर्वक व्यतीत होने लगे, कोई दिवस मन को हर ले जाते तो किन्ही को मन जीत लाता ॥वधु के गर्भ में जिस जिव का अंकुर प्रस्फुटित हो रहा था । उस समय उस जीव की अवस्था सात मास की हो चुकी थी ॥ 

निरखन गर्भ बैद के पाहीं । जब बुलाइ दोनौ जन जाहीं ।। 
असन के बर प्रबंध प्रभारे । बधू के करत सुघड़ सँभारे ॥ 
गर्भ की स्थिति का निरिक्षण करने हेतु जब वैद्यिका बुलाती, युगल दम्पती जाते, वर ने वधु के खान-पान सुन्दर प्रबंध किया हुवा था, वह वधु की देख-रेख  भली प्रकार करता ॥ 

मूल फूल फल सकल सुवादे । लवन रमन रल रसन प्रसादे ॥ 
जो वधु रुचिकर कारक वादे । सो प्रीतम वधु रूचिधर ला दे  ॥ 
सभी रुचिकर मूल फूल फलादि, लावण्या प्रिय, रसना युक्त सभी प्रकार भोजन प्रसाद  जो वधु को स्वादिष्ट एवं प्रिय लगते थे वधु की रुचिनुसार वर वही प्रसाद ला कर दे देते ॥ 

औषधी मंत बैद बताईं । तेहि नियमतस बधुटि खवाईं ॥ 
अस गर्भस सिसु  पावत पोषे । गर्भासय पद अष्टक सोषे ।। 
प्रतिदिवस की औषधियाँ, जिन्हें भिषक ने परामर्श करते हुवे दी थीं । उन्हें वधु नियमातास ग्रहण करती ॥ इस प्रकार गर्भस्थ शिशु पोषण प्राप्त करते हुवे गर्भ धानी में आठ मास की अवस्था का हो गया ॥ 

देखत वधु फुर फर कंद, नउ पल्लव उदगाए । 
हर्षे मन भर आनंद करत सरयु सुखदाए ॥ 
वधू के देखते ही देखते जड़े फलीभूत हुई और नई कोपलें के सह पुष्प फल प्रस्फुटित  हुवे । हवाए सुख सुहावनी हो कर मन को  हर्षित कर और आनंद विभोर करने लगी ॥ 

गुरूवार, १ ३ जून, २ ० १ ३                                                                                                     

कल कोमल कार्तिक पूरिते । पूरन काल सस दिवस बीते ॥ 
उयउ सूर अगहनु अगवाने । देखत दोनौ पाखि पवाने ॥ 
कार्तिक का सुहावना महीना पूर्ण हुवा पूर्ण कालिक चन्द्र दिवस अर्थात पूर्णिमा व्यतीत हुई ।  मार्ग शीर्ष का पद, उदित हुवे सूर्य का स्वागत कर रहा था । देखते ही देखते मार्ग शीर्ष के कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षों ने भी प्रस्थान किया ॥ 
  पत पत पथ पादंतर प्रस्तारे । बैस पुष्प रथ पौष पधारे ॥ 
भेष अभूषन भरी बाटिका । सारे सुमनइ  नवल साटिका ॥ 
पत्र समूह पथ के ऊपर चरण-चरण पर बिछे हुवे थे । पुष्प रथ पर विराजित होकर पुष्य के पद अवतरित हुवे । वाटिकाएं वेश आभूषण से आभरित हो गईं और कुसुम कलित नए वस्त्र नई शाटिकाएं एवं जैसे पञ्च परिधानों में सुसज्जित हुईं ॥ 

ललित कलित कल कंठन हारे । कनक कन सम खनके निहारे ॥ 
सीत काल कर माल तरंगे । कंठ घाल अगुअइ किए संगे  ॥ 
कंठ को सुन्दर हार से विभूषित कर स्वर्ण कण के सदृश्य निहार बिंदु खनकने लगे । शरद काल के हाथों में तरंगों की शीतल मालाएं थी । जिन्हें  कंठ में अर्पण करते हुवे उसने भी वाटिका के साथ पुष्यपद की आगवानी की  ॥ 

यामि रमन सन रल रलियाई  । दपित धूप दिन दीप जराईं  ॥ 
साथ पाथ पत फर फुर वंदन । नीराजन कर किए अभिनंदन ॥ 
रात्रि अपने प्रिय प्रभात के सह स्वागतार्थ सभी के साथ घुल मिल गई । और दिवस ने दीप्त होकर धुप का दीपक जलाया । जल, अक्षत, पत्र,फल,पुष्प ने भी सम्मिलित होकर आरती-वंदना  करते हुवे पुष्य का अभिनन्दन किया ॥   

आवपन पत चरन-चरन, किये द्वार प्रबेस । 
आवभगत पर आसिते,पौस अपनपो देस ॥ 
चरण-चरण पर (पुष्प) पत्र बिखरते चले गए, आवभगत के पश्चात द्वार प्रवेश कर पौष अपनत्व के आसनदेस पर विराजमान हुवा ॥ 

कुमुद कलित कर थाल सर, धारे दुर्बा केस ।
पखारत पद पंकज धर, रैनि संग राकेस ॥  
थाल स्वरूप सरोवर में कैरव कुसुम एवं किरणों की दुर्वा सजाए, रजनी  के संग  राकेश ने पुष्य वर्ष कोष के पंकज के सदृश्य चरणों को नमन कर उनका प्रक्षालन किया ॥ 

शुक्रवार, १ ४ जून, २ ० १ ३                                                                                              

नवम चैल दिन ऊपर घाले । नियरै अगवनु प्रसवन काले ॥ 
एक दिन वधु बर कहति अधीरे । अजहुँ न गवनहु गेहु बाहिरे ॥ 
नौ महीना पूर्ण हुवे गर्भ ने कुछ दिवस और लिए । प्रसव काल निकट आ गया ॥ एक दिन वधू ने वर से अधीरता पूर्वक कहा अब तुम कहीं बाहर देस मत जाना ( क्योंकि प्रसव काल निकट आ गया है ) ॥ 

तेहि काल  तौ बर दिए काना । समऊ परतस दिए न ध्याना ॥ 
कार पाल के करमन कारे । चारि दिन  पर गवने बहारे ॥ 
उस समय वधु की बातें वर बड़े ध्यान से सुनी । समय व्यतीत होने पर फिर ध्यान नहीं दिया  ॥ कार्य पालक के कार्य कर्तव्य पूर्ण करने हेतु फिर वधु के प्रियतम  चार दिवस हेतु कहीं बाहर चले गए ॥ 

बहुरत बर बधू बहुत रिसाई । सौंतुख दु तीत बोल सुनाई ॥ 
भूर गहत बर कहे समुझाए । ऐसन कथन कर जोर मनाए ॥ 
लौटने पर वधु वर से बहुंत ही रुष्ट हुई । सन्मुख पड़ते ही दो तीखी बातें कह दीं ॥ भूल हो गई ऐसा कह कर वर ने वधु को समझाते हुवे याचना करते हुवे मनाया ॥ 

मैं धूप और तुम घन छाया । में सरूप तुम रूप सुकाया ॥ 
तुम अगनी में अगनि पतंगा । दोनौ के मन एक सर रंगा । 
और इस प्रकार स्तुति करने लगे कि में धूप हूँ, तुम छाया हो और धूप घर में अच्छी नहीं लगती । तुम सुन्दर काया का एक भेद हो, तो मैं काय कलेवर हूँ । तुम अग्नि हो तो में अग्नि का पतंग हूँ किन्तु दोनों के ह्रदय एक ही रंग में रंगे हुवे हैं ॥ 

बोली मह करुबर पर्क, बोलहि मह मधु धूर । 
बोलहि फर कंटक प्रिये, बोल मह झरे फूर ॥ 
बोलों में ही करेले का रस घुला होता है और बोलों में ही शक्कर घुली रहती है । हे प्रिये बोली में ही कांटे उगते हैं, और बोली में ही फूल
झड़ते हैं ॥ 

शनिवार,१ ५, जून, २ ० १ ३                                                                                             

श्रुत अस श्रवन बधु मंद हाँसी । रमित बचन बहु मधुरित भासी ॥ 
प्यारे पिया सुनहु मोरी । मोर कह्बती मानहु थोरी ।। 
ऐसा सुनकर वधु  धीमे से हँसी । लुभावने शब्द  समूह के साथ मधुरता पूर्वक बोली  । मेरे प्यारे पियातम हमारी  बात सुनो और थोड़ा सा हमारा कहना मानो ॥ 

हँसे प्रिय ऊँगरी धर ठोरी । हाँ हाँ कहिं मुख कृति कर भोरी ॥ 
छिमा दान करू भूरन मोरी । अजहुँते करहुँ भगतिहि तोरी ॥ 
तब प्रियतम ठुड्डी पर उंगलियाँ रख कर हंसने लगे । और मुख की आकृति अबोध स्वरूप में करते हुवे हाँ हाँ करने लगे ॥ और बोले मेरी भूल को क्षमा  करो अब से में तुम्हारी ही भक्ति करूंगा ॥ 

कहि बधु जो मम गर्भन जागे । सो जग अवनु कुलबुलन लागे ॥ 
कुल धर धारिनी जोउ होई । तव भाव भगति चहहीं सोई ॥ 
वधु ने कथन किया हमारे गर्भ में जो जीव अंकुरित हुवा था, वह संसार में जन्म लेने हेतु कुलबुलाने लगा है ॥ वह चाहे कुल का दीपक हो या दीपिका जो भी हो तुम्हारी भक्ति अनुराग उसे चाहिए हमें नहीं चाहिए ॥ 

श्रुत ऐसन प्रिय भए गंभीरे । बाहु पास लिए कहिं बहु धीरे ॥ 
सुनौ प्रिये मम प्रान समाही । तुम हो तौ को संकट नाही ॥ 
ऐसा सुन कर प्रियतम गंभीर हो गए और प्रियतमा को बाहु पाश में बांधते हुवे धीरे से कहने लगे ॥ सुनो मेरी प्रिया मेरी रान समा जब तुम हो तो फिर संकट कैसा ॥ 

दुइ दिवस गत भइ एक निसि, सन प्रसवन के पीर । 
हहरर  बहियर होवती, गहबर अकुल अधीर ॥ 
दो दिवस के व्यतीत होने के पश्चात प्रसव पीड़ा के सह फिर एक यामिनी का आगमन हुवा ॥ गहन व्याकुलता और अधीरता लिए वधु आक्लांत होने लगी ॥ 
   















Thursday, May 16, 2013

----- ॥ सूक्ति के मणि 8॥ -----

बात कही लगे सरसित भासी । पर लहि रहि बहु दुःख की रासी ॥
सुधाधार धर बर अंतस रूखे । सुखोपर बधू भीतर हूँके ॥

छन महँ सुत सुमिरत घन गाढ़े । दोनौ के लोचन जल बाढ़े ॥ 
कहँ पिय मम पुत पुनि अवतारे । घारे रूप रह गर्भ तिहारे ॥

एहीं बचन सुन वधु हरषाई । एक भाँतिहि भै मंगलताई ॥
जे दरसन दे नयन दिखाई । पट आँगन को बदरी छाई ॥ 

छिनु भर कबि थर सोच बिचारे । अस भाउ कास ब्यंजन कारे ॥ 
गहन प्रबन बार सरग उतारे । करुनारुन कहि कर सिंगारे ॥ 

कभु धीरज हीन धेना कभु सुख सागर सार ।
थिरत अवगाहत दौनौं करना बच्छल धार  ॥  


शुक्रवार, १ ७ मई, २ ० १ ३                                                                                             

बस दौ चारि दिन उपर कलिते । गही बधुटी गातक सममिते ॥ 
जान परख प्रसूत पहिलौठे । करत सँभारी दूजन औठे ॥ 

इत कुल गेही रीति बनाईं । गृह जाई पर कलह न जाईं ॥ 
को कारन कर कही न जाई । परख परस्पर लाग लड़ाईं ॥ 

भरे दोष के अगणित अंतर । सिधि धर विभ्रंस मारे मंतर ॥ 
महिमा रति की अति दुर्गति कर । मन मति तमो गुनी के प्रति कर ॥ 

हबिर गेह दै हबिश कलित कर । दुर भासन के भुज आहुति भर ॥ 
धूनिहि रमाए धुबित धूति धर । धूम केतु कर बर धू धू कर ॥ 

उरप तरप धूर्त रचना कर । धूमलायन गृह धुर ऊपर ।। 
आराधन बिघन जे कोऊ कर । जरत परजरन धरे परेतर ॥ 

जारी सदनि  सुख सम्पद करत कुल निस्तेज । 
जह घर जनि कलह कलेष सह चालत बोल मुख तेज ॥ 

क्रोध कलित बचन दै तस छनमहँ तिनका तोर  । 
जस कुलिस अस्थि उपल जस लोह कराल कठोर ॥ 

शनिवार, १ ८ मई, २ ० १ ३                                                                                            

सदन सभा सद सबहिं उपाधी । कोउ  लउ लेस को बहु राधी ॥ 
अनभल गरुएँ हरियरि भलाई । मंगल समऊ बाम बनाईं ॥ 

गर्ज तर्ज कभु अस गरियाएँ । हरिन हृदय पल महँ डरी जाएँ ॥ 
को दिन कलबलि कुडकुड भाँती । को दिन करकत करकट जाती ॥ 

कटु भाषन जस कलह काटिके । कुल काजरि करि बचन गारि के ॥ 
कमाए धमाए कुल मर्जादे । खोवति आपन  कर दुर्बादे ॥ 

कभु बधुटी के दोषन छाँटे । दुःख बहुल कर बहुतन्ह डाँटे ॥ 
कभू बरतें दुह साध सुभाऊ । कह्बत नहीं होत पछिताऊ ॥ 

हंसनी कला जननी की महिमा अपरम्पार । 
सुथरी कंठ बिराजि कै बिगरी बदन दुआर ॥ 

रविवार १ ९ मई, २ ० १ ३                                                                                         

पर एहि बारी सजन सलौने । द्वेष दीप मह रहे न मौने ॥ 
कहत सकल जन समझ बुझाई । आप लराई केलि पराई ॥ 

पिया उपदेस अस गुनताई । ढोल कुलाहल तुतरि बजाई ॥ 
उलट पडत सब बहुतहि सुनाए । हमरेहि जाए आँखी दिखाए ॥ 

बदन बचन तन चामी चढ़ाए । तेहि चरन हम पे चढ़ी आए ॥ 
बानी तिख बर उर पर सारे । मरम भेद कस घाव उकारे ॥ 

सुन प्रिय जन के भली बुराई । लोचन पट पिय सीस झुकाईं ॥ 
गही कपट सयान प्रभुताई । बिधि करबस गृह कुमतिहि छाई ।। 

कलि कलह पियारे सदन मुख छोरत चिंगार । 
बुझा कोयरा जरा तन  तस बर अगनी धार ॥ 

अस कह्बत बधु सइ कहत सयन सदन पिय रैन । 
मंद गति गहे सबहि जन समझे ना मम बैन ॥ 

सोमवार, २ ० मई, २ ० १ ३                                                                                                  

एक पुत दुःख दुज गर्भन गाहे । तिस पर कुल कलेष बिलखाही ॥ 
तेहिं बले अस कुल के नाईं  । तरु बलयित बेली के ताईं ॥ 

लाग पाछ पुनि कपट कुचाला । बक जातिहि जस चाल मराला ॥ 
रहे अस फेरन की कुल फोरुँ । मधुर नतैति बिच माहुर घोरुँ ॥ 

 पुनि एक बासर रोष अधीना । मंत्र रसन मुख मन मति हीना ॥ 
कँह गृहजन कथन कुठारे। आप गृहस्तिहि आप सँभारें ॥ 

निसंकोच लै खाट खटोरे। रहू दुनौ को औरन ठोरे ।। 
धरनिहि फाटे बदरी मिलाए । कहें संत उर कौन सिलाए ॥ 

चढ़ बढ़ ऊपर छोलत छाँती । घर मँह बोली साढ़े साती ॥ 
दुरभावन जुग बचन बखाने । हीत अन्हीत कछु नहि जाने ॥ 

एक बाल उदर प्रबेसहि, एक निर्गम संसार ॥ 
एक दुखार्त बिरतत नहि दूजन खड़े दुआर ॥ 


मंगलवार, २ १ मई, २ ० १ ३                                                                                                         

मन ही मन बधुटी एहि चहही । कलेश ते बर कहुउत रहहीं ॥ 
अघ वधु उर पिय भलमनसाही । पालक तज कहुँ जाउ न चाही ॥ 

सोचि पीया मन ऊंच निचाही । अजहुँ त लघु बहिन अन  बियाही ॥ 
पहलहि बर भ्राता अपर अवासे । कलहन कारन बिलगत बासे ॥ 

नात नतेत लोग लोगाही । जित मिल मूँ उत बात बनाहीं ॥ 
सकल समुदाए कहन कहाहीं । देखौ तौ कैसे बिलगाहीं ॥ 

घर भाजन ना सोभ समाजू । जे कारज तौ होत बियाजू ॥ 
चरत बिचारत पिय मति ओढ़े । समाधान समऊ पर छोड़े ॥ 

भाग्य क्रम बिपरीत कर नखत लिखत बल लेख ॥ 
सोचे पिय कर्म निज बर लेखीं लेख सुलेख ॥

बुधवार, २ २ मई, २ ० १ ३                                                                                               

इत घर परे न को कर सांती । कलि कर गृह जन दिनु राती ॥ 
कबि अनदेखत मानस दोषे । बार बार कलजुग को कोषे ॥ 

सिख लिख कँह जे आखर भेंटे । ते ज्ञानी जे सार समेटे ॥ 
रहे सदस गन बड़ गुन राधे । धारे कर बर मान उपाधे ॥ 

ऊंच बिचारी नीचक कारे। बर बुध मति अति दुर मति घारे ॥ 
रही ना को बस बिषया सक्ती । केवल कारे कलह के भक्ति । 

अंत कलह कर एहि फल भीते । योजक हारे भाजक जीते ।। 
कारन नहि रहि धन के ताईं । कौतुक रहि जी के अलगाई ॥ 

लागे देखन कहुँ को अन्तिके । भाट भवनु अलि रवन रंतिके ॥ 
पर पी ऐतक  अर्थ न जोगे । बस रहि भोजन छादन योगे  ॥ 

पर राउ के पिया रही सेवक बहुत श्रम सील । 
खोजे ते मीलै नहीं, धरे कर कांति कील ॥ 

सोमवार, २ ७ मई, २ ० १ ३                                                                                         

गयउ प्रिय कार पालक पाहीं । अरु निज सकल बिपदा सुनाहीं।। 
रहि पालक प्रिय के श्रम तोषे । देइ सासकी गृह परितोषे ॥ 

पिया जे के रहि न अधिकारे । नियमन नियतन बंधन धारे ॥ 
पर कार पालक किए उपकारे । दुइ कछ के छादन कर धारे ॥ 

ते छादन रहि बहुतहि दूरे । मात-पिता सन बहिनि बंधु रे ॥ 
एहि सोच प्रिय तनिक अरु ठाढे । गृहजन चरन मधुरता बाढ़े ॥ 

बचपन ते रँह गहज दुलारे । कभु कोउ कभु कोउ कर धारे ॥ 
कभू तात लिए गोद बिहारे । कभु बंधु बहिन कँह रे आरे ॥ 

बिलगत पीया के नें भरी आए । ताके भावना कही न जाए ॥ 
मात-पिता भगिनी प्रिय भाई । देखि पीया कातर दृग ताईं ॥ 

अंत मह सकल संजुग जोरे । पाँ परी बधु  दु बूँद निचोरे ॥ 

लेइ सकल आसन छदन, धरे बाहिका जोर । 
देखत पिया फिरत फिरत, नयनन मह भर नोर ॥

मंगलवार, २ ८ मई, २ ० १ ३                                                                                     

जे गंध राज गृहबन बासे । देख बदन बधु कहत उदासे ॥ 
बोलि बचन मुख करत मलाना । हम बालक तुम पाल समाना ॥ 

सखा बंधु तुम प्रान पियारे । मृदुल नयन पल सजल निहारे ॥ 
आगिन कहि जोरत दौ हाथे । ले जाउ न हमहूँ निज साथे ॥ 

सकल सुम जब बिनति कर पाई । नलिन नयनी कंठ भर लाई ॥ 
अली कली कल रंग सुरंगे । बिकल बधुन्ह सकल लिए संगे ॥ 

बही बहनु बहु धूरि उराई । धुंध कार नभ ऊपर छाई ॥ 
दुआर अटार भवन मुहूटे । मात-पिता प्रिय पाछिन  छूटे ॥ 

सुन्दर बिपिन बीच बसे सुभग सासकी धाम । 
नदि सेतु कर पार पहुँच किये दुआर प्रनाम  ॥
 

बुधवार, २ ९ मई, २ ० १ ३                                                                                           

पर राउन्ह एक नियम बनाए । सुफल भै ना को काम कमाए ॥
जब लगि दै ना दान दखीना । चाहे कैतक भयौ प्रबीना ॥ 

देइ दखीना भवन प्रबेसे । जै कर ब्रम्हा बिष्नु महेसे ॥ 
भीत भवन रहि धूरि धुराई । को खनि कल मल काल कुराई ॥ 

कंकर कंटक कोट कटीले । बहिर भवन रहि बिमौट टीले ॥ 
कहुँ बेली के तरु सुखदाई । कहूँ पात धर झुरि अमराई ॥ 

पाछिन भइ पीपर की छाई । पहिले रहि ते मकै उगाईं ॥ 
ठाढ़ रही इमरी एक कोरे । दूर जमुन लागे बहु भोरे ॥ 

पीत भीत अरु कोर कियारी । फूर फूर फिर फुरि फुरबारी ॥ 

जीवित जीव जंतु सहित, सकल बिपिन रहि सोह । 
कल कंठी के कल कूज, बधू के लिए मन मोह ॥

गुरूवार, ३ ० मई, २ ० १ ३                                                                                                  

जुग दम्पति अस सँजोउ जोईं । असन रसन ते साजि रसोई ॥ 
सकल भवन बन जतन बिलासे । सयन सदन एक बैठक बासे ॥ 

जब बधूटि सन नैन मिलाई । मिलतहि उपबन भू सकुचाई ॥ 
फिरत बन माहि बधु मुसुकाई । सकल चरन रिपु उपल हटाई ॥ 

परसत बधु के पदुम पाद कर । सकल बाटिका भै अति सुन्दर ॥ 

पाँख पेख पख बहु सुख पाई । पद पद उलसित पत सरसाईं ॥ 

अली कली कल जल सुत सींचे । भयउ मगन सब नैनन मीचे ॥ 
मरग करक कठोर कन चिन्हे । मृदा मृदित कर कोमलि किन्हें ॥ 

सुर सरि उपवन सँगायन धरा गगन के संग । 
श्रील निवास रमा रमन भरे प्रकृति मह रंग ॥ 

शुक्रवार, ३ १ मई, २ ० १ ३                                                                                           

सखा सुमन जे भए ससुरारी । बधू करतल तेहिं के धारी ॥ 
फूर प्रफूर परस्पर मिलाए । बहु कुटुंबी कर बीच बैसाए ॥ 

बाड़ी सुमनस अस रलमीले । जल बूँदी मह जस जलमीले ॥ 
दो दिन लिए अरु पोषन पाईं । सुर भवन के सोभा बढ़ाईं ॥ 

जोग जुगलिन्ह घर जतनाही । अनुकूल दिन पिय गए दिज पाहीं ॥ 
तब दिज पोथी पत्तर पेखे । सुभ दिन करतन हवि हुति लेखे ॥ 

हवं रसन हवि पूजन भोरे । हव्य कव्य अहवन पिय जोरे ॥ 
श्रिया श्रीकर की कथा कराए । हविर बहनु ते भवन पविताए ॥     

श्री के सह श्रीधर मंडप प्रियकर मंगल घट तीर धरे । 
ले सत्य अनुरक्ति ह्रदय मह भक्ति दिज श्री मुख कथा करे ॥ 
धर बधु के आँचर बर के पट तर देवत दिज गत जोढ़े । 
बिधिबत पूजन कर साँकल कर धर दंपति आसन पौढ़े ॥ 

दै अंतिम हवन आहुति करत स्वाहा कार । 
भयौ निर्मल सकल भवन मंत्रोदक कन धार ॥ 



  








Thursday, May 2, 2013

----- ॥ सुक्ति के मनि 7॥ -----

बुधवार,१ मई, २ ० १ ३                                                                                        

जदपि तातहु उर दुःख अधीना । बाल बिरह बस रहि बहु दीना ॥ 
तद्यपि पुरुष भए करक सुभाऊ । नारि धैर धरि बिधि कसि काऊ ॥ 
यद्यपि पिता  का ह्रदय भी दुःख के अधीन, बालक के वियोग के  वश होकर  व्याकुलता  से परिपूरित था ॥ ताध्यापी पुरुष 
जाति का ह्रदय कठोर प्रकृति का माना  जाता  है, अत:  वह  धीरज धर कर दुःख सह लेता है । किन्तु  नारी  जिसे  कोमल 
हृदया कहा गया है बालक- बियोग के दुःख को किस प्रकार सहे ॥ 

बधु के करून दसा दुखदाई । बर के लोचन लखत न जाई ॥ 
सोचे बधु  के पीर पहारे । कौन सहारे कवन उपारें ॥ 
वधु की करुणा मयी दशा अत्यंत दुखदाई थी । जिसे वर की आँखें देख नहीं पा रही थी उसने सोचा,  वधु की  पीड़ा  तो पहाड़ 
जैसी हो गई है अब ऐसे पहाड़ को कैसे,किस उपाय से उपाड़ें ॥ 

 बूढ़त अस संतप के सागर । सिराउ न जाइ बपु बपुर्धर ॥ 
सूझ बूझ एक दिवस बहोरे । ले गए बहिअर पीहरू पौरे ॥ 
शोक व संताप के सागर में ऐसे डूबते हुवे  कहीं यह सुन्दरा की मूरत विसर्जित न हो जाए । सो सोच समझ  कर एक दिन उसे 
उसके पीहर घर में ले गए ॥ 

जडत ह्रदय हर जड़ हारी । हरिद मुखी तनी हरि हरियारी ॥ 
पर नारी मन भेद न पाई । का गति रहि का देत दिखाई ॥ 
वहां उसके निश्चेष्ट ह्रदय की चेतना लौटी । पिले पड़े मुख पर हरियाली छा गई ॥ किन्तु नारी के मन के भेद कोई जान नहीं 
सका । वह रहती कुछ औउर ही अवस्था में है और दिखाई कुछ और ही देती है ॥ 

अस दुखि उर पर नैन भर प्रेम प्रीत अनुराग । 
पुनि चारति जीवन चाक प्रिय के लागी लाग ॥  
ऐसे दुखित ह्रदय से, किन्तु आँखों में प्रेम प्रीति और अनुराग भरे वधू, जीवन के चक्र को फिर एक बार चलाती हुई प्रियतम
आसक्ति में ही प्रवृत हो गई ॥ 

गुरूवार, २ मई, २ ० १ ३                                                                                          

पुनि एक दिन अट भवन अटारी । मंद मंद रहि चलत बयारी ॥
सुरभि गंध रस राजन सानी  । सरसति परसति रति रत रानी ॥ 
पुन:एक दिवस भवन अटारियों को छूती, सुगन्धित सुगंधसा, गुग्गुल, बेला,मोगरा,चन्दन में घूलि और रात की रानी के स्पर्श
से अनुरागित हुई,  मंद मंद वायु बह रही थी ॥ 

ढरत रहि बस साँझ सिंदूरी । रजत रजस लस रयनिहि रूरी ॥ 
हरि हरि रख नख अम्बर घारी  । होत निरंतर  गहरत कारी ॥ 
सिंदूरी सांझ बस अपने ढलान पर ही थी ।  पराग के उज्जवल कणों से लिपटती रजनी शोभायमान हुई ॥ अम्बर में धीरे धीरे 
तारों को बिछाती वह , निरंतर गहराती ही जा रही थी ॥ 

लावन सस लख लोचन तरसे । ततछन सम्मुख दरसी अरसे ॥ 
मौलि मयूख अस आकारषे  । मनु नउ दुलहिन दर्पन दरसे ॥ 
आँखें शशि की सुन्दरता के दर्शन करने के लिए तरस गईं । तभी लोचन के सम्मुख वह अक्ष पर दिखाई दी ॥ उसके मुख की 
कांति  ऐसी आकर्षक थी कि मानो कोई नई दुलहन दर्पण देख रही हो ॥ 

नभ प्रकास बिथुरि कर ऐसे  । प्रभा श्याम मनिक सर जैसे ॥ 
उदित मुदित मुद कुमुद बिकासे । मनहु मानस मानिक कासे ॥ 
नभ में उसके दीप्ती की शोभा ऐसे बिखरी जैसे नीलम हीरे आदि रत्न अपनी शोभा बिखरते हैं ॥ (ऐसे सुखपूर्वक वातावरण को 
देखकर ) हर्षित और आनंदित होकर प्रस्फुटित होते कुमुद मानो मन सरोवर में चमकते माणिक्य का आभास दे रहे थे ॥ 

अरु पखारविंदे अरारीलिंदे मुकुलित मुख मुद मुद्रिते । 
कौमुदनी ताला  कौमुदि माला तरि जल गल करि कलिते ॥ 
उद कन उदकाती चलि इठलाती सरिद सरा सरि सरिते । 
हिरनन संकासे कन कन कासे यामिनि जोबन लसिते ॥    
कमलों के नयन के द्वार पटल रूपी पंखुड़ियां आनंद मुद्रा में बंद होती चली गईं ॥ चांदनी, मालाएँ लिए कुमोदों के सरोवर मेंउतरी 
और जल के कंठ को विभूषित कर गईं॥ उदक कणों को उछालती गंगा के जैसी नदी इठलाती हुई प्रवाहित होने लगी । उसके जल 
कण चमकते हुवे स्वर्ण का आभास देने लगे और रात अपने पूर्ण यौवन श्री को प्राप्त हुई ॥ 

हिम किरन नग नगन नखत  सुन्दर गगन बिसाल । 
अति रुचिर प्रति बिम्ब परत दर्सत कुमुदित ताल ॥ 
पीयूष मयूख, रत्नों के समान अनगिनत नक्षत्र और अति सुन्दर विशाल आकाश का  अत्यंत ही सुन्दर प्रतिबिम्ब कुमुदों 
का ताल पर दर्शित हो  रहा है ॥ 

शुक्रवार, ० ३ मई, २ ० १ ३                                                                                           

इत प्रीतम पर भोजनु किन्हें । सयन सदन चर चरनन चिन्हे ।। 
पेख प्रिया के पल छल हीना । मंद कमल मुख दर्पन दीना ॥ 
इधर भोजन करने के पश्चात प्रियतम ने अपने चरण शयन सदन में उद्धृत करते हुवे प्रियतमा की निच्छल पलकें और 
मुरझाए हुवे कमल की भांति उदास मुखड़े को देखा ।। 

आए निकट गह कोमल हाथे । प्रिय कलत्र कर प्रेयषी साथे ॥ 
पाटन पट भए पाटल बरना । परत जुगल के कोमल चरना ॥ 
निकट आ कर कोमल हाथों के हाथ में लेकर अत्यंत स्नेह पूर्वक अपनी प्रेयषी को संग ले चले ।। इस युगल दम्पति के 
चरण पड़ते ही छत और उसके आवरण पर बसंत छा गया ।। 

प्रियतम बैने रमनत रैने । देखु रयनि के सुन्दर सैने ॥ 
राग लता रूप लावन धारी । हेम किरन वर भइ रतनारी ॥ 
उस रात छत पर भ्रमण करते हुवे प्रियतम बोले देखो सुन्दर की प्राण समा का रूप धरी और चंद्रमा के वरण से ललामित 
हुई यह यामिका कितने सुन्दर सन्देश दे रही है । 

हंस गमन तस चरनन चारे । नख नखत नेमि हंसक हारे ॥ 
मंजुल गमनी जब तनि दोले । हँसक हार हिलमिल हँस बोले ॥ 
हंस की भांति मोहक चाल चलने वाली के  चरणों  पर  उद्धृत  होते, तारे  चाँद  स्वरूप  में इसके  चरण  आभूषणों की मुक्ता 
मालाओं को देखो ।। जब यह सुन्दर चाल चलती है तो तनिक दोलित होकर इसके सारे आभूषण आपस में मिलजुल कर 
कैसे प्रसन्न होते हैं ।। 

कल मोर मन हर हरसाई । दुइ पल ठहरत रत बतियाई ॥ 
अस श्रवनत बधु कह मुसुकाई । तव कर गहि कहु का गुठियाई ॥ 
कल इसने मेरे मन को हरण कर लिया । और आह्लादित होती हुई दो पल के लिए ठहर कर लगन पूर्वक मुझसे थोड़ी बात-
चीत करने लगी ।। 

मैं पूछा सुन त रैनी कहन तक तोरी थाह । 
तिरछ्त नैन कर सैनी जँह प्रभात की बाँह ॥  
मैने पूछा अरे यामिका सुन तो  तेरी थाह कहाँ तक है । तो उसने नयन नचाते हुवे संकेत करते बड़े ही बांकपन से मुझे उत्तर
दिया, जहां प्रभात की बहियाँ हैं ।।

शनिवार, ० ४ मई, २ ० १ ३                                                                                    

श्रवनत पिय के बदनन रसने । बधु  के मृदु रद छाजन दसने ॥ 
पल भर मँह हर हँसक अराधे । मनहु मानस हंस निनादे ॥ 
पिया की रसमयी वाणी को सुन कर । वधू के कोमल अधर प्रस्तारित हो गए ।। और तत्क्षण ही हंसी उन होठों की सेवा करने 
लगी । मानो मान सरोवर में हंस मधुर ध्वनि भर रहे हों ॥ 

 जे मल प्रभ मुख अवरन दासे। नैनन रहि पट पलकन डासे ॥ 
ते अबरित  अन अबरन कैसे । सेज सयन नउ दुलहिन जैसे ॥ 
मुख पर जो उदासी का आवरण आच्छादित था । और आँखों पर पलकें प्रतिच्छादित थीं ॥ इन आवरणों का अनावरण कैसे 
हुवा जैसे सुन्दर और कोमल सदन शयनिका पर बैठी नव दुल्हन का आवरण, अनावृत होता हो ॥ 

मुख दर्पन चित्र कर कृत लाहे । चंदु  बदन बधु बर चक चाहे ॥ 
चाह नयन भर प्रियबर वन्दे । तव हँस धुनि सुन नंदन नंदे ॥ 
मुख रूपी दर्पण पर कांटी यूके छवि उभरी । वर वधु के मुख ऐसे निहार रहा था जैसे चकोर चाँद को निहारता हो ॥ आँखों में 
चाहत भर के प्रियतम ने इस प्रकार स्तुति की : -- तुम्हारी इस हंस ध्वनि से तो सारा नंदन आनंदित हो गया ॥ 

कोर कलित तव कज्जल नैने । उठी भृकुटि सुठि कुटिलक लैने ॥ 
दिसित गोचर काम सर षंडे । चलत जात कस कर कोदंडे ॥ 
काजल से विभूषित हुवे तुम्हारी आँखों के ये कगारे और हुवे यह उठी हुई सुन्दर भृकुटी ऐसी दर्शित हो रही है मानो काम देव 
सारंग कास कर अपने  सरासन समूह को छोड़ रहें हों ॥ 

समऊ परे तोहरि छबि लिनी । तेहि ससी बहुरत देइ दिनी ॥ 
लबध लवन लव श्री कर राजे । मनहुँ देइ हों साथ  बियाजे ॥ 
बहुत समय पहले चाँद ने जो तुम्हारे मुख छवि ले ली थी, अब उसे उसने लौटा दिया है । प्राप्य लावण्य तनिक अधिक ही 
सुशोभित हो रहा है । मानो उसने सुदरता के मूल के सह ब्याज भी दिया हो ॥ 

सुधाम्बर कपोल लाल मोहत मुखारविंद । 
भूमि भाल भरे तमाल  केस काल कलिंद ॥ 
अमृत से भरे होंठ, कपोल पर अरुण राग मोहित करता कमलमुख, माथे की भूमि पर यमुना के जैसे काले केश रूपी तमाल 
वृक्ष के सदृश्य हैं ॥ 

एक हिमकर गगन धरे एक प्रीतम के पास । 
गगन  धरनि के सम कास धरनि गगन संकास ॥
एक चाँद गगन धारण किए है एक प्रियतम अर्थात मेरे पास है । गगन, धरती के जैसे चकासित है और धरणी गगन के जैसे 
प्रकाशित है ॥ 

रविवार, ० ५ मई, २ ० १ ३                                                                                         

अस प्रिय के मुख वंदन उचरे । ताकत वधूटि मंजुल मुखरे ॥
जोंहि नयन पख मिलवन उधरे । पिया चरन मन मानस उतरे ॥ 
इस प्रकार प्रियवर के मुख वधु की सुन्दरा की स्तुति का उच्चारण कर वधु के सुन्दर मुखड़े को देखने लगा ॥ ज्यों ही वधु की 
पलकें मिलने के लिए ऊपर उठीं त्यों ही प्रियतम के चरण मन के मान सरोवर में उतर गए ॥ 

बाहु शिखर दल सार प्रलंबे । तरे वधुटि मुख अम्बर अंबे ॥ 
बाँधि प्रिया प्रियबर कर पासे । रति बल्लर प्रिय कोटर कासे॥ 
पिया ने कंधे सहित अपनी लम्बी भुजाएं प्रस्तारित की, तो वधु के अश्रु मुख पर उतर आए ॥ प्रिया ने प्रियतम को अंक में बाँध 
लिया तो प्रिया ने भी अनुराग पूर्वक भुजा पार्श्व में कस लिया ॥ 

पूर निभ बदनु सन्मुख किन्हे। कपोल रद पत के पग चिन्हे ॥ 
लौकित कन के लवनित ओटे । धरे कंपत होठ पर होठे ॥ 
पूर्णिमा के चाँद के जैसे मुख को सम्मुख करके प्रिया के कपोल पर अपने अधर पद चिन्हांकित किए ॥ लाउकित होते अश्रु कणों 
की लवणता ग्रहण करते हुवे प्रियतम ने प्रियतमा के कम्पायमान होंठों पर अपने होंठ रख दी ॥ 

अधरोपर अधरामृत पागे । रूचि कर कारक अति अनुरागे ॥ 
प्रीति प्रतीति रति रमन रुचिते  । मनहु मीलित मधु परक सुधिते  ॥ 
अधरों के दोनों पदों का मधुर अमृत का रसपान करते हुवे  प्रिया अत्यंत अनुराग मयी स्थिति में थे ॥ प्रेम,विश्वास, आसक्ति, 
सुन्दरता और मधुरता का मिश्रण इस प्रकार था कि जिस प्रकार से मधु पर्क का उचित संयोजन हो ॥ 

प्रियबर के अस परम रूप कोटि कमन रहि जीत । 
प्रिया के अस रुचिर सरूप सहस रति न उपमीत ॥ 
प्रियवर का ऐसा अनूठा रूप की तुलना करोड़ों कामदेव से भी नहीं हो सकती थी । और प्रिया के ऐसे मनोहर स्वरूप की सहस्त्रों 
राग लतिकाओं की उपमा भी नहीं दी जा सकती थी ॥ 

दिस अस दर्शन दीठ  देवन रतबत  बरदान । 
धनु कर काँधन पीठ रति रमन कर सर सुधरे ॥

ऐसे दर्शन देखकर सुन्दर वरदान देने हेतु  रति एवं रतिनाथ के काँधे व पृष्ठ ने काम धनुष को सुशोभित किया , और हाथ बाणों  
के दोषों को दूर कर शिल्प का स्वरूप देने लगे ॥ 

सोम/मंगल , ० ६/७ , मई, २ ० १ ३                                                                             

मुद इत मदयित  त्रिबिध बयारी । लहत बहत चलि बहु सुखकारी ॥ 
हिलग मिलग लग उरत पटोरे । बिगलित कुटल लेत हिलोरे ॥ 
इधर  मोद-प्रमोद  से  भरी  त्रिबिध  शरणी ( शीतल,मंद,सुगंध) बह  रही  थी, जो  आनन्द  उत्सव उत्पन्न करती हुई अत्यंत ही 
सुखकारी प्रतीत हो रही थी ॥ 

मंद मधुर रुर स्वर सप्तिके । गूंज करत रहि कहूँ अंतिके ॥ 
मुरज तुरज तुर तार तरंगे । कंठ कूनिक सार सरंगे ॥ 
संगीत के सात स्वरों के समूह की धीर मधुर ध्वनी  कहीं पास में ही गूंज रही थी ॥ ढोल,मृदंग,तुरही के साथ  तंत्र वाद्य की तरंग 
और वीणा सारंगी स्वरामृत भर रहीं थीं ॥ 

सुबर ग्राम कर कम्पत नादे । बाँध भेद जुग बाहन  बादे ॥ 
सुध सिध साधत सँग संगीते । बादन कारूक कह बहु रीते ॥ 
स्वर सरगम कम्पायमान होकर मधुर सुर उत्पन्न कर रहे थे ।  ताल-स्वर में बंधे हुवे गीत स्वरांतर ग्रहण करते हुवे स्वर वर्णों 
की संधि से युक्त होकर केवल स्वरयंत्रों के साथ निनाद कर रहे थे ॥ 

सुर सिंगारें सुरत  सुरीले । बढ़ चढ़ उतरत  कल रल मीलॆ ॥ 
सकल रागिनी रागत रंगे । गावत रहि कर संगति संगे ॥ 
सुरों का श्रृंगार करते हुवे आरोहवरोह क्रम से मधुर मिश्रण करते हुवे, संगी साथी संगती कर कोरस स्वरूप में समस्त रागिनियों 
को रंजित कर इस प्रकार उनमें रंग भर रहे थे ॥ 

एक प्रान पियारी भवन अटारी एक रतनारी रयना  ॥ 
एक सजन दुलारे सयन दुआरे एक अति न्यारी रयना  ॥ 
बिधु बदना बारे अधर अँगारे  लहकारे पट नयना । 
जल बलन पधारे पुहुप पियारे ललक ढारे पट नयना ॥ 
एक प्राणों के समान प्रिय प्रियतमा है, एक भवन अट्टालिका है, और  एक  ललामिक  यामिका  है । एक  शयन  द्वारिका  में एक 
प्यारे से साजन हैं, एक अत्यंत ही अनूठी यामिका है ॥ चन्द्रमा  की  मुखाकृति, अधरों  पर  जलते अंगार, और  उन्हें झुनका देते 
नयन पंख ॥ पतंग स्वरूप प्रियतम जलकर भस्म होने के लिए पधारे तो नयनों ने झट से पंख ढाल लिए ॥  
  
श्री जौबन के सौं साजन के नयनन दर्पन लई । 
लख रूप सिंगारत निरखे रतिबति निस दिन लागत नई । 
रुप बर्धन बर लावन श्री धर लाजत लाग लगई । 
भुजान्तर धारत प्रिया निहारत भाँवर साँवर सईं ॥ 
यौवन के सौंदर्य साधन हैं, सन्मुख साजन के नयनों का दर्पण लिये दर्पण में छवि निहारती,रूप- लावण्यता का श्रृंगार करती एक 
सुंदरी सदैव नव अंगना प्रतीत होती है ॥ रूप लावन्यता को तब और अधिक श्री प्राप्त होता है जब वह लज्जा में अनुरक्त हो जाती है । 
अंक में भरते हुवे प्रिया को निहारते पिया संग में भंवर रहे हैं ॥    

रत रात सुनहरी रति रूप सँवरी जोग जुगल पर छाहिं । 
प्रमद्त बहु लहरी पलभर ठहरी बिसर प्रात की बाहिं ॥ 
गावनी मंडली धुनी मंगली मधुरित सुर बरनई ।  
स्वर सुवागत रागिनि रागत रसित रमित रवनई ॥ 
रात अनुरक्त होती हुई यामिका राग लता का रूप धरे युगल दम्पति पर छाँव कर रही है । और आनन्द प्रमोद में लहराती प्रभात की 
आलिंगन को भूल कर थोड़ी देर ठहरती है ॥ 

कल नादी करतल कलित ताल बल अरु अति आनँद भरै । 
तरंगित ताल जल हंसक हलबल झनक झंकार करें ।। 
रंग राग परिमल कौमुदनी तल मानहु मानिक तरें । 
ज्योति पथ मंडल अवतरित स्थल मनि मनि जगमग करें ॥  
मधुर स्वरसाधक की हथेलियाँ, मधुर स्वर ताल के आभूषण धारण करते हुवे  और अधिक आनन्द भर रही हैं । हंसों की हलचल 
से सरोवर का जल आरोहित-अवरोहित हो रहा है और झनकते हुवे झंकार उत्पन्न कर रहा है ॥ कुमकुम के रंग में अनुरक्त होते 
जल की सतह पर प्रस्फुटित कौमुदनी ऐसे तैर रहीं रहे हैं मानो मणियाँ ही तैर रहे हों । आकाश मंडल ने भूमि पर अवतरित होने
 से सारी मणियाँ  जगमगाने लगी ॥ 

एक छात दौ  बल्लभा रस सिंदूरी रंग । 
एक बियोगित पिया जोग दुजी पिया के संग ॥  
एक छत में श्रृंगार रस में अनुरक्त हुई दो प्रियतमा हैं । एक पिया से वियोग दूसरी पिया के संग में है ॥ 

दिरिस देहरि दुआर पर  चिन्हित चरन उतार ।
अरुनार्विंद आधार प्रियबर मन मानस बसे ॥
चरणों को चिन्हांकित कर दृष्टि  द्वार की देहली के पार करते ह्रदय रूपी आरु अरविन्द पर आधारित होते प्रियवर मन के मान 
सरोवर में बस गए ॥ 

बुधवार, ० ८,बुधवार, २ ० १ ३                                                                                                

सेज सयन थरि सर नीकासे । अबरन सीतल जल संकासे ॥ 
फुर भव भूषित पत प्रस्तारे । मनहु कुमुदहि सुरंगन सारे ॥ 
शयन भवन अथल के और शयनिका सरोवर के जैसे प्रतीत हो रही थी । और शय्यावरण शीतल जल अनुभव प्रस्तुत कर रहा 
था ॥ अलंकृत किये हुवे सरस पुष्प की पंखुड़ियां से युक्त शय्या मानो  उस सरोवर में गाड़े लाल रंग के कुमुद ही विस्तारित हों ॥ 

कुसुमित केसर पल्लव पूरे । लाह मनिक मनु कोपर रूरे ॥ 
सरस सुगन्धित साँस सुबासे । केतन बन बहु केतक बासे ॥ 
पूर्ण स्वरूप में प्रफुलित पुष्प पत्र के रंग की कांति ऐसी थी मानो परांत में माणिक्य चमक रहे हों ॥ शुद्ध सुरभित गंध साँसों को 
भी सुगन्धित कर रही थी क्योंकि भवन के छोटे से उद्यान में केवड़े के बहुंत सारे  पुष्प प्रस्फुटित हुवे थे ।। 

ज्योति थंब बहु जुगत जराहीं । रतनाकर मनि रतन धराही ॥ 
किरनन कर कन कनक बिकिरने । बिकल करन कर बिदयुत पर्ने  ॥ 
प्रकाश स्तम्भ अत्यधिक तीव्रता पूर्वक ज्वलित थे । मानो रत्नाकर ने अपने समस्त मणि रत्न ही उन्हें प्रदान कर दिए हों ॥ उनकी 
किरणे स्वर्ण की आभा बिखेर रही थीं, जो की विद्युत् अप्सरा की भी सुन्दरता को निन्दित कर रही थीं ॥ 

जस फुरित फूर बर फुरबारी । अरु को दीप धरे चिंगारी ॥  
लाह बसन तन कर्पुर गौरे । प्रान समा अस पिया अँकौरे ॥ 
जैसे पुष्पित पुष्पिका उद्यान के आलिंगन में हो, जैसे ज्वाला कण दीपक के आलिंगन में हो । 
जैसे धवली देह पर वस्त्र लब्धित हों वैसे ही अर्द्धागिनी अपने प्राणाधार को आलिंगित की हुई थी ॥  
    एहि प्रेम प्रसंग को न देखे । लखत लखित को लेख न लेखे ॥ 
अस सुरती रत तम अट घेरे। दुअर दरस बन दइ पट भेरे ॥ 
इस प्रेम प्रसंग को कोई ना देखे और देख समझ कर कोई लेख न लिख दे ॥ ऐसा ध्यान करके रात ने उन्हें अपने  अन्धेरे का घेरा 
किया और द्वार पालिका बन कर द्वार के पट मोचित कर दिए ॥ 

अधरन बधु कलित कल हँस, नैनन धरे सनेह । 
साईँ ह्रदय सौंप दियौ सौंपी आपन देह ॥ 
वधु ,अधरों पर मृदु हास्य विभूषित करते और नैनों में स्नेह धारण करते हुवे प्राणाधार को ह्रदय सहित देह भी सौंप दी ॥ 

गुरूवार, ० ९ मई, २ ० १ ३                                                                                                   


बधु अस जस रति सहस सँवारी । सरबस रूप रस प्रिय पर बारी ॥ 
प्रिय के वपुधर रुचिरत ढारे । अंग कोटि कमन न्यौछारे ॥ 
वधु ऐसे प्रतीत हो रही थी जैसे सहस्त्र रति संवारी गई हों । उसने अपना सर्वस्व रूप पीया पर वार दिया । प्रियतम सुन्दर का 
स्वरूप लिए हुवे थे । उनके अंग ऐसे थे मानों करोड़ों मदन न्यौछावर हो रहे हों ॥ 
फुर फर बारिहि फूरत सिधाए । ज्यूँ चिंगारी बरत सिराए ।। 
त्योंहि प्रिया पिय सह सुहाई  । तन मन सन करी सेवकाई ॥   
फुलवारी में जैसे पुष्प प्रस्फुटित होकर समाप्त हो जाता है । जैसे दीपक में ज्वाला कण जल कर समाप्त हो जाती है । वैसे ही प्रिया 
भी प्रियतम के साथ सुशोभित हुई और  उनकी तन मन से सेवा की  ॥ 
  जस चन्द्रानन चातक चहही । असही प्रिय बधु निरखत रहही । 
मधुकर छबि भर पिया अनंदे । सोषत बधु के रूप मकरंदे ॥ 
जैसे चन्द्रमा के मुख को चातक चाहता है । ऐसे ही अली वल्लभ भी वल्लभा को देखते ही रह गए । उन्होंने मधूप की छवि रूप 
धारण कर अपनी प्रियतम के रूप रस को शोषन कर आनंदित हो रहे थे ॥ 

लता ओट जब किरन लखाई । परन करत रत मुसुकाई ॥ 
चहत  ससि गृह लोचन झाँके ।  मनै करत रत झट पट राखे ॥ 
लतिकाओं का ओत लेकर जब किरणे ऐसा दृश्य देखने लगी । तो मुस्कुराती हुई यामिनी ने उअसे दूर हटा दिया ॥ जब शशी ने 
झरोकों से झांकना चाहा । तो उसे भी मना करते हुवे रात्रि ने झरोखे के द्वार बंद कर दिए ॥ 
  अधर उँगरी धरी कहत चुप सरी कोउ न कलरव करीं । 
भए मुखरित बैनी लोचन सैनी देखु तनिक अवसरी ॥ 
हम पर कोऊ ना देखन दौ ना हठ करि मुद मदयन्ति । 
कहि नाहि नाहि रद छदन दसाही दुआरि रत रतियन्ति ॥ 
अधरों पर उंगली रखकर, कही की थोड़ी चुप्पी साधो कोई भी शोर मत मचाओ । संकेत वाणी से आँखे मुखरित हो उठी और कहने
लगी किंचित अवसर तो देखो । तब मेहंदी की पंखुड़ियां कहने लगी हम कोई पराए नहीं है किंचित हमें तो देखने दो ॥ तो यामिका 
ने मुस्करा कर दुआर से लग कर कहा नहीं नहीं ॥ 

कामिनि कंचन सन कमन करें सुन्दर सँजोग । 
सुन्दर सेज सयन सदन सुन्दरि रत रहि जोग ॥
धनलक्ष्मी के संग कामदेव स्वरूप हरी सुन्दर स्वरूप में संयुक्त हैं। और सदन की सुन्दर शयनिका यामिका यामिक संकास है॥ 

शुक्रवार, १ ० मई, २ ० १ ३                                                                                   

लेइ बिदा रत चलि पिय पाहीं । सकुचहिं गहि बिहान के बाहीं ॥ 
उयइ प्रभा बहोर अलसाई । जल सुत सेचत सजन जगाई ॥ 
यामिका ने अपने प्रियतम के पास जाने हेतु विदाई ली । और संकोच कराती हुई प्रभात के भुजाओं में समा गई ॥ फिर भोर में प्रभा अलसाती हुई उठी और जल के मोती स्वरूप ओस कानों का सिंचन करते हुवे अपने प्रियतम सूर्य को जगाया ॥ 

चली नाउ जल नभस नभौके । नभ केतन थित चासत चौंके ॥ 
चारु हाट लग बाट अँबारी । बैठ बस्तु ले बनि मनिहारी ॥
जल में नौकाएँ चलने लगी नभ में पक्षी विचरने लगे । फिर सूर्य ने समस्त चौंक चौराहों को प्रकाशित कर दिया ॥ मार्ग पर स्थित 
भवन खण्डों से  लग कर  पणिकाएँ सज गईं । और श्रृंगार सामग्री के  विक्रेता और  व्यापारी गण विभिन्न वस्तुओं लेकर 
विराजित हुवे॥ 

तापन तप बहु ताप चढ़ाई । गली गली सब करत सिंचाई ॥ 
एक बर्निक पुर मंजुल पेखे । बरन बर्ति ले चित्र बर लेखे ॥ 
ग्रीष्म ऋतु में सूर्य बहुंत ही उष्णता उत्पन्न कर रहा था । उष्णता से बचने के लिए सब गलियों को सिंच रहे थे ॥ एक लेखक ने 
जब ऐसा सुन्दर नगर देखा तो उसने तुलिका लेकर चित्र-शैली में उस नगर का सुन्दर वर्णन किया ॥ 

बहत धरनि जल पवन अगासे । परत धूरि पर फूर उकासे ॥ 
कहुँत उमग कहुँ सोक निबासे । कहुँत आस जी कहूँ निरासे ॥ 
धरती पर जल प्रवाहित है और गगन में वायु प्रवाहित है । धुल की परतों पर पुष्प विकसित हुवे । कहीं उमंग उत्सव  कहीं शोक 
का निवास है । कहीं जीवन आशा हैं तो कहीं निराशा है ॥ 

जीवन धूर्बाहन सम सुख दुःख जाके चाक । 
एक अड़ंग ते दुज बाढ़ चालत जात दे हाँक ॥ 
जीवन एक भार वाहक वाहन है, सुख और दुःख उसके पहिये हैं यदि एक रुकता है तो दुसरा उसे हांक देते हुवे बढ़ा ले जाता है ॥ 

जीवन एक मासहू सम सुख दुःख जाके पाख । 
एक आवन एक पयाने   मावस राका राख ॥ 
जीवन, वर्ष के एक मॉस के समान भी है जिसके दुःख, कृष्ण और सुख, शुक्ल स्वरूप में दो पक्ष है। एक के आते ही अमावस-
पूर्णिमा अर्थात उत्सव-दिवस एवं शोक-दिवस रखते हुवे दुसरा प्रस्थान करता है ॥ 

शनिवार,१ १ मई,२ ० १ ३                                                                                           

इत जग सन जग मोहिनि जागी । बसन सँभारत सयनि तियागी ॥ 
सयित सजन छबि बदन लखाई । सुरत रैन अँखि पखि झुकि आई ।। 

तनि सकुचाह मंद मुसुकाई । लाग लगावत लाज लजाई ॥ 
बरनत बर्निक रूप सुँदरी के । अद्भुत अनुपम अतुलित लीखे ॥ 

पुनि समऊ पख पाखिहि लागे । पहर दिवस लखवन भागे ॥ 
को पल तापत को सुखदाई । जनु धूप कहुँत कहुँ परछाई ॥ 

सुमिरत सुत कभु चित कर भारे । बेसिक झोरि धर रोवति हारे । 
कतहूँ तर जार नैन हिमालै । फिरै नहीं फिर जावनुवाले ॥ 

सोक बिषाद कभु पावति प्रियतम प्रेम प्रसाद । 
दिवस रात बधु बितावति धर उर सुत अवसाद ॥  

रविवार, १ २ मई, २ ० १ ३                                                                                                

सुख के लाखन कही न जाए । दुःख दौ उर बहु निकट लै आए ।। 
जौ दिन बधु प्रिय संग बिहाई । अनु रति निज प्रति बढ़तहि पाई ।। 

तइ नारी बहु होत सुभागी । जै रहि प्रिय पिय चित एकागी ।। 
नहि त पुरुष भए मनस पतंगे । लागे एक रँग रह बहु रंगे ।। 



जे कभू प्रिय पुट के सुधि करहीं । उर भरतहि लोचन जल धरहीं ।। 
पेख पिया अस प्रिया बिकलाए । समझ बचन कहि बहुसह सुहाए ।। 

पुतहिनू पितु तिलछाते कैसे  । रामायन बन दसरथ जैसे ।। 
सेव जोग बधु करतति ऐसे । चरफर पर  जर देवति तैसे ।। 

एहि बिधि गह सुख दुःख गृह बसाए । बार बधु के कल कहनी सुहाए ।। 
लिखनि लिखी बधु पुत अवसानी । लघु मम मुख सन जनम बखानी ।। 

आखर जनि बरनत बर बानी । जथा जोग जो जितै ग्यानी ।। 
रस गाहत जे पाठक बादे । छमा दान दे लिपिक प्रमादे ।। 

आखरी बर्निक रंगन असित हरित लखि लाल । 
लेख साधन गुरुबर गन प्रनत लिखनी भाल ।। 

सोमवार, १ ३ मई, २ ० १ ३                                                                           

प्रेम पूरनित बिषय बिलासे । जाके फल जग जातक बासे ॥ 
जीवन धन रस मरन जनाई । ताके बल बिधि करत बिधाई ॥ 

भिनु भिनु ठियाए भिनु भिनु ठौरे । कोमलि कामिनि कोउ कठोरे ॥ 
कोउ को रूप कोउ को रंगे । सुंदरतम भइ अर्धन अंगे ॥ 

जदपि सरीर पीर पर भारी । जानत जात बहु होत दुखारी ॥ 
ता परहू सब जग नारी । धारन चाहति पद महतारी ॥ 

प्रथम प्रसव जे सोंह धराई । तेहिं सुरति बधु सुध बिसराई ॥ 
माए ममत सों कर अस साँचे । लगत धूँक भए कन कन काँचे ॥ 

ममता मै मन लालक लाहे । भुज अंतर पुनि बालक चाहे ॥ 
असं बसन सन अवसथ साथे । जहाँ मनोरथ तहँ पथ पाथे ॥ 

सतकारु गूँथ गुनसूत केरत रजस प्रबेस । 
तहँ संसेचत सत गर्भ धारन उदार प्रदेस ॥ 

मंगलवार, १ ४ मई, २ ० १ ३                                                                                       

पुनि एक दिन मनि रतनन सजाए । जोत भरत जब जगत उजियाए ॥ 
काज उसारति गृह अँगनाई । बार बार बधु लइ  उबकाई ॥ 

उदार पर कंठ बदन दुआरे । खान पान  सब आए बहारे ॥ 
निरखि बैद कहि बचन पुनीता । गर्भ सहित रहि प्रीतम प्रीता ॥ 

सुभ समाचार श्रुति रंजन के । हर्षे आनन सकल गृहजन के ॥ 
बनत बिलोकत प्रियतम चाऊ । लाजटी बधु धरि लजवति नाऊ ॥ 

दुःख बिरात चलि पौ पुरबाई । कुल मंदिर सुख संपद लाई ॥ 
ताप दिवस पर छाया छाई । फार ते लद फद फुरि अमराई ॥ 

तरी तरंगत तरनी धारा । राग अरुन सुर रंग क्गारा ॥ 
कनक कामिनि के रूप सनाते । हिरन मई कन बरनत हाथे ॥ 

समउ गति कर तनि बिश्राम, साध सुन्दर सँजोग । 
धारे नवल गर्भ धाम पञ्च भूत के जोग ॥ 

बुधवार, १ ५ मई, २ ० १ ३                                                                                                 

जे रहि बधु के सरूप स्वामी । मन मंदिर के अंतर जामी ।। 
बन सेवक  धावत करि सेवा । पुर गमनत लावत फार मेवा ।। 


ऐसन भाई पिय की सेवकाई । जस भगवत करि प्रभु वन्दाई ।। 
पूछ पूछ कर चरन धराहीं । रूचिटी रचित कर काज कराहीं ।। 

पुनि एक बारहि तार बिसारी । चाँद नयन सन जगत निहारी ।। 
समनी बन सद सयन पालिका । गंध पवन भरि सुबर सालिका ।। 

प्रिया पिया के संग सुहाई । मुख सुस्मित भरि पूछ बुझाई ।। 
तुम्हरी भगति लहि सुख सोभा । कहु तुहरे मन को बरु लोभा ।। 

हँसत कहे पिय रजत न सोना । चाहूँ तव मन के एक कोना ।।  
अरु कहिं पिय कर कंठन भारी । जे भगवन के चरना चारी ।।     

नाम जपत प्रभु मूरत धारहिं । ते सत करमन गुनज बिचारहिं ।। 

असहि मैं वंदौं तुहरे स्वत्व बोधि सरूप । 
जे थित चित तव सरीरे तत्व दरस गुण रूप ।।