Tuesday, July 1, 2014

----- ॥ सोपान पथ १७॥ -----

कभु बिद्यार्थी जीवन माही । ते अवसर बधु गइ न बिहाही ॥ 
लगे करन प्रिय सुख संगीता । चितबन् छंदमय प्रीति गीता ॥
कभी विद्यार्थी जीवन में जबकि  वधू  का विवाह नहीं हुवा था । उस समय  सुगम-संगीत  कर्ण प्रिय लगता । छंदमय प्रीति गीत चित्त को लुभाते ॥ 

परिनय पूरब सकल प्रसंगे । बाल बयस रंजन बहु रंगे । । 
बे संधिहि के बरन पतंगहि । करहि कथन तब गगन बिहंगहि ॥ 
परिणय पूर्व के समस्त प्रसंग सहित बाल्यावस्था विविध अनुभूतियों एवं प्रसन्न करने वाली घटनाओं से परिपूर्ण थी ॥ उस अवस्था से तारुण्य अवस्था तक की अनुभूतियो की पतंग तब उक्त वृत्तांत का वर्णन करेगी जब वह उस गगन में विहरेगी ॥ 

कथीक कतिपय कथन अनेका । करत चयन निज ज्ञान बिबेका ॥   
भल रीति भनिति कहे जो कोई । सत्सार कथन रही सँजोई ॥ 
कथीक कतिपय थे  किन्तु कथन अतिशय थे । उस समय जिस किसी ने भी भली रीति से भनिति कही, कविसुलभ उन सत्सारों को अपने ज्ञान एवं विवेक के आधार पर चयन करते हुवे वधु उन्हें संचयित करती थीं ॥ 

भई बिहाइ  गई सब भूरे  । जोगवन करे दोमट कूरे ॥ 
कालांतर मह सुमिरन हारे । सुरति सेष गह मन दुइ चारे ॥ 
जब विवाह हो गया तब सब कुछ विस्मृत हो गया । कवितामयी उन संचयी पुस्तिकाओं को दीमक ने कब करकट में परिवर्तित कर दिया इसका भान ही नहीं हुवा ॥ कालांतर में संस्मरणों ने भी हार मान ली । और चित्त में कतिपय कविताओं की ही स्मृति शेष रही ॥ 

सुमरिन रूरे को आध अधूरे को पूरन बिसराई ।  
 को रचना रसित को सुबचन कहे को दुइ को चौपाई ॥ 
दोइ कबिता  पुनी जुगत लघु धुनी चयन करत  लघु पुंजा । 
लिखनी मसि जोइ पुनि मुखरित होइ दुइ पंगत बन गुंजी ॥ 
उन सुन्दर स्मरणों में कोई आधा अधूरा तो कोई पूर्ण स्वरूप में विस्मृत हो चुका था ।  कोई रचना रसमयी थी कोई सुभाषित वचन थे कोई द्वी तो कोई सुन्दर चौपदी थे ॥ तत्पश्चात वधू ने अपनी स्मरण की उस लघुवर पूंजी में से छोटे शब्दों से युक्त  दो कविताएँ  को चयन की, लेखनी में मसि संजो कर कविता जब मुखरित हुई तब वह द्वि पक्ति उस उपवन में गुंजाएमान हो उठी ॥ 

सिंगारी रस साज , दुइ भाष दुइ कूल कलित ।  
मेलन को नदराज कबिता सरिता बह चली ॥ 
शृंगार रास से सुसज्जित होकर दो भाषाओं के दो कगारों में विभूषित हो फिर कविता की वह सरिता नद्राज से मिलन करने को बही चली ॥ 

बुधवार, ०२ जुलाई,२०१४                                                                                                 

जब ते बधु कीन्हि तहँ बासा । बिते समउ बहु सुधित सुपासा ।। 
उहाँ एक खाँच बोल बतियाए । एक खाँच  लिखे  लेख देखाए ॥ 
 वधु का जबसे उस संगोष्ठी क्षेत्र में निवास हुवा उसका समय बहुंत ही व्यवस्थित एवं सुख पूर्वक व्यतीत होने लगा । वहां एक खांचे में वार्तालाप करना एवं एक में अपने लिखे लेखों को प्रदर्शित करना होता ॥ 

खचित पुहुप चित्र नयनभिरामा । बहुरि प्रबिसि बहियर निज नामा । 
पूछत दय कतिपय रूचि आपनि । कछु संभावनि कछुक बनाउनि ॥ 
उसने खांचे में नेत्रप्रिय  पुष्प चित्र खचित कर दिया फिर अपने नाम की प्रवष्टि कर जैसे  प्रश्न किइ गए थे  उस अनुसार कतिपय रुचियाँ संज्ञापित की । जिसमें कुछ रुचियाँ स्वाभाविक थी कुछ बनावटी थी ॥ 
  अंतर जाल जग बिहंगन हेतु । धुनी पथ बाँधि बचन कर सेतु ॥ 
मानस ऐसिउ आन बिचारे  । देखे जग को दिग संचारे ॥ 
तत्पश्चात अंतरजाल के जगत में विचरण हेतु कुछ शब्दों ने वधु के लिए पथ की रचना कर दी कुछ कथनों ने सेतु बांध दिया ॥ फिर मनोमस्तिष्क में ऐसा विचार आया कि देखें तो यह संसार किस दिशा की ओर  अग्रसर है ॥ 

जाति धर्म समुदाय समाजा । कपट कूट को पदक बिराजा ॥ 
 दुःख आसित कहँ सुख आसीना । अजहुँ देस भए कवन अधीना ॥ 
जाति, धर्म, समुदाय एवं समाज में छल कपट किस पद पर विराजमान है ?  दुःख कहाँ आसित है ?  सुख का आसन कहाँ है ?  अब यह देश किसके अधीन है ?  

पढ़त  दुइ पंगत प्रथम त,  पाँवड़ पलक बिछाए । 
सद्परिचय पैह मृग सम , दरस सिंग जस धाए ॥ 
दो पंक्त्तियाँ पढ़के प्रथमतस तो सब पलक पांवड़े बिछा का स्वागत करने लगे, कुशल क्षेम पूछने लगे । किन्तु वधु ने जब अपना वास्तविक परिचय दिया तब सारे साथी पीठ दिखा कर ऐसे भागे जैसे हिरण ने शेर को देख लिया हो ॥ 

शुक्र/शनि , ०४/२६ जुलाई, २०१४                                                                                                    

कबित हिरन सम रूप सुहागा । गहे संग सो बहुंत सुभागा ॥ 
कबि परस मनि रूप सम लोहा । पैह परस बन कंचन सोहा ॥ 
कविता यदि स्वर्ण है तो रूप सुहागा है । जिस सुहागे को स्वर्ण  का संग प्राप्त हो  जाए वह बहुंत ही सौभाग्यवान  होता है ॥ कवि यदि स्पर्शमणि है तो रूप लौह के समरूप है ।जिस रूप को कवि का  स्पर्श प्राप्त हो जाए वह लौह स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है ॥ 

कबिगन के जस कबित बखाना । जे गुपुत रहस बधु रहि जाना ।। 
बढ़ावन पुनि डेर के सोभा । बधु के चंचल चित अति लोभा ॥ 
इस गुप्त रहस्य  को समय समय पर कवि मंडली द्वारा कविता के सम्बन्ध में समाख्यान करते हुवे कहा जाता है । वधु को यह ज्ञात था ॥ फिर डेरे की  शोभा भी तो वर्द्धन करनी थी एतेव वधु का चंचल चित्त इस हेतु अति लालायित हो उठा ॥ 

दायन सुठि उपबन आकारे  । जाके ऊपर अलि गुंजारे ॥ 
जोइ छबि चरित हेतु चयनिती ।  सुभग रूप पर रहि अपरिचिते ।। 
जिसके ऊपर भौरे सदा गुंजित होते रहे  डेरे को ऐसी सुन्दर वाटिका की आकृति प्रदान करने में ॥ जो कि उसने अपनी मनगढंत कथा न्यास हेतु चयनित की थी  जिसका स्वरूप तो सुभग था किन्तु था अपरिचित ॥  

भयउ समउ कहि धारिअ पाऊ । परिचय दिए धर आपनि  नाऊ ॥ 
बहोरि बधु अरु बिलाम न कारी ।चारु छबि सोइ खाँच उतारी ॥ 
 यह कहते हुवे समय हो  आप इस खांचे में चरण रखे । वधु ने जहाँ अपेक्षित खांचे में अपना नाम लिखकर संक्षिप्त परिचय दिया ॥फिर वधु ने विलम्ब नहीं किया उसी चन्द्रमा चारु छवि को इस हेतु दिए गए खांचे में खचित कर दिया 

छाया भवन निज छबि पराई । करत कबि करम निज कबिताई ॥ 
पूछएँ कोउ यह छबि कवन की । देइ उतरु हमरे आनन की ॥ 
॥ दर्पण स्वयं का और छवि पराई कर वधु कविताओं में उद्भावों को प्रकट करती गई ॥ जब कोई पूछता यह छवि किसकी है ? तब वधु का उत्तर होता हमारी है और किसकी ॥ 

सोचि बधु तर्जनी मुख धारी ।  भयउ जगत जन संकुल भारी ॥ 
कौन लखेरी छबि को होई । एहि मर्म जग न जानहि कोई ॥ 
फिर वधु ने तर्जनी मुख पर धरे यह विचार कर कि अधुनातन जगत में जनसंख्या इतनी संकुलित हो गई है की कौन लिख रहा है छवि किसकी है इस मर्म को भला कौन जान पाएगा ॥ 

बर सुखकर सहज सुभाउ, किए मनहारी बात । 
कहत  कबित मई कथन  करत प्यारी बात ॥ 
उसने बड़ा ही सुप्रसादु सहज स्वभाव को वरण किया और मनोहारी बात करने लगी । और कवितामयी कथा करते हुवे बड़ी ही प्यारी प्यारी लच्छेदार बातें करने लगी ॥ जैसे : -- अपना तो सभी कहते हैं, दूसरे का दुःख जो कहता हैं न वो मुख सबसे श्रेष्ठ  होता है ॥ 

आननानै  निजानन कीन्हि । छल कर तासु रूप बर लीन्हि ॥ 
कबित जुगुति धर सुमुख सुनयनी । बयने अस जस कोकिल बयनी ॥ 

कूट कपट कर छंद  छलावा । लिखे अबर लिखि दिए निज नावा ॥ 
ठानत पन एक देइ हँकारे । कोई सुकबि यह चरित सँवारे ॥ 

जगे बिपरइ  भाग पाहन के । सुघर क्लाहर कर कृति बन के ॥ 
करे कबित आरहु बहु रीती । सह सुबचन जुग प्रीति प्रतीती ॥ 

कबित जुगित बधु जाननिहारे । लिखे लखित को लेखनहारे ॥ 
अबर कबित गरयसि मन ही मन । सुहँसत कहती रे महकबि बन ॥ 


कछु सुमिरन रहि चितबन् माही । जोगवन कृति बय अनब्याही ॥ 
कछुक सुरति मन भई धुंधुरी । भूरी बिसरी आध अधूरी ॥ 

गोठी मह जुगे संगी कबिबर रहे अनेक । 
कूट कपट छल किए तदपि रहे सबहि परबेक ॥ 

चरित हीन चहे मल मलीना  । भया जग रूप लवन अधीना ॥ 
कुपंथ चारि कि लंपट लोही । किए कुसंग जग जुबति कुजोही ॥ 

लगनेतर सँग कह सुठि गेही । संत ह्रदय अह बहुस सनेही ॥ 
जग प्रचरित बिनु रीति बिबाहा । लगे  लगन मन भए लग्नाहा ॥ 

छीकत लगे छीँक महि जूटें । छीँक महि जुगे बंधन टूटे ॥ 
कपट कूट कामग कलुषाई । अस कु लगन सन जाए ढकाई ॥ 

जहँ काम बसति तँह बसि रोषा । ए दोनहु मद लोभ के पोषा ॥ 
तिय गवनहि अरु कहत कुँवारा । कुल तरन तिलक दीप हमारा ॥ 

धर्म न जाति न बरनहु माने । पूछत एहि का कोउ न जाने ॥ 
कह बत बधु कतिपय संगी सन । देखी चाल चरित अधुनातन ॥ 

देखि सुनि कहि जन मुख जग, गवनइ जेहि दिसाए । 
कर बतकहीं कछुक संग, कहाबत तसहि पाए ॥ 

मंगलवार, २९ जुलाई, २०१४                                                                                        

कछुक दिवस हुँत पिय जनि आई । दरस नयन पुत बहु सुख पाईं ॥ 
रयनइ भोजन सोंह निबरिती  । दए सायं बधु पुनि करे भनिती ॥ 

चारि दिवस लग रही बिलोकी । भीत भावना गई न रोकी ।। 
कहत बधू ऐसिहुँ बिराता । करसि न जान केहि संग बाता ॥ 

तिरछ नैन कर कुटिल कोदंडा । बियंग बिष भर मुख सर षण्डा ॥ 

मधुमन मानस माहुर घोली  । छाँड़त सतत सपुत सँग बोली ॥ 

तुम्ह सुतत रहु अरु बधु जागे । रे बिटवा यह उचित न लागे ॥ 
सुतंत्र भयउ त बिगरहि नारी । गहत छोभ जनि करक निहारी ॥ 

एक अगास एक नारि सुभावा । सब बिध अगहु अगाध दुरावा  ॥ 
धरम पूरित बचन मैं कहऊँ । चरित हीं के मूर न लहऊ॥ 

प्रिय अप्रिय मधुर कटुक अस, कहत बचन बहु भाँति । 
बिभंजत साँति प्रीति अरु , प्रतीति के कर हाँति ॥ 

लगन जोग चिंगारी छोरी । पग आगी बधु मात बहोरी ॥ 
तासु कही प्रतीति उअर आई । नारि चरित कछु कही न जाई ॥ 

सोच कदाचित मन यह रमना । भयउ सयानइ अजहुँ हम ना ॥ 
जो बत कही गई महतारी । होहिहि अबसिहि सो हितकारी ॥ 

बोलि देत पिय निकट बुलायो भर संसय मन बहियर आयो ॥ 
को कुघरी गह लै मैं आना । अजहुँ ते तुम्ह बैठ बिमाना ॥ 

मम अनुमति बिनु कहुँ न बिहंगहु । भए बहुंत यह पतंग पतंगहु ॥ 
मान दासि जस आयसु दाईं । ठाढ़ी बधु रहि बहुस रिसाई ॥ 

रन रंगन के राग बिराजे । सकल जुझाउन बाजनि बाजे ॥ 
कलही कलुषइ जूँ जूँ गाढ़े । रोष तरंगिनि तूँ तूँ बाढ़े ॥ 

तब तो बिघनै जे जान, लाने बहु इतराए । 
बिहरन गगन तुमही दिए, कहि बधु गालु फुलाए ॥   

बृहस्पतिवार, ३१ जुलाई,२०१४                                                                                              

अति लघु बात हेतु अस लागे । कहि नहि जाइ दसा अरु आगे ॥ 
कछुक दिवस बीते एहि भाँती । लॉग लगे गह परे न साँती ॥ 

लगे पीया बधु मन दुःख पावै । कलेष प्रिय कह नाउ धरावै ॥ 
प्रियबरहु कहाँ घात रहेऊ । बार बार कलहनी कहेऊ ॥ 

तजत रोष चित सीतर कारी । बहोरि सुठि बिधि बात सँवारी ॥ 
दीन बचन कर मृदुलित बानी ।सुहसित  बदन राज अस सानी ॥ 

लग चली लगउ  लाग बुझाई । भलि भलि बत कह पिय समुझाई ॥ 
काल चाक अति द्रुत गति भागे । हमारे जनिमन हम सन आगे ॥ 

नभ बिचारे कि धरा चरे, बिगरहि कछु न हमार । 
जोग धरे बिनु बिगर जहिं, एहि सुपुतिका तुहार ॥  

एहि समन बचन रिस किए आधा ।  भै सिथिर पिया भइ अध बाधा ॥ 
मुख मंजुल एक दीठी  डारी । कहत कथन पुनि बरन सँभारी ॥  

देस  काल अगजग अधुनातन । आए नित नउ सम्पर्क साधन ।। 
रे पियतम तिन्हनि बिनु जाने । सुबुध  समाजु मूरखा माने ॥ 

काल बिपरीत जग लिए घेरे । यह कुटिल बचन निबल निबेरे ।\ 
पुनि तुअँ तस मैं अहउँ कुलीना । चरित बटी बहु धरम धुरीना ॥ 

हमहि उपर भरोस का नाही । कहि झाँकत पिय नयनन माही ॥ 
मोहि ऐसिहु न मूरख मानिहु । सरिता निज मरजादा जानिहु ॥ 

जासु नियति मह लिखे बहावा । तासु का कोउ बाँधन पावा ॥ 
लाग लगाउत बहुंत बिगोवा । बिमुख सुख कबहु न होवा ॥ 

जेहि बचन गहनइ गहे, प्रियतम के उर माहि । 
मौनी मुख मुदरा धरे, पुनि कछू बोले नाहि ॥ 

शनिवार, ०१ अगस्त, २०१४                                                                                                    

बिरधा मति सियानपन जोई । तिनके बचन बिरथा नहि होई ॥ 
गोठि बिबिध जन नाना जाती । करन चहहीं बधु संग बाती ॥ 
मानत पिय जनि के तनि ठाड़ी । अजहुँ बिरथा  कथा दय छाँड़ी ॥ 
गए दिवस पिया लाग लगाई । तिनके बदन  कही सुरताई ॥ 

जनमत संसय रात अँधेरी । कलुषित काल कपट के घेरी ॥ 
पहलै जोग समउ निर्धारी । बिहरन गवन रयान परिहारी ॥ 

छाँड़ेसि बधु दुआरी लग, माँगत कलह बिदाइ । 

अगुसरन सुवागत कहत , सुख साँतिन अगुवाइ ॥ 


लिखे  लेखनी अस भनिताई ॥ जस लिपिकृत किए  को कबिराई ॥ 
अर्थ परम सुठि भाउ सुभासा । लेख पतिक जिमि उपबन बासा ।। 

होइ न गुरु बिनु बिमल बिबेका । रहि अजानी माहि बधु ऐका । 
आखर जननी कबित जस कृते । बधु मन ही मन भइ भयभीते ॥ 

केट काल लग रही ढकाई । कला कलित कबि कौसलताई ॥ 
कबित ग्यान एक नहि तोरे । धुनी बरन बिबेक गहु थोरे ।। 

सुधित भनित पुनि चित कस करहीं । सोच लगे त माथ चिक्करहीं ॥ 
कहाँ गवने  केहि गत पूछे । पिया रस मए छंद सन छूछे  ॥ 

देही हठात प्रबसि किए, को कबिबर के भूत । 
अंतर्मन अधिकार कर किए मोहि बसीभूत ॥ 

मंगलवार, ५ अगस्त, २०१४                                                                                                 

`दुइ दिवस गहि सोच के बाहू । दुइ रैन नींद परी न काहू । 
 चारि पहर कर धरि चिंतन के । धरे गोदी सिरु उपबरन के ॥ 

ब्यबकल पलक नैन न लागे । लिए करवट सह अचरजु जागे ॥ 
हृदय मनाउ भोरु जनि होई । कान कहे दिनकर जा कोई ॥ 

उदित रबि गह नयन जब झांके । होत बिकल दिन दर्पन ताके ॥ 
सौमुख जब छबि आपनि देखी । लिखे कबित पख पुंजित पेखी ॥ 

भय बिहबल दय दुइ टुक फारे । लगाइ लाग सकल दिए बारे ॥ 
भय रुजित उरस परे न सांति । पारी न नीँद जब केहि भांति ॥ 

देख बधू के अस दसा, प्रियबर बहु हरुबाए । 
बहोरि बीएम अरु किए बिनु, बेद राजु गह लाए ॥ 

तजे हरिदय पुरुख निज आपा, चले स्फुट गति रुधिरू पद चापा ।  
मापत टॉप काज धार नारी । बैदु कहे पिय कोत निहारी ॥ 

च च मुख श्री कस भयउ मलीना । नीद हींन दृग दरपन दीना ॥ 
प्रसन कारि पिय आकुल देखे । बैद निबारक औषध लेखे ॥ 

चारि पलक लग देइ भिजोहू । बहुरि निर्मल जल संग धोहू ॥ 
दोइ चारि घाँ फटकट सूपा । ता पुनि दरसा देहिहु धूपा ॥ 

आद्र निलय जब होहिहि सूखा । हरिहि सकल अंतरतम दूखा ॥ 
तेहि पुरब पूछे पिय फिरि का । पूछि बधु मैं भूत सन घिरि का ॥ 

सुनत अस ओदकत बेदु, नासिक भृकुटि चढ़ाहि । 
अरु कहि री भूताभेषि, मैं को ओझा नाहि ॥ 

चालत कहे हूँ भेषज राजा । भेष राज क बेदु अनाजा ।। 
कहत हँसी बधु निज रुज भूरे । चुपि रहु कह पिय करकत घूरे ॥ 

भयउ न बे जब कोउ सुधारा । घुरमहि सिरु धर भार अपारा ॥ 
रैन दिवस कह दिन कहि रैना । सिथिर नयन अरु बिरुझित बैना ॥ 

आए दुआरी दीप तिहारा । गवने पिया लेइ ससुरारा । 
मना परब तँह चरन बहोरे । नींद परे भए बयकृत थोरे ॥ 

काय पूरन जब गै सँभारी । जीवन बाहिनि निज गति चारी ॥ 
एक बार त बैसत डेराहीं । बहुरि कसत कटि बल गह बाही  ।। 

तिरत फिरत इत उत चरत, लेइ जान निज केत । 
छनु भर मह बिहंगत नभ, रखि लख गोठी खेत ॥ 

बुधवार, ०६ अगस्त, २०१४                                                                                                       

मगन गगन पथ पाँखि बिहँगहि। कछुक काल बिहरत तिन संगहि ॥ 

कहत कथा जस कल्पनामई । सकल लिपि पद जब पढ़ी जुगई ॥ 

चारि दिवस कल कबित प्रसंगे । प्रेम पूरित मेलि सब संगे ॥ 
खेत पति पुनि दुअरि पट देईं । रुदथ पटतर छंद पद सेईं ॥ 

रहे खेत भित द्वार लगाए । हँकारै बधु तहुँ कान न दाए ॥ 
केहि कारन जे जानि न लेसे । बाधित किए बधु खेत प्रबेसे ॥ 

श्लोक छंद कछू दु कछु चौपद । रहै जोइ तहँ रचना सम्पद ॥ 
कंठ संग कर कुण्डी बोले । थापि मूठ पर पट नहि खोले ॥ 

बिनयाबत करत ब्यबहारे  । लिखित पूछि का भूर हमारे ॥ 

 कहत कहत भए कंठ सुखारी, बधिरु के करन न परे । 
सठ पत लंका, कूट क्रम अँका, बारहि बार मँग धरे ॥ 
खेत बनावा करे छलावा, कहत लोचन जल बहै । 
कबिता कोरी देउ बहोरी  कर जोरि पुनि पुनि कहै ॥ 

बारहि बार हाँक देत, बहियर गइ जब हार । 
अंततः सोइ खेत सों, फिरइ चरन मन मार ॥ 








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