Friday, June 15, 2012

-------|| PAANIGRAHAN ||-------

                              -------||पाणिग्रहण ||-------                                      

                              -------||पाणिग्रहण  ||-------                                       
मकरताल की करतल ध्वनी निरंतर प्रतिध्वनित हुई..,
प्रणय-पंथ की प्रतिनिधि प्रत्यक्ष प्रणिसित प्रतीत हुई..,
प्राणाधार की पय परिक्रमा प्रारम्भ पर्यंत प्रवाहित हुई..,
प्रालेयरश्मि प्रावृट-पथ पर पुलकित-प्रीत प्रगाड़ीत हुई..,


तरंग-तरुण मधुर तरंगिणी का रत्नाकर छना..,            
सुधा-सदन का सागर सुदक्षिण प्रथम प्रियतम बना..,   
धन्य-धरा पर सर्वस्व-रूप लुटा रही थी ज्योत्सना ..,     
सर्वतस लच्छित गुण-गगन रंध्र भर लक्षित सुलक्षणा..,



तरंग-तरुण की मधुर-तरंगिणी का रत्नाकर छना..,
सुधा-सदन का सागर सुदक्षिण प्रथम प्रियतम बना..,
रंगानुराग राग-रस-रंजक रज-रजनी को घेरे से..,                
कनक कुमकुम के कण-कण चड़ते पद्म पग फेरे से..,           

कथन करता जा रहा था..,
कवि काव्यतिकांत सूना रहा था.....


MONDAY, JUNE 11, 2012                                                                                              

समलंक    मकरंद    सुरंग    सुगंधा । सुम-सुमंद्रम स्वंत वितान वियंगा ।।
बहुलित बहुविधा बहुविध बंध्यबंधा । बहुब्रीहि  विधुवर  विधान  से संधा ।।


द्रवित दृग  दृष्टव्य  दिव्य द्वंद्वा । दिव   दीप्त  दप्-दप्  देह्संधान  वृंदा ।।
सरल सुहंगम सुर-संगम संगा । संगीत संगत संगाभिधान सारंगा ।।


प्रभा-प्रसून चन्द्रबिम्ब प्रसंगा । सौम्य   सु-मंदर   यौवन   बहुरंगा ।।
लावण्य ललाट अर्णाभा चन्दन । करनव निरुपधि जैसा निध्रानन ।।


चल-चंचल चपल चाप-चालन । चापलतम चारु चमके चंद्रनयन ।।
नभ सी नाभि औघट पथ-प्रस्तर । दोलित्तोलित चंद्रायण निरंतर ।।


सर्वार्थ-सृति शुक्ल सिपज दाने । शुभ्र-शंख के स्वन-वर्ण वरदाने ।।
संकलित सांकल हव्य हवित्री दाने । अभुताहुति अनंत  आह्वाने  ।।


वरण वरेण्यम विश्वेश्वरं देवम् अर्णवावयव रहे सकल समेट ।
भव भावभूमि पर भूताकृति अरुणय रहे सोम-समुद्र को भेंट ।।




कवि कोविद दृश्य दर्शा रहा..,
काव्य संगीत सूना रहा.....




FRIDAY, JUNE 15, 2012
सेहरा, हीरे का-मोती का                                                                                         


वेश विभूषित वासन विरलिकवर्णक । चकाचौंधी चिरंजीव चारु चिराभरणक ।।
विश्व  वासंती   वस्त्र  वत्सल  वसुधा । अभ्यंग  अभिनव  अभिषेक   अभ्युदा ।।


स्वयं  स्वांगभर  सरि  सिन्धु  साजा ।  स्वागत   स्वागत   महिनंदन   राजा ।।
वृहत   वेग    वाग्   वाणी   विसर्जन । पलंकष  पयोधि  प-पाणि  पयस्वन्न ।।


पद्म  प्रकाश  प्रति  परिणय परिधाना । शीर्ष-चरण-रतन   भूषण  जगनाना  ।।
नीलकांत  अंक   निलांक   निलाजन । नर    नारायण    निरख   नयनांजन ।।


मूंगा- मणि-मुकुता   लहरि   लड़ीयाँ । फुले फलित फूटे फाल्गुनी फुलझड़ीयाँ ।।
सिरमौर-मुकुट  कापरकनेरी कलंगी। कटि-कटारी    कंकणम्बर    कन्द्रंगी ।।


परिणय पूजन पुण्य पुंडरिक परिपूर्ण प्रथा परिवेशा ।
त्रिलोक  परिजन  देव  रक्षक  ब्रम्हा-विष्णु- महेशा ।। 






प्रेम  प्रसून पराग  पुंज पदम् काशि । पाण   पयोधर  पाण्य  परम प्रकाशी ।।
पत्रवलि पलक  पत्रांक  पर पत्रांजन। पुलक पुलकित पात  पुष्प  परागण ।।


विलक्षण विमल वल की कलाभृति । विरलयी तरल  अविरल-पथनुकृति ।।
सनासन सरि सागरसिन्धु नीकासी। सरिल  सलिल  विपुल   वारि  राशि ।।


नीर निकुंजन नील-नीरज निकाशी। नीललोहित धारिता द्वि-द्रंग निवासी ।।
विग्रह्ग्रह विगाह्गह विभावरिश विभासी । अखिलनंत अंतरिक्ष  आवासी ।।


पाँजन्य पखावज घन घंटिक बाजे । घनश्याम  गगन  गण  घहरर   गाजे ।।
नृत्य  नट-नागर   नाचे   नर-नारी । सुर    सरगम   संगत   सुमंगलचारी  ।।


जय जय जयमंगल जयोत्तंस जयोतंत उत्तान तुरंगा ।
जयजलधि  जयवारिन्द्र  वंतस उत उत्तोरण उत्तरंगा ।।
उजितोजास उत्कंढ उतकर्षितोदु उत्कम्पितोत्तसंगा ।।
उल्लसितोत्सर्जितोच्छवासितोत्तंगोच्छन्ग जलधि तरंगा ।।




छत्र   छितीस  छवि  छाया  छायी । गौरी-गौरीश   गण  गोविंद   प्रणायी  ।।
तिलकावल देई थैली धर नाथ धराई । वार-फेर यव-राशि लोकनी लुटाई  ।।  


सागर  सिन्धु  सम सनत् सनंदन । मन  मोद  मदन  मधुसुदन  सुनंदन  ।।
नीर निमज्जन नयन नीरज न्यारे। पायनिधि पयोधि पिय पितम प्यारे  ।।


सुपुष्ट समुन्नत भरी-भरी  भुजाएं । सरल   सहज   सप्त   सिन्धु   समाऐं ।।
वीरवर वर्णन विक्सित  बल  बाहू । हंस वंस अवतंस प्रस्थ शशि विवाहू  ।।


मुकुर-मूर्ति मूरत मन-मीर मनोहर। निरधर थल नंदन देव तृपत धरोहर।। 
वर वारिद  विभूषण  व्योम विराजे । जनेत  जनेऊ  बटेऊ संग संग साजे ।।


नभ-मंडल-मण्डप तारकदल नक्षत्रनेमि यह संदेशा देत ।
कुलीनसकोष  कमनीय  कुल  कुंवर  संग सकल जनेत ।।




काव्य गगन पर छा रहा था..,
कवि कथा सूना रहा था.....



MONDAY, JUNE 18, 2012                                                                                         


सकल सखी सुघढ़ साड़ी सिंगारे । पात-कपाट सिन्धौरे सांझ-सकारे ।।
चौरंगे चौराहे  तीर   तोरण तारे । द्विज  दुल्हे    देहली   द्वारे   पधारे ।।  


वेलवेल्लन वेणि वृंत वन्दनवारे । वरुणारुण  वर्ण  व्यापन  विस्तारे ।।
चित्ताकर्षक चौर  चौबारा चाका । डोरी  ढल   ढाँख-ण    ठोसे  टाँका ।।


ताने  तीर   तारण  देश-दिशाएँ । धुन ध्वनित धृति धनुष  ध्वजाएं ।।
मुख   मुकुन्दल   मन  मृदुरंगा । पुलकित पलक प्रतिष्ढ  प्रतिसंगा ।।


अर्णवासनारुणी  अर्णोधरवतारे । छतनारी  छत्री   छित्रे  छर  छर्रारे ।।
कुञ्ज-निकुञ्ज कंणकवच राजे । दलवल्लकी डाली दल-वल  साजे ।।


प्राहुण   प्रियंकर    पद्म्भिनंदन । आहुन  विवाहून समंगल समंजन ।।
परिष्पंद पगयापटीरी पट्टपाटन । वेष-काषाय महिष मेदिनी नंदन ।।


घन घाँघर घुंघरू साजे सजनियाँ । नीलम नग नक् निकट नथनियां ।।
पारसारस पदवी  पग  पैंजनिया । दप दहके दमके देहनी  दुल्हनियां ।।


कोमल काया कर कलाई कंकण । कनक-कनक कांचन कंकणीलंकन ।।
खनक-खन खनके खंकरखंकारी । कृष्ण-केशकोदण्ड कपालककाचन ।।


गोरी-गोरी गुण गंधगेंदंती गंधा । घटा    घट  घूँघट  घान्घर   घुन्धा  ।।
चम् चमचम चन्द्र चंदेरी चुनर  । छायामान  छाजे  छम  छम  छुनर  ।।


पेंजननथ कंकणकंगन हिलोला । चन्दाचरण    रमणीक   रामझोला ।।
पाटलिक  हंस  हँसकपग   होरा । हेमांक हृद्यांशु  ह्रदय  हर हिलकोरा ।।


जलमय जलज  पुष्प  जलाजल । झालर झुन-झुन झलके  झल-झल ।।
टिमटिम टड़ियाटाड़ टांकनटोड़ी । ठाट  ठन  ठुनककर   ठिनके  ठोड़ी ।।



दोo(क)= डगमग डग डेवढ़  डमरू डमडम  डिंड़ीभी डुमके ।
             ढोलक ढपली  ढाल ढले  ढुनमुनिया ढली ठुमके ।।


दोo(ख)= कोटि-कोटि कर  कोटिश: कुलिश  कर कल्याण ।
             कुलि कुलीन कुलीनस कुल कुसुम काम-कमान ।।






चन्द्रकंवर चौकी चढ़ चँवर चारी । मल मल्लक मल्लारी कंचन-थाली ।।
अम्बुनिधि  अभिनवारता-पुराई ।  ठन  ठनगन   ठगाई  ठगैंली ठाली ।।


छलके  छाजित  छवि छरूँ छाई । सुम-संकाश  सजनी   सज   सजाई ।।
सुधा सिंच सागरसिन्धु सत्कारा। संकुल  संकुचित   साजन स्वीकारा ।।


प्रभद्र-प्रभंजन पयोधि तोरणताढ़ा। लावन्यार्णव लढ़लोचन लाडू लाड़ा ।।
शशि  शीश   नत  नयन  निहारे । पुल पुलिन पलक पग पिया पधारे ।।


मौरमुकुट माणिक-मणीन्द्र-मणीचा । मीर मानमनस मोतिया खिंचा ।।
गोता   घुंघरू   धर    काँधा     धारे । चन्द्रकंवर ढुक आये देहरी द्वारे ।।




दोo = सहचारिणी सारिणी सजी सारंग सार सुकुंवार ।
         सोम  सम्मुख  साम्मुखी  सागर  सभानुपहार ।।


WEDNESDAY, JUNE 20/21, 2012                                                                                   


शिवजी जस सुन्दरसोभा आंकी । अतुलित वधुविधु वारिदवर झांकी ।।
स्वर्णिक स्वर्णा सुरमण्य सोभा । लोक   लुभावन   लाभ   अनुलोभा  ।।


वेणु-वृन्दवादन सुवादित्र सुदायी। समधौरा  समदाना  साधन संधाई ।।
सुरतन   स्वर्ण    सीकर    समेटे। अक्ष    आकाश    भू-भूपति    भेटे ।।


सनाभ्य-सनाथ-सनाभ-सनिता । जनक-दशरथ सम  मिलनी  मिता ।।
पान-पुष्प-फल  समाज  समेता । समधिक  समदना  भेंटहिं  जनेता ।।


कनक-कनक  कण-कण कर्षण । श्रृंखलित सुम-सम  सहर्ष  सुवर्षण ।।
सौर सकल सद्  समाजू सभाएं । आलौकिक आलौकन अवलोकनाएं ।।


वन्दे वन्दना वन्दनी वन्दंवारे पयंबर पयोधर पंडाल ।
मातृमही के दान  विभूषण  अहर्निश  कुंदन  कपाल ।।



स्वरुचित सरस सन्देश सुदाना । मोदक-मोह्भोग मधुमस्तक मिष्टाना।।
रसावल रसकोरा रुचिर रसाला । वेल    वेलज   वान   व्यंजन    माला ।।


रसित रसावन रस रसी रसीला । रास  रसोई  रसौर  राजरस  रसलीला ।।
रसरासन रसायन रोचक रुचिरा। शाक    शाकारी    शीतल      शरीरा ।।


षष्टरस पाञ्चाषष्टभोग पकवाना। पञ्जकौर  कौरस   जनेत  जिमाना  ।।
भंडारा भरे मान बान फल पोषा । बहुरी   बहु   बहुरुप्य   पुण्य-परोसा ।।


सुस्वादु   स्वाद  प्रास  पंचमेवा । स्वादक   स्वादन  करकंवर कलेवा ।।
स्वल्पेक्ष स्ववग्रह  सेवा सवाई । आहर  आहारा  आस्वाद  आहुताई ।।


स्वादु कट कंटक कांड कंदक कंदा कम कलि कुल स्वादुकार ।
पोष पवित्र पाक  पटल  पुष्प  फल  योगिन  विवेकिन  सार ।।
खंड खांड गुड़ घृतघेवर घुघरी चूरमा छेना झोल टिंड जलंजीर।
यव-रसित-लसित-तलित-थलित-दलित-धानधवल-नारिकेलक्षीर ।।




मंद्कान्ति-मीर मंचमंचन मंडन। वरार्द्धक वर्राह वरमाल विमंडन ।।
वंश वन वृंदा वादन वादन वेला । मंजू-मंजुल-मुन्जर  मूल   मेला ।।


युक्ता-मुक्ता-मुकुल मंजीर माला । कुञ्ज कुसुम कंजमेकल मृणाला ।।
वर वरण विधु  वरुण   विशाला । ससी सोम सुधाधर कर वरमाला ।।


कंठन कंठिका सुम सोम  सवारे । कंढोत्कंढ  कंढा  काँधा  धर  घारे ।।
मनसिज मन मीर मदन  मंदिर । स्वंग स्वांग समूह सुभग सुमंदिर।। 


मीर मनसिज  माल्या  मल्हारा । हरि -हरि  हरिणाक्ष  हिरण्यं हारा ।।
विरज विरचित वीर वेष विभूषा । प्रियतम   प्रति   प्रणय   प्रभु-सा ।।



 अनल  बिनु  प्रकाश  नहीं  अप्  अर्णव   सम-संकाश ।
अवनि अग्नित समीकरण नहीं हरि नीकाश-निकास ।।



चारु  चराचर   चितवन   चारी । कल-कंज  कज्जल  कांचन  कारी ।।
राज राजन रजत रूपक  रजनी । पियूष पलक  सिन्धु  सुर  सजनी ।।


वर्ण वर्णावरण वरणव  विभूति । पुष्प   परागण    पटल   उदभौती ।।
नव-नव  नूतन   नभ   नवरंगी । सजनी सजन  उत्संजन  उत्संगी ।।


सुन्दर  सुशील  सागर   सुहागा । रास - रस - रंग   रागिनी    रागा ।।
भाव विभूतित भये अभिभावक । भार   भरे    भर       भोर्विभोरक ।।


पियूष पलक पग पीया परिणति। प्रावृष्य   परिणय  प्रीतम   प्रीति ।। 
भव भाग्यभर भार हरे भगवाना । भाग्याशीश   अभंग    अभिदाना ।।


 कलानिधि कलिकण्ठ  कमल सोम-समुद्र वृहद् विशाल ।
शिशिरांशु के शिर्षोतर  जल  जलज  जलपथ जयमाल ।।


FRI/SUT, JUNE 22/23, 2012                                                                                            


कलश  कमंडल   मंडल   मंदिर । गण-गगन यव-यजन लगनमंदिर ।।
मंत्रा  मंत्रोदक  महती   मनीषी । कोविद   सुविदा    सौविद  सुऋषि ।।


हव्य   हविश हवन प्रज्जवलन । हविराहुति    हवि           हविरशन ।।
दशविध  तंत्रोक्त  स्तुति पूजन । मंगल   भवन   मंत्रदीधिती  आसन ।।


पुनीत  पावन परिणय वरनेते । अप्  अर्णव  अवनि पंचभूत  समेते ।।
जन जीव ताड़  बोध तिलकन । विमल आत्यायन  दीप गोप तर्पण ।।


पञ्चशब्द ध्वनि  पुण्योदयन । सागर  गुण  गण   लगन  संगायन ।।
लग्नलग्नः लग्नोदय लग्नेषा । गगन  गणनायक  गणक   गणेशा ।।


जन जीव जीवन जीवंतिका जीवातु जीवनक् जीवन्यास ।
जननी  जीवनी  जिवनिका  जीवत् जीनांत जीवनावासा ।।  




वंदन लगन मुहूर्त  गौधुलिक । मिलन     मंगल    मंडप  बहुलिक ।।
मांगल्य मंडन मंडवा मांकली । मंगल   मांडा   सकलित   सांकली ।।


संकल्प  संकल्पित   संकल्पा । कन्यका  कंज  कलश  कल कल्पा ।।
स्वास्तिक    सौभाग्य  स्तुति । शास्त्रोचारण शारणिक श्रवण श्रुति ।।


वेदनिगम रीति कुलानुशासन । मिलन  सुयोग   सकल    सुवासन ।।
वर   वरिता   वरिवसित  वेदी । सागर  सुवन  द्वैत   द्विज    द्विवेदी ।।


काचन  कंचन  कुंचित  कायी । ससि सकुचाई सखी मंडपहि लायी ।।
शीश  शशि  सों  चरण  सुहाए । मुनि  जन   मधुरित  मंगल   गाये ।।




नौ नवध नैमित्तिकी नंदी नाथ नाड़ी नाडिकेल ।
कलश  कैलाश  कुलीनस  कुश  कुशप  कुवेल ।।



युगल युगान्तक युग्मन योजन। अगन  दहन  हवन  पञ्चप्रयोजन ।।
सुमत सुमंगल समंत्र सैमंतिक । सौभाग्य सु-लगन   शुभस्वास्तिक।।


सरस सालोक्य  सुरसार सुहाई । सप्तसुर  सालिका  सुरीली  सहनाई।।
बहन बहिअर बहनेली बहुताई । चरण  त्राण   छुपाई   मांगें   बधाई।।


तृपत तोयधि तिलकतूल तोषा। दधि   दधिज  दप्   दर्शन  देवों-सा ।।
धरणी धराधीश धरधरुण धारा। नाथ   नर   नागर   नेग   न्योछारा ।।


पंडाल  पंडल  परिणय  पर्विधि। प्रमुग्ध   प्रमुदित  प्रणय   प्राकरणि ।।
पुण्य  पुराण  पुरुषक  पुरुडासा। पुरोधा     स्वयंभू       स्वाभाव्यासा ।।


कलस-कलश  कुलिनस  कुसुम कोशिका कोष ।
कालिंद कालिंदक कीलाल कली-कली कै कोस ।। 


SUNDAY, JUNE 24, 2012                                                                                          


अंजुरी   अर्चन  अर्क  असुरारि । पत्र   पत्रि   पुण्य   पुटक   पूरारी ।।
स्वस्ति स्वस्त्ययन स्वर गुंजा। पुष्कर  पथ  पर   पुंडरिक   पूजा ।।


श्लोक  स्तुति   स्वनि निराजन। राम    रूप   रस   रत्नेश    राजन ।।
नील  नीलांजन  श्याम  शरीरा। सुमत   सुमति  धुरी   धर   धीरा ।।


प्रथा परिणेय परिणमन आसन। युगल  दंपत्ति परिणद्ध परिपुजन ।।
गगन  सुमन  झरे  ज्यूँ  झरना। नीरनिधि   निध्र  पाणि   ग्रहणा ।।


मातु  पितृ  पय पानी  प्रहारण। कर्मण्य   कुकुद   कर्म     प्रहर्षण ।।
यजत  यजंती  यज्ञ  यजमाना। यथा    योग्य   पचोतर      दाना ।।


पिया   परिणय   सूत्र   पहनाई। पुन:   पुन:    सप्त  वचन   भराई ।।
सगुन समुख सुमन  देव वर्षहिं। सखा  सखी  संग  संग उत्कर्षहिं ।।


मगन मगन   सागर   सुधामा। सप्तपदी पूजन परिणय परिनामा ।।
पद  पद पदिक  पदम्  पदांतर। पदनत  प्रस्तर  पृथक   करे   वर ।।


चतुष्पद  वरग्रत: परतस् रक्षा । त्रिपद   वधुग्रत:   स्वयं    सुरक्षा ।।
सहचारी   चली  चारी  चरणा । पिया   पाई   बहुपुजहिं    अपर्णा ।।


सशब्द   सप्त वचन भरे भारी । कहीं  सुधानिधि   सदैव   तुम्हारी ।।
तरी तर दिरीस थिर नीरधारा । मीर   मन  मंदिर  बंध  बारम्बारा ।।


सित  संकाश  सुन्दर सुधामा । सिन्धु   सागर   परम   सुखधामा ।।
प्रेम प्रजप्रचेता प्रसूनप्रसाधन । मांग  मुंदरी  भरी सैन्धौरी साधन ।।


माथ नाथ  भरे  सिन्धु सेंदुरी । अधर   अधर     अधीर      अधूरी ।।
संग संगत संग सागर सिंदुरा । जीवन   अधूरा   संगनी  सौं  पूरा ।।
  
दोo(क) = मन मति मंत दान लिए अनुदान करें मनोहार ।
              सौ  सौ  सोन  यसोदा  करे  बाँध  गले  में हार ।।


दोo(ख)= घट  घट  सागर  सुधानिधि  नीर  नुपुर  न्यास ।
             नग  नग  नाथ  नथन   वेणी   वेणि  विन्यास ।। 



FRIDAY, JUNE 29, 2012                                                                                            


सुनयन प्रावंजल प्रावारी प्रावरणा । मातु-पिता  लगी  लागिन चरणा ।।
नयनुन्न उनवना जलझल सिंचा ।  कस   कस    कंठाकंठन     भींचा ।।


प्रिय प्राभृत अन्नधन्न समदाना । आभ    अभरण    रतनन     नाना ।।
पाटलक   पटोला  पाट   पहनाई । बोले   बाबुल  बस  बिहाई   बिदाई ।।


नलिन  नयन नवनि नीर नहाए । कनक     कणिका   कण   कर्षणायें ।।
कज्जल कोर  कोर कारी श्रंगारी । कण  कण   कनी   कुमकुम  क्यारी ।।


खन  कण घन  करधन गंग घर । गामिनी  गंतव्य  गति  गगन गहर ।।
दोउ दिरिस  द्रप्स  धरधरा धारा । तुषारान्शु  तवीष  तोय  ताल   तारा ।।


सफल सकल सभाजन सम्माना । नाथ  साथ सिन्धु  ससि  समादाना ।।
धार  धार  दृग्  दारुण  द्विरधारा । द्रव्य   तल   धुन्धरा    नगरी   द्वारा ।।




दो0 (क) = पाँव  पी  परिधि  पर्वधि  पियूष  पलक  पर  पीर ।
                धुल-धूल धुर धवलित धुरवा निध्र नयन नत नीर ।।  


दो0(ख) = चरण-चरण चार चरणानुगम चाप चित् चिर-चीर ।
               चाष  चाह  चारु  चारण  चल चरणानति चिरौरीर ।।





काल  क्लिष्ट  कली  क्लेदु क्रंदन । क्लिन्नास    क्रोड    खंडन    खंडन ।।
संग  सिन्धु  संयोगिनी  संयोगा । विदा  विधु  विदीर्ण  विरह वियोगा ।।


मेघमाल  बाल  फाल  भाल  पोहे । बहुश:   बिखरे   बिछुड़े   बहे   बोहे ।।
सरस  सर  सई  सरित सर सोता । सरसर  सरिस  सर  सरासर सरोता ।।


मातु  पिता  सोम समुद्र समुदाई । सगन सगुण  संग समदन समुझाई ।।
सगलगी सगासंग सजल समाना। सागर   संगिनी   संग   संग  जाना ।।


नदीं  निधि  नत  नैनन  निथारा । तरुणी  तरल  तर  तीर   तीर  तारा ।।
तृपत  तिरत तिल  तिल तरलाई । तनोजा  तनी  तोयधि  पुण्य  पराई ।।


धर  धूसरित  धुरी धरनाथ धापा । थप   थप   थिरकत   थाहे    थापा ।।
दक्   दक्  दक्षा   दान   दाक्षिणा । तोय  तूल  तिलकित  तल  तीक्ष्णा ।।




विवाह विलोकन विधु वारिधि आनील आनंत्य आनंद ।
मुहुस  मनन  मुनिजन  गुण्य  गह  गाहे गाधिकुलचंद ।।




बांध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिन्धु बारिस ।
सत्य  तोयनिधि  कंपति  उदधि  पयोधि  नदीस ।।
                           ----- ।। तुलसीदास ।। -----

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